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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 28
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि

इस प्रकार मेरे अर्पण करनेसे जिनसे कर्मबन्धन होता है, ऐसे शुभ (विहित) और अशुभ (निषिद्ध) सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंसे तू मुक्त हो जायगा। ऐसे अपनेसहित सब कुछ मेरे अर्पण करनेवाला और सबसे मुक्त हुआ तू मेरेको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar

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NepaliIND

यसरी, तिमी राम्रो र खराब फल दिने कर्मको बन्धनबाट मुक्त हुनेछौ; त्यागको योगमा अडिग चित्त राखेर मुक्त भएर ममा आउने छौ।

PunjabiIND

ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ, ਤੁਸੀਂ ਚੰਗੇ ਅਤੇ ਮਾੜੇ ਫਲ ਦੇਣ ਵਾਲੇ ਕਰਮ ਦੇ ਬੰਧਨਾਂ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹੋ ਜਾਵੋਗੇ; ਤਿਆਗ ਦੇ ਯੋਗ ਵਿੱਚ ਚਿੱਤ ਅਡੋਲ ਹੋ ਕੇ, ਮੁਕਤ ਹੋ ਕੇ, ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਆਵੇਂਗਾ।

MarathiIND

अशा प्रकारे, चांगली आणि वाईट फळे देणाऱ्या कर्मांच्या बंधनातून तुम्ही मुक्त व्हाल; त्यागाच्या योगात मन स्थिर ठेवून, मुक्त होऊन तू माझ्याकडे येशील.

SindhiIND

اهڙيءَ طرح، توهان عملن جي بندن کان آزاد ٿي ويندا، جيڪي سٺا ۽ بڇڙا ميوا ڏين ٿا. ذهن کي ثابت قدميءَ سان ورتاءُ جي يوگا ۾، ۽ آزاد ٿي، تون مون وٽ ايندين.

OdiaIND

ଏହିପରି, ତୁମେ ଭଲ ଏବଂ ମନ୍ଦ ଫଳ ଦେଉଥିବା କାର୍ଯ୍ୟର ବନ୍ଧନରୁ ମୁକ୍ତ ହେବ; ତ୍ୟାଗର ଯୋଗରେ ମୁକ୍ତ ମନ ସହିତ, ଏବଂ ମୁକ୍ତ ହୋଇ ତୁମେ ମୋ ପାଖକୁ ଆସିବ |

GujaratiIND

આમ, તમે સારા અને ખરાબ ફળ આપતાં કાર્યોના બંધનોમાંથી મુક્ત થશો; ત્યાગના યોગમાં મન સ્થિર રાખીને, અને મુક્ત થઈને, તમે મારી પાસે આવશો.

KannadaIND

ಹೀಗಾಗಿ, ಒಳ್ಳೆಯ ಮತ್ತು ಕೆಟ್ಟ ಫಲಗಳನ್ನು ನೀಡುವ ಕ್ರಿಯೆಗಳ ಬಂಧಗಳಿಂದ ನೀವು ಮುಕ್ತರಾಗುತ್ತೀರಿ; ತ್ಯಾಗದ ಯೋಗದಲ್ಲಿ ದೃಢವಾದ ಮನಸ್ಸಿನಿಂದ ಮತ್ತು ಮುಕ್ತಿ ಹೊಂದಿ, ನೀವು ನನ್ನ ಬಳಿಗೆ ಬರುತ್ತೀರಿ.

TeluguIND

ఈ విధంగా, మీరు మంచి మరియు చెడు ఫలాలను ఇచ్చే చర్యల బంధాల నుండి విముక్తి పొందుతారు; త్యజించే యోగంలో స్థిరమైన మనస్సుతో, మరియు విముక్తితో, మీరు నా వద్దకు వస్తారు.

BengaliIND

এইভাবে, আপনি কর্মের বন্ধন থেকে মুক্ত হবেন যা ভাল এবং মন্দ ফল দেয়; ত্যাগের যোগে অটল চিত্তে এবং মুক্ত হয়ে তুমি আমার কাছে আসবে।

MalayalamIND

അങ്ങനെ, നല്ലതും ചീത്തയുമായ ഫലങ്ങൾ നൽകുന്ന പ്രവർത്തനങ്ങളുടെ ബന്ധനങ്ങളിൽ നിന്ന് നിങ്ങൾ സ്വതന്ത്രരാകും; ത്യാഗത്തിൻ്റെ യോഗയിൽ ഉറച്ച മനസ്സോടെ, മോചിതനായി, നീ എൻ്റെ അടുക്കൽ വരും.

