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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 31
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति

वह तत्काल (उसी क्षण) धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन ! तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश (पतन) नहीं होता। — VaniSagar

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ManipuriIND

ꯑꯊꯨꯕꯥ ꯃꯇꯃꯗꯥ ꯃꯍꯥꯛ ꯆꯨꯝꯃꯤ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯂꯣꯝꯕꯥ ꯅꯥꯏꯗꯕꯥ ꯁꯥꯟꯇꯤ ꯐꯪꯏ; ꯍꯦ ꯑꯔꯖꯨꯟ, ꯑꯩꯒꯤ ꯚꯛꯇ ꯑꯁꯤ ꯀꯩꯗꯧꯉꯩꯗꯁꯨ ꯃꯥꯡꯈꯤꯗꯦ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯅꯍꯥꯛꯅꯥ ꯁꯣꯌꯗꯅꯥ ꯂꯥꯑꯣꯊꯣꯀꯎ |

KonkaniIND

रोखडोच तो धर्मीक जाता आनी ताका सासणाची शांती मेळटा; हे अर्जुन, माझ्या भक्ताचो केन्नाच नाश जायना अशें तूं निश्चीतपणान जाहीर कर.

GujaratiIND

ટૂંક સમયમાં તે ન્યાયી બને છે અને શાશ્વત શાંતિ પ્રાપ્ત કરે છે; હે અર્જુન, તું નિશ્ચિતપણે કહે કે મારા ભક્તનો ક્યારેય નાશ થતો નથી.

KannadaIND

ಶೀಘ್ರದಲ್ಲೇ ಅವನು ನೀತಿವಂತನಾಗುತ್ತಾನೆ ಮತ್ತು ಶಾಶ್ವತ ಶಾಂತಿಯನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ; ಓ ಅರ್ಜುನಾ, ನನ್ನ ಭಕ್ತ ಎಂದಿಗೂ ನಾಶವಾಗುವುದಿಲ್ಲ ಎಂದು ನೀನು ಖಚಿತವಾಗಿ ಘೋಷಿಸು.

DogriIND

जल्दी गै ओह धर्मी होई जंदा ऐ ते अनन्त शांति हासल करदा ऐ; हे अर्जुन, तू पक्का ऐलान करो कि मेरा भक्त कदे नाश नहीं होंदा।

MaithiliIND

जल्दिये ओ धर्मात्मा भ' जाइत छथि आ अनन्त शान्ति प्राप्त करैत छथि; हे अर्जुन, अहाँ निश्चित रूप सँ घोषणा करू जे हमर भक्त कहियो नष्ट नहि होइत अछि ।

OdiaIND

ଶୀଘ୍ର ସେ ଧାର୍ମିକ ହୁଅନ୍ତି ଏବଂ ଅନନ୍ତ ଶାନ୍ତି ପ୍ରାପ୍ତ କରନ୍ତି; ହେ ଅର୍ଜୁନ, ନିଶ୍ଚିତ ଭାବରେ ଘୋଷଣା କର ଯେ ମୋର ଭକ୍ତ କଦାପି ବିନଷ୍ଟ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ |

TeluguIND

త్వరలో అతను నీతిమంతుడవుతాడు మరియు శాశ్వతమైన శాంతిని పొందుతాడు; ఓ అర్జునా, నా భక్తుడు ఎన్నటికీ నశించడని నిశ్చయంగా ప్రకటించు.

MarathiIND

लवकरच तो नीतिमान बनतो आणि शाश्वत शांती प्राप्त करतो; हे अर्जुना, माझा भक्त कधीही नाश पावत नाही, हे तू निश्चितपणे सांग.

BengaliIND

শীঘ্রই সে ধার্মিক হয়ে ওঠে এবং অনন্ত শান্তি লাভ করে; হে অর্জুন, তুমি নিশ্চিতভাবে ঘোষণা কর যে, আমার ভক্ত কখনও বিনষ্ট হয় না।

MalayalamIND

താമസിയാതെ അവൻ നീതിമാനായിത്തീരുകയും നിത്യശാന്തി നേടുകയും ചെയ്യുന്നു; ഹേ അർജ്ജുനാ, എൻ്റെ ഭക്തൻ ഒരിക്കലും നശിക്കുകയില്ല എന്ന് ഉറപ്പിച്ചു പറയുക.

