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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 15
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्

दूसरे साधक ज्ञानयज्ञके द्वारा एकीभावसे (अभेद-भावसे) मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और दूसरे कई साधक अपनेको पृथक् मानकर चारों तरफ मुखवाले मेरे विराट्ररुपकी अर्थात् संसारको मेरा विराट्ररुप मानकर (सेव्य-सेवकभावसे) मेरी अनेक प्रकारसे उपासना करते हैं। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

SindhiIND

ٻيا به، عقل جي قرباني سان، مون کي پوڄيندا آهن، سڀ منهن، هڪ، الڳ ۽ ڪيترن ئي طور تي.

DogriIND

दूए बी ज्ञान-बलिदान कन्नै बलिदान करदे होई मेरी सर्वमुखी गी इक, विशिष्ट ते बहुविध दे रूप च भक्ति करदे न।

AssameseIND

আন কিছুমানেও প্ৰজ্ঞা-যজ্ঞৰ সৈতে বলিদান কৰি মোক, সৰ্বমুখীক এক, সুকীয়া আৰু বহুবিধ হিচাপে পূজা কৰে।

MaithiliIND

आन लोक सेहो प्रज्ञा-यज्ञक संग यज्ञ करैत हमरा सर्वमुखी केँ एक, विशिष्ट आ बहुविध रूप मे पूजैत छथि |

ManipuriIND

ꯑꯇꯣꯞꯄꯁꯤꯡꯅꯁꯨ ꯂꯧꯁꯤꯡ-ꯀꯠꯊꯣꯀꯄꯒꯥ ꯂꯣꯌꯅꯅꯥ ꯀꯠꯊꯣꯛꯇꯨꯅꯥ ꯑꯩꯕꯨ, ꯃꯥꯌꯊꯣꯡ ꯈꯨꯗꯤꯡꯒꯤ, ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯑꯣꯏꯅꯥ, ꯇꯣꯞ ꯇꯣꯞꯄꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯈꯜ ꯀꯌꯥꯒꯤ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯈꯨꯔꯨꯃꯖꯩ |

BengaliIND

অন্যান্যরাও, জ্ঞান-যজ্ঞের সাথে যজ্ঞ করে, সর্বমুখী, এক, স্বতন্ত্র এবং বহুগুণে আমার পূজা করে।

TeluguIND

మరికొందరు కూడా, జ్ఞాన-త్యాగంతో త్యాగం చేస్తూ, సర్వముఖుడనైన నన్ను ఏకంగా, విభిన్నంగా, నానావిధంగా పూజిస్తారు.

BhojpuriIND

दोसरो लोग बुद्धि-यज्ञ के साथे बलिदान करत हमरा, सर्वमुखी के एक, विशिष्ट आ बहुविध के रूप में पूजत बा।

KonkaniIND

हेर लोकूय प्रज्ञा-यज्ञान बळी दिवन म्हाका, सर्वमुखाची एक, वेगळी आनी बहुविध अशी उपासना करतात.

MizoIND

Mi dangte pawhin finna-inthawina nen inthawiin, Kei, Hmêl zawng zawng neitu chu pakhat, danglam tak leh chi hrang hrang angin an chibai a ni.

PunjabiIND

ਹੋਰ ਵੀ, ਬੁੱਧੀ-ਬਲੀਦਾਨ ਨਾਲ ਬਲੀਦਾਨ ਕਰਦੇ ਹੋਏ, ਮੈਨੂੰ, ਸਰਬ-ਵਿਆਪਕ, ਇਕ, ਵੱਖਰਾ, ਅਤੇ ਕਈ ਗੁਣਾਂ ਵਜੋਂ ਪੂਜਦੇ ਹਨ।

GujaratiIND

અન્યો પણ, જ્ઞાન-ત્યાગ સાથે, મારી, સર્વ-મુખી, એક, ભિન્ન અને અનેકગણી તરીકે પૂજા કરે છે.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--[जैसे, भूखे आदमियोंकी भूख एक होती है और भोजन करनेपर सबकी तृप्ति भी एक होती है परन्तु उनकी भोजनके पदार्थोंमें रुचि भिन्न-भिन्न होती है। ऐसे ही परिवर्तनशील अनित्य संसारकी तरफ लगे हुए लोग कुछ भी करते हैं, पर उनकी तृप्ति नहीं होती, वे अभावग्रस्त ही रहते हैं। जब वे संसारसे विमुख होकर परमात्माकी तरफ ही चलते हैं, तब परमात्माकी प्राप्ति होनेपर उन सबकी तृप्ति हो जाती है अर्थात् वे कृतकृत्य, ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाते हैं। परन्तु उनकी रुचि, योग्यता, श्रद्धा, विश्वास आदि भिन्नभिन्न होते हैं। इसलिये उनकी उपासनाएँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं।]

