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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 10
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते

प्रकृति मेरी अध्यक्षतामें सम्पूर्ण चराचर जगत् को रचती है। हे कुन्तीनन्दन ! इसी हेतुसे जगत् का विविध प्रकारसे परिवर्तन होता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

KannadaIND

ನನ್ನ ಅಡಿಯಲ್ಲಿ, ಮೇಲ್ವಿಚಾರಕನಾಗಿ, ಪ್ರಕೃತಿ ಚಲಿಸುವ ಮತ್ತು ಚಲಿಸದ ಉತ್ಪಾದಿಸುತ್ತದೆ; ಆದ್ದರಿಂದ, ಓ ಅರ್ಜುನ, ಜಗತ್ತು ಸುತ್ತುತ್ತಿದೆ.

BengaliIND

আমার অধীনে, তত্ত্বাবধায়ক হিসাবে, প্রকৃতি চলমান এবং অচলের উত্পাদন করে; অতএব, হে অর্জুন, জগৎ ঘোরে।

MalayalamIND

എൻ്റെ കീഴിൽ, സൂപ്പർവൈസർ എന്ന നിലയിൽ, പ്രകൃതി ചലിക്കുന്നതും ചലിക്കാത്തതും ഉത്പാദിപ്പിക്കുന്നു; അതിനാൽ ഹേ അർജ്ജുനാ, ലോകം കറങ്ങുന്നു.

TamilIND

எனக்கு கீழ், மேற்பார்வையாளராக, இயற்கையானது நகரும் மற்றும் அசையாதவற்றை உருவாக்குகிறது; எனவே அர்ஜுனா, உலகம் சுழல்கிறது.

MaithiliIND

हमरा अधीन, पर्यवेक्षक के रूप में, प्रकृति चल आ अचल के उत्पन्न करैत अछि; तेँ हे अर्जुन, संसार घुमैत अछि।

AssameseIND

মোৰ অধীনত তত্বাৱধায়ক হিচাপে প্ৰকৃতিয়ে চলন্ত আৰু অচল উৎপন্ন কৰে; সেয়ে হে অৰ্জুন জগতখন ঘূৰি থাকে।

GujaratiIND

મારા હેઠળ, સુપરવાઇઝર તરીકે, કુદરત ગતિશીલ અને અચલ ઉત્પન્ન કરે છે; તેથી, હે અર્જુન, વિશ્વ ફરે છે.

TeluguIND

నా క్రింద, పర్యవేక్షకుడిగా, ప్రకృతి కదిలే మరియు కదలని వాటిని ఉత్పత్తి చేస్తుంది; కాబట్టి, ఓ అర్జునా, ప్రపంచం తిరుగుతోంది.

NepaliIND

म अन्तर्गत, पर्यवेक्षकको रूपमा, प्रकृतिले चल्ने र अचल उत्पादन गर्छ; त्यसैले हे अर्जुन, संसार घुम्छ।

MarathiIND

माझ्या अंतर्गत, पर्यवेक्षक म्हणून, निसर्ग गतिमान आणि अचल निर्माण करतो; म्हणून हे अर्जुना, जग फिरते.

SindhiIND

منهنجي تحت، نگران جي حيثيت ۾، فطرت حرڪت ۽ غير متحرڪ پيدا ڪري ٿي؛ تنهن ڪري، اي ارجن، دنيا گردش ڪري ٿي.

