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Adhyay 9, Shlok 12
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः

जिनकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभ-कर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान सत्-फल देनेवाले नहीं होते, ऐसे अविवेकी मनुष्य आसुरी, राक्षसी और मोहिनी फकृतिका आश्रय लेते हैं। — VaniSagar

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MarathiIND

त्यांच्याकडे भुते आणि अदैवी प्राणी यांच्या कपटी स्वभावाचे आहेत, ते व्यर्थ आशा, व्यर्थ कृती आणि निरर्थक ज्ञानाने भरलेले आहेत.

PunjabiIND

ਉਹ ਭੂਤਾਂ ਅਤੇ ਬ੍ਰਹਮ ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਧੋਖੇਬਾਜ਼ ਸੁਭਾਅ ਦੇ ਮਾਲਕ ਹਨ, ਵਿਅਰਥ ਉਮੀਦਾਂ, ਵਿਅਰਥ ਕੰਮਾਂ, ਅਤੇ ਵਿਅਰਥ ਗਿਆਨ ਨਾਲ ਭਰੇ ਹੋਏ ਹਨ ਜੋ ਕਿ ਮੂਰਖ ਹੈ।

SindhiIND

اهي شيطانن ۽ غير خدائي مخلوقات جي فريب واري فطرت جا مالڪ آهن، بيڪار اميدن، بيڪار عملن ۽ بيڪار علم سان ڀريل آهن جيڪي بي عقل آهن.

NepaliIND

तिनीहरू दानवहरू र अदिव्य प्राणीहरूको छलपूर्ण प्रकृतिको अधीनमा छन्, व्यर्थ आशाहरू, व्यर्थ कार्यहरू, र व्यर्थ ज्ञानले भरिएका छन्।

MalayalamIND

വ്യർഥമായ പ്രതീക്ഷകളും വ്യർത്ഥമായ പ്രവൃത്തികളും വിവേകശൂന്യമായ വ്യർഥമായ അറിവും നിറഞ്ഞ അസുരന്മാരുടെയും ദൈവിക ജീവികളുടെയും വഞ്ചനാപരമായ സ്വഭാവം അവർക്കുണ്ട്.

KannadaIND

ಅವರು ರಾಕ್ಷಸರು ಮತ್ತು ದೈವಿಕ ಜೀವಿಗಳ ಮೋಸದ ಸ್ವಭಾವವನ್ನು ಹೊಂದಿದ್ದಾರೆ, ವ್ಯರ್ಥವಾದ ಭರವಸೆಗಳು, ವ್ಯರ್ಥ ಕ್ರಿಯೆಗಳು ಮತ್ತು ಅರ್ಥಹೀನವಾದ ವ್ಯರ್ಥ ಜ್ಞಾನದಿಂದ ತುಂಬಿರುತ್ತಾರೆ.

GujaratiIND

તેઓ રાક્ષસો અને અવિશ્વસનીય માણસોના કપટી સ્વભાવથી વંચિત છે, જે નિરર્થક આશાઓ, નિરર્થક ક્રિયાઓ અને નિરર્થક જ્ઞાનથી ભરેલા છે જે મૂર્ખ છે.

BengaliIND

তারা রাক্ষস এবং অদ্বৈত প্রাণীদের ছলনাময় প্রকৃতির অধিকারী, নিরর্থক আশা, নিরর্থক কর্ম এবং নিরর্থক জ্ঞানে ভরা যা জ্ঞানহীন।

TeluguIND

వారు రాక్షసులు మరియు దైవిక జీవుల యొక్క మోసపూరిత స్వభావాన్ని కలిగి ఉన్నారు, వ్యర్థమైన ఆశలు, వ్యర్థమైన చర్యలు మరియు తెలివిలేని నిష్ఫలమైన జ్ఞానంతో నిండి ఉన్నారు.

TamilIND

அவர்கள் பேய்கள் மற்றும் தெய்வீகமற்ற உயிரினங்களின் வஞ்சக குணம் கொண்டவர்கள், வீண் நம்பிக்கைகள், வீண் செயல்கள் மற்றும் அர்த்தமற்ற வீண் அறிவு ஆகியவற்றால் நிரப்பப்படுகிறார்கள்.

MaithiliIND

ओ सभ राक्षस आ अदिव्यक छल-प्रपंच सँ ग्रस्त छथि, व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म आ व्यर्थ ज्ञान सँ भरल छथि जे निरर्थक अछि |

