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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 9
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु

हे धनञ्जय ! उन (सृष्टि-रचना आदि) कर्मोंमें अनासक्त और उदासीनकी तरह रहते हुए मेरेको वे कर्म नहीं बाँधते। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

அர்ஜுனா, இந்தச் செயல்கள் என்னைப் பிணைப்பதில்லை, அந்தச் செயல்களில் பற்றற்றவனாக, அலட்சியமாக உட்கார்ந்திருக்கிறான்.

MarathiIND

हे अर्जुना, या कृत्यांमुळे मला बांधले जात नाही, त्या कृत्यांशी अलिप्त, अलिप्त होऊन बसलो आहे.

KannadaIND

ಈ ಕೃತ್ಯಗಳು ನನ್ನನ್ನು ಬಂಧಿಸುವುದಿಲ್ಲ, ಓ ಅರ್ಜುನನೇ, ಆ ಕೃತ್ಯಗಳಿಗೆ ಅಂಟಿಕೊಂಡಿರದೆ ಉದಾಸೀನನಾಗಿ ಕುಳಿತಿರುವೆ.

TeluguIND

ఈ పనులు నన్ను బంధించవు, ఓ అర్జునా, ఉదాసీనంగా, ఆ చర్యలతో సంబంధం లేకుండా కూర్చున్నాను.

NepaliIND

यी कर्महरूले मलाई बाँध्दैनन्, हे अर्जुन, ती कर्महरूमा अलिप्त भएर बसेको छु।

MalayalamIND

ഹേ അർജ്ജുനാ, ആ പ്രവൃത്തികളോട് ബന്ധമില്ലാത്തവനായി ഉദാസീനനായി ഇരിക്കുന്ന എന്നെ ഈ പ്രവൃത്തികൾ ബന്ധിക്കുന്നില്ല.

SindhiIND

اهي عمل مون کي پابند نٿا ڪن، اي ارجن، هڪ لاتعلق بيٺو، انهن عملن کان بيزار.

BengaliIND

হে অর্জুন, এই কর্মগুলি আমাকে আবদ্ধ করে না, সেই সমস্ত কর্মের প্রতি উদাসীন, অসংলগ্ন হয়ে বসে আছি।

PunjabiIND

ਇਹ ਕਰਮ ਮੈਨੂੰ ਨਹੀਂ ਬੰਨ੍ਹਦੇ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਇੱਕ ਉਦਾਸੀਨ, ਉਹਨਾਂ ਕਰਮਾਂ ਤੋਂ ਨਿਰਲੇਪ ਬੈਠੇ ਹੋਏ।

OdiaIND

ହେ ଅର୍ଜୁନ, ଏହି କାର୍ଯ୍ୟଗୁଡ଼ିକ ମୋତେ ବାନ୍ଧି ରଖେ ନାହିଁ, ଏକ ଉଦାସୀନ ଭାବରେ ବସି, ସେହି କାର୍ଯ୍ୟଗୁଡ଼ିକ ସହିତ ସଂଯୁକ୍ତ ନୁହେଁ |

GujaratiIND

હે અર્જુન, આ કૃત્યો મને બંધનકર્તા નથી, તે કૃત્યોથી અલિપ્ત, અલિપ્ત બનીને બેઠા છે.

KonkaniIND

त्या कृत्यां कडेन असक्त, एक उदासीन म्हणून बसून अर्जुन, हीं कृत्यां म्हाका बांदनात.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु'--महासर्गके आदिमें प्रकृतिके परवश हुए प्राणियोंकी उनके कर्मोंके अनुसार विविध प्रकारसे रचनारूप जो कर्म है, उसमें मेरी आसक्ति नहीं है। कारण कि मैं उनमें उदासीनकी तरह रहता हूँ अर्थात् प्राणियोंके उत्पन्न होनेपर मैं हर्षित नहीं होता और उनके प्रकृतिमें लीन होनेपर मैं खिन्न नहीं होता।यहाँ 'उदासीनवत्' पदमें जो 'वत्'(वति) प्रत्यय है, उसका अर्थ तरह होता है अतः इस पदका अर्थ हुआ -- उदासीनकी तरह। भगवान्ने अपनेको उदासीनकी तरह क्यों कहा? कारण कि मनुष्य उसी वस्तुसे उदासीन होता है, जिस वस्तुकी वह सत्ता मानता है। परन्तु जिस संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होता है, उसकी भगवान्के सिवाय कोई स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है। इसलिये भगवान् उस संसारकी रचनारूप कर्मसे उदासीन क्या रहें? वे तो उदासीनकी तरह रहते हैं; क्योंकि भगवान्की दृष्टिमें संसारकी कोई सत्ता ही नहीं है। तात्पर्य है कि वास्तवमें यह सब भगवान्का ही स्वरूप है, इनकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं, तो अपने स्वरूपसे भगवान् क्या उदासीन रहें? इसलिये भगवान् उदासीनकी तरह हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तब तो भूतसमुदायको विषम रचनेवाले आप परमेश्वरका उस विषम रचनाजनित पुण्यपापसे भी सम्बन्ध होता ही होगा ऐसी शङ्का होनेपर भगवान् ये वचन बोले --, हे धनंजय भूतसमुदायकी विषम रचनानिमित्तक वे कर्म? मुझ ईश्वरको बन्धनमें नहीं डालते। उन कर्मोंका सम्बन्ध न होनेमें कारण बतलाते हैं -- मैं उन कर्मोंमें उदासीनकी भाँति स्थित रहता हूँ अर्थात् आत्मा निर्विकार है? इसलिये जैसे कोई उदासीन -- उपेक्षा करनेवाला स्थित हो उसीकी भाँति मैं स्थित रहता हूँ। तथा उन कर्मोंमें फलसम्बन्धी आसक्तिसे और मैं करता हूँ इस अभिमानसे भी मैं रहित हूँ ( इस कारण वे कर्म मुझे नहीं बाँधते )। इससे यह अभिप्राय समझ लेना चाहिये कि कर्तापनके अभिमानका अभाव और फलसम्बन्धी आसक्तिका अभाव दूसरोंको भी बन्धनरहित कर देनेवाला है। इसके सिवा अन्य प्रकारसे किये हुए कर्मोंद्वारा मूर्खलोग कोशकार ( रेशमके कीड़े ) की भाँति बन्धनमें पड़ते हैं।,

