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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 14
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते

नित्य- (मेरेमें) युक्त मनुष्य दृढ़व्रती होकर लगनपूर्वक साधनमें लगे हुए और भक्तिपूर्वक कीर्तन करते हुए तथा नमस्कार करते हुये निरन्तर मेरी उपासना करते हैं। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TeluguIND

ఎల్లప్పుడూ నన్ను కీర్తిస్తూ, కృషి చేస్తూ, తమ ప్రమాణాలలో దృఢంగా, నా ముందు సాష్టాంగ ప్రణామం చేస్తూ, స్థిరమైన భక్తితో నన్ను పూజిస్తారు.

SindhiIND

هميشه منهنجي تسبيح ڪندي، ڪوشش ڪندي، پنهنجي واعدن ۾ ثابت قدم، مون کي سجدو ڪندي، ثابت قدمي سان منهنجي عبادت ڪندا آهن.

PunjabiIND

ਸਦਾ ਹੀ ਮੇਰੀ ਵਡਿਆਈ ਕਰਦੇ ਹੋਏ, ਯਤਨਸ਼ੀਲ, ਆਪਣੀ ਸੁੱਖਣਾ ਵਿੱਚ ਦ੍ਰਿੜ੍ਹ, ਮੇਰੇ ਅੱਗੇ ਮੱਥਾ ਟੇਕਦੇ ਹੋਏ, ਅਡੋਲ ਸ਼ਰਧਾ ਨਾਲ ਮੇਰੀ ਉਪਾਸਨਾ ਕਰਦੇ ਹਨ।

TamilIND

எப்பொழுதும் என்னை மகிமைப்படுத்தி, பாடுபட்டு, தங்கள் சபதங்களில் உறுதியாக, என் முன் பணிந்து, உறுதியான பக்தியுடன் என்னை வணங்குகிறார்கள்.

MaithiliIND

सदिखन हमर महिमा करैत, प्रयासरत, अपन व्रत मे दृढ़, हमर समक्ष सजदा करैत, ओ सब अडिग भक्ति सँ हमर पूजा करैत छथि |

AssameseIND

সদায় মোক মহিমামণ্ডিত কৰি, চেষ্টা কৰি, নিজৰ ব্ৰতত দৃঢ় হৈ, মোৰ আগত প্ৰণাম কৰি, তেওঁলোকে মোক অটল ভক্তিৰে পূজা কৰে।

KonkaniIND

सदांच म्हजी महिमा करून, यत्न करून, आपल्या व्रतांत घट्ट, म्हजे मुखार सजदा करून, ते म्हाका स्थिर भक्तीन उपासना करतात.

MizoIND

Min chawimawi fo thin, beih rengin, an thutiam nghet takin, Ka hmaah bawkkhup chungin, inpekna nghet takin Min chibai thin.

OdiaIND

ମୋତେ ସର୍ବଦା ଗ ifying ରବାନ୍ୱିତ କର, ଚେଷ୍ଟା କର, ପ୍ରତିଜ୍ଞା କରି ଦୃ, ଼ ହୁଅ, ମୋ ସମ୍ମୁଖରେ ପ୍ରଣାମ କର, ସେମାନେ ଦୃ fast ଭକ୍ତି ସହିତ ମୋତେ ଉପାସନା କରନ୍ତି |

KannadaIND

ಸದಾ ನನ್ನನ್ನು ಮಹಿಮೆಪಡಿಸುತ್ತಾ, ಶ್ರಮಿಸುತ್ತಾ, ತಮ್ಮ ವ್ರತಗಳಲ್ಲಿ ದೃಢವಾಗಿ, ನನ್ನ ಮುಂದೆ ಸಾಷ್ಟಾಂಗ ನಮಸ್ಕಾರ ಮಾಡಿ, ದೃಢ ಭಕ್ತಿಯಿಂದ ನನ್ನನ್ನು ಪೂಜಿಸುತ್ತಾರೆ.

