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Sudarshana Chakra
Adhyay 8, Shlok 19
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे

हे पार्थ ! वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृतिके परवश हुआ ब्रह्माके दिनके समय उत्पन्न होता है और ब्रह्माकी रात्रिके समय लीन होता है। — VaniSagar

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GujaratiIND

હે અર્જુન, આ જ જીવો પુનઃજન્મ પામીને નિઃસહાયપણે વિલીન થઈ જાય છે, રાત્રીના સમયે અપ્રગટ થઈ જાય છે અને દિવસના આગમન સમયે બહાર આવે છે.

NepaliIND

हे अर्जुन, यो नै जीवको भीड, बारम्बार जन्म लिई असहाय भई रातको आगमनमा अव्यक्तमा विलीन हुन्छ र दिनको आगमनमा बाहिर आउँछ।

SindhiIND

هي ساڳيون مخلوقات جو بار بار پيدا ٿيڻ سان، اي ارجن، رات جي اچڻ تي اڻڄاڻ ۾ ضم ٿي وڃي ٿي ۽ ڏينهن جي اچڻ تي نڪرندي آهي.

MalayalamIND

ഹേ അർജ്ജുനാ, വീണ്ടും വീണ്ടും ജനിച്ചു കൊണ്ടിരിക്കുന്ന ഇതേ ജീവജാലങ്ങൾ നിസ്സഹായതയോടെ രാത്രിയുടെ ആഗമനത്തിൽ അവ്യക്തമായി ലയിക്കുകയും പകലിൻ്റെ ആഗമനത്തിൽ പുറത്തുവരുകയും ചെയ്യുന്നു.

TamilIND

இதே திரளான உயிரினங்கள், மீண்டும் மீண்டும் பிறந்து, உதவியின்றி இரவின் வருகையில் வெளிப்படுத்தப்படாத நிலையில் கரைந்து பகல் வரும்போது வெளிவருகின்றன.

KannadaIND

ಇದೇ ಬಹುಸಂಖ್ಯೆಯ ಜೀವಿಗಳು, ಮತ್ತೆ ಮತ್ತೆ ಹುಟ್ಟುತ್ತಾ, ಅಸಹಾಯಕವಾಗಿ ಓ ಅರ್ಜುನಾ, ರಾತ್ರಿಯ ಆಗಮನದಲ್ಲಿ ಅವ್ಯಕ್ತದಲ್ಲಿ ಕರಗುತ್ತದೆ ಮತ್ತು ಹಗಲು ಬರುವಾಗ ಹೊರಬರುತ್ತದೆ.

TeluguIND

ఇదే సమూహమైన జీవులు, మళ్లీ మళ్లీ జన్మిస్తూ, నిస్సహాయంగా, ఓ అర్జునా, రాత్రి రాబోతున్న సమయంలో అవ్యక్తంగా కరిగిపోయి, పగలు రాగానే బయటికి వస్తాయి.

MarathiIND

हे अर्जुना, हेच प्राणी पुन्हा पुन्हा जन्म घेत असहायतेने रात्रीच्या वेळी अव्यक्तामध्ये विरघळतात आणि दिवसाच्या वेळी बाहेर पडतात.

PunjabiIND

ਇਹੋ ਜੀਵਾਂ ਦੀ ਭੀੜ, ਬਾਰ ਬਾਰ ਜਨਮ ਲੈ ਕੇ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਰਾਤ ​​ਦੇ ਆਉਣ ਤੇ ਅਪ੍ਰਗਟ ਵਿੱਚ ਘੁਲ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਦਿਨ ਦੇ ਆਉਣ ਤੇ ਬਾਹਰ ਆਉਂਦੀ ਹੈ।

BengaliIND

এই একই সংখ্যক প্রাণী, বারবার জন্মগ্রহণ করে, হে অর্জুন, রাতের আগমনে অব্যক্ত অবস্থায় বিলীন হয়ে যায় এবং দিনের আগমনে বেরিয়ে আসে।

KonkaniIND

हीच जीवांची गर्दी परत परत जल्माक येतना असहाय्यपणान अर्जुन अप्रकटांत विरगळटा आनी दिसाच्या येवपाक भायर सरता.

