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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 7
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्। कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्

हे कुन्तीनन्दन ! कल्पोंका क्षय होनेपर सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं और कल्पोंके आदिमें मैं फिर उनकी रचना करता हूँ। — VaniSagar

Global Translations

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MaithiliIND

सब जीव, हे अर्जुन, एक कल्प के अंत में मम प्रकृति में जाते हैं; अगिला कल्पक प्रारंभ मे पुनः पठा दैत छी ।

MizoIND

Thilsiam zawng zawng, Aw Arjuna, Kalpa pakhat tawp lamah Ka Nature-ah an lut vek a; Kalpa lo awm tur tan tirh lamah ka tir leh thin.

ManipuriIND

ꯖꯤꯕ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛ, ꯍꯦ ꯑꯔꯖꯨꯟ, ꯀꯜꯄ ꯑꯃꯒꯤ ꯑꯔꯣꯏꯕꯗꯥ ꯑꯩꯒꯤ ꯄ꯭ꯔꯀ꯭ꯔ꯭ꯏꯇꯤꯗꯥ ꯆꯠꯂꯤ; ꯃꯊꯪꯒꯤ ꯀꯜꯄꯀꯤ ꯍꯧꯔꯀꯐꯃꯗꯥ ꯃꯈꯣꯌꯕꯨ ꯑꯃꯨꯛ ꯍꯟꯅꯥ ꯊꯥꯔꯀꯏ꯫

BhojpuriIND

सब जीव हे अर्जुन, एगो कल्प के अंत में हमरा प्रकृति में जाला; अगिला कल्प के शुरुआत में फेरु से भेजत बानी।

KonkaniIND

सगळे प्राणी अर्जुन एका कल्पाच्या शेवटाक म्हज्या स्वभावांत वतात; फुडल्या कल्पाचे सुरवेक परतून धाडटां.

TamilIND

அனைத்து உயிரினங்களும், ஓ அர்ஜுனா, ஒரு கல்பத்தின் முடிவில் என் இயற்கைக்கு செல்கின்றன; அடுத்த கல்பத்தின் தொடக்கத்தில் நான் அவர்களை மீண்டும் அனுப்புகிறேன்.

MarathiIND

हे अर्जुना, कल्पाच्या शेवटी माझ्या प्रकृतीत जा; पुढील कल्पाच्या सुरुवातीला मी त्यांना पुन्हा पाठवीत आहे.

GujaratiIND

હે અર્જુન, સર્વ જીવો, કલ્પના અંતે મારી પ્રકૃતિમાં જાઓ; હું તેમને આગામી કલ્પની શરૂઆતમાં ફરીથી મોકલું છું.

KannadaIND

ಓ ಅರ್ಜುನಾ, ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳು ಕಲ್ಪದ ಕೊನೆಯಲ್ಲಿ ನನ್ನ ಪ್ರಕೃತಿಗೆ ಹೋಗುತ್ತವೆ; ಮುಂದಿನ ಕಲ್ಪದ ಆರಂಭದಲ್ಲಿ ನಾನು ಅವರನ್ನು ಮತ್ತೆ ಕಳುಹಿಸುತ್ತೇನೆ.

MalayalamIND

ഹേ അർജ്ജുനാ, എല്ലാ ജീവജാലങ്ങളും ഒരു കൽപ്പത്തിനൊടുവിൽ എൻ്റെ പ്രകൃതിയിലേക്ക് പോകുന്നു; അടുത്ത കൽപത്തിൻ്റെ തുടക്കത്തിൽ ഞാൻ അവരെ വീണ്ടും അയയ്ക്കുന്നു.

TeluguIND

సమస్త జీవులు, ఓ అర్జునా, ఒక కల్పము చివరిలో నా స్వభావములోనికి వెళ్లి; నేను వాటిని తదుపరి కల్ప ప్రారంభంలో మళ్లీ పంపుతాను.

BengaliIND

সমস্ত প্রাণী, হে অর্জুন, একটি কল্পের শেষে আমার প্রকৃতিতে যান; আমি পরবর্তী কল্পের শুরুতে তাদের আবার পাঠাচ্ছি।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकां कल्पक्षये' -- सम्पूर्ण प्राणी मेरे ही अंश हैं और सदा मेरेमें ही स्थित रहनेवाले हैं। परन्तु वे प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर आदिके साथ तादात्म्य (मैं-मेरेपनका सम्बन्ध) करके जो कुछ भी कर्म करते हैं, उन कर्मों तथा उनके फलोंके साथ उनका सम्बन्ध जुड़ता जाता है, जिससे वे बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं। जब महाप्रलयका समय आता है,(जिसमें ब्रह्माजी सौ वर्षकी आयु पूरी होनेपर लीन हो जाते हैं), उस समय प्रकृतिके परवश हुए वे सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिजन्य सम्बन्धको लेकर अर्थात् अपने-अपने कर्मोंको लेकर मेरी प्रकृतिमें लीन हो जाते हैं।महासर्गके समय प्राणियोंका जो स्वभाव होता है, उसी स्वभावको लेकर वे महाप्रलयमें लीन होते हैं। 'पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्'-- महाप्रलयके समय अपने-अपने कर्मोंको लेकर प्रकृतिमें लीन हुए प्राणियोंके कर्म जब परिपक्व होकर फल देनेके लिये उन्मुख हो जाते हैं, तब प्रभुके मनमें 'बहु स्यां प्रजायेय' ऐसा संकल्प हो जाता है। यही महासर्गका आरम्भ है। इसीको आठवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें कहा है -- 'भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः' अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियोंका जो होनापन है, उसको प्रकट करनेके लिये भगवान्का जो संकल्प है, यही विसर्ग (त्याग) है और यही आदिकर्म है। चौदहवें अध्यायमें इसीको 'गर्भं' 'दधाम्यहम्' (14। 3) और 'अहं बीजप्रदः पिता' (14। 4) कहा है।तात्पर्य यह हुआ कि कल्पोंके आदिमें अर्थात् महासर्गके आदिमें ब्रह्माजीके प्रकट होनेपर मैं पुनः प्रकृतिमें लीन हुए, प्रकृतिके परवश हुए, उन जीवोंका उनके कर्मोंके अनुसार उन-उन योनियों-(शरीरों-) के साथ विशेष सम्बन्ध करा देता हूँ--यह मेरा उनको रचना है। इसीको भगवान्ने चौथे अध्यायके तेरहवें श्लोकमें कहा है--'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः'अर्थात् मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है।ब्रह्माजीके एक दिनका नाम 'कल्प' है, जो मानवीय एक हजार चतुर्युगीका होता है। इतने ही समयकी ब्रह्माजीकी एक रात होती है। इस हिसाबसे ब्रह्माजीकी आयु सौ वर्षोंकी होती है। ब्रह्माजीकी आयु समाप्त होनेपर जब ब्रह्माजी लीन हो जाते हैं, उस महाप्रलयको यहाँ 'कल्पक्षये' पदसे कहा गया है। जब ब्रह्माजी पुनः प्रकट होते हैं, उस महासर्गको यहाँ 'कल्पादौ'पदसे कहा गया है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

