Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 8
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्

प्रकृतिके वशमें होनेसे परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायको मैं (कल्पोंके आदिमें) अपनी प्रकृतिको वशमें करके बार-बार रचता हूँ। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

BengaliIND

আমার প্রকৃতিকে অ্যানিমেট করে, আমি বারবার এই সমস্ত প্রাণীদের পাঠাই, প্রকৃতির শক্তির অধীনে অসহায়।

TeluguIND

నా స్వభావాన్ని యానిమేట్ చేస్తూ, ప్రకృతి శక్తిలో నిస్సహాయంగా ఉన్న ఈ సమూహాన్ని నేను మళ్లీ మళ్లీ బయటకు పంపుతున్నాను.

GujaratiIND

મારી પ્રકૃતિને એનિમેટ કરીને, હું ફરીથી અને ફરીથી પ્રકૃતિના બળ હેઠળ લાચાર એવા આ બધા જીવોને મોકલું છું.

MaithiliIND

अपन प्रकृति के जीवंत करैत हम बेर-बेर प्रकृति के बल में असहाय एहि सब जीव के भीड़ के आगू पठा दैत छी |

BhojpuriIND

अपना प्रकृति के जीवंत करत हम बेर-बेर प्रकृति के बल में लाचार, एह सब जीव के भीड़ के आगे भेजत बानी।

ManipuriIND

ꯑꯩꯒꯤ ꯄ꯭ꯔꯀ꯭ꯔ꯭ꯏꯇꯤꯕꯨ ꯍꯤꯡꯍꯟꯗꯨꯅꯥ, ꯑꯩꯅꯥ ꯍꯟꯖꯤꯟ ꯍꯟꯖꯤꯟ ꯃꯍꯧꯁꯥꯒꯤ ꯁꯛꯇꯤꯒꯤ ꯃꯈꯥꯗꯥ ꯃꯇꯦꯡ ꯄꯥꯡꯗꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯀꯌꯥ ꯑꯁꯤ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛ ꯊꯥꯗꯣꯀꯏ꯫

TamilIND

என் இயல்பை உயிர்ப்பித்து, இயற்கையின் சக்தியின் கீழ் உதவியற்ற இந்த திரளான உயிரினங்களை நான் மீண்டும் மீண்டும் அனுப்புகிறேன்.

MalayalamIND

എൻ്റെ പ്രകൃതിയെ ആനിമേറ്റ് ചെയ്തുകൊണ്ട്, പ്രകൃതിയുടെ ശക്തിയിൽ നിസ്സഹായരായ ഈ അനേകം ജീവികളെ ഞാൻ വീണ്ടും വീണ്ടും അയക്കുന്നു.

MarathiIND

माझ्या प्रकृतीला ॲनिमेट करून, मी पुन्हा पुन्हा निसर्गाच्या बळाखाली असहाय अशा सर्व प्राण्यांना पाठवत आहे.

KannadaIND

ನನ್ನ ಪ್ರಕೃತಿಯನ್ನು ಅನಿಮೇಟ್ ಮಾಡುತ್ತಾ, ನಾನು ಮತ್ತೆ ಮತ್ತೆ ಈ ಎಲ್ಲಾ ಬಹುಸಂಖ್ಯೆಯ ಜೀವಿಗಳನ್ನು ಕಳುಹಿಸುತ್ತೇನೆ, ಪ್ರಕೃತಿಯ ಬಲದ ಅಡಿಯಲ್ಲಿ ಅಸಹಾಯಕ.

NepaliIND

मेरो प्रकृतिलाई एनिमेटेड गर्दै, म यी सबै प्राणीहरूको भीडलाई बारम्बार पठाउँछु, प्रकृतिको बल अन्तर्गत असहाय।