MizoIND

He thilsiam tam tak hi, piang nawn leh zel hian, tanpui theih lohvin, Aw Arjuna, zan lo thlengah chuan A lang loah a inthiarfihlim a, ni lo thlengah chuan a lo chhuak ta a ni.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या --'भूतग्रामः स एवायम्'--अनादिकालसे जन्म-मरणके चक्करमें पड़ा हुआ यह प्राणिसमुदाय वही है, जो कि साक्षात् मेरा अंश, मेरा स्वरूप है। मेरा सनातन अंश होनेसे यह नित्य है। सर्ग और प्रलय तथा महासर्ग और महाप्रलयमें भी यही था और आगे भी यही रहेगा। इसका न कभी अभाव हुआ है और न आगे कभी इसका अभाव होगा। तात्पर्य है कि यह अविनाशी है, इसका कभी विनाश नहीं होता। परन्तु भूलसे यह प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है। प्राकृत पदार्थ (शरीर आदि) तो बदलते रहते हैं, उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं, पर यह उनके सम्बन्धको पकड़े रहता है। यह कितने आश्चर्यकी बात है कि सम्बन्धी (सांसारिक पदार्थ) तो नहीं रहते, पर उनका सम्बन्ध रहता है; क्योंकि उस सम्बन्धको स्वयंने पकड़ा है। अतः यह स्वयं जबतक उस सम्बन्धको नहीं छोड़ता, तबतक उसको दूसरा कोई छुड़ा नहीं सकता। उस सम्बन्धको छोड़नेमें यह स्वतन्त्र है, सबल है। वास्तवमें यह उस सम्बन्धको रखनेमें सदा परतन्त्र है; क्योंकि वे पदार्थ तो हरदम बदलते रहते हैं, पर यह नया-नया सम्बन्ध पकड़ता रहता है। जैसे, बालकपनको इसने नहीं छोड़ा और न छोड़ना चाहा, पर वह छूट गया। ऐसे ही जवानीको इसने नहीं छोड़ा, पर वह छूट गयी। और तो क्या, यह शरीरको भी छोड़ना नहीं चाहता, पर वह भी छूट जाता है। तात्पर्य यह हुआ कि प्राकृत पदार्थ तो छूटते ही रहते हैं, पर यह जीव उन पदार्थोंके साथ अपने सम्बन्धको बनाये रखता है, जिससे,इसको बार-बार शरीर धारण करने पड़ते हैं, बार-बार जन्मना-मरना पड़ता है। जबतक यह उस माने हुए सम्बन्धको नहीं छोड़ेगा तबतक यह जन्ममरणकी परम्परा चलती ही रहेगी, कभी मिटेगी नहीं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

न किये कर्मोंका फल मिलना और किये हुए कर्मोंका फल न मिलना इस दोषका परिहार करनेके लिये बन्धन और मुक्तिका मार्ग बतलानेवाले शास्त्रवाक्योंकी सफलता दिखानेके लिये और अविद्यादि पञ्चक्लेशमूलक कर्मसंस्कारोंके वशमें पड़कर पराधीन हुआ प्राणीसमुदाय बारंबार उत्पन्न होहोकर लय हो जाता है -- इस प्रकारके कथनसे संसारमें वैराग्य दिखलानेके लिये यह कहते हैं --, जो पहले कल्पमें था वही -- दूसरा नहीं -- यह स्थावरजङ्गमरूप भूतोंका समुदाय ब्रह्माके दिनके आरम्भमें बारंबार उत्पन्न होहोकर दिनकी समाप्ति और रात्रिका प्रवेश होनेपर पराधीन हुआ ही बारंबार लय होता जाता है और फिर उसी प्रकार विवश होकर दिनके प्रवेशकालमें पुनः उत्पन्न होता जाता है।

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Sri Anandgiri

ननु प्रबोधकाले ब्रह्मणो यो भूतग्रामो भूत्वा तस्यैव स्वापकाले विलीयते तस्मादन्यो भूयो ब्रह्मणोऽहरागमे भूत्वा पुना रात्र्यागमे परवशो विनश्यति तदेवं प्रत्यवान्तरकल्पं भूतग्रामविभागो भवेदित्याशङ्क्यानन्तरश्लोकतात्पर्यमाह -- अकृतेति। प्रतिकल्पं प्राणिनिकायस्य भिन्नत्वे सत्यकृताभ्यागमादिदोषप्रसङ्गात्तत्परिहारार्थं भूतग्रामस्य प्रतिकल्पमैक्यमास्थेयमित्यर्थः। यदि स्थावरजङ्गमलक्षणप्राणिनिकायस्य प्रतिकल्पमन्यथात्वं तदेकस्य बन्धमोक्षान्वयिनोऽभावात्काण्डद्वयात्मनो बन्धमोक्षार्थस्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिरफला प्रसज्येतातस्तत्साफल्यार्थमपि प्रतिकल्पं प्राणिवर्गस्य नवीनत्वानुपपत्तिरित्याह -- बन्धेति। कथं पुनर्भूतसमुदायोऽस्वतन्त्रः सन्नवशो भूत्वा प्रविलीयते तत्राह -- अविद्यादीति। आदिशब्देनास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा गृह्यन्ते। यथोक्तं क्लेशपञ्चकं मूलं प्रतिलभ्य धर्माधर्मात्मककर्मराशिरुद्भवति तद्वशादेवास्वतन्त्रो भूतसमुदायो जन्मविनाशावनुभवतीत्यर्थः। प्राणिनिकायस्य जन्मनाशाभ्यासोक्तेरर्थमाह -- इत्यत इति। संसारे विपरिवर्तमानानां प्राणिनामस्वातन्त्र्यादवशानामेव जन्ममरणप्रबन्धादलमनेन संसारेणेति वैतृष्ण्यं तस्मिन्प्रदर्शनीयं तदर्थं चेद भूतानामहोरात्रमावृत्तिवचनमित्यर्थः। समनन्तरवाक्यमिदमा परामृश्यते। रात्र्यागमे प्रलयमनुभवतोऽहरागमे च प्रभवं प्रतिपद्यमानस्य प्राणिवर्गस्य तुल्यं पारवश्यमित्याशयवानाह -- अह्न इति।

