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Sudarshana Chakra
Adhyay 8, Shlok 20
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति

परन्तु उस अव्यक्त- (ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर-) से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है, उसका सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नाश नहीं होता। — VaniSagar

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TamilIND

ஆனால் உண்மையாகவே, இந்த வெளிப்படுத்தப்படாத, மற்றுமொரு வெளிப்படுத்தப்படாத நித்தியத்தை விட உயர்ந்தது உள்ளது, இது அனைத்து உயிரினங்களும் அழிக்கப்பட்டாலும் அழியாது.

BengaliIND

কিন্তু প্রকৃতপক্ষে, এই অব্যক্তের চেয়েও উচ্চে আছে, অন্য একটি অব্যক্ত চিরন্তন, যা সমস্ত প্রাণী ধ্বংস হয়ে গেলেও ধ্বংস হয় না।

GujaratiIND

પરંતુ ખરેખર, આ અવ્યક્ત કરતાં પણ ઉચ્ચ અસ્તિત્વ ધરાવે છે, અન્ય અવ્યક્ત શાશ્વત, જે તમામ જીવોનો નાશ થાય ત્યારે પણ નાશ પામતો નથી.

NepaliIND

तर वास्तवमा, यो अव्यक्त भन्दा उच्च छ, अर्को अव्यक्त शाश्वत, जुन सबै प्राणीहरू नष्ट हुँदा पनि नष्ट हुँदैन।

KannadaIND

ಆದರೆ ನಿಜವಾಗಿ, ಈ ಅವ್ಯಕ್ತ, ಇನ್ನೊಂದು ಅವ್ಯಕ್ತವಾದ ಶಾಶ್ವತವಾದುದಕ್ಕಿಂತ ಎತ್ತರವಿದೆ, ಅದು ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳು ನಾಶವಾದಾಗಲೂ ನಾಶವಾಗುವುದಿಲ್ಲ.

TeluguIND

కానీ నిశ్చయంగా, ఈ అవ్యక్తమైన, మరొక అవ్యక్త శాశ్వతమైన దాని కంటే ఉన్నతమైనది ఉంది, ఇది అన్ని జీవులు నాశనం చేయబడినప్పటికీ నాశనం చేయబడదు.

MalayalamIND

എന്നാൽ തീർച്ചയായും, ഈ അവ്യക്തതയേക്കാൾ ഉയർന്നതാണ്, മറ്റൊരു അവ്യക്തമായ ശാശ്വതമായത്, അത് എല്ലാ ജീവികളും നശിച്ചാലും നശിപ്പിക്കപ്പെടില്ല.

AssameseIND

কিন্তু নিশ্চয় এই অপ্ৰকাশিততকৈও উচ্চ, আন এটা অপ্ৰকাশিত চিৰন্তন আছে, যিটো সকলো সত্তা ধ্বংস হ’লেও ধ্বংস নহয়।

BhojpuriIND

बाकिर साँचहू, एह अप्रकट से ऊँच, एगो अउरी अप्रकट शाश्वत मौजूद बा, जवन सभ जीव के नाश होखला पर भी नाश ना होला।

ManipuriIND

ꯑꯗꯨꯕꯨ ꯇꯁꯦꯡꯅꯃꯛ, ꯃꯁꯤꯗꯒꯤ ꯍꯦꯟꯅꯥ ꯋꯥꯡꯕꯥ, ꯑꯇꯣꯞꯄꯥ ꯃꯁꯛ ꯊꯣꯀꯄꯥ ꯂꯣꯝꯕꯥ ꯅꯥꯏꯗꯕꯥ, ꯖꯤꯕ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛ ꯃꯥꯉꯈ꯭ꯔꯕꯥ ꯃꯇꯃꯗꯁꯨ ꯃꯥꯡꯍꯟ ꯇꯥꯀꯍꯅꯕꯥ ꯉꯃꯗꯕꯥ ꯑꯃꯥ ꯂꯩꯔꯤ꯫

MizoIND

Mahse, a dik tak chuan, he Inlan lo aia sang zawk, Chatuan Lang lo dang, thil nung zawng zawng tihchhiat a nih pawhin tihchhiat loh a awm a ni.

