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Sudarshana Chakra
Adhyay 8, Shlok 21
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम

उसीको अव्यक्त और अक्षर कहा गया है और उसीको परमगति कहा गया है तथा जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

যা অব্যক্ত ও অবিনশ্বর নামে পরিচিত, তাকেই সর্বোচ্চ লক্ষ্য বলা হয়। যারা সেখানে পৌঁছায় তারা (এই সংসারে) ফিরে আসে না। এটাই আমার সর্বোচ্চ আবাস (স্থান বা রাষ্ট্র)।

KannadaIND

ಯಾವುದನ್ನು ಅವ್ಯಕ್ತ ಮತ್ತು ಅವಿನಾಶಿ ಎಂದು ಕರೆಯಲಾಗುತ್ತದೆ, ಅದು ಅತ್ಯುನ್ನತ ಗುರಿ ಎಂದು ಹೇಳಲಾಗುತ್ತದೆ. ಅದನ್ನು ತಲುಪಿದವರು (ಈ ಸಂಸಾರಕ್ಕೆ) ಹಿಂದಿರುಗುವುದಿಲ್ಲ. ಅದು ನನ್ನ ಪರಮೋಚ್ಚ ವಾಸಸ್ಥಾನ (ಸ್ಥಳ ಅಥವಾ ರಾಜ್ಯ).

SindhiIND

جيڪو اڻڄاتل ۽ غير فاني طور سڃاتو وڃي ٿو، اهو سڀ کان وڏو مقصد آهي. جيڪي اُن تائين پھچن ٿا سي (ھن سمسار ڏانھن) واپس نه ٿا اچن. اهو منهنجو اعليٰ مقام آهي (جڳهه يا رياست).

GujaratiIND

જેને અવ્યક્ત અને અવિનાશી તરીકે ઓળખવામાં આવે છે, તે સર્વોચ્ચ ધ્યેય કહેવાય છે. જેઓ ત્યાં પહોંચે છે તેઓ પાછા (આ સંસારમાં) આવતા નથી. તે મારું સર્વોચ્ચ નિવાસ (સ્થળ અથવા રાજ્ય) છે.

TamilIND

வெளிப்படுத்தப்படாதது என்றும் அழியாதது என்றும் அறியப்படுகிறதோ, அதுவே உயர்ந்த குறிக்கோள் என்று கூறப்படுகிறது. அதை அடைந்தவர்கள் (இந்த சம்சாரத்திற்கு) திரும்புவதில்லை. அதுவே எனது உயர்ந்த இருப்பிடம் (இடம் அல்லது மாநிலம்).

MarathiIND

जे अव्यक्त आणि अविनाशी म्हणून ओळखले जाते, तेच सर्वोच्च ध्येय आहे असे म्हणतात. जे पोहोचतात ते (या संसाराकडे) परत येत नाहीत. ते माझे सर्वोच्च निवासस्थान आहे (स्थान किंवा राज्य).

TeluguIND

ఏది అవ్యక్తమైనది మరియు నశించనిది అని పిలువబడుతుందో, అది అత్యున్నత లక్ష్యం అని చెప్పబడింది. దానిని చేరుకున్న వారు (ఈ సంసారానికి) తిరిగి రారు. అది నా సర్వోన్నత నివాసం (స్థలం లేదా రాష్ట్రం).

MalayalamIND

അവ്യക്തവും നശ്വരവുമായത് എന്ന് അറിയപ്പെടുന്നത്, അത് ഏറ്റവും ഉയർന്ന ലക്ഷ്യമാണെന്ന് പറയപ്പെടുന്നു. അതിൽ എത്തിച്ചേരുന്നവർ (ഈ സംസാരത്തിലേക്ക്) മടങ്ങിവരില്ല. അതാണ് എൻ്റെ പരമമായ വാസസ്ഥലം (സ്ഥലം അല്ലെങ്കിൽ സംസ്ഥാനം).

