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Adhyay 9, Shlok 16
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम्। मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्

क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत्का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ। — VaniSagar

Global Translations

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GujaratiIND

હું ક્રાતુ છું; હું યજ્ઞ છું; હું મેને અર્પણ છું; હું ઔષધીય વનસ્પતિઓ અને તમામ છોડ છું; હું મંત્ર છું; હું પણ ઘી કે ઓગળેલું માખણ છું; હું અગ્નિ છું; હું અર્પણ છું.

MarathiIND

मी क्रतु आहे; मी यज्ञ आहे; मी मानेला अर्पण आहे; मी औषधी वनस्पती आणि सर्व वनस्पती आहे; मी मंत्र आहे; मी सुद्धा तूप किंवा वितळलेले लोणी आहे; मी अग्नी आहे; मी अर्पण आहे.

TamilIND

நான் க்ரது; நான் யக்ஞம்; மேனிகளுக்குப் பிரசாதம் நான்; நான் மருத்துவ மூலிகைகள் மற்றும் அனைத்து தாவரங்கள்; நான் மந்திரம்; நான் நெய் அல்லது உருகிய வெண்ணெய்; நான் நெருப்பு; நான் காணிக்கை.

TeluguIND

నేను క్రతువు; నేను యజ్ఞమును; మనుష్యులకు నైవేద్యము నేనే; నేను ఔషధ మూలికలు మరియు అన్ని మొక్కలు; నేను మంత్రమును; నేను కూడా నెయ్యి లేదా కరిగించిన వెన్న; నేను అగ్నిని; నైవేద్యము నేనే.

KannadaIND

ನಾನು ಕ್ರತು; ನಾನು ಯಜ್ಞ; ನಾನು ಮಾನೆಗಳಿಗೆ ಅರ್ಪಣೆ; ನಾನು ಔಷಧೀಯ ಗಿಡಮೂಲಿಕೆಗಳು ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ ಸಸ್ಯಗಳು; ನಾನು ಮಂತ್ರ; ನಾನು ತುಪ್ಪ ಅಥವಾ ಕರಗಿದ ಬೆಣ್ಣೆಯೂ ಆಗಿದ್ದೇನೆ; ನಾನು ಬೆಂಕಿ; ನಾನು ಅರ್ಪಣೆ.

MalayalamIND

ഞാൻ ക്രതു; ഞാൻ യജ്ഞമാണ്; ഞാൻ മേനികൾക്കുള്ള വഴിപാടാണ്; ഞാൻ ഔഷധസസ്യങ്ങളും എല്ലാ സസ്യങ്ങളും ആകുന്നു; ഞാൻ മന്ത്രം; ഞാൻ നെയ്യ് അല്ലെങ്കിൽ ഉരുകിയ വെണ്ണയാണ്; ഞാൻ അഗ്നിയാണ്; ഞാനാണ് വഴിപാട്.

MaithiliIND

हम क्रतु छी; हम यज्ञ छी; हम अयाल सभक प्रसाद छी; हम औषधीय जड़ी-बूटी आ सभ पौधा छी; हम मंत्र छी; हमहूँ घी वा पिघलल मक्खन छी; हम आगि छी; हम हवन छी।

AssameseIND

মই ক্ৰাতু; মই যজ্ঞ; মই মেনেছৰ প্ৰসাদ; মই ঔষধি বনৌষধি আৰু সকলো উদ্ভিদ; মই মন্ত্ৰ; মইও ঘিউ বা গলি যোৱা ঘিউ; মই জুই; মই আবেগ।

BhojpuriIND

हम क्रतु हईं; हम यज्ञ हईं; अयाल के चढ़ावे वाला हमहीं हईं; हम औषधीय जड़ी-बूटी आ सब पौधा हईं; हम मंत्र हईं; हम घी भा पिघलल मक्खन भी हईं; हम आग हईं; हम हववाह हउवन।

NepaliIND

म क्रतु हुँ; म यज्ञ हुँ; म मानेहरूलाई भेटी हुँ; म औषधीय जडिबुटी र सबै बोटबिरुवा हुँ; म मन्त्र हुँ; म घिउ वा पग्लिएको मक्खन पनि हुँ; म आगो हुँ; बलिदान म हुँ।

PunjabiIND

ਮੈਂ ਕ੍ਰਤੁ ਹਾਂ; ਮੈਂ ਯੱਗ ਹਾਂ; ਮੈਂ ਮੇਨਾਂ ਨੂੰ ਭੇਟਾ ਹਾਂ; ਮੈਂ ਚਿਕਿਤਸਕ ਜੜੀ ਬੂਟੀਆਂ ਅਤੇ ਸਾਰੇ ਪੌਦੇ ਹਾਂ; ਮੈਂ ਮੰਤਰ ਹਾਂ; ਮੈਂ ਘਿਓ ਜਾਂ ਪਿਘਲਾ ਮੱਖਣ ਵੀ ਹਾਂ; ਮੈਂ ਅੱਗ ਹਾਂ; ਮੈਂ ਭੇਟਾ ਹਾਂ।

