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Sudarshana Chakra
Adhyay 8, Shlok 23
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! जिस काल अर्थात् मार्गमें शरीर छोड़कर गये हुए योगी अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर नहीं आते और (जिस मार्गमें गये हुए) आवृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर आते हैं, उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको मैं कहूँगा। — VaniSagar

Global Translations

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GujaratiIND

હવે હું તમને કહીશ, હે ભરતના વડા, યોગીઓ કયા સમયે પાછા ફરશે કે પાછા નહીં ફરે તે સમય.

TamilIND

ஓ பாரதர்களின் தலைவரே, யோகிகள் திரும்பும் அல்லது திரும்பாத காலங்களை இப்போது நான் உங்களுக்குச் சொல்கிறேன்.

KannadaIND

ಓ ಭರತಗಳ ಮುಖ್ಯಸ್ಥನೇ, ಯೋಗಿಗಳು ಹಿಂದಿರುಗುವ ಅಥವಾ ಹಿಂತಿರುಗದ ಹೊರಡುವ ಸಮಯಗಳನ್ನು ಈಗ ನಾನು ನಿಮಗೆ ಹೇಳುತ್ತೇನೆ.

MalayalamIND

ഭരതൻമാരുടെ തലവനേ, യോഗിമാർ മടങ്ങിവരുന്നതും തിരിച്ചുവരാത്തതുമായ യാത്രയുടെ സമയങ്ങൾ ഞാൻ ഇപ്പോൾ നിങ്ങളോട് പറയും.

TeluguIND

ఓ భరతుల అధిపతి, యోగులు ఏ సమయాల్లో తిరిగి వస్తారో లేదా తిరిగి రాని సమయాలను ఇప్పుడు నేను మీకు చెప్తాను.

MarathiIND

आता हे भरताच्या प्रधाना, योगी परत येणार की परत येणार नाही ते मी तुम्हाला सांगेन.

BengaliIND

এখন আমি আপনাকে বলব, হে ভরতগণের প্রধান, যোগীগণ যে সময়ে ফিরে আসবেন বা ফিরবেন না।

OdiaIND

ବର୍ତ୍ତମାନ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କୁ କହିବି, ଭାରତର ମୁଖ୍ୟ, ଯୋଗୀମାନେ ଫେରିବେ କି ଫେରିବେ ନାହିଁ।

SindhiIND

ھاڻي مان توھان کي ٻڌايان ٿو، اي ڀارتن جا سردار، موڪل جو وقت ڪھڙي وقت يوگي موٽندا يا نه موٽندا.

PunjabiIND

ਹੁਣ ਮੈਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਦੱਸਾਂਗਾ, ਹੇ ਭਰਤ ਦੇ ਮੁਖੀ, ਯੋਗੀ ਵਾਪਸ ਆਉਣ ਜਾਂ ਵਾਪਸ ਨਾ ਆਉਣ ਦਾ ਸਮਾਂ।

NepaliIND

अब म तिमीलाई बताउनेछु, हे भरतहरूका प्रधान, योगीहरू फर्कने वा नफर्किने समय।

MizoIND

Tunah chuan Aw Bharata hotu ber, Yogi-te an lo kir leh hun tur leh an lo kir leh loh hun tur chu ka hrilh ang che.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या --[जीवित अवस्थामें ही बन्धनसे छूटनेको 'सद्योमुक्ति' कहते हैं अर्थात् जिनको यहाँ ही भगवत्प्राप्ति हो गयी, भगवान्में अनन्यभक्ति हो गयी, अनन्यप्रेम हो गया, वे यहाँ ही परम संसिद्धिको प्राप्त हो जाते हैं। दूसरे जो साधक किसी सूक्ष्म वासनाके कारण ब्रह्मलोकमें जाकर क्रमशः ब्रह्माजीके साथ मुक्त हो जाते हैं, उनकी मुक्तिको 'क्रममुक्ति' कहते हैं। जो केवल सुख भोगनेके लिये ब्रह्मलोक आदि लोकोंमें जाते हैं, वे फिर लौटकर आते हैं। इसको 'पुनरावृत्ति' कहते हैं। सद्योमुक्तिका वर्णन तो पंद्रहवें श्लोकमें हो गया, पर क्रममुक्ति और पुनरावृत्तिका वर्णन करना बाकी रह गया। अतः इन दोनोंका वर्णन करनेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।]