DogriIND

मेरे हेठ सुपरवाईजर दे तौर उप्पर कुदरत चलने आह्ले ते अचल पैदा करदी ऐ; इस करिए हे अर्जुन, संसार घूमदा ऐ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्-- मेरेसे सत्ता-स्फूर्ति पाकर ही प्रकृति चर-अचर, जड-चेतन आदि भौतिक सृष्टिको रचती है। जैसे बर्फका जमना, हीटरका जलना, ट्राम और रेलका आना-जाना, लिफ्टका चढ़ना-उतरना, हजारों मील दूरीपर बोले जानेवाले शब्दोंको सुनना, हजारों मील दूरीपर होनेवाले नाटक आदिको देखना, शरीरके भीतरका चित्र लेना, अल्पसमयमें ही बड़े-से-बड़ा हिसाब कर लेना, आदि-आदि कार्य विभिन्न-विभिन्न यन्त्रोंके द्वारा होते हैं। परन्तु उन सभी यन्त्रोंमें शक्ति बिजलीकी ही होती है। बिजलीकी शक्तिके बिना वे यन्त्र स्वयं काम कर ही नहीं सकते; क्योंकि उन यन्त्रोंमें बिजलीको छोड़कर कोई सामर्थ्य नहीं है। ऐसे ही संसारमें जो कुछ परिवर्तन हो रहा है अर्थात् अनन्त ब्रह्माण्डोंका सर्जन, पालन और संहार, स्वर्गादि लोकोंमें और नरकोंमें पुण्य-पापके फलका भोग, तरह-तरहकी विचित्र परिस्थितियाँ और घटनाएँ, तरह-तरहकी आकृतियाँ, वेश-भूषा, स्वभाव आदि जो कुछ हो रहा है, वह सब-का-सब प्रकृतिके द्वारा ही हो रहा है; पर वास्तवमें हो रहा है भगवान्की अध्यक्षता अर्थात् सत्ता-स्फूर्तिसे ही। भगवान्की सत्ता-स्फूर्तिके बिना प्रकृति ऐसे विचित्र काम कर ही नहीं सकती; क्योंकि भगवान्को छोड़कर प्रकृतिमें ऐसी स्वतन्त्र सामर्थ्य ही नहीं है कि जिससे वह ऐसे-ऐसे काम कर सके। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे बिजलीमें सब शक्तियाँ हैं, पर वे मशीनोंके द्वारा ही प्रकट होती हैं, ऐसे ही भगवान्में अनन्त शक्तियाँ हैं, पर वे प्रकृतिके द्वारा ही प्रकट होती हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

यहाँ यह शङ्का होती है कि इस भूतसमुदायको मैं रचता हूँ? तथा मैं उदासीनकी भाँति स्थित रहता हूँ यह कहना परस्पर विरुद्ध है। इस शङ्काको दूर करनेके लिये कहते हैं --, सब ओरसे द्रष्टामात्र ही जिसका स्वरूप है ऐसे निर्विकारस्वरूप मुझ अधिष्ठातासे ( प्रेरित होकर ) अविद्यारूप मेरी त्रिगुणमयी माया -- प्रकृति समस्त चराचर जगत्को उत्पन्न किया करती है। वेदमन्त्र भी यही बात कहते हैं कि समस्त भूतोंमें अदृश्यभावसे रहनेवाला एक ही देव है जो कि सर्वव्यापी और सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा तथा कर्मोंका स्वामी? समस्त भूतोंका आधार? साक्षी? चेतन? शुद्ध और निर्गुण है। हे कुन्तीपुत्र इसी कारणसे अर्थात् मैं इसका अध्यक्ष हूँ इसीलिये चराचरसहित साकारनिराकाररूप समस्त जगत् सब अवस्थाओंमें परिवर्तित होता रहता है? क्योंकि जगत्की समस्त प्रवृत्तियाँ साक्षीचेतनके ज्ञानका विषय बननेके लिये ही हैं। मैं यह खाऊँगा? यह देखता हूँ? यह सुनता हूँ? अमुक सुखका अनुभव करता हूँ? दुःख अनुभव करता हूँ? उसके लिये अमुक कार्य करूँगा? इसके लिये अमुक कार्य करूँगा? अमुक वस्तुको जानूँगा इत्यादि जगत्की समस्त प्रवृत्तियाँ ज्ञानाधीन और ज्ञानमें ही लय हो जानेवाली हैं। जो इस जगत्का अध्यक्ष साक्षी चेतन है वह परम हृदयाकाशमें स्थित है इत्यादि मन्त्र भी यही अर्थ दिखला रहे हैं। जब कि सबका अध्यक्षरूप चैतन्यमात्र एक देव वास्तवमें समस्त भोगोंके सम्बन्धसे रहित है और उसके सिवा अन्य चेतन न होनेके कारण दूसरे भोक्ताका अभाव है तो यह सृष्टि किसके लिये है इस प्रकारका प्रश्न और उसका उत्तर -- यह दोनों ही नहीं बन सकते ( अर्थात् यह विषय अनिर्वचनीय है )। ( इसको ) साक्षात् कौन जानता है -- इस विषयमें कौन कह सकता है यह जगत् कहाँसे आया किस कारण यह रचना हुई इत्यादि मन्त्रोंसे ( यही बात कही गयी है )। इसके सिवा भगवान्ने भी कहा है कि अज्ञानसे ज्ञान आवृत हो रहा है इसलिये समस्त जीव मोहित हो रहे हैं।

