Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 26
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः

जो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार-(भेंट-) को मैं खा लेता हूँ। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

KannadaIND

ಯಾರು ನನಗೆ ಭಕ್ತಿಯಿಂದ ಎಲೆ, ಹೂವು, ಹಣ್ಣು ಅಥವಾ ಸ್ವಲ್ಪ ನೀರನ್ನು ಅರ್ಪಿಸುತ್ತಾರೋ, ಅದನ್ನು ಶುದ್ಧ ಮನಸ್ಸಿನವರು ಭಕ್ತಿಯಿಂದ ಅರ್ಪಿಸುತ್ತೇನೆ, ನಾನು ಸ್ವೀಕರಿಸುತ್ತೇನೆ.

TamilIND

எவன் ஒரு இலையையோ, பூவையோ, பழத்தையோ, சிறிதளவு தண்ணீரையோ எனக்கு பக்தியுடன் சமர்பிக்கிறானோ, அதைத் தூய்மையான மனதுடன் அர்ப்பணிப்பவன் நான் ஏற்றுக்கொள்கிறேன்.

SindhiIND

جيڪو به مون کي عقيدت سان هڪ پتي، هڪ گل، هڪ ميوو، يا ٿورو پاڻي پيش ڪري ٿو، جيڪو خالص ذهن سان پيش ڪيو ويو آهي، مان قبول ڪريان ٿو.

OdiaIND

ଯିଏ ମୋତେ ଭକ୍ତି ସହିତ ଏକ ପତ୍ର, ଫୁଲ, ଫଳ, କିମ୍ବା ଟିକିଏ ପାଣି ପ୍ରଦାନ କରେ, ଯାହା ଶୁଦ୍ଧ ଚିନ୍ତାଧାରା ଦ୍ୱାରା ଉତ୍ସର୍ଗୀକୃତ, ମୁଁ ଗ୍ରହଣ କରେ |

PunjabiIND

ਜੋ ਕੋਈ ਮੈਨੂੰ ਸ਼ਰਧਾ ਨਾਲ ਇੱਕ ਪੱਤਾ, ਇੱਕ ਫੁੱਲ, ਇੱਕ ਫਲ, ਜਾਂ ਥੋੜਾ ਜਿਹਾ ਪਾਣੀ ਭੇਟ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਕਿ ਪਵਿੱਤਰ ਮਨ ਦੁਆਰਾ ਸ਼ਰਧਾ ਨਾਲ ਭੇਟ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਮੈਂ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰਦਾ ਹਾਂ।

GujaratiIND

જે કોઈ મને ભક્તિભાવથી પાંદડું, ફૂલ, ફળ અથવા થોડું પાણી અર્પણ કરે છે, જે શુદ્ધ ચિત્તે ભક્તિપૂર્વક અર્પણ કરે છે, તે હું સ્વીકારું છું.

MaithiliIND

जे हमरा भक्तिपूर्वक एकटा पात, फूल, फल, वा कनि जल अर्पित करैत अछि, जे शुद्ध मनक लोक द्वारा एतेक भक्तिपूर्वक अर्पित कयल गेल अछि, हम स्वीकार करैत छी |

ManipuriIND

ꯀꯅꯥꯒꯨꯝꯕꯥ ꯑꯃꯅꯥ ꯑꯩꯉꯣꯟꯗꯥ ꯚꯛꯇꯤꯒꯥ ꯂꯣꯌꯅꯅꯥ ꯄꯥꯝꯕꯤ ꯑꯃꯥ, ꯐꯨꯜ ꯑꯃꯥ, ꯃꯍꯩ ꯑꯃꯥ ꯅꯠꯠꯔꯒꯥ ꯏꯁꯤꯡ ꯈꯔꯥ ꯄꯤꯕꯤꯔꯕꯗꯤ, ꯃꯗꯨ ꯁꯦꯡꯂꯕꯥ ꯋꯥꯈꯂꯁꯤꯡꯅꯥ ꯑꯁꯨꯛ ꯌꯥꯝꯅꯥ ꯀꯠꯊꯣꯀꯄꯤꯔꯕꯗꯤ ꯑꯩꯅꯥ ꯌꯥꯖꯩ |

