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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 6
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय

जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं -- ऐसा तुम मान लो। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TeluguIND

ప్రబలమైన గాలి, ప్రతిచోటా కదులుతున్నట్లుగా, ఎల్లప్పుడూ ఈథర్‌లో విశ్రాంతి తీసుకుంటుంది, అలాగే, అన్ని జీవులు నాలో విశ్రాంతి తీసుకుంటున్నాయని తెలుసుకోండి.

KannadaIND

ಎಲ್ಲೆಲ್ಲಿಯೂ ಚಲಿಸುವ ಪ್ರಬಲವಾದ ಗಾಳಿಯು ಯಾವಾಗಲೂ ಈಥರ್‌ನಲ್ಲಿ ನೆಲೆಗೊಂಡಿರುವಂತೆ, ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳು ನನ್ನಲ್ಲಿ ವಿಶ್ರಾಂತಿ ಪಡೆಯುತ್ತವೆ ಎಂದು ತಿಳಿಯಿರಿ.

GujaratiIND

જેમ પ્રબળ પવન, દરેક જગ્યાએ ફરતો હોય છે, હંમેશા આકાશમાં રહે છે, તે જ રીતે, તમે પણ જાણો કે બધા જીવો મારામાં વિશ્રામ કરે છે.

NepaliIND

जसरी सर्वत्र चल्ने शक्तिशाली हावा सधैं ईथरमा रहन्छ, त्यसरी नै सबै प्राणीहरू ममा वास गर्छ भनी जान।

BhojpuriIND

जइसे हर जगह घूमत पराक्रमी हवा हमेशा ईथर में टिकल रहेले, ओइसहीं जान लीं कि सब जीव हमरा में टिकल बाड़े।

ManipuriIND

ꯃꯐꯝ ꯈꯨꯗꯤꯡꯗꯥ ꯆꯠꯊꯣꯛ-ꯆꯠꯁꯤꯟ ꯇꯧꯔꯤꯕꯥ ꯑꯆꯧꯕꯥ ꯅꯨꯡꯁꯤꯠꯅꯥ ꯃꯇꯝ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯇꯥ ꯏꯊꯥꯅꯣꯂꯗꯥ ꯂꯦꯞꯂꯤꯕꯒꯨꯝꯅꯥ, ꯖꯤꯕ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛ ꯑꯩꯉꯣꯟꯗꯥ ꯂꯦꯞꯂꯤ ꯍꯥꯌꯕꯥ ꯈꯉꯕꯤꯌꯨ |

KonkaniIND

सगळेकडेन हालपी पराक्रमी वारें सदांच ईथरांत विश्रांती घेता, तशें सगळे जीव म्हजे भितर विश्रांती घेतात हें जाणून घेयात.

MaithiliIND

जेना सब ठाम चलैत प्रचंड हवा सदिखन ईथर मे विश्राम करैत अछि, तहिना ई जानि लिअ जे सब जीव हमरा मे विश्राम करैत अछि ।

DogriIND

जिवें हर जगह चलदी पराक्रमी हवा हमेशा ईथर विच आराम करदी है, उवें ही जान लओ कि सारे जीव मेरे विच विश्राम रखदे हन।

PunjabiIND

ਜਿਵੇਂ ਸ਼ਕਤੀਸ਼ਾਲੀ ਹਵਾ, ਹਰ ਪਾਸੇ ਚਲਦੀ ਹੈ, ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਈਥਰ ਵਿੱਚ ਟਿਕਦੀ ਹੈ, ਉਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇਹ ਵੀ ਜਾਣੋ ਕਿ ਸਾਰੇ ਜੀਵ ਮੇਰੇ ਵਿੱਚ ਟਿਕਦੇ ਹਨ।

