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Adhyay 9, Shlok 5
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः

यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है। — VaniSagar

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MarathiIND

तसेच माझ्यामध्ये (वास्तविक) प्राणी अस्तित्वात नाहीत; पाहा, माझा दिव्य योग, जो सर्व प्राणिमात्रांना आधार देतो, परंतु त्यांच्यामध्ये राहत नाही, तो माझा आत्मा आहे, जीवांचे कार्यक्षम कारण आहे.

GujaratiIND

તેમજ મારામાં (વાસ્તવમાં) જીવો અસ્તિત્વમાં નથી; જુઓ, મારો દિવ્ય યોગ, જે તમામ જીવોને આધાર આપે છે, પરંતુ તેમાં રહેતો નથી, તે મારો સ્વ છે, જીવોનું કાર્યક્ષમ કારણ.

TeluguIND

నాలో (వాస్తవంలో) జీవులు ఉండవు; ఇదిగో, నా దివ్య యోగం, ఇది అన్ని జీవులకు మద్దతు ఇస్తుంది, కానీ వాటిలో నివసించదు, నా నేనే, జీవులకు సమర్థవంతమైన కారణం.

AssameseIND

নতুবা মোৰ মাজত (বাস্তৱত) সত্তাৰ অস্তিত্ব নাই; চোৱা, মোৰ ঐশ্বৰিক যোগ, যিয়ে সকলো সত্তাক সমৰ্থন কৰে, কিন্তু সেইবোৰত বাস নকৰে, তেওঁ মোৰ আত্মা, সত্তাৰ কাৰ্যক্ষম কাৰণ।

DogriIND

न ही मेरे च (यथार्थ च) जीव मौजूद न; देखो, मेरा दिव्य योग, जो सारे जीवां दा सहारा लैंदा है, पर उन्हां विच नहीं रहंदा, मेरा आत्म है, जीवां दा कुशल कारण है।

BengaliIND

বা আমার মধ্যে (বাস্তবে) সত্তার অস্তিত্ব নেই; দেখ, আমার ঐশ্বরিক যোগ, যা সমস্ত প্রাণীকে সমর্থন করে, কিন্তু তাদের মধ্যে বাস করে না, তা হল আমার স্বয়ং, জীবের কার্যকরী কারণ।

BhojpuriIND

ना ही हमरा में (वास्तविकता में) जीव मौजूद बाड़े; देखऽ, हमार दिव्य योग, जवन सभ जीव के सहारा देला, बाकिर ओहमें ना रहेला, ऊ हमार आत्म ह, जीव के कुशल कारण ह।

MaithiliIND

आ ने हमरा मे (वास्तविकता मे) जीवक अस्तित्व अछि; देखू, हमर दिव्य योग, जे सब जीवक सहारा दैत अछि, मुदा ओहि मे नहि रहैत अछि, हमर स्वयं अछि, जीवक कुशल कारण अछि |

MalayalamIND

എന്നിൽ (യഥാർത്ഥത്തിൽ) ജീവികളില്ല. ഇതാ, എല്ലാ ജീവജാലങ്ങളെയും പിന്തുണയ്ക്കുന്ന, എന്നാൽ അവയിൽ വസിക്കാത്ത, എൻ്റെ ദിവ്യയോഗം, ജീവികളുടെ കാര്യക്ഷമമായ കാരണമായ എൻ്റെ സ്വയമാണ്.

KannadaIND

ಅಥವಾ ಜೀವಿಗಳು ನನ್ನಲ್ಲಿ ಅಸ್ತಿತ್ವದಲ್ಲಿಲ್ಲ (ವಾಸ್ತವದಲ್ಲಿ); ಇಗೋ, ನನ್ನ ದೈವಿಕ ಯೋಗವು ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳನ್ನು ಬೆಂಬಲಿಸುತ್ತದೆ, ಆದರೆ ಅವುಗಳಲ್ಲಿ ವಾಸಿಸುವುದಿಲ್ಲ, ಜೀವಿಗಳ ಸಮರ್ಥ ಕಾರಣ ನನ್ನ ಸ್ವಯಂ.