BhojpuriIND

जे हमरा के भक्ति से एगो पत्ता, फूल, फल, भा तनी पानी चढ़ावे, जवन शुद्ध मन के लोग के अतना भक्ति से चढ़ावल जाला, हम मान लेनी।

BengaliIND

যে আমাকে ভক্তি সহকারে একটি পাতা, একটি ফুল, একটি ফল, বা সামান্য জল, যা শুদ্ধচিত্তের দ্বারা নিবেদন করে, আমি গ্রহণ করি।

TeluguIND

ఎవరైతే నాకు భక్తితో ఆకు, ఒక పువ్వు, ఒక పండు, లేదా కొద్దిగా నీరు సమర్పిస్తారో, పవిత్రమైన మనస్సు గలవారు భక్తితో అర్పిస్తే, నేను అంగీకరిస్తాను.

MarathiIND

जो कोणी मला भक्तीभावाने पान, फूल, फळ किंवा थोडेसे पाणी अर्पण करतो, जे शुद्ध मनाने अर्पण केले जाते ते मी स्वीकारतो.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--[भगवान्की अपरा प्रकृतिके दो कार्य हैं--पदार्थ और क्रिया। इन दोनोंके साथ अपनी एकता मानकर ही यह जीव अपनेको उनका भोक्ता और मालिक मानने लग जाता है और इन पदार्थों और क्रियाओंके भोक्ता एवं मालिक भगवान् हैं -- इस बातको वह भूल जाता है। इस भूलको दूर करनेके लिये ही भगवान् यहाँ कहते हैं कि पत्र, पुष्प, फल आदि जो कुछ पदार्थ हैं और जो कुछ क्रियाएँ हैं (9। 27), उन सबको मेरे अर्पण कर दो, तो तुम सदासदाके लिये आफतसे छूट जाओगे (9। 28)।दूसरी बात, देवताओंके पूजनमें विधि-विधानक, मन्त्रों आदिकी आवश्यकता है। परन्तु मेरा तो जीवके साथ स्वतः-स्वाभाविक अपनेपनका सम्बन्ध है, इसलिये मेरी प्राप्तिमें विधियोंकी मुख्यता नहीं है। जैसे, बालक माँकी गोदीमें जाय, तो उसके लिये किसी विधिकी जरूरत नहीं है। वह तो अपनेपनके सम्बन्धसे ही माँकी गोदीमें जाता है। ऐसे ही मेरी प्राप्तिके लिये विधि, मन्त्र आदिकी आवश्यकता नहीं है, केवल अपनेपनके दृढ़ भावकी आवश्यकता है।] 'पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति'-- जो भक्त अनायास यथासाध्य प्राप्त पत्र (तुलसीदल आदि), पुष्प, फल, जल आदि भी प्रेमपूर्वक भगवान्के अर्पण करता है, तो भगवान् उसको खा जाते हैं। जैसे, द्रोपदीसे पत्ता लेकर भगवान्ने खा लिया और त्रिलोकीको तृप्त कर दिया। गजेन्द्रने सरोवरका एक पुष्प भगवान्के अर्पण करके नमस्कार किया, तो भगवान्ने गजेन्द्रका उद्धार कर दिया। शबरीके दिये हुए फल पाकर भगवान् इतने प्रसन्न हुए कि जहाँ कहीं भोजन करनेका अवसर आया, वहाँ शबरीके फलोंकी प्रशंसा करते रहे । रन्तिदेवने अन्त्यजरूपसे आये भगवान्को जल पिलाया तो उनको,भगवान्के साक्षात् दर्शन हो गये। जब भक्तका भगवान्को देनेका भाव बहुत अधिक बढ़ जाता है, तब वह अपने-आपको भूल जाता है। भगवान् भी भक्तके प्रेममें इतने मस्त हो जाते हैं कि अपने-आपको भूल जाते हैं। प्रेमकी अधिकतामें भक्तको इसका खयाल नहीं रहता कि मैं क्या दे रहा हूँ, तो भगवान्को भी यह खयाल नहीं रहता कि मैं क्या खा रहा हूँ! जैसे, विदुरानी प्रेमके आवेशमें भगवान्को केलोंकी गिरी न देकर छिलके देती है, तो भगवान् उन छिलकोंको भी गिरीकी तरह ही खा लेते हैं! (टिप्पणी0 514.2)।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