SindhiIND

منهنجي فطرت کي متحرڪ ڪندي، مان بار بار انهن سڀني جاندارن کي موڪليان ٿو، جيڪي فطرت جي قوت هيٺ لاچار آهن.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्'-- यहाँ प्रकृति शब्द व्यष्टि प्रकृतिका वाचक है। महाप्रलयके समय सभी प्राणी अपनी व्यष्टि प्रकृति-(कारणशरीर) में लीन हो जाते हैं, व्यष्टि प्रकृति समष्टि प्रकृतिमें लीन होती है और समष्टि प्रकृति परमात्मामें लीन हो जाती है। परन्तु जब महासर्गका समय आता है, तब जीवोंके कर्मफल देनेके लिये उन्मुख हो जाते हैं। उस उन्मुखताके कारण भगवान्में 'बहु स्यां प्रजायेय' (छान्दोग्य0 6। 2। 3) -- यह संकल्प होता है, जिससे समष्टि प्रकृतिमें क्षोभ (हलचल) पैदा हो जाता है। जैसे, दहीको बिलोया जाय तो उसमें मक्खन और छाछ --ये दो चीजें पैदा हो जाती हैं। मक्खन तो ऊपर आ जाता है और छाछ नीचे रह जाती है। यहाँ मक्खन सात्त्विक है, छाछ तामस है और बिलोनारूप क्रिया राजस है। ऐसे ही भगवान्के संकल्पसे प्रकृतिमें क्षोभ हुआ तो प्रकृतिसे सात्त्विक, राजस और तामस --ये तीनों गुण पैदा हो गये। उन तीनों गुणोंसे स्वर्ग, मृत्यु और पाताल --ये तीनों लोक पैदा हुए। उन तीनों लोकोंमें भी अपने-अपने गुण, कर्म और स्वभावसे सात्त्विक, राजस और तामस जीव पैदा हुए अर्थात् कोई सत्त्व-प्रधान हैं, कोई रजःप्रधान हैं और कोई तमःप्रधान हैं।इसी महासर्गका वर्णन चौदहवें अध्यायके तीसरे-चौथे श्लोकोंमें भी किया गया है। वहाँ परमात्माकी प्रकृतिको 'महद्ब्रह्म' कहा गया है और परमात्माके अंश जीवोंका अपने-अपने गुण, कर्म और स्वभावके अनुसार प्रकृतिके साथ विशेष सम्बन्ध करा देनेको बीज-स्थापन करना कहा गया है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस प्रकार अविद्यारूप --, अपनी प्रकृतिको वशमें करके? मैं प्रकृतिसे उत्पन्न हुए इस विद्यमान समग्र अस्वतन्त्र भूतसमुदायको? जो कि स्वभाववश अविद्यादि दोषोंसे परवश हो रहा है? बारंबार रचता हूँ।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

तर्हि कीदृशी प्रकृतिः सा च कथं सृष्टावुपयुक्तेत्याशङ्क्याह -- एवमिति। संसारस्यानादित्वद्योतनार्थं पुनःपुनरित्युक्तम्। भूतसमुदायस्याविद्यास्मितादिदोषपरवशत्वे हेतुमाह -- स्वभाववशादिति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

ननु सृजाभ्यहमित्युक्त्या किं प्रकृतिं स्वामनधिष्ठायैव सृजसि नेत्याह -- प्रकृतिमविद्यालक्षणां त्रिगुणात्मिकां मायं स्वां स्वाधीनामवष्टभ्याधिष्टायेमं प्रत्क्षादिसन्नधापितं भूतानां ग्रामं समुदायं निखिलं प्रकृतेः स्वभावस्य वशादवशं अविद्यादिदोषैः परवशीकृतं पुनः पुनः सृजामि। अनेन संसारस्यानादित्वं सूचितम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
prakṛitimthe material energy
svāmmy own
avaṣhṭabhyapresiding over
visṛijāmigenerate
punaḥ punaḥagain and again
bhūtagrāmam
imamthese
kṛitsnamall
avaśhambeyond their control
prakṛiteḥnature
vaśhātforce
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 9.7
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्। कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्

हे कुन्तीनन्दन ! कल्पोंका क्षय होनेपर सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं और कल्पोंके आदिमें मैं फिर उनकी रचना करता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.9
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु

हे धनञ्जय ! उन (सृष्टि-रचना आदि) कर्मोंमें अनासक्त और उदासीनकी तरह रहते हुए मेरेको वे कर्म नहीं बाँधते। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 8
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 8
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्

प्रकृतिके वशमें होनेसे परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायको मैं (कल्पोंके आदिमें) अपनी प्रकृतिको वशमें करके बार-बार रचता हूँ। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ: "प्रकृतिके वशमें होनेसे परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायको मैं (कल्पोंके आदिमें) अपनी प्रकृतिको वशमें करके बार-बार रचता हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 8?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 8 translates to: "Animating My Nature, I again and again send forth all this multitude of beings, helpless under the force of Nature. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 8 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। प्रकृतिके वशमें होनेसे परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायको मैं (कल्पोंके आदिमें) अपनी प्रकृतिको वशमें करके बार-बार रचता हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "prakṛitiṁ svām avaṣhṭabhya visṛijāmi punaḥ punaḥ" mean in English?

"prakṛitiṁ svām avaṣhṭabhya visṛijāmi punaḥ punaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 8. Animating My Nature, I again and again send forth all this multitude of beings, helpless under the force of Nature. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.