MarathiIND

पण खरंच, या अव्यक्तापेक्षा वरचेवर अस्तित्वात आहे, आणखी एक अव्यक्त शाश्वत, जो सर्व प्राणीमात्रांचा नाश झाल्यावरही नष्ट होत नाही.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः'-- सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक ब्रह्मलोक तथा उससे नीचेके लोकोंको पुनरावर्ती कहा गया है। परन्तु परमात्मतत्त्व उनसे अत्यन्त विलक्षण है, -- यह बतानेके लिये यहाँ 'तु' पद दिया गया है।यहाँ 'अव्यक्तात्' पद ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरका ही वाचक है। कारण कि इससे पहले अठारहवें-उन्नीसवें श्लोकोंमें सर्गके आदिमें ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे प्राणियोंके पैदा होनेकी और प्रलयमें ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरमें प्राणियोंके लीन होनेकी बात कही गयी है। इस श्लोकमें आया 'तस्मात्' पद भी ब्रह्माजीके उस सूक्ष्मशरीरका द्योतन करता है। ऐसा होनेपर भी यहाँ ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीर-(समष्टि मन, बुद्धि और अहंकार-) से भी पर अर्थात् अत्यन्त विलक्षण जो भावरूप अव्यक्त कहा गया है, वह ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीरके साथ-साथ ब्रह्माजीके कारण-शरीर- (मूल प्रकृति-) से भी अत्यन्त विलक्षण है।ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे पर दो तत्त्व हैं--मूल प्रकृति और परमात्मा। यहाँ प्रसङ्ग मूल प्रकृतिका नहीं है, प्रत्युत परमात्माका है। अतः इस श्लोकमें परमात्माको ही पर और श्रेष्ठ कहा गया है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता। आगेके श्लोकमें भी 'अव्यक्तोऽक्षर' आदि पदोंसे उस परमात्माका ही वर्णन आया है। गीतामें प्राणियोंके अप्रकट होनेको अव्यक्त कहा गया है--'अव्यक्तादीनि भूतानि' (2। 28); ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरको भी अव्यक्त कहा गया है (8। 18) प्रकृतिको भी अव्यक्त कहा गया है --'अव्यक्तमेव च' (13। 5) आदि। उन सबसे परमात्माका स्वरूप विलक्षण, श्रेष्ठ है, चाहे वह स्वरूप व्यक्त हो, चाहे अव्यक्त हो। वह भावरूप है अर्थात् किसी भी कालमें उसका अभाव हुआ नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं। कारण कि वह सनातन है अर्थात् वह सदासे है और सदा ही रहेगा। इसलिये वह पर अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है। उससे श्रेष्ठ कोई हो ही नहीं सकता और होनेकी सम्भावना भी नहीं है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जिस अक्षरका पहले प्रतिपादन किया था उसकी प्राप्तिका उपाय ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म इत्यादि कथनसे बतला दिया। अब उसी अक्षरके स्वरूपका निर्देश करनेकी इच्छासे यह बतलाया जाता है कि इस योगमार्गद्वारा अमुक वस्तु मिलती है --, तु शब्द यहाँ आगे वर्णन किये जानेवाले अक्षरकी उस पूर्वोक्त अव्यक्तसे विलक्षणता दिखलानेके लिये है। ( वह अव्यक्त ) भाव यानी अक्षरनामक परब्रह्म परमात्मा अत्यन्त भिन्न है। किससे उस पहले कहे हुए अव्यक्त से। भिन्न होनेपर भी किसी प्रकार समानता हो सकती है इस शंकाकी निवृत्तिके लिये कहते हैं कि वह इन्द्रियोंसे प्रत्यक्ष न होनेवाला अव्यक्तभाव अन्य -- दूसरा है अर्थात् सर्वथा विलक्षण है। उससे पर है ऐसा कहा सो किससे पर है वह उस पूर्वोक्त भूतसमुदायके बीजभूत अविद्यारूप अव्यक्तसे परे है। ऐसा जो सनातन भाव अर्थात् सदासे होनेवाला भाव है वह ब्रह्मादि समस्त प्राणियोंका नाश होनेपर भी नष्ट नहीं होता।

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Sri Anandgiri

अक्षरं ब्रह्म परममित्युपक्रम्य तदनुपयुक्तं किमिदमन्यदुक्तमित्याशङ्क्य वृत्तमनूद्यानन्तरग्रन्थसंगतिमाह -- यदुपन्यस्तमिति। अक्षरस्वरूपे निर्दिदिक्षिते तस्मिन्पूर्वोक्तयोगमार्गस्य कथमुपयोगः स्यादित्याशङ्क्य तत्प्राप्त्युपायत्वेनेत्याह -- अनेनेति। गन्तव्यमिति योगमार्गोक्तिरुपयुक्तेति शेषः। पूर्वोक्तादव्यक्तादिति संबन्धः। परशब्दस्य व्यतिरिक्तविषयत्वे तुशब्देन वैलक्षण्यमुक्त्वा पुनरन्यशब्दप्रयोगात्पौनरुक्त्यमित्याशङ्क्याह -- व्यतिरिक्तत्व इति। तुना द्योतितं वैलक्षण्यमन्यशब्देन प्रकटितम्। यतो भिन्नेष्वपि भावभेदेषु सालक्षण्यमालक्ष्यते ततश्चाव्यक्ताद्भिन्नत्वेऽपि ब्रह्मणस्तेन सादृश्यमाशङ्कते तन्निवृत्त्यर्थमन्यपदमित्यर्थः। यद्वा परशब्दस्य प्रकृष्टवाचिनो भावविशेषणार्थत्वे पुनरुक्तिशङ्कैव नास्तीति द्रष्टव्यम्। अनादिभावस्याक्षरस्याविनाशित्वमर्थसिद्धं समर्थयते -- यः स भाव इति। सर्वं हि विनश्यद्विकारजातं पुरुषान्तं विनश्यति स तु विनाशहेत्वभावान्न,विन(नं)ष्टुमर्हतीत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