इस प्रकार जगत्के स्थितिकालमें? आकाशमें वायुकी भाँति? मुझमें स्थित जो समस्त भूत हैं वे --, सम्पूर्ण प्राणी? हे कुन्तीपुत्र प्रलयकालमें मेरी त्रिगुणमयी -- अपरानिकृष्ट प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं और फिर कल्पके आदिमें अर्थात् उत्पत्तिकालमें मैं पहलेकी भाँति पुनः उन प्राणियोंको रचता हूँ -- उत्पन्न करता हूँ।

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Sri Anandgiri

आकाशे वाय्वादिस्थितिवदाकाशादीनि भूतानि स्थितिकाले परमेश्वरे स्थितानि चेत्तर्हि प्रलयकाले ततोऽन्यत्र तिष्ठेयुरित्याशङ्क्याह -- एवमिति। प्रकृतिशब्दस्य स्वभाववचनत्वं व्यावर्तयति -- त्रिगुणात्मिकामिति। सा चापरेयमिति प्रागेव सूचितेत्याह -- अपरामिति। तस्याश्चेश्वराधीनत्वेनास्वातन्त्र्यमाह -- मदीयामिति। प्रलयकाले भूतानि यथोक्तां प्रकृतिं यान्ति चेदुत्पत्तिकालेऽपि ततस्तेषामुत्पत्तेरीश्वराधीनत्वं भूतसृष्टेर्न स्यादित्याशङ्क्याह -- पुनरिति।

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Sri Dhanpati

आकाशे वायुरिवाकाशादीनि समस्तभूतानि स्थितिकाले मयि स्थितानीत्युक्तम्? इदानीं लयकाले उत्पत्तिकाले च मयि तिष्ठन्तीति वक्तुं स्वाधीनप्रकृतौ सर्वेषां भूतानां लयं स्वस्मादुत्पत्तिं चाह -- सर्वेति। सर्वभूतानि प्रकृतिं त्रिगुणात्मिकामपरां माया मामिकां मदीयाम्। मदधीनामितियावत्। नतु स्वतन्त्रां कल्पक्षये यान्ति तस्यां लीयन्त इत्यर्थः। कल्पक्षय इत्यस्य सर्वभूतानि प्रकृतिमिति स्वारस्यात् ब्राह्मे प्रलयकाले इत्यर्थः। पुनर्भूस्तानि ब्रह्मादीनि सर्वभूतानि कल्पादावुत्पत्तिकालेऽहं सृजामि पूर्ववदुत्पादयामि। एतादृशोऽहं त्वन्मातृभ्रातृपुत्ररुपेणाविर्भूत इत्यहो तव भाग्यमिति कौन्तेयेति संबोधनाशयः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sarvabhūtāni
kaunteyaArjun, the son of Kunti
prakṛitimprimordial material energy
yāntimerge
māmikāmmy
kalpakṣhaye
punaḥagain
tānithem
kalpaādau
visṛijāmimanifest
ahamI
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Bhagavad Gita · 9.6
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय

जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं -- ऐसा तुम मान लो। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.8
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्

प्रकृतिके वशमें होनेसे परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायको मैं (कल्पोंके आदिमें) अपनी प्रकृतिको वशमें करके बार-बार रचता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 7
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 7
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्। कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्

हे कुन्तीनन्दन ! कल्पोंका क्षय होनेपर सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं और कल्पोंके आदिमें मैं फिर उनकी रचना करता हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ: "हे कुन्तीनन्दन ! कल्पोंका क्षय होनेपर सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं और कल्पोंके आदिमें मैं फिर उनकी रचना करता हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 7?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 7 translates to: "All beings, O Arjuna, go into My Nature at the end of a Kalpa; I send them forth again at the beginning of the next Kalpa. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्। कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 7 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। हे कुन्तीनन्दन ! कल्पोंका क्षय होनेपर सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं और कल्पोंके आदिमें मैं फिर उनकी रचना करता हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sarva-bhūtāni kaunteya prakṛitiṁ yānti māmikām" mean in English?

"sarva-bhūtāni kaunteya prakṛitiṁ yānti māmikām" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 7. All beings, O Arjuna, go into My Nature at the end of a Kalpa; I send them forth again at the beginning of the next Kalpa. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.