NepaliIND

सदैव मेरो महिमा गर्दै, प्रयत्नशील, आफ्नो व्रतमा दृढ, मेरो सामु प्रणाम गर्दै, अटल भक्तिले मेरो आराधना गर्दछन्।

MarathiIND

सदैव माझा गौरव करीत, धडपडणारे, त्यांच्या व्रतांमध्ये ठाम राहून, माझ्यापुढे नतमस्तक होऊन ते माझी अखंड भक्ती करतात.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'नित्ययुक्ताः'--मात्र मनुष्य भगवान्में ही नित्ययुक्त रह सकते हैं, हरदम लगे रह सकते हैं, सांसारिक भोगों और संग्रहमें नहीं। कारण कि समय-समयपर भोगोंसे भी ग्लानि होती है और संग्रहसे भी उपरति होती है। परन्तु भगवान्की प्राप्तिका, भगवान्की तरफ चलनेका जो एक उद्देश्य बनता है, एक दृढ़ विचार होता है, उसमें कभी भी फरक नहीं पड़ता।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

किस प्रकार भजते हैं --, वे दृढ़व्रती भक्त अर्थात् जिनका निश्चय दृढ़स्थिरअचल है ऐसे वे भक्तजन सदानिरन्तर ब्रह्मस्वरूप मुझ भगवान्का कीर्तन करते हुए तथा इन्द्रियनिग्रह? शम? दम? दया और अहिंसा आदि धर्मोंसे युक्त होकर प्रयत्न करते हुए एवं हृदयमें वास करनेवाले मुझ परमात्माको भक्ितपूर्वक नमस्कार करते हुए और सदा मेरा चिन्तन करनेमें लगे रहकर? मेरी उपासना -- सेवा करते रहते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

भजनप्रकारं पृच्छति -- कथमिति। तत्प्रकारमाह -- सततमिति। सर्वदेति श्रवणावस्था गृह्यन्ते? कीर्तनं वेदान्तश्रवणं प्रणवजपश्च? व्रतं ब्रह्मचर्यादि? नमस्यन्तो मांप्रति चेतसा प्रह्वीभवन्तो भक्त्या परेण प्रेम्णा नित्ययुक्ताः सन्तः सदा संयुक्ताः।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

