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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 27
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्

हे कुन्तीपुत्र ! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

MarathiIND

हे अर्जुना, तू जे काही करतोस, जे काही खातोस, जे काही यज्ञ करतोस, जे काही देतोस, जे काही तप करतोस, ते मला अर्पण म्हणून कर.

TamilIND

நீ எதைச் செய்தாலும், எதைச் சாப்பிட்டாலும், எதைப் பலியிடுகிறாயோ, எதைக் கொடுத்தாலும், எந்தத் துறவு செய்கிறாயோ, அர்ஜுனா, அதை எனக்குப் பிரசாதமாகச் செய்.

GujaratiIND

હે અર્જુન, તમે જે કંઈ કરો, જે કંઈ ખાઓ, જે કંઈ યજ્ઞ કરો, તમે જે કંઈ આપો, જે કંઈ તપ કરો, હે અર્જુન, તે મને અર્પણ કરો.

NepaliIND

तिमी जे गर्छौ, जे खान्छौ, जे जे बलिदान गर्छौ, जे दिन्छौ, जे तपस्या गर्छौ, हे अर्जुन, मलाई प्रसादको रुपमा गर ।

PunjabiIND

ਜੋ ਕੁਝ ਤੂੰ ਕਰਦਾ ਹੈਂ, ਜੋ ਕੁੱਝ ਤੂੰ ਖਾਂਦਾ ਹੈਂ, ਜੋ ਕੁੱਝ ਤੂੰ ਬਲੀਦਾਨ ਵਿੱਚ ਚੜ੍ਹਾਉਂਦਾ ਹੈਂ, ਜੋ ਕੁੱਝ ਤੂੰ ਦਿੰਦਾ ਹੈਂ, ਜੋ ਵੀ ਤਪੱਸਿਆ ਕਰਦਾ ਹੈਂ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਉਹ ਮੇਰੇ ਲਈ ਭੇਟਾ ਕਰ।

MalayalamIND

അർജ്ജുനാ, നീ എന്തു ചെയ്താലും, എന്തു ഭക്ഷിച്ചാലും, എന്തു യാഗത്തിൽ അർപ്പിക്കുന്നുവോ, എന്തു തന്നാലും, എന്തു തപസ്സു ചെയ്താലും, ഹേ അർജ്ജുനാ, അത് എനിക്ക് നിവേദ്യമായി ചെയ്യുക.

AssameseIND

যি কৰা, যি খাব, যি বলিদানত অৰ্পণ কৰা, যি দিয়া, যি তপস্যা কৰা, হে অৰ্জুন, মোৰ বাবে প্ৰসাদ হিচাপে কৰা।

KannadaIND

ನೀನು ಏನು ಮಾಡುತ್ತೀಯೋ, ಏನನ್ನು ತಿನ್ನುತ್ತೀಯೋ, ಏನನ್ನು ಯಜ್ಞದಲ್ಲಿ ಅರ್ಪಿಸುತ್ತೀಯೋ, ಏನನ್ನು ಕೊಡುತ್ತೀಯೋ, ಏನು ತಪಸ್ಸು ಮಾಡುತ್ತೀಯೋ, ಓ ಅರ್ಜುನಾ, ಅದನ್ನು ನನಗೆ ನೈವೇದ್ಯವಾಗಿ ಮಾಡು.

ManipuriIND

ꯅꯍꯥꯛꯅꯥ ꯇꯧꯔꯤꯕꯥ ꯊꯕꯛ ꯈꯨꯗꯤꯡꯃꯛ, ꯅꯍꯥꯛꯅꯥ ꯆꯥꯔꯤꯕꯥ ꯈꯨꯗꯤꯡꯃꯛ, ꯅꯍꯥꯛꯅꯥ ꯀꯠꯆꯗꯨꯅꯥ ꯀꯠꯊꯣꯀꯄꯥ ꯈꯨꯗꯤꯡꯃꯛ, ꯅꯍꯥꯛꯅꯥ ꯄꯤꯔꯤꯕꯥ ꯈꯨꯗꯤꯡꯃꯛ, ꯅꯍꯥꯛꯅꯥ ꯇꯧꯔꯤꯕꯥ ꯇꯄꯊꯕꯥ ꯈꯨꯗꯤꯡꯃꯛ, ꯍꯦ ꯑꯔꯖꯨꯟ, ꯑꯩꯉꯣꯟꯗꯥ ꯀꯠꯊꯣꯀꯄꯥ ꯑꯃꯥ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯇꯧꯕꯤꯌꯨ꯫

SindhiIND

اي ارجن، تون جيڪو به ڪم ڪرين، جيڪو به کائين، جيڪو به قربانيءَ ۾ پيش ڪرين، جيڪو به ڏئين، جيڪا به ساٿ ڏئين، اي ارجن، اهو مون لاءِ نذرانه طور ڪر.