OdiaIND

ଯେହେତୁ ପ୍ରବଳ ପବନ, ସବୁଆଡେ ଗତି କରେ, ସବୁବେଳେ ଇଥରରେ ରହିଥାଏ, ତେଣୁ ମଧ୍ୟ ଜାଣ ଯେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ମୋ ଭିତରେ ବିଶ୍ରାମ କରନ୍ତି |

SindhiIND

جيئن طاقتور واء، هر طرف هلندي، هميشه آسمان ۾ آرام ڪري ٿي، تنهنڪري پڻ ڄاڻو ته سڀئي مخلوق مون ۾ آرام ڪن ٿا.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्'-- जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है अर्थात् वह कहीं निःस्पन्दरूपसे रहती है, कहीं सामान्यरूपसे क्रियाशील रहती है, कहीं बड़े वेगसे चलती है आदि, पर किसी भी रूपसे चलनेवाली वायु आकाशसे अलग नहीं हो सकती। वह वायु कहीं रुकी हुई मालूम देगी और कहीं चलती हुई मालूम देगी, तो भी वह आकाशमें ही रहेगी। आकाशको छोड़कर वह कहीं रह ही नहीं सकती। ऐसे ही तीनों लोकों और चौदह भुवनोंमें घूमनेवाले स्थावरजङ्गम सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें ही स्थित रहते हैं -- तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानि।भगवान्ने चौथे श्लोकसे छठे श्लोकतक तीन बार 'मत्स्थानि' शब्दका प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि ये सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें ही स्थित हैं। मेरेको छोड़कर ये कहीं जा सकते ही नहीं। ये प्राणी प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर आदिके साथ कितना ही घनिष्ठ सम्बन्ध मान लें, तो भी वे प्रकृति और उसके कार्यसे एक हो सकते ही नहीं और अपनेको मेरेसे कितना ही अलग मान लें, तो भी वे मेरेसे अलग हो सकते ही नहीं।वायुको आकाशमें नित्य स्थित बतानेका तात्पर्य यह है कि वायु आकाशसे कभी अलग हो ही नहीं सकती। वायुमें यह किञ्चिन्मात्र भी शक्ति नहीं है कि वह आकाशसे अलग हो जाय क्योंकि आकाशके साथ उसका नित्यनिरन्तर घनिष्ठ सम्बन्ध अर्थात् अभिन्नता है। वायु आकाशका कार्य है और कार्यकी कारणके साथ अभिन्नता होती है। कार्य केवल कार्यकी दृष्टिसे देखनेपर कारणसे भिन्न दीखता है परन्तु कारणसे कार्यकी अलग सत्ता नहीं होती। जिस समय कार्य कारणमें लीन रहता है, उस समय कार्य कारणमें प्रागभावरूपसे अर्थात् अप्रकटरूपसे रहता है, उत्पन्न होनेपर कार्य भावरूपसे अर्थात् प्रकटरूपसे रहता है और लीन होनेपर कार्य प्रध्वंसाभावरूपसे अर्थात् कारणरूपसे रहता है। कार्यका प्रध्वंसाभाव नित्य रहता है, उसका कभी अभाव नहीं होता क्योंकि वह कारणरूप ही हो जाता है। इस रीतिसे वायु आकाशसे ही उत्पन्न होती है, आकाशमें ही स्थित रहती है और आकाशमें ही लीन हो जाती है अर्थात् वायुकी स्वतन्त्र सत्ता न रहकर आकाश ही रह जाता है। ऐसे ही यह जीवात्मा परमात्मासे ही प्रकट होता है, परमात्मामें ही स्थित रहता है और परमात्मामें ही लीन हो जाता है अर्थात् जीवात्माकी स्वतन्त्र सत्ता न रहकर केवल परमात्मा ही रह जाते हैं।जैसे वायु गतिशील होती है अर्थात् सब जगह घूमती है, ऐसे यह जीवात्मा गतिशील नहीं होता। परन्तु जब यह गतिशील प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ अपनापन (मैंमेरापन) कर लेता है, तब शरीरकी गति इसको अपनी गति देखने लग जाती है। गतिशीलता दीखनेपर भी यह नित्यनिरन्तर परमात्मामें ही स्थित रहता है। इसलिये दूसरे अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें भगवान्ने जीवात्माको नित्य, सर्वगत,अचल, स्थाणु और सनातन बताया है। यहाँ शरीरोंकी गतिशीलताके कारण इसको सर्वगत बताया है। अर्थात् यह सब जगह विचरनेवाला दीखता हुआ भी अचल और स्थाणु है। यह स्थिर स्वभाववाला है। इसमें हिलनेडुलनेकी क्रिया नहीं है। इसलिये भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि सब प्राणी अटलरूपसे नित्यनिरन्तर मेरीमें ही स्थित हैं।