भजन्तीत्युक्तं तत्र भजनप्रकारजिज्ञासायमाह द्वाभ्याम् -- सततमिति। निरन्तरं सर्वदा ब्रह्मरूपं मां कीर्यन्तः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं गुरुमुपसंगम्य तन्मुखादुपनिषच्छ्रवणानन्तरमुपनिषद्भिः हरे गोविन्द वासुदेव दामोदर माधव मुकुन्देत्यादिनामभिश्च कीर्ययन्तः यतन्तश्च शमदमदयाऽहिंसाऽस्ते ब्रह्मचर्यापरिग्रहादिभिर्यत्नं कुर्वन्तः। अतएव दृढं स्थिरं केनापि चालयितुमशक्यं व्रतं शमदमादिरुपं येषां ते भक्त्या परप्रेम्णा मां हृदयेशयमन्तर्यामिरुपेण प्रत्यक्चेतनरुपेण च हृद्गुहावासिनमात्मानं नित्ययुक्ता उद्युक्ताः सन्त उपासते सेवन्ते। सततमित्यनेन कीर्तनादिव्यतिरिक्तकालव्यावृत्तिः। अत्र केचित्। गुरुपसदनोत्तरकाले प्रणवजपोपनिषदावर्तनादिभिर्मां सर्वोपनिषत्प्रतिपाद्यं ब्रह्मस्वरुपं कीर्तयन्तः वेदान्तशास्त्राध्ययनरुपश्रवणव्यापारविषयीकुर्वन्त इतियावत्। तथा यतन्तश्च गुरुमुखाच्छ्रेतमत्स्वरुपावधारणाय यतमानाः श्रवणगृहीतार्थबाधकशङ्कानिवर्तकतर्कानुसंधानरुपं मननं यत्नेन संपादयन्त इतियावत्। तथा दृढानि अहिंसादिव्रतानि येषां ते दृढव्रताः। शमदमादिसाधनसंपन्ना इतियावत्। तथा नमस्यन्तश्च मां भगवन्तं वासुदेवमिष्टदेवतारुपेण गुरुरुपेण च स्थितं कायवाङ्यनोभिर्नमस्कुर्वन्तश्च। चकारात्श्रवणं कीर्तनं विषणोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् इति वन्दनसहचरितं श्रवणाद्यपि बोध्यम्। पादसेवनमित्यपि गुरुरुपे परमात्मनि सुकरमेव। अत्र मामिति पुनर्वचनं सगुणरुपपरामर्शार्थम्। अन्यथैकस्य वैयर्थ्यप्रसङ्गात्। तया भक्त्या मद्विषयेण परप्रेम्णा नित्ययुक्ताः। एतेन सर्वसाधनपौष्कल्यं प्रतिबन्धकाभावश्च दर्शितः। तथाच श्रुतिःयस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः इति। तदेवं शमदमादिसाधनसंपन्नाः वेदान्तश्रवणमननपरायणाः परमेश्वरे परमगुरौ परप्रेरणा नमस्कारदिना च विगतविघ्नाः परिपूर्णसाधनाः सन्तो मामुपासते विजातीयप्रत्ययानन्तरितेन सजातीयप्रत्ययप्रवाहेण श्रवणमननोत्तरभाविना सततं चिन्तयन्ति महात्मानोऽनेन निदिध्यासनं चरमसाधनं दर्शितमित्यदि वर्णयन्ति तदेतद्भाष्यस्य श्रवणमननोत्तरभाविना सततं चिन्तयन्ति महात्मानोऽनेन निदिध्यासनं चरमसाधनं दर्शितमित्यादि वर्णयन्ति तदेतद्भाष्यस्य सामान्यरुपस्याविरोधेनोपादेयम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
satatamalways
kīrtayantaḥsinging divine glories
māmme
yatantaḥstriving
chaand
dṛiḍhavratāḥ
namasyantaḥhumbly bowing down
chaand
māmme
bhaktyāloving devotion
nityayuktāḥ
upāsateworship
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 9.13
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्

परन्तु हे पृथानन्दन ! दैवी प्रकृतिके आश्रित अनन्यमनवाले महात्मालोग मुझे सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि और अविनाशी समझकर मेरा भजन करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.15
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्

दूसरे साधक ज्ञानयज्ञके द्वारा एकीभावसे (अभेद-भावसे) मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और दूसरे कई साधक अपनेको पृथक् मानकर चारों तरफ मुखवाले मेरे विराट्ररुपकी अर्थात् संसारको मेरा विराट्ररुप मानकर (सेव्य-सेवकभावसे) मेरी अनेक प्रकारसे उपासना करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 14
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 14
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते

नित्य- (मेरेमें) युक्त मनुष्य दृढ़व्रती होकर लगनपूर्वक साधनमें लगे हुए और भक्तिपूर्वक कीर्तन करते हुए तथा नमस्कार करते हुये निरन्तर मेरी उपासना करते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 14 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 14 का हिंदी अर्थ: "नित्य- (मेरेमें) युक्त मनुष्य दृढ़व्रती होकर लगनपूर्वक साधनमें लगे हुए और भक्तिपूर्वक कीर्तन करते हुए तथा नमस्कार करते हुये निरन्तर मेरी उपासना करते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 14?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 14 translates to: "Always glorifying Me, striving, firm in their vows, prostrating themselves before Me, they worship Me with steadfast devotion. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपास" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 14 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। नित्य- (मेरेमें) युक्त मनुष्य दृढ़व्रती होकर लगनपूर्वक साधनमें लगे हुए और भक्तिपूर्वक कीर्तन करते हुए तथा नमस्कार करते हुये निरन्तर मेरी उपासना करते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "satataṁ kīrtayanto māṁ yatantaśh cha dṛiḍha-vratāḥ" mean in English?

"satataṁ kīrtayanto māṁ yatantaśh cha dṛiḍha-vratāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 14. Always glorifying Me, striving, firm in their vows, prostrating themselves before Me, they worship Me with steadfast devotion. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.