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

वे किसकिस प्रकारसे उपासना करते हैं सो कहते हैं --, कुछ ( ज्ञानीजन ) दूसरी उपासनाओंको छोड़कर भगवद्विषयक ज्ञानरूप यज्ञसे मेरा पूजन करते हुए उपसना किया करते हैं अर्थात् परमब्रह्म परमात्मा एक ही है? ऐसे एकत्वरूप परमार्थज्ञानसे पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं। और कोईकोई पृथक् भावसे अर्थात् आदित्य? चन्द्रमा आदिके भेदसे इस प्रकार समझकर उपासना करते हैं कि वही भगवान् विष्णु? सूर्य आदिके रूपमें स्थित हुए हैं। तथा कितने ही भक्त ऐसा समझकर कि वही सब ओर मुखवाले विश्वमूर्ति भगवान् अनेक रूपसे स्थित हो रहे हैं। उन विश्वरूप विराट् भगवान्हीकी विविध प्रकारसे उपासना करते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

उपासनप्रकारभेदप्रतिपित्सया पृच्छति -- ते केनेति। तत्प्रकारभेदोदीरणार्थं श्लोकमवतारयति -- उच्यत इति। इज्यते पूज्यते परमेश्वरोऽनेनेति प्रकृते ज्ञाने यज्ञशब्दः। ईश्वरं चेति चकारोऽवधारणे। देवतान्तरध्यानत्यागमपिशब्दसूचितं दर्शयति -- अन्यामिति। अन्ये ब्रह्मनिष्ठामिति यावत्। ज्ञानयज्ञमेव विभजते -- तच्चेति। उत्तमाधिकारिणामुपासनमुक्त्वा मध्यमानामधिकारिणामुपासनप्रकारमाह -- केचिच्चेति। तेषामेव प्रकारान्तरेणोपासनमुदीरयति -- केचिदिति। बहुप्रकारेणाग्न्यादित्यादिरूपेणेति यावत्।

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Sri Dhanpati

एवमुपासनाप्रकारः सर्वोपासकसाधारणो दर्शितः। तत्रासाधारणं तमाह -- ज्ञानयज्ञेन। ज्ञानमेव परमात्मविषयं तत्पूजनरुपत्वाद्यज्ञस्तेन ज्ञानयज्ञेन यजन्तः पूजयन्तः मां परमात्मानमन्ये उत्तमाः। चकार उक्तानामनुक्तानां च,साधारणानामुपासनाप्रकाराणां समुच्चयार्थः। अपिशब्द इन्द्रादिदेवतोपासनापरित्यागार्थः। तथाचान्यामुपासनां परित्यज्य मामुपासत इत्यर्थः। तच्च ज्ञानमेकमेव परं ब्रह्मेति परमार्थदर्शनं तेन यजन्ते। यत्तु अन्ये पूर्वोक्तसाधनानुष्ठानासमर्था ज्ञानयज्ञेनत्वं वाहमस्मि भगवो देवतेऽहं वै त्वमसि इत्यादिश्रुत्युक्तमहंग्रहोपासनं ज्ञानमति तच्चिन्त्यम्। मुख्यामुख्ययोर्मुख्ये संभवत्यमुख्यग्रहणस्यान्याय्यत्वात्। एतेन ज्ञानयज्ञेन निर्विकल्पसमाधिना पातञ्चला इति प्रत्युक्तम्। केचिच्च स एव भगवान् बहुधा व्यवस्थितो विश्वतोमुखो विश्वरपस्तं बहुधा बहुप्रकारेण उपासते मन्दाः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
jñānayajñena
chaand
apialso
anyeothers
yajantaḥworship
māmme
upāsateworship
ekatvenaundifferentiated oneness
pṛithaktvenaseparately
bahudhāvarious
viśhwataḥmukham
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 9.14
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते

नित्य- (मेरेमें) युक्त मनुष्य दृढ़व्रती होकर लगनपूर्वक साधनमें लगे हुए और भक्तिपूर्वक कीर्तन करते हुए तथा नमस्कार करते हुये निरन्तर मेरी उपासना करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.16
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम्। मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्

क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत्का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 15
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 15
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्

दूसरे साधक ज्ञानयज्ञके द्वारा एकीभावसे (अभेद-भावसे) मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और दूसरे कई साधक अपनेको पृथक् मानकर चारों तरफ मुखवाले मेरे विराट्ररुपकी अर्थात् संसारको मेरा विराट्ररुप मानकर (सेव्य-सेवकभावसे) मेरी अनेक प्रकारसे उपासना करते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ: "दूसरे साधक ज्ञानयज्ञके द्वारा एकीभावसे (अभेद-भावसे) मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और दूसरे कई साधक अपनेको पृथक् मानकर चारों तरफ मुखवाले मेरे विराट्ररुपकी अर्थात् संसारको मेरा विराट्ररुप मानकर (सेव्य-सेवकभावसे) मेरी अनेक प्रकारसे उपासना करते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 15?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 15 translates to: "Others also, sacrificing with the wisdom-sacrifice, worship Me, the All-Faced, as one, distinct, and manifold. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 15 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। दूसरे साधक ज्ञानयज्ञके द्वारा एकीभावसे (अभेद-भावसे) मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और दूसरे कई साधक अपनेको पृथक् मानकर चारों तरफ मुखवाले मेरे विराट्ररुपकी अर्थात् संसारको मेरा विराट्ररुप मानकर (सेव्य-सेवकभावसे) मेरी अनेक प्रकारसे उपासना करते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "jñāna-yajñena chāpyanye yajanto mām upāsate" mean in English?

"jñāna-yajñena chāpyanye yajanto mām upāsate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 15. Others also, sacrificing with the wisdom-sacrifice, worship Me, the All-Faced, as one, distinct, and manifold. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.