BhojpuriIND

ऊ लोग राक्षस आ अदिव्य जीव के धोखाधड़ी वाला स्वभाव से ग्रस्त बा, जवन व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म आ व्यर्थ ज्ञान से भरल बा जवन बेमतलब बा.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'मोघाशाः'-- जो लोग भगवान्से विमुख होते हैं, वे सांसारिक भोग चाहते हैं, स्वर्ग चाहते हैं तो उनकी ये सब कामनाएँ व्यर्थ ही होती हैं। कारण कि नाशवान् और परिवर्तनशील वस्तुकी कामना पूरी होगी ही-- यह कोई नियम नहीं है। अगर कभी पूरी हो भी जाय, तो वह टिकेगी नहीं अर्थात् फल देकर नष्ट हो जायगी। जबतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती, तबतक कितनी ही सांसारिक वस्तुओंकी इच्छाएँ की जायँ और उनका फल भी मिल जाय तो भी वह सब व्यर्थ ही है (गीता 7। 23)।'मोघकर्माणः'--भगवान्से विमुख हुए मनुष्य शास्त्रविहित कितने ही शुभकर्म करें, पर अन्तमें वे सभी व्यर्थ हो जायँगे। कारण कि मनुष्य अगर सकामभावसे शास्त्रविहित यज्ञ, दान आदि कर्म भी करेंगे, तो भी उन कर्मोंका आदि और अन्त होगा और उनके फलका भी आदि और अन्त होगा। वे उन कर्मोंके फलस्वरूप ऊँचे-ऊँचे लोकोंमें भी चले जायँगे, तो भी वहाँसे उनको फिर जन्म-मरणमें आना ही पड़ेगा। इसलिये उन्होंने कर्म करके केवल अपना समय बरबाद किया, अपनी बुद्धि बरबाद की और मिला कुछ नहीं। अन्तमें रीते-के-रीते रह गये अर्थात् जिसके लिये मनुष्यशरीर मिला था, उस लाभसे सदा ही रीते रह गये। इसलिये उनके सब कर्म व्यर्थ, निष्फल ही हैं।तात्पर्य यह हुआ कि ये मनुष्य स्वरूपसे साक्षात् परमात्माके अंश हैं, सदा रहनेवाले हैं और कर्म तथा उनका,फल आदि-अन्तवाला है; अतः जबतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं होगी, तबतक वे सकामभावपूर्वक कितने ही कर्म करें और उनका फल भोंगे, पर अन्तमें दुःख और अशान्तिके सिवाय कुछ नहीं मिलेगा। जो शास्त्रविहित कर्म अनुकूल परिस्थिति प्राप्त करनेकी इच्छासे सकामभावपूर्वक किये जाते हैं, वे ही कर्म व्यर्थ होते हैं अर्थात् सत्-फल देनेवाले नहीं होते। परन्तु जो कर्म भगवान्के लिये, भगवान्की प्रसन्नताके लिये किये जाते हैं और जो कर्म भगवान्के अर्पण किये जाते हैं, वे कर्म निष्फल नहीं होते अर्थात् नाशवान् फल देनेवाले नहीं होते, प्रत्युत सत्-फल देनेवाले हो जाते हैं-- 'कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते'(गीता 17। 27)।

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Sri Harikrishnadas Goenka

क्योंकि --, वे मोघाशा -- जिनकी आशाएँ -- कामनाएँ व्यर्थ हों ऐसे व्यर्थ कामना करनेवाले और मोघकर्मा -- व्यर्थ कर्म करनेवाले होते हैं क्योंकि उनके द्वारा जो कुछ अग्निहोत्रादि कर्म किये जाते हैं वे सब अपने अन्तरात्मारूप भगवान्का अनादर करनेके कारण निष्फल हो जाते हैं। इसलिये वे मोघकर्मा होते हैं। इसके अतिरिक्त वे मोघज्ञानी -- निष्फल ज्ञानवाले होते हैं? अर्थात् उनका ज्ञान भी निष्फल ही होता है। और वे विचेता अर्थात् विवेकहीन भी होते हैं। तथा वे मोह उत्पन्न करनेवाली देहात्मवादिनी राक्षसी और आसुरी प्रकृतिका यानी राक्षसोंके और असुरोंके स्वभावका आश्रय करनेवाले हो जाते हैं। अभिप्राय यह कि तोड़ो? फोड़ो? पिओ? खाओ? दूसरोंका धन लूट लो इत्यादि वचन बोलनेवाले और बड़े क्रूरकर्मा हो जाते हैं। श्रुति भी कहती है कि वे असुरोंके रहने योग्य लोक प्रकाशहीन हैं इत्यादि।

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Sri Anandgiri

भगवन्तमवजानतां प्रश्नपूर्वकं शोच्यत्वं विशदयति -- कथमिति। भगवन्निन्दापराणां न काचिदपि प्रार्थनार्थवतीत्याह -- वृथेति। ननु भगवन्तं निन्दन्तोऽपि नित्यं नैमित्तिकं वा कर्मानुतिष्ठन्ति? तदनुष्ठानाच्च तेषां प्रार्थनाः सार्था भविष्यन्तीति नेत्याह -- तथेति। परिभवस्तिरस्करणम्? अवज्ञानमनादरणम्। तेषामपि शास्त्रार्थाज्ञानवतां तद्द्वारा प्रार्थनार्थवत्त्वमित्याशङ्क्याह -- तथा मोघेति। तथापि यौक्तिकविवेकवशात्तत्प्रार्थनासाफल्यमित्याशङ्क्याह -- विचेतस इति। न केवलमुक्तविशेषणवत्त्वमेव तेषां किंतु वर्तमानदेहपातादनन्तरं तत्तदतिक्रूरयोनिप्राप्तिश्च निश्चितेत्याह -- किञ्चेति। मोहकरीमिति प्रकृतिद्वयेऽपि तुल्यं विशेषणं? छिन्धि भिन्धि पिब खादेति प्राणिहिंसारूपो रक्षसां स्वभावः? असुराणां स्वभावस्तु न देहि नो जुहुधि परस्वमेवापहरेत्यादिरूपः? मोहो मिथ्याज्ञानम्। उक्तमेव स्फुटयति -- छिन्धीति।