अक्षरं ब्रह्म परममित्युपक्रम्योमित्येकाक्षरं ब्रह्मेत्यादिना तत्प्राप्त्युपाय उपदिष्टः अथेदानीमक्षरस्य प्राप्यस्य स्वरुपमाह -- पर इत्यादिना। तस्मात्त्वव्यक्ताद्भूतग्रामबीजभूताविद्यालक्षणात्परो व्यक्तिरिक्तो भिन्नः। अव्यक्तात् हिरण्यगर्भादिति वा। अस्मिन्पक्षेमहतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः। पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः इति श्रुत्या हरिण्यगर्भान्महानात्मेत्यनेन प्रतिपादितात्पत्वमव्यक्तशब्दप्रतिपादिताया मूलप्रकृतेरुक्तं तदनुरोधेनात्रापि हिरण्यगर्भात्परस्य मूलप्रकृतिबोधकस्याव्यक्तशब्दस्य ग्रहणः प्राप्तोतीति। इमं पक्षं विहायाचार्यैरव्यक्तात्पुरुषः परः इति श्रुतिरनुसृता। तुशब्दः संसारबीजभूतान्मूलप्रकृतिशब्दावाच्यादव्यक्तान्मोक्षाख्यस्य सकलप्रपञ्चशून्यस्य परमानन्दैकघनस्य परमात्मनोऽव्यक्तस्याक्षरस्य वैलक्षण्यद्योतनार्थः। भावः सत्तास्वरुपः अक्षराख्यं परं ब्रह्म। स्वरूपो व्यतिरिक्तत्वेऽपि लक्षणैक्यव्यावृत्त्यर्थं तुना द्योतितमर्थं तद्वाचकेनाप्याहान्य इति। विलक्षण इत्यर्थः। यद्वा परशब्दस्य प्रकृष्टवाचिनो भावे विशेषणार्थत्वेन पुनरुक्तिशंङ्कैव नास्तीत्येके। आचार्यैस्तु निकृष्टात्प्रकृष्टस्य विलक्षणत्वव्यतिरिक्तत्वध्रौव्याक्तुशब्दयोरुभयोरपि वैयथर्यमभिप्रेत्य सुगमत्वाद्वायं पक्षस्त्यक्तः। वैलक्षण्यं स्फुटयति। सनातनः चिरंतनः यः सर्वेषु भूतेषु हिरण्यगरभादिषु विनयश्यत्सु न विनश्यति स भावः परमात्मेत्यर्थः। तथाच सनातन्तवे सति अनश्वरत्वं परमात्मलक्षणं नाव्यक्त इति भावः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
paraḥtranscendental
tasmātthan that
tubut
bhāvaḥcreation
anyaḥanother
avyaktaḥunmanifest
avyaktātto the unmanifest
sanātanaḥeternal
yaḥwho
saḥthat
sarveṣhuall
bhūteṣhuin beings
naśhyatsucease to exist
nanever
vinaśhyatiis annihilated
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 8.19
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे

हे पार्थ ! वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृतिके परवश हुआ ब्रह्माके दिनके समय उत्पन्न होता है और ब्रह्माकी रात्रिके समय लीन होता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 8.21
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम

उसीको अव्यक्त और अक्षर कहा गया है और उसीको परमगति कहा गया है तथा जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 8Shlok 20
Bhagavad Gita · Adhyay 8, Shlok 20
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति

परन्तु उस अव्यक्त- (ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर-) से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है, उसका सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नाश नहीं होता। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ: "परन्तु उस अव्यक्त- (ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर-) से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है, उसका सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नाश नहीं होता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 20?

Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 20 translates to: "But verily, there exists higher than this Unmanifested, another Unmanifested Eternal, which is not destroyed even when all beings are destroyed. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न " — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 8, श्लोक 20 है जो Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga में संकलित है। परन्तु उस अव्यक्त- (ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर-) से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है, उसका सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नाश नहीं होता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "paras tasmāt tu bhāvo ’nyo ’vyakto ’vyaktāt sanātanaḥ" mean in English?

"paras tasmāt tu bhāvo ’nyo ’vyakto ’vyaktāt sanātanaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 20. But verily, there exists higher than this Unmanifested, another Unmanifested Eternal, which is not destroyed even when all beings are destroyed. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.