Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 11
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्

मूर्खलोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वररूप परमभावको न जानते हुए मुझे मनुष्यशरीरके आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

GujaratiIND

મૂર્ખ લોકો મારી અવગણના કરે છે, માનવ સ્વરૂપ ધારણ કરે છે, મારા ઉચ્ચ અસ્તિત્વને સર્વ જીવોના મહાન ભગવાન તરીકે જાણતા નથી.

BengaliIND

মূর্খরা আমাকে অবজ্ঞা করে, মানব রূপে পরিধান করে, আমার উচ্চ সত্ত্বাকে সমস্ত প্রাণীর মহান প্রভু বলে জানে না।

KannadaIND

ಮೂರ್ಖರು ನನ್ನನ್ನು ನಿರ್ಲಕ್ಷಿಸುತ್ತಾರೆ, ಮಾನವ ರೂಪವನ್ನು ಧರಿಸುತ್ತಾರೆ, ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳ ಮಹಾನ್ ಭಗವಂತನೆಂದು ತಿಳಿಯದೆ.

KonkaniIND

मूर्ख म्हाका आडनदर करतात, मनशाच्या रुपांत न्हेसून, म्हज्या उच्च सत्ताक सगळ्या प्राण्यांचो व्हडलो स्वामी म्हूण वळखना.

MarathiIND

मूर्ख लोक माझी अवहेलना करतात, मानवी रूप धारण करतात, माझ्या उच्च अस्तित्वाला सर्व प्राणिमात्रांचा महान प्रभु म्हणून ओळखत नाहीत.

MaithiliIND

मूर्ख लोकनि हमरा अवहेलना करैत छथि, मानव रूप मे वस्त्रधारी, हमर उच्च सत्ता केँ सब प्राणीक महान स्वामी नहि जानि।

AssameseIND

মূৰ্খবোৰে মোক অৱজ্ঞা কৰে, মানৱ ৰূপ পৰিধান কৰি, মোৰ উচ্চ সত্তাক সকলো সত্তাৰ মহান প্ৰভু বুলি নাজানে।

DogriIND

मूर्ख मनुक्खी रूप च सजदे, मेरे उच्चे प्राणी गी सारें प्राणियें दा महान प्रभु दे रूप च नेईं जानदे मेरी अवहेलना करदे न।

ManipuriIND

ꯃꯨꯔꯈꯁꯤꯡꯅꯥ ꯑꯩꯕꯨ ꯃꯤꯄꯥꯏꯕꯥ ꯄꯣꯀꯏ, ꯃꯤꯑꯣꯏꯕꯒꯤ ꯃꯑꯣꯡꯗꯥ ꯄꯣꯠꯆꯩ ꯊꯃꯗꯨꯅꯥ, ꯑꯩꯒꯤ ꯑꯋꯥꯡꯕꯥ ꯊꯥꯛꯀꯤ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯗꯨꯕꯨ ꯖꯤꯕ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯀꯤ ꯑꯆꯧꯕꯥ ꯃꯄꯨꯅꯤ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯈꯉꯗꯅꯥ꯫

PunjabiIND

ਮੂਰਖ, ਮਨੁੱਖਾ ਸਰੂਪ ਧਾਰਨ ਕਰਕੇ, ਮੇਰੇ ਉੱਚੇ ਹਸਤੀ ਨੂੰ ਸਭ ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਮਹਾਨ ਸੁਆਮੀ ਵਜੋਂ ਨਾ ਜਾਣ ਕੇ, ਮੇਰਾ ਨਿਰਾਦਰ ਕਰਦੇ ਹਨ।

BhojpuriIND

मूर्ख लोग हमरा के अवहेलना करेला, मानव रूप में सजल, हमरा उच्च सत्ता के सब प्राणी के महान स्वामी के रूप में ना जानत।

NepaliIND

मेरो उच्चत्वलाई सबै प्राणीको महान् भगवानको रूपमा नचिनेर मूर्खहरूले मानव रूप धारण गरेर मलाई बेवास्ता गर्छन्।