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Sri Anandgiri

ईश्वरे स्रष्टृत्वमौदासीन्यं च विरुद्धमिति शङ्कते -- तत्रेति। पूर्वग्रन्थः सप्तम्यर्थः। विरोधपरिहारार्थमुत्तरश्लोकमवतारयति -- तदिति। तृतीयाद्वयं समानाधिकरणमित्यभ्युपेत्य व्याचष्टे -- मयेत्यादिना। प्रकृतिशब्दार्थमाह -- ममेति। तस्या अपि ज्ञानत्वं व्यावर्तयति -- त्रिगुणेति। पराभिप्रेतं प्रधानं व्युदस्यति -- अविद्येति। साक्षित्वे प्रमाणमाह -- तथाचेति। मूर्तित्रयात्मना भेदं वारयति -- एक इति। अखण्डं जाड्यं प्रत्याह -- देव इति। आदित्यवत्ताटस्थ्यं प्रत्यादिशति -- सर्वभूतेष्विति। किमिति तर्हि सर्वैर्नोपलभ्यते तत्राह -- गूढ इति। बुद्ध्यादिवत्परिच्छिन्नत्वं व्यवच्छिनत्ति -- सर्वव्यापीति। तर्हि नभोवदनात्मत्वं नेत्याह -- सर्वभूतेति। तर्हि तत्र तत्र कर्मतत्फलसंबन्धित्वं स्यात्तत्राह -- कर्मेति। सर्वाधिष्ठानत्वमाह -- सर्वेति। सर्वेषु भूतेषु सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेन संनिधिर्वा(सो)त्रोच्यते। न केवलं कर्मणामेवायमध्यक्षोऽपि तु तद्वतामपीत्याह -- साक्षीति। दर्शनकर्तृत्वशङ्कां शातयति -- चेतेति। अद्वितीयत्वं केवलत्वम्। धर्माधर्मादिराहित्यमाह -- निर्गुण इति। किं बहुना सर्वविशेषशून्य इति चकारार्थः। उदासीनस्यापीश्वरस्य साक्षित्वमात्रं निमित्तीकृत्य जगदेतत्पौनःपुन्येन सर्गसंहारावनुभवतीत्याह -- हेतुनेति। कार्यवत्कारणस्यापि साक्ष्यधीना प्रवृत्तिरिति वक्तुं व्यक्ताव्यक्तात्मकमित्युक्तम्। सर्वावस्थास्वित्यनेन सृष्टिस्थितिसंहारावस्था गृह्यन्ते। तथापि जगतः सर्गादिभ्यो,भिन्ना प्रवृत्तिः स्वाभाविकी नेश्वरायत्तेत्याशङ्क्याह -- दृशीति। नहि दृशा व्याप्यत्वं विना जडवर्गस्य कापि प्रवृत्तिरिति हिशब्दार्थः। तामेव प्रवृत्तिमुदाहरति -- अहमित्यादिना। भोगस्य विषयोपलम्भाभावेसंभवान्नानाविधां विषयोपलब्धिं दर्शयति -- पश्यामीति। भोगफलमिदानीं कथयति -- सुखमिति। विहितप्रतिषिद्धाचरणनिमित्तं सुखं दुःखं चेत्याह -- तदर्थमिति। नच विमर्शपूर्वकं विज्ञानं विनानुष्ठानमित्याह -- इदमिति। इत्याद्या प्रवृत्तिरिति संबन्धः। सा च प्रवृत्तिः सर्वा दृक्कर्मत्वमुररीकृत्यैवेत्युक्तं निगमयति -- अवगतीति। तत्रैव च प्रवृत्तेरवसानमित्याह -- अवगत्यवसानेति। परस्याध्यक्षत्वमात्रेण जगच्चेष्टेत्यत्र प्रमाणमाह -- यो अस्येति। अस्य जगतो योऽध्यक्षो निर्विकारः स परमे प्रकृष्टे हार्दे व्योम्नि स्थितो दुर्विज्ञेय इत्यर्थः। ईश्वरस्य साक्षित्वमात्रेण स्रष्टृत्वे स्थिते फलितमाह -- ततश्चेति। किंनिमित्तापरस्येयं सृष्टिर्न तावद्भोगार्था परस्य परमार्थतो भोगासंबन्धित्वात्तस्य सर्वसाक्षिभूतचैतन्यमात्रत्वान्न चान्यो भोक्ता चेतनान्तराभावादीश्वरस्यैकत्वादचेतनस्याभोक्तृत्वान्न च सृष्टुरपवर्गार्था तद्विरोधित्वान्नैवं प्रश्नो वा तदनुरूपं प्रतिवचनं वा युक्तं परस्य मायानिबन्धने सर्गे तस्यानवकाशत्वादित्यर्थः। परस्यात्मनो दुर्विज्ञेयत्वे श्रुतिमुदाहरति -- को अद्धेति। तस्मिन्प्रवक्तापि संसारमण्डले नास्तीत्याह -- क इहेति। जगतः सृष्टिकर्तृत्वेन परस्य ज्ञेयत्वमाशङ्क्य कूटस्थत्वात्ततो न सृष्टिर्जातेत्याह -- कुत इति। नहीयं विविधा सृष्टिरन्यस्मादपि कस्माच्चिदुपपद्यतेऽन्यस्य वस्तुनोऽभावादित्याह -- कुत इति। कथं तर्हि सृष्टिरित्याशङ्क्याज्ञानाधीनेत्याह -- दर्शितं चेति।