NepaliIND

न त ममा (वास्तवमा) प्राणीहरू अवस्थित छन्; हेर, मेरो दिव्य योग, जसले सबै प्राणीहरूलाई समर्थन गर्दछ, तर तिनीहरूमा वास गर्दैन, मेरो आत्म, प्राणीहरूको कुशल कारण हो।

TamilIND

என்னில் (உண்மையில்) உயிரினங்கள் இல்லை. இதோ, என் தெய்வீக யோகம், எல்லா உயிர்களையும் ஆதரிக்கிறது, ஆனால் அவற்றில் வசிப்பதில்லை, உயிரினங்களின் திறமையான காரணமான என் சுயமே.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना'--मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसे जिसका ज्ञान होता है, वह भगवान्का व्यक्तरूप है और जो मन-बुद्धि-इन्द्रियोंका विषय नहीं है अर्थात् मन आदि जिसको नहीं जान सकते, वह भगवान्का अव्यक्तरूप है। यहाँ भगवान्ने 'मया' पदसे व्यक्त(साकार) स्वरूप और,'अव्यक्तमूर्तिना' पदसे अव्यक्त-(निराकार-) स्वरूप बताया है। इसका तात्पर्य है कि भगवान् व्यक्तरूपसे भी हैं और अव्यक्तरूपसे भी हैं। इस प्रकार भगवान्की यहाँ व्यक्तअव्यक्त (साकारनिराकार) कहनेकी गूढ़ाभिसन्धि समग्ररूपसे है अर्थात् सगुणनिर्गुण, साकारनिराकार आदिका भेद तो सम्प्रदायोंको लेकर है, वास्तवमें परमात्मा एक हैं। ये सगुणनिर्गुण आदि एक ही परमात्माके अलगअलग विशेषण हैं, अलगअलग नाम हैं। गीतामें जहाँ सत्असत्, शरीरशरीरीका वर्णन किया गया है, वहाँ जीवके वास्तविक स्वरूपके लिये आया है-- 'येन सर्वमिदं ततम्' (2। 17) क्योंकि यह परमात्माका साक्षात् अंश होनेसे परमात्माके समान ही सर्वत्र व्यापक है अर्थात् परमात्माके साथ इसका अभेद है। जहाँ सगुणनिराकारकी उपासनाका वर्णन आया है, वहाँ बताया है -- 'येन सर्वमिदं ततम्' (8। 22), जहाँ कर्मोंके द्वारा भगवान्का पूजन बताया है, वहाँ भी कहा है -- 'येन सर्वमिदं ततम्' (18। 46)। इन सबके साथ एकता करनेके लिये ही भगवान् यहाँ कहते हैं --'मया ततमिदं सर्वम्'। 'मतस्थानि सर्वभूतानि'-- सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं अर्थात् पराअपरा प्रकृतिरूप सारा जगत् मेरेमें ही स्थित है। वह मेरेको छोड़कर रह ही नहीं सकता। कारण कि सम्पूर्ण प्राणी मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं, मेरेमें ही स्थित रहते हैं और मेरेमें ही लीन होते हैं अर्थात् उनका उत्पत्ति,स्थिति और प्रलयरूप जो कुछ परिवर्तन होता है, वह सब मेरेमें ही होता है। अतः वे सब प्राणी मेरेमें स्थित हैं।'न चाहं तेष्ववस्थितः'-- पहले भगवान्ने दो बातें कहीं -- पहली 'मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना' और दूसरी 'मत्स्थानि सर्वभूतानि।' अब भगवान् इन दोनों बातोंके विरुद्ध दो बातें कहते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

मैं असंसर्गी हूँ? इसलिये --, ( वास्तवमें ) ब्रह्मादि सब प्राणी भी मुझमें स्थित नहीं हैं? तू मेरे इस ईश्वरीय योग -- युक्ति -- घटनाको देख? अर्थात् मुझ ईश्वरके योगको यानी यथार्थ आत्मतत्त्वको समझ। संसर्गरहित आत्मा कहीं भी लिप्त नहीं होता यह श्रुति भी संसर्गरहित होनेके कारण ( आत्माकी ) निर्लेपता दिखलाती है। यह और भी आश्चर्य देख कि भूतभावन मेरा आत्मा संसर्गरहित होकर भी भूतोंका भरणपोषण करता रहता है परंतु भूतोमें स्थित नहीं है। क्योंकि परमात्माका भूतोंमें स्थित होना सम्भव नहीं? यह बात उपर्युक्त न्यायसे स्पष्ट दिखलायी जा चुकी है। पू0 -- ( जब कि आत्मा अपनेसे कोई अन्य वस्तु ही नहीं है ) तो मेरा आत्मा यह कैसे कहा जाता है उ0 -- लौकिक बुद्धिका अनुकरण करते हुए देहादि संघातको आत्मासे अलग करके फिर उसमें अहंकारका अध्यारोप करके मेरा आत्मा ऐसा कहते हैं? आत्मा अपने आपसे भिन्न है ऐसा समझकर लोगोंकी भाँति अज्ञानपूर्वक ऐसा नहीं कहते। जो भूतोंको प्रकट करता है -- उत्पन्न करता है या बढ़ाता है उसको भूतभावन कहते हैं।