तात्पर्य हुआ कि तीनों लोक और चौदह भुवनोंमें घूमनेवाले जीवोंकी परमात्मासे भिन्न किञ्चिन्मात्र भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है और हो सकती भी नहीं अर्थात् सब योनियोंमें घूमते रहनेपर भी वे नित्यनिरन्तर परमात्माके सच्चिदानन्दघनस्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। परन्तु प्रकृतिके कार्यके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे इसका अनुभव नहीं हो रहा है। अगर ये मनुष्यशरीरमें अपनापन न करें, मैंमेरापन न करें तो इनको असीम आनन्दका अनुभव हो जाय। इसलिये मनुष्यमात्रको चेतावनी देनेके लिये यहाँ भगवान् कहते हैं कि तुम मेरेमें नित्यनिरन्तर स्थित हो, फिर मेरी प्राप्तिमें परिश्रम और देरी किस बातकी मेरेमें अपनी स्थिति न माननेसे और न जाननेसे ही मेरेसे दूरी प्रतीत हो रही है।'इति उपधारय' --यह बात तुम विशेषतासे धारण कर लो, मान लो कि चाहे सर्ग(सृष्टि) का समय हो, चाहे प्रलयका समय हो, अनन्त ब्रह्माण्डोंके सम्पूर्ण प्राणी सर्वथा मेरेमें ही रहते हैं मेरेसे अलग उनकी स्थिति कभी हो ही नहीं सकती। ऐसा दृढ़तासे मान लेनेपर प्रकृतिके कार्यसे विमुखता हो जायगी और वास्तविक तत्त्वका अनुभव हो जायगा।इस वास्तविक तत्त्वका अनुभव करनेके लिये साधक दृढ़तासे ऐसा मान ले कि जो सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें सर्वथा परिपूर्ण हैं, वे परमात्मा ही मेरे हैं। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदि कोई भी मेरा नहीं है और मैं उनका नहीं हूँ। विशेष बात सम्पूर्ण जीव भगवान्में ही स्थित रहते हैं। भगवान्में स्थित रहते हुए भी जीवोंके शरीरोंमें उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका क्रम चलता रहता है क्योंकि सभी शरीर परिवर्तनशील हैं और यह जीव स्वयं अपरिवर्तनशील है। इस जीवकी परमात्माके साथ तात्त्विक एकता है। परन्तु जब यह जीव परमात्मासे विमुख होकर शरीरके साथ,अपनी एकता मान लेता है, तब इसे मैंपनकी स्वतन्त्र सत्ताका भान होने लगता है कि मैं शरीर हूँ। इस मैंपनमें एक तो परमात्माका अंश है और एक प्रकृतिका अंश है -- यह जीवका स्वरूप हुआ। जीव अंश तो है परमात्माका, पर पकड़ लेता है प्रकृतिके अंशको।इस मैंपनमें जो प्रकृतिका अंश है, वह स्वतः ही प्रकृतिकी तरफ खिंचता है। परन्तु प्रकृतिके अंशके साथ तादात्म्य होनेसे परमात्माका अंश जीव उस खिंचावको अपना खिंचाव मान लेता है और मुझे सुख मिल जाय, धन मिल जाय,भोग मिल जाय -- ऐसा भाव कर लेता है। ऐसा भाव करनेसे वह परमात्मासे विशेष विमुख हो जाता है। उसमें संसारका सुख हरदम रहे पदार्थोंका संयोग हरदम रहे यह शरीर मेरे साथ और मैं शरीरके साथ सदा रहूँ -- ऐसी जो इच्छा रहती है, यह इच्छा वास्तवमें परमात्माके साथ रहनेकी है क्योंकि उसका नित्य सम्बन्ध तो परमात्माके साथ ही है।जीव शरीरोंके साथ कितना ही घुलमिल जाय, पर परमात्माकी तरफ उसका खिंचाव कभी मिटता नहीं, मिटनेकी सम्भावना ही नहीं। मैं नित्यनिरन्तर रहूँ, सदा रहूँ, सदा सुखी रहूँ तथा मुझे सर्वोपरि सुख मिले -- इस रूपमें परमात्माका खिंचाव रहता ही है। परन्तु उससे भूल यह होती है कि वह (जडअंशकी मुख्यतासे) इस सर्वोपरि सुखको जडके द्वारा ही प्राप्त करनेकी इच्छा करता है। वह भूलसे उस सुखको चाहने लगता है, जिस सुखपर उसका अधिकार नहीं है। अगर वह सजग, सावधान हो जाय और भोगोंमें कोई सुख नहीं है, आजतक कोईसा भी संयोग नहीं रहा, रहना सम्भव ही नहीं -- ऐसा समझ ले, तो सांसारिक संयोगजन्य सुखकी इच्छा मिट जायगी और वास्तविक, सर्वोपरि, नित्य रहनेवाले सुखकी इच्छा (जो कि आवश्यकता है) जाग्रत् हो जायगी। यह आवश्यकता ज्योंज्यों जाग्रत् होगी, त्योंहीत्यों नाशवान् पदार्थोंसे विमुखता होती चली जायगी। नाशवान् पदार्थोंसे सर्वथा विमुखता होनेपर मेरी स्थिति तो अनादिकालसे परमात्मामें ही है -- इसका अनुभव हो जायगा। सम्बन्ध--पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सम्पूर्ण प्राणियोंकी स्थिति अपनेमें बतायी, पर उनके महासर्ग और महाप्रलयका वर्णन करना बाकी रह गया। अतः उसका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

