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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 30
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः

अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

అత్యంత పాపాత్ముడు నన్ను పూజించినా, మరెవరి పట్లా భక్తితో పూజించినా, అతడు న్యాయంగా పరిష్కరించినందున, అతను నిజంగా నీతిమంతుడిగా పరిగణించబడాలి.

SindhiIND

جيتوڻيڪ سڀ کان وڌيڪ گنهگار منهنجي عبادت ڪري ٿو، ڪنهن ٻئي جي عقيدت سان، هن کي حقيقت ۾ صالح سمجهيو وڃي، ڇاڪاڻ ته هن صحيح فيصلو ڪيو آهي.

MarathiIND

जरी अत्यंत पापी मनुष्याने माझी उपासना केली, इतर कोणाचीही भक्ती केली नाही, तरी तो खरोखरच धार्मिक समजला पाहिजे, कारण त्याने योग्य संकल्प केला आहे.

BengaliIND

এমনকি যদি সবচেয়ে পাপী আমার উপাসনা করে, অন্য কারো প্রতি ভক্তি না করে, তবে তাকে সত্যই ধার্মিক বলে গণ্য করা উচিত, কারণ সে ঠিকই সিদ্ধান্ত নিয়েছে।

NepaliIND

परम पापीले मेरो आराधना गरे पनि अरु कसैको भक्तिभावले गर्दा पनि उसलाई धर्मी मान्नु पर्छ, किनकि उसले ठीकै संकल्प गरेको छ।

KannadaIND

ಅತಿಪಾಪಿಯು ನನ್ನನ್ನು ಪೂಜಿಸಿದರೂ, ಬೇರೆಯವರಿಗೆ ಭಕ್ತಿಯಿಲ್ಲದಿದ್ದರೂ, ಅವನು ನಿಜವಾಗಿಯೂ ನೀತಿವಂತನೆಂದು ಪರಿಗಣಿಸಬೇಕು, ಏಕೆಂದರೆ ಅವನು ಸರಿಯಾಗಿ ಪರಿಹರಿಸಿದ್ದಾನೆ.

TamilIND

பாவம் செய்பவன் வேறு எவரிடத்திலும் பக்தியுடன் என்னை வணங்கினாலும், அவன் சரியாகத் தீர்த்துவிட்டதால், அவன் உண்மையில் நீதியுள்ளவனாகக் கருதப்பட வேண்டும்.

PunjabiIND

ਭਾਵੇਂ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਧ ਪਾਪੀ ਮੇਰੀ ਭਗਤੀ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਦੀ ਸ਼ਰਧਾ ਨਾਲ, ਉਹ ਸੱਚਮੁੱਚ ਧਰਮੀ ਮੰਨਿਆ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਸਨੇ ਸਹੀ ਸੰਕਲਪ ਕੀਤਾ ਹੈ.

GujaratiIND

જો સૌથી વધુ પાપી મારી ભક્તિ કરે, બીજા કોઈની ભક્તિ સાથે, તો પણ તે ખરેખર ન્યાયી ગણવો જોઈએ, કારણ કે તેણે યોગ્ય રીતે સંકલ્પ કર્યો છે.

KonkaniIND

चड पापी मनीस हेरांक भक्ती नासतना म्हजी भजता तरी ताका खरेंच धर्मीक मानूंक जाय, कारण ताणें योग्य थाराव केला.

MalayalamIND

ഏറ്റവും പാപിയായവൻ മറ്റാരോടും ഭക്തിയോടെ എന്നെ ആരാധിച്ചാലും, അവൻ നീതിമാൻ ആയി കണക്കാക്കണം, കാരണം അവൻ ശരിയായി തീരുമാനിച്ചു.