मेरे भक्तोंको केवल अपुनरावृत्तिरूप अनन्त फल मिलता है इतना ही नहीं? किंतु मेरी आराधना भी सुखपूर्वक की जा सकता है। कैसे ( सो कहते हैं -- ) जो भक्त मुझे पत्र? पुष्प? फल और जल आदि कुछ भी वस्तु भक्तिपूर्वक देता है? उस प्रयतात्मा -- शुद्धबुद्धि भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक अर्पण किये हुए वे पत्र पुष्पादि मैं ( स्वयं ) खाता हूँ अर्थात् ग्रहण करता हूँ।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

अनन्तफलत्वाद्भगवदाराधनमेव कर्तव्यमित्युक्तं सुकरत्वाच्च तथेत्याह -- न केवलमिति। भगवदाराधनस्य सुकरत्वमेव प्रश्नपूर्वकं प्रपञ्चयति -- कथमित्यादिना। यद्धि पुष्पादिकं भक्तिपूर्वकं मदर्थमर्पितं तेनायं शुद्धचेतास्तपस्वी मामाराधयतीत्यहमवधारयामीत्याह -- पत्रमित्यादिना।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

न केवलं मम पूजकानां मत्प्राप्तिरुपमना वृत्तिलक्षणमनन्तफलमपि तु मत्पूजनसाधनानामतिसौलभ्यान्मद्यजनमतिसुलभमित्याह। पत्रं तुलसीपत्रं? पुष्पं? फलं? तोयं जलं? यो मे मह्यं भक्त्या परप्रेरणा प्रयच्छति अर्पयति। प्रयतात्मनः तत् पत्रादि भक्त्या उपहृतं समर्पितं अश्रामि गृहीत्वा तृप्यामीत्यर्थः। सुदाम्नोपाहृततन्दुलवद्भक्षयामीति वा। तस्माद्देवतान्तरादिपूजनं विहायाल्पायासलब्यवस्तुसाध्यमनन्तफलदं मद्यजनमतिभक्त्या कर्तव्यमित्यभिप्रायः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
patrama leaf
puṣhpama flower
phalama fruit
toyamwater
yaḥwho
meto me
bhaktyāwith devotion
prayachchhatioffers
tatthat
ahamI
bhaktiupahṛitam
aśhnāmipartake
prayataātmanaḥ
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 9.25
यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्

(सकामभावसे) देवताओंका पूजन करनेवाले (शरीर छोड़नेपर) देवताओंको प्राप्त होते हैं। पितरोंका पूजन करनेवाले पितरोंको प्राप्त होते हैं। भूत-प्रेतोंका पूजन करनेवाले भूत-प्रेतोंको प्राप्त होते हैं। परन्तु मेरा पूजन करनेवाले मुझे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.27
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्

हे कुन्तीपुत्र ! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 26
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 26
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः

जो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार-(भेंट-) को मैं खा लेता हूँ। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ: "जो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार-(भेंट-) को मैं खा लेता हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 26?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 26 translates to: "Whoever offers Me with devotion a leaf, a flower, a fruit, or a little water, that, so offered devotedly by the pure-minded, I accept. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्म" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 26 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। जो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार-(भेंट-) को मैं खा लेता हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "patraṁ puṣhpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayachchhati" mean in English?

"patraṁ puṣhpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayachchhati" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 26. Whoever offers Me with devotion a leaf, a flower, a fruit, or a little water, that, so offered devotedly by the pure-minded, I accept. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.