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Sri Dhanpati

ननु भूतग्रामिमं कृत्स्त्रं विसृजामि। उदासीनवदासीनमिति च विरुद्धमिदमुच्यते इति चेतत्राह -- मयेति। मया,चेतनरुपेण सर्वविक्रियाशून्येनाध्यक्षेण स्वामिना सन्नधिमात्रेण सत्तास्फूर्तिप्रदानेन प्रवर्तकेन प्रवर्तिता प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिकाऽविद्यालक्षणा मायाशब्दवाच्याऽनिर्वचनीया सचराचरं व्यक्ताव्यक्तात्मकं जगदुत्पादयति। तथाच मन्त्रवर्णःएको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च इति मूर्तित्रयात्मना भेदव्यावृत्त्यर्थं एक इति। जाड्यव्यावृत्त्यर्थमुक्तं देव इति। आदित्यवत्ताटस्थ्यं वारयति सर्वभूतेषु गूढ इति। बुद्य्धादिवत्परिच्छिन्नत्वं निराकरोति सर्वव्यापीति। आकाशवदनात्मत्वं वारयति सर्वभूतान्तरात्मेति। जीववत्कर्मपराधीनत्वं तस्य निराचष्टे कर्माध्यक्षः कर्मणां तत्तत्फलप्रदानाय प्रवर्तकः। न केवलं कर्माध्यक्ष एवापितु सर्वाधिष्ठानं कर्मवतां साक्षी चेत्याह सर्वभूताधिवासः साक्षीति। सर्वभूतेषु सत्तास्फूर्तिप्रदानायाधिवसति सन्निहित इत्यर्थः। यद्वा सर्वाणि भूतानि अधिवसन्ति यस्मिन्नधिष्ठाने सः। दर्शनकर्तत्वं वारयति चेता इति। विजातीयकृतं भेदं व्यवच्छिनत्ति केवल इति। अद्वितीय इत्यर्थः। स्वगतभेदं प्रत्याचष्टे निर्गुण इति। तथाच सूर्यवत्प्रकृतिसत्तास्फूर्तिप्रदानेन जगत्कर्तृत्वेऽप्यदासीनत्वमविरुद्धमिति भावः। अनेनाध्यक्षत्वेन हेतुना निमित्तेन सचराचरं जगद्विपरिवर्तते सर्वास्थासु जाग्रदादिषु बाल्यादिषु चेदमहं भोक्ष्ये इदं पश्यामि इदं श्रृणोमीदं स्पृशामीदमास्वादयामीदं जिघ्रामीदं सुखदुःखमनुभवामि तदर्थमिदं धर्माधर्मलक्षणं कर्म करिष्ये इत्यादिसर्वापि जगतः प्रवृत्तिः चेतनव्याप्तिं विना जडवर्गस्य न संभवति। तथाच मन्त्रवर्णःयो अस्याध्यक्षः परमे व्यामेन् इत्यादिः। अस्य प्रत्यक्षादिसन्निधापितस्य जगतो योऽध्यक्षः सत्तास्फूर्तप्रदादेन प्रवर्तत्तः सूर्यवन्निर्विकारः सः परमे प्रकष्टे हार्ते व्योम्र्याकाशे स्थितो दुर्विज्ञय इत्यर्थः। एतेनेदं फलितम्। ननु किंनिमित्तेयं परस्येश्वात्त सृष्टिः किं स्वभोगार्था? उत चेतनान्तरभोगार्था? उत चेतनान्तरभोगार्था? उताचेतनार्था? उतापवर्गार्था। नाद्यः। एकस्य देवस्य सर्वाध्यक्षभूतचैतन्यस्य परमार्थसत आप्तकामस्य पूर्णस्य सर्वभोगास्पृष्टत्वात्।नेह नानास्ति किंचन िति श्रुतेरचेतनस्य भोक्तृत्वायोगाच्च। नापि चतुर्थः। सृष्टेरपवर्गविरोधित्वात्। किंच कस्य मोक्षार्था स्वस्योतान्यस्य। नाद्यः। स्वस्य नित्यमुक्तत्वात्। नान्त्योऽन्यस्यानिरुपणादित्यादिशङ्कातदनुरुपं प्रतिवचनं च न युक्तं? परस्य ब्रह्मणः मायानिबन्धने सर्गे उक्तशङ्कानवकाशत्वेन प्रतिवचनयोग्यताया अभावात्। किंच मायासर्गमभ्युपगच्छतां परत्र ब्रह्मणि नानाभावो वास्तवो न संभवतीति वदतामौपनिषदानामियमुक्तिरिष्टैव। तथाच मन्त्रवर्णःको अद्धा वेद क इह प्रवोचत्कुत आ जाता कुत इयं विसृष्टिः इत्यादिः। इत्यादिः। परमात्मनो दुर्विज्ञेयत्वं प्रतिपादयन् सृष्टिकर्तृत्वं तस्मिन्नाक्षिपति परमात्मानमद्धा साक्षात् को वेद घटमिव तदिदमिति। न कोऽपि जानातीत्यर्थः। तस्मिन्परमात्मनि प्रवक्तापि संसारमण्डले नास्तीत्याह -- क इहेतु। शुद्धस्य परमात्मनः सर्वशब्दावाच्यत्वान्न कोऽपि प्रावोचदित्यर्थः।यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह इति श्रुतेः। तर्हि ब्रह्माज्ञानाय श्रवणादौ प्रवृत्तिबोधकानांब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतितरति शोकमात्मवित् इत्यादिकानां च श्रुतिनामप्रामाण्यमिति चेन्नैष दोषः। फलव्याप्तिप्रतिषेधेनाज्ञाननिबर्हणाय वृत्तिव्याप्तिस्वीकारेण चाविरोधात्। शब्दोऽपि साक्षान्न ब्रह्म पतिपादयति किंतु अज्ञाननिबर्हण एव तस्याचिन्त्या शक्तिरित स्वीक्रीयते। तथाच सुप्ते देवदत्ते देवदत्तेतिशब्दो यथा तन्निद्रां नाशयति एवं तत्त्वमसीतिवाक्यमपि नाहं ब्रह्मेत्यज्ञानं निराकरोति। तदुक्तं सुरेश्वराचार्यैःदुर्बलत्वादविद्याया आत्मत्वाद्वोधरुपिणाः। शब्दशक्तेरचिन्त्यत्वाद्विह्य्स्तं मोहहानतः। अग्रहीत्वैव संबन्धमभिधानाभिधेययोः। हित्वा निद्रां प्रबुध्यन्ते सुषुप्ते बोधिताः परैः। जाग्रद्वन्न यतः शब्दं सुषुप्ते वेत्ति कश्चन। ध्वस्तेऽतो ज्ञानतोऽज्ञाने ब्रह्मास्मीति भवेत्फलम्। अविद्याघातिनः शब्दाद्याहं ब्रह्मेति धीर्भवेत्। नश्यत्यविद्यया सार्धं हत्वा रोगमिवौषसंभवात्। ननु अन्यस्मान्निमित्ताद्भविष्यतीति चेत्तत्राह -- कुत इति। अन्यस्य वस्तुनो भावादियं विविधा सृष्टिर्न कुतश्चिन्निमित्तादुत्पद्यत इत्यर्थः। ननुयतो वा इमानि भूतानि जायन्ते?यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे?जन्माद्यस्य यतः इत्यादिश्रुतिस्मृतिसूत्राणामप्रामाण्यप्रसङ्ग इति चेन्नैष दोषः। ब्रह्मणः सृष्टेरुत्पत्त्यादिप्रतिपादनेन तदत्यन्तासत्त्वस्य निरपवादादन्यथा वायौ रुपं नास्तीत्यपवादमात्रेण तेजसि रुपस्य सत्तानपायान्न तस्यासत्त्वं प्रतीयते। तथा ब्रह्मणि जगन्नास्तीत्यपवादमात्रेण प्रधानादौ तत्सत्त्वापत्त्यातदसिद्धेः। कथं तर्हि मुथ्याभूते प्रपञ्चे इदमुत्पन्नमिदं नष्टमिति वैदिकलौकिकव्यवहार इति चेत् अनाद्यनिर्वचनीयाज्ञानकल्पितं लौकिकमपवदितुं श्रुतिभरनूद्यते इति गृहाण। तदुग्तंअज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः इति। यथा पाण्डुनाध्यक्षेण कुन्ती त्वामुत्पादितवती तथा मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सचराचरं जगदुत्पादयतीति कौन्तेयेति संबोधनस्य गूढाभिसंधिः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
mayāby me
adhyakṣheṇadirection
prakṛitiḥmaterial energy
sūyatebrings into being
saboth
charaacharam
hetunāreason
anenathis
kaunteyaArjun, the son of Kunti
jagatthe material world
viparivartateundergoes the changes
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Bhagavad Gita · 9.9
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु

हे धनञ्जय ! उन (सृष्टि-रचना आदि) कर्मोंमें अनासक्त और उदासीनकी तरह रहते हुए मेरेको वे कर्म नहीं बाँधते। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.11
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्

मूर्खलोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वररूप परमभावको न जानते हुए मुझे मनुष्यशरीरके आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 10
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 10
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते

प्रकृति मेरी अध्यक्षतामें सम्पूर्ण चराचर जगत् को रचती है। हे कुन्तीनन्दन ! इसी हेतुसे जगत् का विविध प्रकारसे परिवर्तन होता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ: "प्रकृति मेरी अध्यक्षतामें सम्पूर्ण चराचर जगत् को रचती है। हे कुन्तीनन्दन ! इसी हेतुसे जगत् का विविध प्रकारसे परिवर्तन होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 10?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 10 translates to: "Under Me, as supervisor, Nature produces the moving and the unmoving; therefore, O Arjuna, the world revolves. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 10 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। प्रकृति मेरी अध्यक्षतामें सम्पूर्ण चराचर जगत् को रचती है। हे कुन्तीनन्दन ! इसी हेतुसे जगत् का विविध प्रकारसे परिवर्तन होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "mayādhyakṣheṇa prakṛitiḥ sūyate sa-charācharam" mean in English?

"mayādhyakṣheṇa prakṛitiḥ sūyate sa-charācharam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 10. Under Me, as supervisor, Nature produces the moving and the unmoving; therefore, O Arjuna, the world revolves. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.