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Sri Anandgiri

यदि प्राकृतं भूतग्रामं स्वभावादविद्यादितन्त्रं विषमं विदधासि तर्हि तव विषमसृष्टिप्रयुक्तं धर्मादिमत्त्वमित्यनीश्वरत्वापत्तिरिति शङ्क्यते -- तर्हीति। तत्रेति सप्तम्या परमेश्वरो निरुच्यते। ईश्वरस्य फलासङ्गाभावात्कर्तृत्वाभिमानाभावाच्च कर्मासंबन्धवदीश्वरादन्यस्यापि तदुभयाभावो धर्माद्यसंबन्धे कारणमित्याह -- अतोऽन्यस्येति। यदि कर्मसु कर्तृत्वाभिमानो वा कस्यचित्कर्मफलसङ्गो वा स्यात्तत्राह -- अन्यथेति।

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Sri Dhanpati

ननु यथा जीवो विषमस्वभावत्वाद्वध्यते तथा त्वामपि देवनतिर्यगादिरुपविषमसृष्टिकर्तारं वैषम्यावशयंभावाद्धर्माधर्मादिकर्माणि कुतो न निबन्धन्तीत्याशङ्क्यास्य शुभं दास्याम्यस्याशुभमिति तत्तच्छुभाशुभदानात्म केषु कर्मस्वसक्तं यता कल्पवृक्षादिकमुदासी नं तत्तत्पुरुषस्य तत्तत्कर्मजन्यतत्तत्संकल्पानुसारितत्तत्फलोत्पत्तिकर्तारं तानि तानि कर्माणइ न निबन्धन्ति तथा मामपीत्याह -- नचेति। मामीश्वरं तानि भूतसमुदायस्य विष्टम्भविसर्गनिमित्तानि कर्माणि न निबन्धन्ति यथा युधिष्ठिरराजसूर्यार्थं धनं जेतुं प्रवृत्तं त्वां तत्र तत्र कृतानि निग्रहानुग्रहादीनि कर्माणि न निबन्धन्ति तत्तद्राज्ञः कर्मानुसारेण निरग्रहानुग्रहादीनां त्वया संपादितत्वादिति धनंजयेति संबोधनाभिसंधिः। कर्माणि मां न निबन्धन्तीत्युक्तं तत्र हेतुमाह -- उदासीनवदासीनमित्यादिना। तथाच फलासक्तिरहितस्याहंकरोमीत्यभिमानवर्जितस्य न तत्तत्कर्मभिर्बन्धः अतोऽन्यस्यापि फलासक्तिकर्तत्वाभावोऽबन्धस्य हेतुरन्यथा कोशकारवन्मूढः कर्मभिर्बध्यत इत्यभिप्रायः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nanone
chaas
māmme
tānithose
karmāṇiactions
nibadhnantibind
dhanañjayaArjun, conqueror of wealth
udāsīnavat
āsīnamsituated
asaktamdetached
teṣhuthose
karmasuactions
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 9.8
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्

प्रकृतिके वशमें होनेसे परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायको मैं (कल्पोंके आदिमें) अपनी प्रकृतिको वशमें करके बार-बार रचता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.10
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते

प्रकृति मेरी अध्यक्षतामें सम्पूर्ण चराचर जगत् को रचती है। हे कुन्तीनन्दन ! इसी हेतुसे जगत् का विविध प्रकारसे परिवर्तन होता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 9
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 9
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु

हे धनञ्जय ! उन (सृष्टि-रचना आदि) कर्मोंमें अनासक्त और उदासीनकी तरह रहते हुए मेरेको वे कर्म नहीं बाँधते। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 9 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 9 का हिंदी अर्थ: "हे धनञ्जय ! उन (सृष्टि-रचना आदि) कर्मोंमें अनासक्त और उदासीनकी तरह रहते हुए मेरेको वे कर्म नहीं बाँधते। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 9?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 9 translates to: "These acts do not bind Me, O Arjuna, sitting as one indifferent, unattached to those acts. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 9 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। हे धनञ्जय ! उन (सृष्टि-रचना आदि) कर्मोंमें अनासक्त और उदासीनकी तरह रहते हुए मेरेको वे कर्म नहीं बाँधते। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "na cha māṁ tāni karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya" mean in English?

"na cha māṁ tāni karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 9. These acts do not bind Me, O Arjuna, sitting as one indifferent, unattached to those acts. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.