उपर्युक्त दो श्लोकोंद्वारा कहे हुए अर्थको दृष्टान्तसे सिद्ध करते हुए कहते हैं --, लोकमें जैसे ( यह प्रसिद्ध है ) सब जगह विचरनेवाला परमाणमें अति महान् वायु सदा आकाशमें ही स्थित है? वैसे ही आकाशके समान सर्वत्र परिपूर्ण मुझ परमात्मामें समस्त भूत निर्लिप्तभावसे स्थित हैं? ऐसा तू जान।

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Sri Anandgiri

सृष्टिस्थितिसंहाराणामसङ्गात्माधारत्वंमया ततमिदम् इत्यादिश्लोकद्वयेनोक्तोऽर्थस्तं दृष्टान्तेनोपपादयन्नादौ दृष्टान्तमाहेति योजना। सदेत्युत्पत्तिस्थितिसंहारकालो गृह्यते। आकाशादेर्महतोऽन्याधारत्वं कथमित्याशङ्क्याह -- महानिति। यथा सर्वगामित्वात्परिमाणतो महान्वायुराकाशे सदा तिष्ठति तथाकाशादीनि महान्त्यपि सर्वाणि भूतान्याकाशकल्पे पूर्णे प्रतीच्यसङ्गे परस्मिन्नात्मनि संश्लेषमन्तरेण स्थितानीत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