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Sri Anandgiri

परमेश्वरस्य भूतेषु स्थित्यभावेऽपि भूतानां तत्र स्थितिरास्थितेति कुतोऽसङ्गत्वं तत्राह -- अतएवेति। नचेत्यत्र चकारोऽवधारणार्थः। भूतानामीश्वरे नैव स्थितिरित्यत्र हेतुमाह -- पश्येति। आत्मनोऽसङ्गत्वं,स्वरूपमित्यत्र प्रमाणमाह -- तथाचेति। असङ्गश्चेदीश्वरस्तर्हि कथं मत्स्थानि भूतानीत्युक्तं कथं च तथोक्त्वा नच मत्स्थानीति तद्विरुद्धमुदीरितमित्याशङ्क्याह -- इदं चेति। तर्हि भूतसंबन्धः स्यादिति नेत्याह -- नचेति। यथोक्तेन न्यायेन। असङ्गत्वेनेति यावत्। असङ्गतया वस्तुतो भूतासंबन्धेऽपि कल्पनया तदविरोधान्न मिथोविरोधोऽस्तीति भावः। आत्मनः सकाशादात्मनोऽन्यत्वायोगात्कुतः संबन्धोक्तिरित्याशङ्क्याह -- असाविति। (विभज्येति)। यथा लोको वस्तुतत्त्वमजानन्भेदमारोप्य ममायमिति संबन्धमनुभवति न तथेह संबन्धव्यपदेश आत्मनि स्वतो भेदाभावादतो भेदेऽसत्येव लोके संबन्धबुद्धिदर्शनमनुसरन्भगवानात्मनो देहादिसंघातं विभज्याहंकारं तस्मिन्नारोप्य असौ ममात्मेति भेदं व्यपदिशति। तथाच संघातस्य ममेति व्यपदेशात्ततो नि(कृ)ष्कृष्टस्य स्वरूपस्यात्मशब्देन निर्देशान्न भूतस्थोऽसावित्यर्थः। पूर्वोक्तासङ्गत्वाङ्गीकारेणैवात्मा भूतानि भावयतीत्याह -- तथेति।

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Sri Dhanpati

अतएव सर्वसङ्गविवर्जिते मयि परमात्मनि वस्तुस्तु भूतान्यपि सर्वाणि नच स्थितानि। पश्य मे योगमैश्वम्। योगं युक्तं घटनां ममैश्वरं याथात्म्यभावम्। तथाच श्रुतिःअङ्गो नहि सञ्जते इति। इदं चान्यद्योगमधटितधटनापटीयस्त्वं पश्य। भूतभृन्नच भूतस्थो ममात्माऽसङ्गित्वात् भूतेषु न तिष्ठतीति तथा वस्तुत एतादृशोऽपि सन् भूतानि स्थावरजङ्गमादीनि बिभर्ति धारयति पोषयतीति तथा भूतभावनः भूतानि भावत्युत्पादयतीति तथा ममात्मेति तु भेदमारोप्य राहोः शरि इतिवत्प्रयोगः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nanever
chaand
matsthāni
bhūtāniall living beings
paśhyabehold
memy
yogam aiśhwaramdivine energy
bhūtabhṛit
nanever
chayet
bhūtasthaḥ
mamamy
ātmāself
bhūtabhāvanaḥ
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 9.4
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः

यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मुझ में स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.6
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय

जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं -- ऐसा तुम मान लो। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 5
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 5
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः

यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ: "यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 5?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 5 translates to: "Nor do beings exist in Me (in reality); behold, My divine Yoga, which supports all beings, but does not dwell in them, is My Self, the efficient cause of beings. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 5 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमे Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "na cha mat-sthāni bhūtāni paśhya me yogam aiśhwaram" mean in English?

"na cha mat-sthāni bhūtāni paśhya me yogam aiśhwaram" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 5. Nor do beings exist in Me (in reality); behold, My divine Yoga, which supports all beings, but does not dwell in them, is My Self, the efficient cause of beings. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.