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Sudarshana Chakra
Adhyay 8, Shlok 22
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया। यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्

हे पृथानन्दन अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो अनन्यभक्तिसे प्राप्त होनेयोग्य है। — VaniSagar

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MarathiIND

हे परमपुरुष, हे अर्जुना, ज्याच्यामध्ये सर्व प्राणी वास करतात आणि ज्याच्याद्वारे हे सर्व व्यापलेले आहे, केवळ त्याच्यावरच अखंड भक्ती केल्याने प्राप्त होते.

NepaliIND

त्यो सर्वोच्च पुरूष, हे अर्जुन, उहाँमा अटल भक्तिद्वारा प्राप्त हुन्छ, जसमा सबै प्राणीहरू वास गर्छन् र जसद्वारा यो सबै व्याप्त छ।

PunjabiIND

ਉਹ ਸਰਵਉੱਚ ਪੁਰਖ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਕੇਵਲ ਉਸ ਦੀ ਅਟੱਲ ਭਗਤੀ ਦੁਆਰਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਜਿਸ ਦੇ ਅੰਦਰ ਸਾਰੇ ਜੀਵ ਵੱਸਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਜਿਸ ਦੁਆਰਾ ਇਹ ਸਭ ਵਿਆਪਕ ਹੈ।

BengaliIND

সেই সর্বোচ্চ পুরুষ, হে অর্জুন, একমাত্র তাঁরই প্রতি অটল ভক্তি দ্বারা সাধিত হয়, যাঁর মধ্যেই সমস্ত প্রাণী বাস করে এবং যাঁর দ্বারা এই সমস্ত বিস্তৃত।

SindhiIND

اهو سڀ کان وڏو پروش، اي ارجن، صرف هن جي بيحد عقيدت سان حاصل ڪري سگهجي ٿو، جنهن جي اندر سڀ شيون رهن ٿيون ۽ جنهن جي ذريعي اهو سڀ ڪجهه پکڙيل آهي.

GujaratiIND

એ સર્વોચ્ચ પુરૂષ, હે અર્જુન, જેની અંદર સર્વ જીવો વસે છે અને જેમના દ્વારા આ બધું વ્યાપેલું છે, તેની જ નિરંતર ભક્તિ દ્વારા પ્રાપ્ત થાય છે.

MalayalamIND

ഹേ അർജ്ജുനാ, ആ പരമോന്നത പുരുഷനെ, അവനോടുള്ള അചഞ്ചലമായ ഭക്തികൊണ്ട് മാത്രമേ പ്രാപ്യനാകൂ, എല്ലാ ജീവജാലങ്ങളും ആരുടെ ഉള്ളിൽ വസിക്കുന്നുവോ, ആരിലൂടെയാണ് ഇതെല്ലാം വ്യാപിച്ചിരിക്കുന്നത്.

TamilIND

அந்த உயர்ந்த புருஷனே, ஓ அர்ஜுனா, அவனிடமே அசையாத பக்தியினால் மட்டுமே அடைய முடியும், யாருக்குள் எல்லா உயிர்களும் வாழ்கின்றன, யாரால் இவை அனைத்தும் வியாபித்திருக்கின்றன.

TeluguIND

ఆ అత్యున్నతమైన పురుషుడు, ఓ అర్జునా, అతనిపై మాత్రమే అచంచలమైన భక్తిని పొందగలడు, ఎవరిలో అన్ని జీవులు నివసిస్తున్నాయి మరియు ఎవరి ద్వారా ఇవన్నీ వ్యాపించి ఉన్నాయి.

KannadaIND

ಆ ಅತ್ಯುನ್ನತ ಪುರುಷ, ಓ ಅರ್ಜುನ, ಅವನಲ್ಲಿ ಮಾತ್ರ ಅಚಲವಾದ ಭಕ್ತಿಯಿಂದ ಪ್ರಾಪ್ತಿಯಾಗುತ್ತಾನೆ, ಯಾರೊಳಗೆ ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳು ವಾಸಿಸುತ್ತವೆ ಮತ್ತು ಯಾರಿಂದ ಇದೆಲ್ಲವೂ ವ್ಯಾಪಿಸಲ್ಪಟ್ಟಿದೆ.