AssameseIND

এইদৰে তোমালোকে ভাল আৰু বেয়া ফল দিয়া কৰ্মৰ বান্ধোনৰ পৰা মুক্ত হবা; ত্যাগ যোগত অটল মন লৈ, আৰু মুক্ত হৈ, তুমি মোৰ ওচৰলৈ আহিবা।

KonkaniIND

अशे तरेन तुमी बरें आनी वायट फळां दिवपी कर्मांच्या बंधनांतल्यान मुक्त जातले; त्यागयोगांत थिरावन, मुक्त जावन, तूं माझ्याकडेन येतलो.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः--पूर्वोक्त प्रकारसे सब पदार्थ और क्रियाएँ मेरे अर्पण करनेसे अर्थात् तेरे स्वयंके मेरे अर्पित हो जानेसे अनन्त जन्मोंके जो शुभ-अशुभ कर्मोंके फल हैं, उन सबसे तू मुक्त हो जायगा। वे कर्मफल तेरेको जन्म-मरण देनेवाले नहीं होंगे। यहाँ शुभ और अशुभकर्मोंसे अनन्त जन्मोंके किये हुए संचित शुभ-अशुभकर्म लेने चाहिये। कारण कि भक्त वर्तमानमें भगवदाज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म ही भगवान्को अर्पण करता है। भगवदाज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म शुभ ही होते हैं, अशुभ होते ही नहीं। हाँ, अगर किसी रीतिसे, किसी परिस्थितिके कारण, किसी पूर्वाभ्यासके प्रवाहके कारण भक्तके द्वारा कदाचित्, किञ्चिन्मात्र भी कोई आनुषङ्गिक अशुभकर्म बन जाय, तो उसके हृदयमें विराजमान भगवान् उस अशुभकर्मको नष्ट कर देते हैं ।जितने भी कर्म किये जाते हैं, वे सभी बाह्य होते हैं अर्थात् शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदिके द्वारा ही होते हैं। इसलिये उन शुभ और अशुभकर्मोंका अनुकल-प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें जो फल आता है, वह भी बाह्य ही होता है। मनुष्य भूलसे उन परिस्थितियोंके साथ अपना सम्बन्ध जोड़कर सुखी-दुःखी होता रहता है। यह सुखी-दुःखी होना ही कर्मबन्धन है और इसीसे वह जन्मता-मरता है। परन्तु भक्तकी दृष्टि अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंपर न रहकर भगवान्की कृपापर रहती है अर्थात् भक्त उनको भगवान्का विधान ही मानता है, कर्मोंका फल मानता ही नहीं। इसलिये वह अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिरूप कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है। 'संन्यासयोगयुक्तात्मा'--सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान्के अर्पण करनेका नाम 'संन्यासयोग' है। इस संन्यासयोग अर्थात् समर्पणयोगसे युक्त होनेवालेको यहाँ 'संन्यासयोगयुक्तात्मा' कहा गया है। ऐसे तो गीतामें बहुत जगह 'संन्यास' शब्द सांख्ययोगका वाचक आता है, पर इसका प्रयोग भक्तिमें भी होता है; जैसे-- 'मयि संन्यस्य' (18। 57)। जैसे सांख्ययोगी सम्पूर्ण कर्मोंको मनसे नवद्वारवाले शरीरमें रखकर स्वयं सुखपूर्वक अपने स्वरूपमें स्थित रहता है (गीता 5। 13), ऐसे ही भक्त कर्मोंके साथ अपने माने हुए सम्बन्धको भगवान्में रख देता है। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे कोई सज्जन अपनी धरोहरको कहीं रख देता है, ऐसे ही भक्त अपनेसहित अनन्त जन्मोंके संचित कर्मोंको, उनके फलोंको और उनके सम्बन्धको भगवान्में रख देता है। इसलिये इसको 'संन्यासयोग' कहा गया है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

ऐसा करनेसे तुझे जो लाभ होगा वह सुन --, इस प्रकार कर्मोंको मेरे अर्पण करके तू शुभाशुभ फलयुक्त कर्मबन्धनसे अर्थात् अच्छा और बुरा जिसका फल,है ऐसे कर्मरूप बन्धनसे छूट जायगा। तथा इस प्रकार तू संन्यासयोगयुक्तात्मा होकर? -- मेरे अर्पण करके कर्म किये जानेके कारण जो संन्यास है और कर्मरूप होनेके कारण जो योग है उस संन्यासरूप योगसे जिसका अन्तःकरण युक्त है उसका नाम संन्यासयोगयुक्तात्मा है? ऐसा होकर? -- तू इस जीवितावस्थामें ही कर्मबन्धनसे मुक्त होकर इस शरीरका नाश होनेपर मुझे ही प्राप्त हो जायगा। अर्थात् मुझमें ही विलीन हो जायगा।