BengaliIND

আমি ক্রতু; আমি যজ্ঞ; আমি মনিদের নৈবেদ্য; আমি ঔষধি ও সব গাছপালা; আমি মন্ত্র; আমিও সেই ঘি বা গলিত মাখন; আমি আগুন; আমিই উৎসর্গ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--[अपनी रुचि, श्रद्धा-विश्वासके अनुसार किसीको भी साक्षात् परमात्माका स्वरूप मानकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़ा जाय तो वास्तवमें यह सम्बन्ध सत्के साथ ही है। केवल अपने मन-बुद्धिमें किञ्चिन्मात्र भी संदेह न हो। जैसे ज्ञानके द्वारा मनुष्य सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें एक परमात्मतत्त्वको ही जानता है। परमात्माके सिवाय दूसरी किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया,आदिकी किञ्चिन्मात्र भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है--इसमें उसको किञ्चिन्मात्र भी संदेह नहीं होता। ऐसे ही भगवान् विराट्रूपसे अनेक रूपोंमें प्रकट हो रहे हैं; अतः सब कुछ भगवान्-ही-भगवान् हैं -- इसमें अपनेको किञ्चिन्मात्र भी संदेह नहीं होना चाहिये। कारण कि 'यह सब भगवान् कैसे हो सकते हैं?' यह संदेह साधकको वास्तविक तत्त्वसे, मुक्तिसे वञ्चित कर देता है और महान् आफतमें फँसा देता है। अतः यह बात दृढ़तासे मान लें कि कार्य-कारणरूपे स्थूल-सूक्ष्मरूप जो कुछ देखने, सुनने, समझने और माननेमें आता है, वह सब केवल भगवान् ही हैं। इसी कार्य-कारणरूपसे भगवान्की सर्वव्यापकताका वर्णन सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक किया गया है।]

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

यदि भक्तलोग बहुत प्रकारसे उपासना करते हैं तो आपकी ही उपासना कैसे करते हैं इसपर कहते हैं --, क्रतु -- श्रौतयज्ञविशेष मैं हूँ और यज्ञस्मार्तकर्मविशेष भी मैं ही हूँ। तथा जो पितरोंको दिया जाता है? वह स्वधा नामक अन्न भी मैं ही हूँ। सब प्राणियोंसे जो खायी जाती है? उसका नाम औषध है? वह औषध भी मैं ही हूँ। अथवा यों समझो कि सब प्राणियोंका साधारण अन्न स्वधा है और व्याधिका नाश करनेके लिये काममें ली जानेवाली भेषज औषध है। तथा जिसके द्वारा देव और पितरोंको हवि पहुँचायी जाती है वह मन्त्र भी मैं ही हूँ। इसके अतिरिक्त मैं ही आज्य हविघृत हूँ? जिसमें होम किया जाता है वह अग्नि भी मैं ही हूँ और मैं ही हवनरूपकर्म भी हूँ।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

भगवदेकविषयमुपासनं तर्हि न सिध्यतीति शङ्कते -- यदीति। प्रकारभेदमादाय ध्यायन्तोऽपि भगवन्तमेव ध्यायन्ति तस्य सर्वात्मकत्वादित्याह -- अत आहेति। क्रतुयज्ञशब्दयोरपौनरुक्त्यं दर्शयन् व्याचष्टे -- श्रौत इत। क्रियाकारकफलजातं भगवदतिरिक्तं नास्तीति समुदायार्थः।

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Sri Dhanpati

ननु बहुभिः प्रकारैः यदि उपासते तर्हि कथं तेषां त्वदेकविषयमुपासनं सिध्यतीत्याशङ्क्य तत्तत्प्रकारभेदेन ध्यायन्तोऽपि मामेव ध्यायन्ति सर्वात्मकत्वान्ममेत्याशयेनाह -- अहमित्यादिना। अहं क्रतुः श्रौतः कर्मभेदोऽहमेवं। ननु क्रतुः संकल्पो देवताध्यानरुप इति भाष्यकृद्भिः कुतो न व्याख्यातमितिचेत्? यज्ञादिसमभिव्याहारादिति गृहाण। यज्ञः स्मार्तकर्मभेदो वैश्वदेवादिः सोऽप्यहमेव। पितृभ्योद्दीयतेऽन्नं तत्स्वधाशब्देन ग्राह्यम्। सर्वप्राणिभिर्यदद्यतेऽन्नं तदौषधम्। यद्वा स्वधाशब्देन साधारणमन्नं गृह्यते। औषधशब्देन व्याधिनिवर्तकमौषधम्। येन पितृभ्यो देवेभ्यश्च हविर्दीयते स मन्त्रः आज्यं हविः यस्मिन्हूयते सोऽग्निः हुतं हवनकर्मक्रियाकारकफलजातं मह्यतिरिक्तं नास्तीति समुदायार्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
ahamI
kratuḥVedic ritual
ahamI
yajñaḥsacrifice
svadhāoblation
ahamI
ahamI
auṣhadhammedicinal herb
mantraḥVedic mantra
ahamI
ahamI
evaalso
ājyamclarified butter
ahamI
agniḥfire
ahamI
hutamthe act offering
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ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्

दूसरे साधक ज्ञानयज्ञके द्वारा एकीभावसे (अभेद-भावसे) मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और दूसरे कई साधक अपनेको पृथक् मानकर चारों तरफ मुखवाले मेरे विराट्ररुपकी अर्थात् संसारको मेरा विराट्ररुप मानकर (सेव्य-सेवकभावसे) मेरी अनेक प्रकारसे उपासना करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.17
पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक् साम यजुरेव च

क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत् का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 16
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 16
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम्। मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्

क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत्का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ: "क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत्का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 16?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 16 translates to: "I am Kratu; I am Yajna; I am the offering to the manes; I am the medicinal herbs and all plants; I am the Mantra; I am also the ghee or melted butter; I am the fire; I am the oblation. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम्। मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 16 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत्का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ahaṁ kratur ahaṁ yajñaḥ svadhāham aham auṣhadham" mean in English?

"ahaṁ kratur ahaṁ yajñaḥ svadhāham aham auṣhadham" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 16. I am Kratu; I am Yajna; I am the offering to the manes; I am the medicinal herbs and all plants; I am the Mantra; I am also the ghee or melted butter; I am the fire; I am the oblation. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.