OdiaIND

ହେ ଅର୍ଜୁନ, ସେହି ସର୍ବୋଚ୍ଚ ପୁରୁଷୋତ୍ତମ, କେବଳ ତାଙ୍କ ପ୍ରତି ଅବିସ୍ମରଣୀୟ ଭକ୍ତି ଦ୍ୱାରା ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ, ଯାହା ଭିତରେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ବାସ କରନ୍ତି ଏବଂ ଯାହାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଏହିସବୁ ବ୍ୟାପିଥାଏ |

MaithiliIND

ओ सर्वोच्च पुरुष हे अर्जुन केवल हुनके अविचल भक्ति सँ प्राप्त होइत अछि, जिनका भीतर सब प्राणी निवास करैत छथि आ जिनका द्वारा ई सब व्याप्त अछि |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्'--सातवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें भगवान्ने निषेधरूपसे कहा कि सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं, पर मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं। यहाँ भगवान् विधिरूपसे कहते हैं कि परमात्माके अन्तर्गत सम्पूर्ण प्राणी हैं और परमात्मा सम्पूर्ण संसारमें परिपूर्ण हैं। इसीको भगवान्ने नवें अध्यायके चौथे, पाँचवें और छठे श्लोकमें विधि और निषेध--दोनों रूपोंसे कहा है। तात्पर्य यह हुआ कि मेरे सिवाय किसीकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। सब मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं; मेरेमें ही स्थित रहते हैं और मेरेमें ही लीन होते हैं, अतः सब कुछ मैं ही हुआ।वे परमात्मा सर्वोपरि होनेपर भी सबमें व्याप्त हैं अर्थात् वे परमात्मा सब जगह हैं; सब समयमें हैं; सम्पूर्ण वस्तुओंमें हैं, सम्पूर्ण क्रियाओंमें हैं और सम्पूर्ण प्राणियोंमें हैं। जैसे सोनेसे बने हुए गहनोंमें पहले भी सोना ही था, गहनारूप बननेपर भी सोना ही रहा और गहनोंके नष्ट होनेपर भी सोना ही रहेगा। परन्तु सोनेसे बने गहनोंके नाम, रूप, आकृति, उपयोग, तौल मूल्य आदिपर दृष्टि रहनेसे सोनेकी तरफ दृष्टि नहीं जाती। ऐसे ही संसारके पहले भी परमात्मा थे, संसाररूपसे भी परमात्मा ही हैं और संसारका अन्त होनेपर भी परमात्मा ही रहेंगे। परन्तु संसारको पाञ्चभौतिक, ऊँच-नीच, बड़ा-छोटा, अनुकूल-प्रतिकूल आदि मान लेनेसे परमात्माकी तरफ दृष्टि नहीं जाती।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

उस परमधामकी प्राप्तिका उपाय बतलाया जाता है --, शरीररूप पुरमें शयन करनेसे या सर्वत्र परिपूर्ण होनेसे परमात्माका नाम पुरुष है। हे पार्थ वह निरतिशय परमपुरुष जिससे पर ( सूक्ष्मश्रेष्ठ ) अन्य कुछ भी नहीं है जिस पुरुषके अन्तर्गत समस्त कार्यरूप भूत स्थित हैं -- क्योंकि कार्य कारणके अन्तर्वर्ती हुआ करता है -- और जिस पुरुषसे यह सारा संसार आकाशसे घट आदिकी भाँति व्याप्त है। ऐसा परमात्मा अनन्य भक्ितसे अर्थात् आत्मविषयक ज्ञानरूप भक्ितसे प्राप्त होने योग्य है।,

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Sri Anandgiri

नन्वव्यक्तादतिरिक्तस्य तद्विलक्षणस्य परमपुरुषस्य प्राप्तौ कश्चिदसाधारणो हेतुरेषितव्यो यस्मिन्प्रेक्षापूर्वकारी तत्प्रेक्षया प्रवृत्तो निर्वृणोति तत्राह -- तल्लब्धेरिति। परस्य पुरुषस्य सर्वकारणत्वं सर्वव्यापकत्वं च विशेषणद्वयमुदाहरति -- यस्येति। निरतिशयत्वं विशदयति -- यस्मादिति। तुशब्दोऽवधारणार्थः। भक्तिर्भजनम् सेवा प्रदक्षिणप्रणामादिलक्षणा तां व्यावर्तयति -- ज्ञानेति। उक्ताया भक्तेर्विषयतो वैशिष्ट्यमाह -- अनन्ययेति। कोऽसौ पुरुषो यद्विषया भक्तिस्तत्प्राप्तौ पर्याप्तेत्याशङ्क्योत्तरार्धं व्याचष्टे -- यस्येति। कथंभूतानां तदन्तःस्थत्वं तत्राह -- कार्यं हीति।स पर्यगात् इति श्रुतिमाश्रित्याह -- येनेति।

