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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 33
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा। अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्

जो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय भगवान् के भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है। इसलिये इस अनित्य और सुखरहित शरीरको प्राप्त करके तू मेरा भजन कर। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

MarathiIND

मग, ब्राह्मण आणि भक्त राजे संत किती सहजतेने ध्येय गाठतात? या शाश्वत आणि दुःखी जगात आल्यावर तू माझी पूजा कर.

BengaliIND

তাহলে, ব্রাহ্মণ এবং ভক্ত রাজ-সাধুরা কত সহজে লক্ষ্য অর্জন করে? এই অস্থায়ী ও অসুখী পৃথিবীতে এসে তুমি আমার পূজা কর।

NepaliIND

त्यसोभए, ब्राह्मण र भक्त राज संतहरूले कति सजिलै लक्ष्य प्राप्त गर्न सक्छन्? यस अस्थायी र दुखी संसारमा आएर मेरो भजन गर।

PunjabiIND

ਤਾਂ ਫਿਰ, ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਅਤੇ ਸ਼ਰਧਾਲੂ ਸ਼ਾਹੀ ਸੰਤ ਕਿੰਨੀ ਆਸਾਨੀ ਨਾਲ ਟੀਚਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਲੈਂਦੇ ਹਨ? ਇਸ ਅਸਥਾਈ ਅਤੇ ਦੁਖੀ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਆ ਕੇ ਤੂੰ ਮੇਰੀ ਭਗਤੀ ਕਰ।

GujaratiIND

તો પછી, બ્રાહ્મણો અને સમર્પિત રાજવી સંતો કેટલી સરળતાથી ધ્યેય પ્રાપ્ત કરે છે? આ અસ્થાયી અને દુઃખી જગતમાં આવીને તું મારી પૂજા કર.

TamilIND

அப்படியானால், பிராமணர்களும் அர்ப்பணிப்புள்ள அரச துறவிகளும் எவ்வளவு எளிதாக இலக்கை அடைகிறார்கள்? இந்த நிலையற்ற மற்றும் மகிழ்ச்சியற்ற உலகத்திற்கு வந்த பிறகு, நீங்கள் என்னை வணங்குங்கள்.

KannadaIND

ಹಾಗಾದರೆ, ಬ್ರಾಹ್ಮಣರು ಮತ್ತು ನಿಷ್ಠಾವಂತ ರಾಜ ಸಂತರು ಎಷ್ಟು ಸುಲಭವಾಗಿ ಗುರಿಯನ್ನು ಸಾಧಿಸುತ್ತಾರೆ? ಈ ಅಶಾಶ್ವತ ಮತ್ತು ಅತೃಪ್ತ ಜಗತ್ತಿಗೆ ಬಂದ ನಂತರ, ನೀನು ನನ್ನನ್ನು ಪೂಜಿಸು.

SindhiIND

پوءِ برهمڻ ۽ عقيدتمند شاهي بزرگ ڪيترو آسانيءَ سان مقصد حاصل ڪندا؟ هن فاني دنيا ۾ اچي، تون منهنجي عبادت ڪر.

MalayalamIND

അപ്പോൾ, ബ്രാഹ്മണരും അർപ്പണബോധമുള്ള രാജകീയ സന്യാസിമാരും എത്ര എളുപ്പത്തിൽ ലക്ഷ്യം കൈവരിക്കും? ഈ അനശ്വരവും അസന്തുഷ്ടവുമായ ലോകത്തിൽ വന്നിട്ട് നീ എന്നെ ആരാധിക്കുക.

DogriIND

फिर ब्राह्मण ते भक्त राज संत कितनी आसानी नाल लक्ष्य हासिल करदे हन? इस अनित्य ते दुखी संसार च आ के तू मेरी भक्ति करो।

BhojpuriIND

त ब्राह्मण आ भक्त राज संत लोग केतना आसानी से लक्ष्य के प्राप्ति होला? एह अनित्य आ दुखी संसार में आके तू हमार पूजा करऽ।

ManipuriIND

ꯑꯗꯨ ꯑꯣꯏꯔꯕꯗꯤ ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯃꯅꯁꯤꯡ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯚꯛꯇ ꯔꯥꯖꯀꯨꯃꯥꯔꯁꯤꯡꯅꯥ ꯀꯌꯥ ꯌꯥꯝꯅꯥ ꯂꯥꯏꯅꯥ ꯄꯥꯟꯗꯝ ꯑꯗꯨ ꯐꯪꯂꯤꯕꯅꯣ? ꯂꯦꯡꯗꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯇꯕꯥ ꯃꯥꯂꯦꯝ ꯑꯁꯤꯗꯥ ꯂꯥꯛꯇꯨꯅꯥ ꯅꯍꯥꯛꯅꯥ ꯑꯩꯕꯨ ꯈꯨꯔꯨꯃꯖꯧ |