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Sri Dhanpati

पूर्वकल्पीया एव प्रजा रात्र्यागमे अव्यक्ते प्रलीना अहरागमेऽव्यक्तादाविर्भवन्ति नतु ता विनष्टा अन्या एवास्मिन्कल्पे उत्पद्यन्ते इतीममर्थं स्फुटमाह -- भूतग्राम इति। भूतसमुदायश्चराचरलक्षणो यः पूर्वस्मिन्कल्पे आसीत्स एवायं नान्यः अहरागमे पुनःपुनर्भूत्वा रात्र्यागमे पुनःपुनर्लीयते पुनरहागमे प्रभवति प्रादुर्भवति। अवशो विद्यादिपरतन्त्रः। पार्थेति संबोधयन् कुन्तिभोजसंबन्धेन यथा पृथैव कुन्ती संपन्ना नतु पृथान्यैव स्थितान्यैव कुन्ती जातेति ध्वनयति। अयमाशयः -- प्रतिकल्पं भूतग्रामस्याभिनवत्वेऽकृताभ्यागमकृतविप्रणाशदोषो बन्धमोक्षान्वयिन एकस्याभावात्। बन्धमोक्षार्थस्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिनिष्फलता चापतति तन्निरासार्थ भूतग्रामस्य प्रतिकल्पमैक्यमभ्युपेयम्। अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशक्लेशमूलधर्माधर्माशयशाच्चावशो भूतग्रामो भूत्वा भूत्वा प्रलीयत इत्यतोऽलमनेन संसारेणेति विरक्तो भूत्वा ज्ञानेन संसारोपरमं संपादयेदिति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
bhūtagrāmaḥ
saḥthese
evacertainly
ayamthis
bhūtvā bhūtvārepeatedly taking birth
pralīyatedissolves
rātriāgame
avaśhaḥhelpless
pārthaArjun, the son of Pritha
prabhavatibecome manifest
ahaḥāgame
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 8.18
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके

ब्रह्माजीके दिनके आरम्भकालमें अव्यक्त- (ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर-) से सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं और ब्रह्माजीकी रातके आरम्भकालमें उसी अव्यक्तमें सम्पूर्ण प्राणी लीन हो जाते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 8.20
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति

परन्तु उस अव्यक्त- (ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर-) से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है, उसका सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नाश नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 8Shlok 19
Bhagavad Gita · Adhyay 8, Shlok 19
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे

हे पार्थ ! वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृतिके परवश हुआ ब्रह्माके दिनके समय उत्पन्न होता है और ब्रह्माकी रात्रिके समय लीन होता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ: "हे पार्थ ! वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृतिके परवश हुआ ब्रह्माके दिनके समय उत्पन्न होता है और ब्रह्माकी रात्रिके समय लीन होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 19?

Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 19 translates to: "This same multitude of beings, being born again and again, helplessly dissolves, O Arjuna, into the Unmanifested at the coming of the night and comes forth at the coming of the day. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 8, श्लोक 19 है जो Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga में संकलित है। हे पार्थ ! वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृतिके परवश हुआ ब्रह्माके दिनके समय उत्पन्न होता है और ब्रह्माकी रात्रिके समय लीन होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "bhūta-grāmaḥ sa evāyaṁ bhūtvā bhūtvā pralīyate" mean in English?

"bhūta-grāmaḥ sa evāyaṁ bhūtvā bhūtvā pralīyate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 19. This same multitude of beings, being born again and again, helplessly dissolves, O Arjuna, into the Unmanifested at the coming of the night and comes forth at the coming of the day. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.