BhojpuriIND

जवन करऽ, जवन खाईं, जवन यज्ञ में चढ़ावऽ, जवन देब, जवन तपस्या करऽ, हे अर्जुन, हमरा खातिर प्रसाद के रूप में करऽ।

OdiaIND

ତୁମେ ଯାହା ବି କର, ତୁମେ ଯାହା ଖାଅ, ବଳିଦାନରେ ଯାହା ଅର୍ପଣ କର, ତୁମେ ଯାହା ଦିଅ, ତୁମେ ଯାହା ଅଭ୍ୟାସ କର, ହେ ଅର୍ଜୁନ, ତାହା ମୋ ପାଇଁ ଏକ ନ offering ବେଦ୍ୟ ଭାବରେ କର |

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--भगवान्का यह नियम है कि जो जैसे मेरी शरण लेते हैं, मैं वैसे ही उनको आश्रय देता हूँ (गीता 4। 11)। जो भक्त अपनी वस्तु मेरे अर्पण करता है, मैं उसे अपनी वस्तु देता हूँ। भक्त तो सीमित ही वस्तु देता है, पर मैं अनन्त गुणा करके देता हूँ। परन्तु जो अपने-आपको ही मुझे दे देता है, मैं अपनेआपको उसे दे देता हूँ। वास्तवमें मैंने अपने-आपको संसारमात्रको दे रखा है (गीता 9। 4), और सबको सब कुछ करनेकी स्वतन्त्रता दे रखी है। अगर मनुष्य मेरी दी हुई स्वतन्त्रताको मेरे अर्पण कर देता है, तो मैं भी अपनी स्वतन्त्रताको उसके अर्पण कर देता हूँ अर्थात् मैं उसके अधीन हो जाता हूँ। इसलिये यहाँ भगवान् उस स्वतन्त्रताको अपने अर्पण करनेके लिये अर्जुनसे कहते हैं।]

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

क्योंकि यह बात है? इसलिये --, हे कुन्तीपुत्र तू जो कुछ भी स्वतःप्राप्त कर्म करता है? जो खाता? जो कुछ श्रौत या स्मार्त यज्ञरूप हवन करता है? जो कुछ सुवर्ण? अन्न? घृतादि वस्तु ब्राह्मणादि सत्पात्रोंको दान देता है और जो कुछ तपका आचरण करता है? वह सब मेरे समर्पण कर।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

तदाराधनस्य सुकरत्वे तदेवावश्यकमित्याह -- यत इति। स्वतः शास्त्रादृते प्राप्तं गमनादीति यावत्। यदश्नासि यं कंचिद्भोगं भुङ्क्षे। हवनस्य स्वतस्त्वं वारयति श्रौतमिति। मत्समर्पणं तत्सर्वं मह्यं समर्पयेत्यर्थः।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

यतः पत्रादिकमपि मक्त्युपहृतं गृह्णामि अतः सर्वमपि कर्म मय्यार्पितं यथा भवेत्तथा कर्तव्यमिदमेव चातुसुलभं मद्यजनमित्याह। यत्करोषि यद्रागादाचरसि? यच्चाश्रासि? यच्च जुहोशि श्रोतं स्मार्तं वा हवनं संपादयसि? यच्च हिरण्यादि ब्राह्मणादिभ्यो ददासि प्रयच्छसि? यत्तपस्यसि तपश्चरसि? तन्मदर्पणं कुरुष्वेश्वरप्रेरणया तदर्थमेव सर्वं करोमीति बुद्य्धा मयि वासुतेवेऽर्पितं यथा भवति तथा कुरुष्व मत्संबन्धित्वात्तवैतदतिसुलभमिति सूचयन्नाह -- कौन्तेयेति। यद्वा यथा कुन्ती भर्तुराज्ञया भवदादीनिन्द्रादिसङ्गेनोत्पाद्यापि तत्कर्मसंबन्धवर्जिता तथा त्वमप्येवं कुर्वन् कर्मब्धनैर्मोक्ष्यसे इति संबोधनस्य गूढाभिप्रायः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yatwhatever
karoṣhiyou do
yatwhatever
aśhnāsiyou eat
yatwhatever
juhoṣhioffer to the sacred fire
dadāsibestow as a gift
yatwhatever
yatwhatever
tapasyasiausterities you perform
kaunteyaArjun, the son of Kunti
tatthem
kuruṣhvado
mad arpaṇamas an offering to me
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 9.26
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः

जो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार-(भेंट-) को मैं खा लेता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.28
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि

इस प्रकार मेरे अर्पण करनेसे जिनसे कर्मबन्धन होता है, ऐसे शुभ (विहित) और अशुभ (निषिद्ध) सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंसे तू मुक्त हो जायगा। ऐसे अपनेसहित सब कुछ मेरे अर्पण करनेवाला और सबसे मुक्त हुआ तू मेरेको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 27
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 27
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्

हे कुन्तीपुत्र ! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ: "हे कुन्तीपुत्र ! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 27?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 27 translates to: "Whatever you do, whatever you eat, whatever you offer in sacrifice, whatever you give, whatever austerity you practice, O Arjuna, do it as an offering to Me. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 27 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। हे कुन्तीपुत्र ! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yat karoṣhi yad aśhnāsi yaj juhoṣhi dadāsi yat" mean in English?

"yat karoṣhi yad aśhnāsi yaj juhoṣhi dadāsi yat" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 27. Whatever you do, whatever you eat, whatever you offer in sacrifice, whatever you give, whatever austerity you practice, O Arjuna, do it as an offering to Me. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.