Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 32
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्

हे पृथानन्दन ! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

MalayalamIND

എന്തെന്നാൽ, എന്നിൽ അഭയം പ്രാപിച്ച്, ഹേ അർജ്ജുനാ, പാപജന്മമായിരിക്കാവുന്നവർ-സ്ത്രീകൾ, വൈശ്യർ, ശൂദ്രർ-പരമമായ ലക്ഷ്യം കൈവരിക്കുന്നു.

MarathiIND

कारण, हे अर्जुना, माझ्यामध्ये आश्रय घेऊन जे पापी जन्माचे असतील - स्त्री, वैश्य आणि शूद्र - ते सर्वोच्च ध्येय प्राप्त करतात.

SindhiIND

ڇاڪاڻ ته، مون ۾ پناهه وٺندي، اهي، جيڪي، اي ارجن، هڪ گناهه جي ڄمڻ وارا هجن - عورتون، ويسيا ۽ سدرا - اعلي مقصد حاصل ڪن ٿا.

GujaratiIND

કારણ કે, હે અર્જુન, મારામાં આશ્રય લઈને, જેઓ પાપી જન્મે છે - સ્ત્રી, વૈશ્ય અને શુદ્ર - તેઓ સર્વોચ્ચ ધ્યેય પ્રાપ્ત કરે છે.

KannadaIND

ಯಾಕಂದರೆ, ನನ್ನಲ್ಲಿ ಆಶ್ರಯ ಪಡೆದರೆ, ಓ ಅರ್ಜುನ, ಪಾಪಪೂರ್ಣ ಜನ್ಮದವರಾಗಿರಬಹುದು - ಸ್ತ್ರೀಯರು, ವೈಶ್ಯರು ಮತ್ತು ಶೂದ್ರರು - ಅವರು ಪರಮ ಗುರಿಯನ್ನು ಸಾಧಿಸುತ್ತಾರೆ.

PunjabiIND

ਕਿਉਂਕਿ, ਮੇਰੀ ਸ਼ਰਨ ਲੈ ਕੇ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਜੋ ਪਾਪੀ ਜਨਮ ਤੋਂ ਹੋ ਸਕਦੇ ਹਨ - ਇਸਤਰੀ, ਵੈਸ਼ ਅਤੇ ਸ਼ੂਦਰ - ਪਰਮ ਟੀਚੇ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦੇ ਹਨ।

MaithiliIND

कारण, जे हे अर्जुन, पाप जन्मक होथि-स्त्री, वैश्य आ शूद्र- हमर शरण मे बैसल, ओ परम लक्ष्य प्राप्त करैत छथि |

TamilIND

ஏனெனில், என்னிடம் அடைக்கலமாகி, அர்ஜுனா, பாவப் பிறவியில் இருப்பவர்கள் - பெண்கள், வைசியர்கள் மற்றும் சூத்திரர்கள் - உயர்ந்த இலக்கை அடைகிறார்கள்.

MizoIND

Keimaha inhumhimna neiin, Aw Arjuna, sual piang ni thei turte—hmeichhia, Vaisya leh Sudra—te chuan Tum Chungnung ber chu an thleng si a.

DogriIND

कीजे मेरी शरण लैंदे होई जेह्ड़े हे अर्जुन पाप जन्म दे होन-स्त्रियां, वैश्य ते शूद्र- परम लक्ष्य गी हासल करदे न।

NepaliIND

किनकि, हे अर्जुन, पापपूर्ण जन्मका नारी, वैश्य र शुद्रहरू ममा शरण लिएर सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त गर्छन्।

BhojpuriIND

काहे कि हमरा शरण में जे हे अर्जुन पाप जन्म के हो सकेला- नारी, वैश्य आ शूद्र- ऊ लोग परम लक्ष्य के प्राप्ति करेला।