TamilIND

விரைவில் அவர் நீதியுள்ளவராகி நித்திய அமைதியை அடைகிறார்; அர்ஜுனா, என் பக்தன் ஒருக்காலும் அழியமாட்டான் என்பதை உறுதியாகப் பிரகடனம் செய்.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या --'क्षिप्रं भवति धर्मात्मा'-- वह तत्काल धर्मात्मा हो जाता है अर्थात् महान् पवित्र हो जाता है। कारण कि यह जीव स्वयं परमात्माका अंश है और जब इसका उद्देश्य भी परमात्माकी प्राप्ति करना हो गया तो अब उसके धर्मात्मा होनेमें क्या देरी लगेगी? अब वह पापात्मा कैसे रहेगा? क्योंकि वह धर्मात्मा तो स्वतः था ही, केवल संसारके सम्बन्धके कारण उसमें पापात्मापन आया था, जो कि आगन्तुक था। अब जब अहंता बदलनेसे संसारका सम्बन्ध नहीं रहा, तो वह ज्यों-का-त्यों (धर्मात्मा) रह गया।यह जीव जब पापात्मा नहीं बना था, तब भी पवित्र था और जब पापात्मा बन गया, तब भी वैसा ही पवित्र था। कारण कि परमात्माका अंश होनेसे जीव सदा ही पवित्र है। केवल संसारके सम्बन्धसे वह पापात्मा बना था। संसारका सम्बन्ध छूटते ही वह ज्योंकात्यों पवित्र रह गया।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

आन्तरिक यथार्थ निश्चयकी शक्तिसे बाहरी दुराचारिताको छोड़कर --, वह शीघ्र ही धर्मात्मा -- धार्मिक चित्तवाला बन जाता है और सदा रहनेवाली नित्य शान्ति -- उपरतिको पा लेता है। हे कुन्तीपुत्र तू यथार्थ बात सुन? तू यह निश्चित प्रतिज्ञा कर अर्थात् दृढ़ निश्चय कर ले कि जिसने मुझ परमात्मामें अपना अन्तःकरण समर्पित कर दिया है वह मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता? अर्थात् उसका कभी पतन नहीं होता।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

हेत्वर्थमेव प्रपञ्चयति -- उत्सृज्येति। भगवन्तं भजमानस्य कथं दुराचारता परित्यक्ता भवतीत्याशङ्क्याह -- क्षिप्रमिति। सति दुराचारे कथं धर्मचित्तत्वं तदाह -- शश्वदिति। उपशमो दुराचारादुपरमः। किमिति त्वद्भक्तस्य दुराचारादुपरतिरुच्यते दुराचारोपहतचेतस्तया किमित्यसौ न नङ्क्ष्यतीत्याशङ्क्याह -- शृण्विति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

ननु किं त्वामनन्यभाक् भजन्नपि सुदुराचार एव तिष्ठति? नेत्याह -- क्षिप्रमिति। अतः मद्भजनरुपसम्यग्व्यवसायसामर्थ्याद्वाह्यतां दुराचारतां च विहाय क्षिप्रं शीघ्रं धर्मात्मा धर्मे आत्मा चित्तं यस्य स धर्मचित्त एव भवति। तत एव शश्वन्नित्यं शान्तिमुपशमं नितरां गच्छति प्राप्नोति। अस्मिन्नर्थेऽसंभावनां निरस्यन्नाह। हे कौन्तेय? मे मम भ्कतो न प्रणश्यतीति प्रतिजानीहि निश्चितां प्रतिज्ञां कुरु। यथा कुन्ती इन्द्रादिसंसर्गं कृत्वापि मद्भक्तिमहिम्ना सर्वोत्तमा सतीत्वेन परिगणिता नाधर्मसंबन्धेन नाशयोग्या तथेति कौन्तेयेति संबोधनस्य गूढाभिप्रायः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
kṣhipramquickly
bhavatibecome
dharmaātmā
śhaśhvatśhāntim
nigachchhatiattain
kaunteyaArjun, the son of Kunti
pratijānīhideclare
nanever
memy
bhaktaḥdevotee
praṇaśhyatiperishes
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Bhagavad Gita · 9.30
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः

अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.32
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्

हे पृथानन्दन ! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 31
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 31
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति

वह तत्काल (उसी क्षण) धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन ! तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश (पतन) नहीं होता। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 31 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 31 का हिंदी अर्थ: "वह तत्काल (उसी क्षण) धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन ! तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश (पतन) नहीं होता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 31?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 31 translates to: "Soon he becomes righteous and attains eternal peace; O Arjuna, proclaim thou for certain that My devotee never perishes. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 31 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। वह तत्काल (उसी क्षण) धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन ! तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश (पतन) नहीं होता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "kṣhipraṁ bhavati dharmātmā śhaśhvach-chhāntiṁ nigachchhati" mean in English?

"kṣhipraṁ bhavati dharmātmā śhaśhvach-chhāntiṁ nigachchhati" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 31. Soon he becomes righteous and attains eternal peace; O Arjuna, proclaim thou for certain that My devotee never perishes. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.