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Sri Dhanpati

ततश्च तेषामनादरणेन तिरस्कारणएन निन्दया च हतानां सर्वपुरुषार्थभ्रष्टानां अतिक्षुद्राणां केनापि कापि प्रार्थना न सिध्यतीत्याह -- मोघाशा इति। माघो व्यर्था आशा आशिषस्तत्तद्वस्तुप्रार्थना येषां ते। ननु तेषां प्रार्थना अग्निहोत्रादिकर्मानुष्ठानात्सार्था भविष्यतीतिचेत् भगवन्तिमात्मानमवजानतामग्निहोत्रादिकर्मणां श्रममात्रत्वेन नैष्फल्यान्नेत्याह -- मोघकर्माण इति। मोघानि निष्पलान्येव श्रमहेतुभूतानि अग्निहोत्रादीनि कर्माणि येषां ते। तदुक्तम्धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासुः यः। नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् इति। ननु भगवन्तमवजानन्तोऽपि ज्ञानिनो दृश्यन्ते ज्ञानाच्च तेषां मोक्षप्रार्थना सार्था भविष्यतीतिचेत्। भगवदवज्ञानसहितस्य तस्य साक्षात्काराहेतुत्वेन मोक्षाहेतुत्वान्नेत्याह। मोघज्ञाना मोघं निष्फलं ज्ञानं येषां ते। तदुक्तंनैष्कर्म्यम्पयत्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जमनम्। कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे च चार्पितं कर्म यदप्यकारणम् इति। विगतचेतसो विगतविवेकाश्चेति भाष्ये चो हेतौ। यतो भगवदवज्ञानेन कर्मादीनि निष्फलानि तद्भक्त्या तु सफलानीति विवेकशून्या अत एतादृशास्ते भवन्तीत्यभिप्रायः। किंच यतो राक्षसीं रक्षसां प्रकृतिं स्वभावं च्छिन्धि भिन्धि पिब खादेत्येवंरुपाम्? आसूरीमसुराणां च प्रकृतिं न देहि न जुहुधि परस्वमपहरेत्येवंरुपां मोहिनीं मोहकारीं देहात्माभिमानरुपां श्रिता आश्रिताः क्रूरकरर्माणस्ते भवन्ति अतोऽपि तेषामुक्तविशेषणवत्त्वमित्यर्थः। यद्वा किंच न केवलमुक्तविशेषणवत्त्वमेव तेषामपि तु एतादृशा अपीत्याह -- राक्षसीमिति। अथवा न केवलं वर्तमानदेह एवैतादृशाः किंतु वर्तमानदेहपातानन्तरमेतेषां तत्तदतिक्रूरयोनिप्राप्तिश्च निश्चितेत्याह -- राक्षसीमिति। तथाच श्रुतिःअसूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः। तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये केचात्महनो जनाः इति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
moghaāśhāḥ
moghakarmāṇaḥ
moghajñānāḥ
vichetasaḥdeluded
rākṣhasīmdemoniac
āsurīmatheistic
chaand
evacertainly
prakṛitimmaterial energy
mohinīmbewildered
śhritāḥtake shelter
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Bhagavad Gita · 9.11
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्

मूर्खलोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वररूप परमभावको न जानते हुए मुझे मनुष्यशरीरके आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं। — VaniSagar

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परन्तु हे पृथानन्दन ! दैवी प्रकृतिके आश्रित अनन्यमनवाले महात्मालोग मुझे सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि और अविनाशी समझकर मेरा भजन करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 12
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 12
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः

जिनकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभ-कर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान सत्-फल देनेवाले नहीं होते, ऐसे अविवेकी मनुष्य आसुरी, राक्षसी और मोहिनी फकृतिका आश्रय लेते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ: "जिनकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभ-कर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान सत्-फल देनेवाले नहीं होते, ऐसे अविवेकी मनुष्य आसुरी, राक्षसी और मोहिनी फकृतिका आश्रय लेते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 12?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 12 translates to: "They are possessed of the deceitful nature of demons and undivine beings, filled with vain hopes, vain actions, and vain knowledge that is senseless. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 12 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। जिनकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभ-कर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान सत्-फल देनेवाले नहीं होते, ऐसे अविवेकी मनुष्य आसुरी, राक्षसी और मोहिनी फकृतिका आश्रय लेते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "moghāśhā mogha-karmāṇo mogha-jñānā vichetasaḥ" mean in English?

"moghāśhā mogha-karmāṇo mogha-jñānā vichetasaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 12. They are possessed of the deceitful nature of demons and undivine beings, filled with vain hopes, vain actions, and vain knowledge that is senseless. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.