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षय स्तथा'-- जब वर्तमानमें पाप करनेवाला साङ्गोपाङ्ग दुराचारी और पूर्वजन्मके पापोंके कारण नीच योनियोंमें जन्म लेनेवाले प्राणी तथा स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र--ये सभी मेरे शरण होकर, मेरा आश्रय लेकर परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं, परम पवित्र हो जाते हैं, तो फिर जिनके पूर्वजन्मके आचरण भी अच्छे हों और इस जन्ममें भी उत्तम कुलमें जन्म हुआ हो, ऐसे पवित्र ब्राह्मण और पवित्र क्षत्रिय अगर मेरे शरण हो जायँ, मेरे भक्त बन जायँ, तो वे परमगतिको प्राप्त हो जायँगे, इसमें कहना ही क्या है! अर्थात् वे निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जायँगे।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

फिर जो पुण्ययोनि ब्राह्मण और राजर्षि भक्त हैं उनका तो कहना ही क्या है जो राजा भी हों और ऋषि भी हों? वे राजर्षि कहलाते हैं। क्योंकि यह बात है? इसलिये इस अनित्य? क्षणभङ्गुर और सुखरहित मनुष्यलोकको पाकर अर्थात् परम पुरुषार्थके साधनरूप दुर्लभ मनुष्यशरीरको पाकर मुझ ईश्वरका ही भजन कर -- मेरी ही सेवा कर।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

यदि पापयोनिः पापाचारश्च त्वद्भक्त्या परां गतिं गच्छति तर्हि किमुत्तमजातिनिमित्तेन संन्यासादिना किं वा सद्वृत्तेनेत्याशङ्क्याह -- किं पुनरिति। उत्तमजातिमतां ब्राह्मणादीनामतिशयेन परा गतिर्यतो लभ्यतेऽतो भगवद्भजनं तैरेकान्तेन विधातव्यमित्याह -- यत इति। मनुष्यदेहातिरिक्तेषु पश्वादिदेहेषु भगवद्भजनयोग्यताभावात्प्राप्ते मनुष्यत्वे तद्भजने प्रयतितव्यमित्याह -- दुर्लभमिति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्याः पुण्ययोनयः शमादिसंपन्नाः तथा पुण्ययोनयो राजानश्च ते ऋषयः सूक्ष्मदर्शिनो मद्भक्ताः क्षत्रियाः मां व्यपाश्रित्य परां गतिं यान्तीति किंमु वक्तव्यमित्यर्थः। यस्मान्मद्भजनमेव परमपुरुषार्थसाधनं अतोऽनित्यमसुखमिमं मनुष्यलोकं पुरुषार्थसाधनं प्राप्य मां वासुदेवं परमात्मानं भजस्व। अनित्यमित्यनेन कालान्तरे त्वद्भजनं करिष्यामीति वारितम्। सुखवर्जितमिति तद्धननेन सुखत्यागो भविष्यतीति। इममित्यनेन राजर्षिदेहं मत्संनिधियोग्यमतिदुर्लभमित्युक्तम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
kimwhat
punaḥthen
brāhmaṇāḥsages
puṇyāḥmeritorius
bhaktāḥdevotees
rājaṛiṣhayaḥ
tathāand
anityamtransient
asukhamjoyless
lokamworld
imamthis
prāpyahaving achieved
bhajasvaengage in devotion
māmunto me
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Bhagavad Gita · 9.32
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्

हे पृथानन्दन ! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.34
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः

तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर। इस प्रकार मेरे साथ अपने-आपको लगाकर, मेरे परायण हुआ तू मेरेको ही प्राप्त होगा। , — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 33
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 33
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा। अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्

जो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय भगवान् के भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है। इसलिये इस अनित्य और सुखरहित शरीरको प्राप्त करके तू मेरा भजन कर। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 33 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 33 का हिंदी अर्थ: "जो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय भगवान् के भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है। इसलिये इस अनित्य और सुखरहित शरीरको प्राप्त करके तू मेरा भजन कर। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 33?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 33 translates to: "How much more easily, then, do Brahmins and devoted royal saints attain the goal? Having come to this impermanent and unhappy world, do thou worship Me. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा। अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 33 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। जो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय भगवान् के भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है। इसलिये इस अनित्य और सुखरहित शरीरको प्राप्त करके तू मेरा भजन कर। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "kiṁ punar brāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣhayas tathā" mean in English?

"kiṁ punar brāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣhayas tathā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 33. How much more easily, then, do Brahmins and devoted royal saints attain the goal? Having come to this impermanent and unhappy world, do thou worship Me. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.