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Sri Anandgiri

किमतो भवति तदाह -- एवमिति। भगवदर्पणबुद्ध्या सर्वकर्म कुर्वतो जीवन्मुक्तस्य प्रारब्धकर्मावसाने विदेहकैवल्यमावश्यकमित्याह -- शुभेत्यादिना। भगवदर्पणकरणान्मुक्तिः संन्यासयोगाच्चेति साधनद्वयशङ्कां शातयति -- सोऽयमिति।

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Sri Dhanpati

एवं मदर्पणं कुर्वतस्तत्व यत्फलं भविष्यति तच्छृणु। शूभाशुभे इष्यानिष्टे फले येषां कर्मणां तान्येव बन्धनानि शूभाशूभफलैः कर्मरुपैर्बन्धनैरितियावत्। एवं मदुक्तं कुर्वन् मोक्ष्यसे। कर्मभिर्न बध्यस इत्यर्थः। सोऽयं मदर्पणबुद्य्धा क्रियमाणकर्मसंन्यासयोगो नाम फलत्यागात्संन्यासश्चासौ कर्मत्वाद्योगश्च तेन युक्त आत्मा अन्तःकरणं यस्य स त्वं संन्यासः स्वरुपतः सर्वकर्मत्यागः स एव युज्यते ब्रह्मणानेनेति योगस्तेन युक्तस्तस्मिन्युक्तः समाहितो वा आत्मान्तःकरणं यस्य स त्वं संन्यासः स्वरुपतः सर्वकर्मत्यागः स ए युज्यते ब्रह्मणानेनेति योगस्तेन युक्तस्तस्मिन्युक्तः समाहितो वा आत्मान्तःकरणं यस्य स त्वमित्यर्थस्तु सर्वकर्मत्यागरुपे मुख्यसंन्यासेऽर्जुनाधिकारो भगवतोऽनभिप्रेत इत्यभिप्रेत्याचार्यैर्न प्रदर्शितः। संन्यासयोगयुक्तात्मा सन् ज्ञानप्राप्त्या जीवन्नेव कर्मबन्धनैर्विमुक्तः पतितं च देहे मां परमात्मानं सच्चिदान्दघनं मोक्षाख्यमुपैष्यसि प्राप्स्यसि।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhubha aśhubha phalaiḥfrom good and bad results
evamthus
mokṣhyaseyou shall be freed
karmawork
bandhanaiḥfrom the bondage
sanyāsayoga
yuktaātmā
vimuktaḥliberated
māmto me
upaiṣhyasiyou shall reach
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Bhagavad Gita · 9.27
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्

हे कुन्तीपुत्र ! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे। — VaniSagar

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समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्

मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ। उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है। परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 28
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 28
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि

इस प्रकार मेरे अर्पण करनेसे जिनसे कर्मबन्धन होता है, ऐसे शुभ (विहित) और अशुभ (निषिद्ध) सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंसे तू मुक्त हो जायगा। ऐसे अपनेसहित सब कुछ मेरे अर्पण करनेवाला और सबसे मुक्त हुआ तू मेरेको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 28 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 28 का हिंदी अर्थ: "इस प्रकार मेरे अर्पण करनेसे जिनसे कर्मबन्धन होता है, ऐसे शुभ (विहित) और अशुभ (निषिद्ध) सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंसे तू मुक्त हो जायगा। ऐसे अपनेसहित सब कुछ मेरे अर्पण करनेवाला और सबसे मुक्त हुआ तू मेरेको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 28?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 28 translates to: "Thus, you shall be freed from the bonds of actions yielding good and evil fruits; with the mind steadfast in the Yoga of renunciation, and liberated, you shall come to Me. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 28 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। इस प्रकार मेरे अर्पण करनेसे जिनसे कर्मबन्धन होता है, ऐसे शुभ (विहित) और अशुभ (निषिद्ध) सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंसे तू मुक्त हो जायगा। ऐसे अपनेसहित सब कुछ मेरे अर्पण करनेवाला और सबसे मुक्त हुआ तू मेरेको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhubhāśhubha-phalair evaṁ mokṣhyase karma-bandhanaiḥ" mean in English?

"śhubhāśhubha-phalair evaṁ mokṣhyase karma-bandhanaiḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 28. Thus, you shall be freed from the bonds of actions yielding good and evil fruits; with the mind steadfast in the Yoga of renunciation, and liberated, you shall come to Me. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.