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य ৷৷. यान्ति परां गतिम्'-- जिनके इस जन्ममें आचरण खराब हैं अर्थात् जो इस जन्मका पापी है, उसको भगवान्ने तीसवें श्लोकमें 'दुराचारी' कहा है। जिनके पूर्वजन्ममें आचरण खराब थे अर्थात् जो पूर्वजन्मके पापी हैं और अपने पुराने पापोंका फल भोगनेके लिये नीच योनियोंमें पैदा हुए हैं, उनको भगवान्ने यहाँ 'पापयोनि' कहा है। यहाँ 'पापयोनि' शब्द ऐसा व्यापक है, जिसमें असुर, राक्षस, पशु, पक्षी आदि सभी लिये जा सकते हैं और ये सभी भगवद्भक्तिके अधिकारी माने जाते हैं। शाण्डिल्य ऋषिने कहा है --'आनिन्द्ययोन्यधिक्रियते पारम्पर्यात् सामान्यवत्।' (शाण्डिल्य-भक्तिसूत्र 78) अर्थात् जैसे दया, क्षमा, उदारता आदि सामान्य धर्मोंके मात्र मनुष्य अधिकारी हैं, ऐसे ही भगवद्भक्तिके नीची-से-नीची योनिसे लेकर ऊँची-से-उँची योनितकके सब प्राणी अधिकारी हैं। इसका कारण यह है कि मात्र जीव भगवान्के अंश होनेसे भगवान्की तरफ चलनेमें, भगवान्की भक्ति करनेमें, भगवान्के सम्मुख होनेमें अनधिकारी नहीं हैं। प्राणियोंकी योग्यताअयोग्यता आदि तो सांसारिक कार्योंमें हैं क्योंकि ये योग्यता आदि बाह्य हैं और मिली हुई हैं तथा बिछुड़नेवाली हैं। इसलिये भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़नेमें योग्यताअयोग्यता कोई कारण नहीं है अर्थात् जिसमें योग्यता है, वह भगवान्में लग सकता है और जिसमें अयोग्यता है, वह भगवान्में नहीं लग सकता -- यह कोई कारण नहीं है। प्राणी स्वयं भगवान्के हैं अतः सभी भगवान्के सम्मुख हो सकते हैं। तात्पर्य हुआ कि जो हृदयसे भगवान्को चाहते हैं, वे सभी भगवद्भक्तिके अधिकारी हैं। ऐसे पापयोनिवाले भी भगवान्के शरण होकर परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं, परम पवित्र हो जाते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, क्योंकि हे पार्थ जो कोई पापयोनिवाले हैं अर्थात् जिनके जन्मका कारण पाप है ऐसे प्राणी हैं -- वे कौन हैं सो कहते हैं -- वे स्त्री? वैश्य और शूद्र भी मेरी शरणमें आकर -- मुझे ही अपना अवलम्बन बनाकर परम -- उत्तम गतिको ही पाते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

इतश्च भगवद्भक्तिर्विधातव्येत्याह -- किञ्चेति। न मे भक्तः प्रणश्यतीत्यन्न हेतुमाचक्षाणो भक्त्यधिकारे जातिनियमो नास्तीत्याह -- मां हीति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

किंच हे पार्थ? येऽपि पापं योनिर्येषां ते पापयोनयः पापजन्मानस्तेऽपि मां वासुदेवं व्यपाश्रित्य ईश्वर एव भक्त्या प्रदादितोऽस्माकमुद्धर्तेत्याश्रयत्वेन गृहीत्वा परां प्रकृष्टां गतिं यान्ति गच्छन्ति। के ते पापयोनय इत्यत आह -- स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रा इति। तत्र स्त्रीशूद्राणां वेदाध्ययनादावनधिकृतानां पापबाहुल्याल्लब्धस्त्रीजन्मानां पापयोनित्वं स्पष्टमेव। वैश्या अपि पूर्वजन्मनि ब्राह्मणाः क्षत्रिया वा पापकर्मणा वैश्ययोनिमापन्नाः कृष्यादिरता ग्राह्याः। ननु येऽपि स्युः पापयोनयोऽन्यत्यजास्तिर्यञ्जचो वा जातिदोषेण दुष्टाः तथा स्त्रियो वैश्यास्था शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिमित्याचार्यैः कुतो न व्याख्यातमिति चेदुच्यते। निकृष्टा अपि मां व्यपाश्रित्य परां गतिं यान्ति किं पुनरुत्कृष्टा इति ह्यर्थोऽत्र विवक्षितः। तत्र पापनिबन्धना निकृष्टता पुण्यनिमित्ता चोत्कृष्टता। तथाच स्त्रियादीनां निकृष्टत्वेन पापयोनित्वावश्यकत्वेनेदमेव पापयोनय इतिपदं स्त्रियातौ संबध्यते। अन्यथा पापयोनयोऽन्त्यजादयोऽपि ये स्युस्तेऽपि मामुपाश्रित्य परां गतिं यान्तीत्येतावतैव निर्वाहे स्त्रियाद्युपादानस्यि वैयर्थ्यं स्यादिति दिक्। त्वं तु मत्पैतृष्वस्त्रेयत्वादत्युत्कृष्ट इति सूचयन्त्संबोधयति पार्थेति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
māmin me
hicertainly
pārthaArjun, the son of Pritha
vyapāśhrityatake refuge
yewho
apieven
syuḥmay be
pāpa yonayaḥof low birth
striyaḥwomen
vaiśhyāḥmercantile people
tathāand
śhūdrāḥmanual workers
te apieven they
yāntigo
parāmthe supreme
gatimdestination
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 9.31
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति

वह तत्काल (उसी क्षण) धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन ! तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश (पतन) नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.33
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा। अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्

जो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय भगवान् के भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है। इसलिये इस अनित्य और सुखरहित शरीरको प्राप्त करके तू मेरा भजन कर। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 32
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 32
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्

हे पृथानन्दन ! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 32 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 32 का हिंदी अर्थ: "हे पृथानन्दन ! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 32?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 32 translates to: "For, taking refuge in Me, they who, O Arjuna, may be of a sinful birth—women, Vaisyas, and Sudras—attain the Supreme Goal. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽ" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 32 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। हे पृथानन्दन ! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "māṁ hi pārtha vyapāśhritya ye ’pi syuḥ pāpa-yonayaḥ" mean in English?

"māṁ hi pārtha vyapāśhritya ye ’pi syuḥ pāpa-yonayaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 32. For, taking refuge in Me, they who, O Arjuna, may be of a sinful birth—women, Vaisyas, and Sudras—attain the Supreme Goal. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.