PunjabiIND

ਜਿਸ ਨੂੰ ਅਪ੍ਰਗਟ ਅਤੇ ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਉੱਚਤਮ ਟੀਚਾ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਜੋ ਇਸ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਦੇ ਹਨ, ਉਹ (ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ) ਮੁੜਦੇ ਨਹੀਂ। ਉਹ ਮੇਰਾ ਪਰਮ ਨਿਵਾਸ (ਸਥਾਨ ਜਾਂ ਰਾਜ) ਹੈ।

NepaliIND

जसलाई अव्यक्त र अविनाशी भनिन्छ, त्यसैलाई सर्वोच्च लक्ष्य भनिन्छ। त्यहाँ पुग्नेहरू (यस संसारमा) फर्केर आउँदैनन्। त्यो मेरो सर्वोच्च निवास (स्थान वा राज्य) हो।

BhojpuriIND

जवना के अप्रकट आ अविनाशी के नाम से जानल जाला, उहे सबसे ऊँच लक्ष्य कहल जाला। एकरा तक पहुँचे वाला लोग (एह संसार में) ना लवटत बा। उहे हमार परम धाम (स्थान भा राज्य) ह।

ManipuriIND

ꯑꯅꯃꯦꯅꯤꯐꯦꯁ꯭ꯇꯦꯗ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯏꯝꯄꯦꯔꯤꯁꯦꯕꯜ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯈꯉꯅꯕꯥ ꯑꯗꯨ, ꯃꯗꯨ ꯈ꯭ꯕꯥꯏꯗꯒꯤ ꯋꯥꯡꯕꯥ ꯄꯥꯟꯗꯝꯅꯤ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯍꯥꯌꯅꯩ꯫ ꯃꯁꯤꯗꯥ ꯌꯧꯔꯛꯂꯤꯕꯁꯤꯡ ꯑꯗꯨ (ꯁꯝꯁꯥꯔ ꯑꯁꯤꯗꯥ) ꯍꯜꯂꯛꯇꯦ꯫ ꯃꯗꯨ ꯑꯩꯒꯤ ꯈ꯭ꯕꯥꯏꯗꯒꯤ ꯋꯥꯡꯕꯥ ꯂꯩꯐꯝ (ꯃꯐꯝ ꯅꯠꯔꯒꯥ ꯔꯥꯖ꯭ꯌ)ꯅꯤ꯫

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'अव्यक्तोऽक्षर ৷৷. तद्धाम परमं मम'--भगवान्ने सातवें अध्यायके अट्ठाईसवें, उन्तीसवें और तीसवें श्लोकमें जिसको 'माम्', कहा है तथा आठवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें 'अक्षरं ब्रह्म', चौथे श्लोकमें 'अधियज्ञः', पाँचवें और सातवें श्लोकमें 'माम्', आठवें श्लोकमें 'परमं पुरुषं दिव्यम्', नवें श्लोकमें 'कविं पुराणमनुशासितारम्' आदि, तेरहवें, चौदहवें, पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें 'माम्', बीसवें श्लोकमें,'अव्यक्तः' और 'सनातनः' कहा है, उन सबकी एकता करते हुए भगवान् कहते हैं कि उसीको अव्यक्त और अक्षर कहते हैं तथा उसीको परमगति अर्थात् सर्वश्रेष्ठ गति कहते हैं; और जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है अर्थात् मेरा सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है। इस प्रकार जिस प्रापणीय वस्तुको अनेक रूपोंमें कहा गया है, उसकी यहाँ एकता की गयी है। ऐसे ही चौदहवें अध्यायके सत्ताईसवें श्लोकमें भी 'ब्रह्म, अविनाशी, अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं हूँ' ऐसा कहकर भगवान्ने प्रापणीय वस्तुकी एकता की है।लोगोंकी ऐसी धारणा रहती है कि सगुण-उपासनाका फल दूसरा है और निर्गुण-उपासनाका फल दूसरा है।,इस धारणाको दूर करनेके लिये इस श्लोकमें सबकी एकताका वर्णन किया गया है। मनुष्योंकी रुचि, विश्वास और योग्यताके अनुसार उपासनाके भिन्न-भिन्न प्रकार होते हैं, पर उनके अन्तिम फलमें कोई फरक नहीं होता। सबका प्रापणीय तत्त्व एक ही होता है। जैसे भोजनके प्राप्त न होनेपर अभावकी और प्राप्त होनेपर तृप्तिकी एकता होनेपर भी भोजनके पदार्थोंमें भिन्नता रहती है, ऐसे ही परमात्माके प्राप्त न होनेपर अभावकी और प्राप्त होनेपर पूर्णताकी एकता होनेपर भी उपासनाओंमें भिन्नता रहती है। तात्पर्य यह हुआ कि उस परमात्माको चाहे सगुण-निराकार मानकर उपासना करें, चाहे निर्गुण-निराकार मानकर उपासना करें और चाहे सगुण-साकार मानकर उपासना करें, अन्तमें सबको एक ही परमात्माकी प्राप्ति होती है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