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्--जिसकी सत्ता-स्फूर्ति पाकर प्रकृति अनन्त ब्रह्माण्डोंकी रचना करती है, चरअचर, स्थावर-जङ्गम प्राणियोंको पैदा करती है; जो प्रकृति और उसके कार्यमात्रका संचालक, प्रवर्तक, शासक और संरक्षक है जिसकी इच्छाके बिना वृक्षका पत्ता भी नहीं हिलता प्राणी अपने कर्मोंके अनुसार जिनजिन लोकोंमें जाते हैं, उन-उन लोकोंमें प्राणियोंपर शासन करने-वाले जितने देवता हैं, उनका भी जो ईश्वर (मालिक) है और जो सबको जाननेवाला है-- ऐसा वह मेरा भूतमहेश्वररूप सर्वोत्कृष्ट भाव (स्वरूप) है। 'परं भावम्' कहनेका तात्पर्य है कि मेरे सर्वोत्कृष्ट प्रभावको अर्थात् करनेमें, न करनेमें और उलट-फेर करनेमें जो सर्वथा स्वतन्त्र है; जो कर्म, क्लेश, विपाक आदि किसी भी विकारसे कभी आबद्ध नहीं है; जो क्षरसे अतीत और अक्षरसे भी उत्तम है तथा वेदों और शास्त्रोंमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध है (गीता 15। 18) -- ऐसे मेरे परमभावको मूढ़लोग नहीं जानते, इसीसे वे मेरेको मनुष्य-जैसा मानकर मेरी अविज्ञा करते हैं।'मानुषी तनुमाश्रितम्'-- भगवान्को मनुष्य मानना क्या है? जैसे साधारण मनुष्य अपनेको शरीर, कुटुम्ब-परिवार, धन-सम्पत्ति, पद-अधिकार आदिके आश्रित मानते हैं अर्थात् शरीर, कुटुम्ब आदिकी इज्जत-प्रतिष्ठाको अपनी इज्जतप्रतिष्ठा मानते हैं; उन पदार्थोंके मिलनेसे अपनेको बड़ा मानते हैं; और उनके न मिलनेसे अपनेको छोटा मानते हैं और जैसे साधारण प्राणी पहले प्रकट नहीं थे, बीचमें प्रकट हो जाते हैं तथा अन्तमें पुनः अप्रकट हो जाते हैं (गीता 2। 28), ऐसे ही वे मेरेको साधारण मनुष्य मानते हैं। वे मेरेको मनुष्यशरीरके परवश मानते हैं अर्थात् जैसे साधारण मनुष्य होते हैं? ऐसे ही साधारण मनुष्य कृष्ण हैं --ऐसा मानते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस प्रकार मैं यद्यपि नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव तथा सभी प्राणियोंका आत्मा हूँ तो भी --, मूढ़ -- अविवेकी लोग मेरे सर्व लोकोंके महान् ईश्वररूप परमभावको अर्थात् सबका अपना आत्मारूप मैं परमात्मा सब प्राणियोंका महान् ईश्वर हूँ एवं आकाशकी भाँति बल्कि आकाशकी अपेक्षा भी सूक्ष्मतर भावसे व्यापक हूँ -- इस परम परमात्मतत्त्वको न जाननेके कारण मुझ मनुष्यदेहधारी परमात्माको तुच्छ समझते हैं अर्थात् मनुष्यरूपसे लीला करते हुए मुझ परमात्माकी अवज्ञा -- अनादर करते हैं। इसलिये मुझ परमात्माके निरादरकी भावनासे वे पामर जीव ( व्यर्थ ) मारे हुए पड़े हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