सर्वसङ्गिविवर्जितेऽपि सर्वाणि भूतानि स्थितानीत्युक्तं श्लोकद्वयेन तत्र दृष्टान्तमाह। यथा लोके वायुः सर्वत्र गच्छतीति सर्वत्रगः परिमाणतो महान्। एवंभूतोऽपि नित्यं सदा आकाशोऽसङ्गिनि तिष्ठतीति आकाशस्थः। तथा सर्वाणि महान्ति सूक्ष्माणि च मयि असङ्गिनि स्थितानीत्युपधारय निश्चयेन जानिहि। युत्तु किंतद्ब्रह्मेति प्रश्नस्योत्तरमुक्तं? अक्षरं परमं ब्रह्मैत्यक्षरसंज्ञः शुद्धस्त्वंपदार्थ एव निरुपाधिकं ब्रह्मेत्युक्तं? तत्रानिरुपपाधिकं सर्वत्रगः। महानित्यनेन बाह्यवायोर्व्यावृत्तिः। स यथा नित्यं कालत्रयेऽप्युत्पत्तेः प्राक्? नाशादूर्ध्वं मध्ये च स्वकारणे आकाशोऽव्याकृते अभेदेन तिष्ठति तथा सर्वाणि भूतानि उपाधिनिष्कृष्टत्वंपदार्थरुपी चेतनवर्गः। बहुत्वं लोकाभिप्रायेण। एतेन जीवब्रह्माभेदकथनेन स्वभावोऽध्यात्ममुच्यत इति प्रागुक्तं ब्रह्मैव जीव इति विवृतमित्यन्ये। तत्रेदं वक्तव्यं निरुपाधिकस्याक्षरस्य परब्रह्मणस्तत्त्वंपदलक्ष्यत्वेनोभयपदलक्ष्त्वात् त्वंपदलक्ष्यत्वबोधकोपपदादेरभावच्च शुद्धः त्वंपदार्थ एवेत्याद्यसंगतं तत्रेत्यादिना विभागोऽप्यनुपपन्नः। मत्स्थानि सर्वभूतानीत्यस्य पूर्वमपि विद्यमानत्वात्। सर्वाणि भूतानीत्यस्योपाधिनिष्कृष्टत्वंपदार्थरूपी चेतनवर्ग इति व्याख्यानमप्यसंगतम्। पूर्वोत्तरश्लोकेषु सर्वभूतानीत्यस्य स्थावरजंगमपरत्वेनात्रैवंपरत्वेऽसङ्गततायाः स्पष्टत्वात्। एवं सर्वोऽपि जीववर्ग इत स्वग्रन्थविरोधाच्च। एतेन नन्वेवं जीवस्य उपाधिरहतिस्यैव ब्रह्माणि लयश्चेदुपाधेः का गतिरित्याशङ्क्याह सर्वेतीति प्रत्युक्तमिति दिक्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yathāas
ākāśhasthitaḥ
nityamalways
vāyuḥthe wind
sarvatragaḥ
mahānmighty
tathālikewise
sarvāṇi bhūtāniall living beings
matsthāni
itithus
upadhārayaknow
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 9.5
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः

यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.7
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्। कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्

हे कुन्तीनन्दन ! कल्पोंका क्षय होनेपर सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं और कल्पोंके आदिमें मैं फिर उनकी रचना करता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 6
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 6
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय

जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं -- ऐसा तुम मान लो। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ: "जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं -- ऐसा तुम मान लो। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 6?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 6 translates to: "As the mighty wind, moving everywhere, always rests in the ether, so too, know that all beings rest in Me. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधा" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 6 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं -- ऐसा तुम मान लो। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yathākāśha-sthito nityaṁ vāyuḥ sarvatra-go mahān" mean in English?

"yathākāśha-sthito nityaṁ vāyuḥ sarvatra-go mahān" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 6. As the mighty wind, moving everywhere, always rests in the ether, so too, know that all beings rest in Me. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.