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Sri Dhanpati

तत्प्राप्तेव्याभिचारि साधनमाह। स परः पुरुषः सर्वोत्तमः पुरिशयनात्पूर्णत्वाद्वा पुरुषः। अनन्यया न विद्यतेऽन्यो विषयो यस्यां तया। आत्मविषययेति यावत्। भक्त्या ज्ञानलक्षणयोत्तमभक्त्या। तदुक्तंसर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यामन्येष भागवत्तोत्तमः।।ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेम मैत्री दयोपेक्षाः यः करोति स मध्यमः।।अर्चायामेव हरये पूजा यः श्रद्धयेहते। न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः इति।वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।यो वै अन्यां देवतामुपास्ते अहमन्योऽसावन्य इति न स वेदेति तस्मात्सः परः पुरुष अहमेव न तदभिन्नात्मनः किंचित्पृथगस्ति इत्यनन्यया भक्तया लभ्यः लब्धुं शक्यः। ननु सतु सदैव प्राप्त इत्याशङ्क्य द्विविधो हि लाभोऽलब्धलाभो लब्धलाभस्चेति। तत्रालब्धस्य ग्रामदे राजसेवादिना लाभ आद्यः। लब्धस्यैव ग्रैवेयकादेराप्तवाक्याल्लाभो द्वितीयः। तत्रान्त्यलाभोऽत्राभिप्रेत इत्याशयेन शङ्कामङ्गीकरोति। यस्य परस्य पुरुषस्यान्तर्मध्ये स्थानि स्थितानि भूतानि सर्वाणि कार्यजातानि भूतानि यस्मिन्नधिष्ठाने कल्पितानीत्यर्थः। कल्पितं ह्यधिष्ठास्यान्तर्भवति न व्यतिरिक्तं येन पुरुषेणेदं सर्व जगत्ततं सत्तास्फूर्तिभ्यां व्याप्तं त्वमपि मत्प्राप्त्यव्यभिचारिसाधिनभूतां भक्तिं यत्नेन संपादय नतु पृथानतयोऽहं मम तु भक्तिं विनैवेश्वरलाभो भविष्यतीति विश्रम्भाश्रयणं कुर्विति ध्वनयन् संबोधयति -- हे पार्थेति। मद्विषयानन्या भक्तिस्तवानायासलभ्येति सूचनार्थ वा संबोधनम्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
puruṣhaḥthe Supreme Divine Personality
saḥhe
paraḥgreatest
pārthaArjun, the son of Pritha
bhaktyāthrough devotion
labhyaḥis attainable
tuindeed
ananyayāwithout another
yasyaof whom
antaḥsthāni
bhūtānibeings
yenaby whom
sarvamall
idamthis
tatamis pervaded
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Bhagavad Gita · 8.21
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम

उसीको अव्यक्त और अक्षर कहा गया है और उसीको परमगति कहा गया है तथा जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 8.23
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! जिस काल अर्थात् मार्गमें शरीर छोड़कर गये हुए योगी अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर नहीं आते और (जिस मार्गमें गये हुए) आवृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर आते हैं, उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको मैं कहूँगा। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 8Shlok 22
Bhagavad Gita · Adhyay 8, Shlok 22
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया। यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्

हे पृथानन्दन अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो अनन्यभक्तिसे प्राप्त होनेयोग्य है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 22 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 22 का हिंदी अर्थ: "हे पृथानन्दन अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो अनन्यभक्तिसे प्राप्त होनेयोग्य है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 22?

Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 22 translates to: "That highest Purusha, O Arjuna, is attainable by unswerving devotion to Him alone, within Whom all beings dwell and by Whom all this is pervaded. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया। यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं " — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 8, श्लोक 22 है जो Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga में संकलित है। हे पृथानन्दन अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो अनन्यभक्तिसे प्राप्त होनेयोग्य है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "puruṣhaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyas tvananyayā" mean in English?

"puruṣhaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyas tvananyayā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 22. That highest Purusha, O Arjuna, is attainable by unswerving devotion to Him alone, within Whom all beings dwell and by Whom all this is pervaded. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.