सर्वाध्यक्षः सर्वभूताधिवासो नित्यमुक्तश्चेत्त्वं तर्हि किमिति त्वामेवात्मत्वेन भेदेन वा सर्वे न भजन्ते तत्राह -- एवमिति। विपर्यस्तबुद्धित्वं भगवदवज्ञायां कारणमित्याह -- मूढा इति। भगवतो मनुष्यदेहसंबन्धात्तस्मिन्विपर्यासः संभवतीत्याह -- मानुषीमिति। अस्मदादिवद्देहतादात्म्याभिमानं भगवतो व्यावर्तयति -- मनुष्येति। भगवन्तमवजानतामविवेकमूलाज्ञानं हेतुमाह -- परमिति। ईश्वरावज्ञानात्किं भवतीत्यपेक्षायां तदवज्ञानप्रतिबद्धबुद्धयः शोच्या भवन्तीत्याह -- ततश्चेति। भगवदवज्ञानादेव हेतोरवजानन्तस्ते जन्तवो वराकाः शोच्याः सर्वपुरुषार्थबाह्याः स्युरिति संबन्धः। तत्र हेतुं सूचयति -- तस्येति। प्रकृतस्य भगवतोऽवज्ञानमनादरणं निन्दनं वा तस्य भावनं पौनःपुन्यं तेनाहतास्तज्जनितदुरितप्रभावात् प्रतिबद्धबुद्धय इत्यर्थः।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

नन्वेवंभूतं शुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं सर्वजन्ततूनामात्मानं त्वां किमति सर्वे आत्मत्वेन भेदेन वा न प्रतिपद्यन्ते प्रत्युतावजनन्ततीतेचेत्तत्राह -- अवजानन्तीति। एवंभूतमपि मां अवजान्ति अवज्ञां परिभवं अपरोक्षं च तिरस्कारं निन्दां च कुर्वन्तीति यावत्। भगवदवज्ञायां कारणमाह -- मूढा इति। विपरीतज्ञानाः। विपरीतज्ञाने निमित्तमाह। मानुषीं तनुमाश्रितं मनुष्यसंबन्धिनं देहमाश्रितं मनुष्यदेहेन व्यवहरन्तमितियावत्। तथाच मनुष्यवद्देहाभिमाशून्ये साधकानुग्रहार्थं गृहीतमायामयलीलाविग्रहे मयि परब्रह्मणिदेहसंबन्धदर्शनं विपर्ययबुद्धौ निमित्तमिति भावः। देहादिसंबन्धशून्ये परमात्मनि देहादिसंसर्गावलोकने हेतुमाह -- परमिति। मम सर्वभूतानां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानां महान्तमीश्वरं परं सर्वोत्कृष्टं भावं परमात्मतत्त्वभाकाशवत्सर्वसङ्गविवर्जितमाकाशस्यापि मूलकारणभूतं स्वात्मस्वरुपमजानन्त इत्यर्थः। तथाच मम,वास्तवस्वरुपाज्ञानमेव तत्र हेतुरित्याशयः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
avajānantidisregard
māmme
mūḍhāḥdim
mānuṣhīmhuman
tanumform
āśhritamtake on
paramdivine
bhāvampersonality
ajānantaḥnot knowing
mamamy
bhūtaall beings
mahāīśhvaram
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 9.10
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते

प्रकृति मेरी अध्यक्षतामें सम्पूर्ण चराचर जगत् को रचती है। हे कुन्तीनन्दन ! इसी हेतुसे जगत् का विविध प्रकारसे परिवर्तन होता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.12
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः

जिनकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभ-कर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान सत्-फल देनेवाले नहीं होते, ऐसे अविवेकी मनुष्य आसुरी, राक्षसी और मोहिनी फकृतिका आश्रय लेते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 11
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 11
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्

मूर्खलोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वररूप परमभावको न जानते हुए मुझे मनुष्यशरीरके आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ: "मूर्खलोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वररूप परमभावको न जानते हुए मुझे मनुष्यशरीरके आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 11?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 11 translates to: "Fools disregard Me, clad in human form, not knowing My higher Being as the great Lord of all beings. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 11 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। मूर्खलोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वररूप परमभावको न जानते हुए मुझे मनुष्यशरीरके आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "avajānanti māṁ mūḍhā mānuṣhīṁ tanum āśhritam" mean in English?

"avajānanti māṁ mūḍhā mānuṣhīṁ tanum āśhritam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 11. Fools disregard Me, clad in human form, not knowing My higher Being as the great Lord of all beings. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.