जो वह अव्यक्त अक्षर ऐसे कहा गया है उसी अक्षर नामक अव्यक्तभावको परम -- श्रेष्ठ गति कहते हैं। जिस परम भावको प्राप्त होकर ( मनुष्य ) फिर संसारमें नहीं लौटते वह मेरा परम श्रेष्ठ स्थान है अर्थात् मुझ विष्णुका परमपद है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

यथोक्तेऽव्यक्ते भावे श्रुतिसंमतिमाह -- अव्यक्त इति। तस्य परमगतित्वं साधयति -- यं प्राप्येति। योऽसावव्यक्तो भावोऽत्र दर्शितः सयेनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यम् इत्यादिश्रुतावक्षर इत्युक्तस्तं वाक्षरं भावं परमां गतिंपुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः इत्याद्याः श्रुतयो वदन्तीत्याह -- योऽसाविति। परमपुरुषस्य परमगतित्वमुक्तं व्यनक्ति -- यं भावमिति।तद्विष्णोः परमं पदम् इति श्रुतिमत्र संवादयति -- तद्धामेति।

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Sri Dhanpati

योऽसौ अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्एतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्ति अस्थूलमनणुएतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः। एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्गि आकाश ओतश्च प्रोतश्चपुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः इत्यादिश्रुतयस्तमेवाक्षरसंज्ञकं अव्यक्तं भावे परमां प्रकृष्टां गतिं प्राप्यमाहुः। यं प्राप्यं भावं प्राप्य गत्वा पुनः संसाराय न निवर्तन्ते। जन्ममरणादिरुपां संसृतिं न प्राप्नुवन्ति। मम विषणोः परब्रह्मणः तत्परमं सर्वोत्कृष्टं धाम स्थानंतद्विष्णोः परमं पदम् इति श्रुतेः। श्रुतावत्र च राहोः शिर इतिवदभेदेऽपि भेदकल्पनया षष्ठी। अतोऽहमेव मोक्षाख्यं परमं स्थानमित्यर्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
avyaktaḥunmanifest
akṣharaḥimperishable
itithus
uktaḥis said
tamthat
āhuḥis called
paramāmthe supreme
gatimdestination
yamwhich
prāpyahaving reached
nanever
nivartantecome back
tatthat
dhāmaabode
paramamthe supreme
mamamy
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 8.20
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति

परन्तु उस अव्यक्त- (ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर-) से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है, उसका सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नाश नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 8.22
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया। यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्

हे पृथानन्दन अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो अनन्यभक्तिसे प्राप्त होनेयोग्य है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 8Shlok 21
Bhagavad Gita · Adhyay 8, Shlok 21
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम

उसीको अव्यक्त और अक्षर कहा गया है और उसीको परमगति कहा गया है तथा जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 21 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 21 का हिंदी अर्थ: "उसीको अव्यक्त और अक्षर कहा गया है और उसीको परमगति कहा गया है तथा जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 21?

Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 21 translates to: "What is known as the Unmanifested and the Imperishable, That is said to be the highest goal. Those who reach It do not return (to this Samsara). That is My supreme abode (place or state). — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं " — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 8, श्लोक 21 है जो Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga में संकलित है। उसीको अव्यक्त और अक्षर कहा गया है और उसीको परमगति कहा गया है तथा जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "avyakto ’kṣhara ityuktas tam āhuḥ paramāṁ gatim" mean in English?

"avyakto ’kṣhara ityuktas tam āhuḥ paramāṁ gatim" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 21. What is known as the Unmanifested and the Imperishable, That is said to be the highest goal. Those who reach It do not return (to this Samsara). That is My supreme abode (place or state). — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.