AssameseIND

যদিও অতি পাপীয়ে মোক পূজা কৰে, আন কাৰো ভক্তি নোহোৱাকৈ, তথাপিও তেওঁক সঁচাকৈয়ে ধাৰ্মিক বুলি গণ্য কৰা উচিত, কাৰণ তেওঁ সঠিকভাৱে সংকল্প লৈছে।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या --[कोई करोड़पति या अरबपति यह बात कह दे कि मेरे पास जो कोई आयेगा, उसको मैं एक लाख रुपये दूँगा, तो उसके इस वचनकी परीक्षा तब होगी, जब उससे सर्वथा ही विरुद्ध चलनेवाला, उसके साथ वैर रखनेवाला, उसका अनिष्ट करनेवाला भी आकर उससे एक लाख रुपये माँगे और वह उसको दे दे। इससे सबको यह विश्वास हो जायगा कि जो यह माँगे, उसको दे देता है। इसी भावको लेकर भगवान् सबसे पहले दुराचारीका नाम लेते हैं।] 'अपि चेत्'-- सातवें अध्यायमें आया है कि जो पापी होते हैं, वे मेरे शरण नहीं होते (7। 15) और यहाँ कहा है कि दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है-- इन दोनों बातोंमें आपसमें विरोध प्रतीत होता है। इस विरोधको दूर करनेके लिये ही यहाँ 'अपि' और 'चेत्' ये दो पद दिये गये हैं। तात्पर्य है कि सातवें अध्यायमें 'दुष्कृती मनुष्य मेरे शरण नहीं होते' ऐसा कहकर उनके स्वभावका वर्णन किया है। परन्तु वे भी किसी कारणसे मेरे भजनमें लगना चाहें तो लग सकते हैं। मेरी तरफसे किसीको कोई मना नहीं है ; क्योंकि किसी भी प्राणीके प्रति मेरा द्वेष नहीं है। ये भाव प्रकट करनेके लिये ही यहाँ 'अपि' और 'चेत्' पदोंका प्रयोग किया है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

मेरी भक्तिकी महिमा सुन --, यदि कोई सुदुराचारी अर्थात् अतिशय बुरे आचरणवाला मनुष्य भी अनन्य प्रेमसे युक्त हुआ मुझ ( परमेश्वर ) को भजता है तो उसे साधु ही मानना चाहिये अर्थात् उसे यथार्थ आचरण करनेवाला ही समझना चाहिये क्योंकि यह यथार्थ निश्चययुक्त हो चुका है -- उत्तम निश्चयवाला हो गया है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

प्रकृतां भगवद्भक्तिं स्तुवन्पापीयसामपि तत्राधिकारोऽस्तीति सूचयति -- शृण्विति। सम्यग्वृत्त एव भगवद्भक्तो ज्ञातव्य इत्यत्र हेतुमाह -- सम्यगिति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

शृणु मद्भक्तेर्महिमानं दुराचारानपि यया युक्ताननुगृह्णामीत्याह। अपिचेत् यद्यपि सुदुराचारः सुष्ठु अत्यन्तं दुष्ट आचारः आचरणं यस्य स पूर्वं सुदुराचारोऽपि यो मां परमेस्वरं अनन्यभाक् न विद्यतेऽन्यस्मिमन्भक्तिर्यस्य सः भजते सेवते स साधुरेव मन्तव्यः। हि यस्मात्सभ्यग्वयवसितः सम्यक् यथावत् व्यवसायं निश्चयं प्राप्तः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
apieven
chetif
sudurāchāraḥ
bhajateworship
māmme
ananyabhāk
sādhuḥrighteous
evacertainly
saḥthat person
mantavyaḥis to be considered
samyakproperly
vyavasitaḥresolve
hicertainly
saḥthat person
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 9.29
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्

मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ। उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है। परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.31
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति

वह तत्काल (उसी क्षण) धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन ! तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश (पतन) नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 30
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 30
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः

अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 30 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 30 का हिंदी अर्थ: "अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 30?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 30 translates to: "Even if the most sinful worships Me, with devotion to no one else, he should indeed be regarded as righteous, for he has rightly resolved. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 30 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "api chet su-durāchāro bhajate mām ananya-bhāk" mean in English?

"api chet su-durāchāro bhajate mām ananya-bhāk" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 30. Even if the most sinful worships Me, with devotion to no one else, he should indeed be regarded as righteous, for he has rightly resolved. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.