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Sri Harikrishnadas Goenka

जिन्होंने ओंकारमें ब्रह्मबुद्धि सम्पादन की है जिन्हें कालान्तरमें मुक्ति मिलनेवाली है तथा यहाँ जिनका प्रकरण चल रहा है उन योगियोंकी ब्रह्मप्राप्तिके लिये आगेका मार्ग बताना चाहिये। अतः विवक्षित अर्थको बतलानेके लिये ही यत्र काले इत्यादि अगले श्लोक कहे जाते हैं। यहाँ पुनरावर्ती मार्गका वर्णन दूसरे मार्गकी स्तुति करनेके लिये किया गया है --, यत्र काले इस पदका व्यवधानयुक्त प्रयाताः इस अगले पदसे सम्बन्ध है। जिस कालमें अनावृत्तिको -- अपुनर्जन्मको और जिस कालमें आवृत्तिको -- उससे विपरीत पुनर्जन्मको योगी लोग पाते हैं। योगिनः इस पदसे कर्म करनेवाले कर्मी लोग भी योगी कहे गये हैं क्योंकि कर्मयोगेन योगिनाम् इस विशेषणसे कर्मी भी किसी गुणविशेषसे योगी हैं। तात्पर्य यह है कि अर्जुन जिस कालमें मरे हुए योगी लोग पुनर्जन्मको नहीं पाते और जिस कालमें मरे हुए लोग पुनर्जन्म पाते हैं मैं अब उस कालका वर्णन करता हूँ।

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Sri Anandgiri

ननु ज्ञानायत्ता परमपुरुषप्राप्तिरुक्ता। न च ज्ञानं मार्गमपेक्ष्य फलाय कल्पते विदुषो गत्युत्क्रान्तिनिषेधश्रुतेस्तथाच मार्गोक्तिरयुक्तेत्याशङ्क्य सगुणशरणानां तदुपदेशोऽर्थवानित्यभिप्रेत्याह -- प्रकृतानामिति। वक्तव्य इति यत्र काल इत्याद्युच्यत इति संबन्धः। स चेद्वक्तव्यस्तर्हि किमित्यध्यात्मादिभावेन सविशेषं ब्रह्म ध्यायतां फलाप्तये मूर्धन्यनाडीसंबद्धे देवयाने पथ्युपास्यत्वाय वक्तव्ये कालो निर्दिश्यते तत्राह -- विवक्षितेति। सोऽर्थो मार्गस्तदुक्तिशेषत्वेन कालोक्तिरित्यर्थः। पितृयाणमार्गोपन्यासस्तर्हि किमिति क्रियते तत्राह -- आवृत्तीमिति। मार्गान्तरस्यावृत्तिफलत्वादस्य चानावृत्तिफलत्वात्तदपेक्षया महीयानयमिति स्तुतिर्विवक्षितेति भावः। योगिन इति ध्यायिनां कर्मिणां च तन्त्रेणाभिधानमित्याह -- योगिन इति। कथं कर्मिषु योगिशब्दो वर्ततामित्याशङ्क्यानुष्ठानगुणयोगादित्याह -- कर्मिणस्त्विति। गुणतो योगिन इति संबन्धः। तत्रैव वाक्योपक्रमस्यानुकूल्यमाह -- कर्मयोगेने(णे)ति। अवशिष्टान्यक्षराणि व्याचक्षाणो वाक्यार्थमाह -- यत्रेति। योगिनो ध्यायिनोऽत्र विवक्षिताः आवृत्तावधिकृता योगिनः कर्मिण इति विभागः। कालप्राधान्येन मार्गद्वयोपन्यासमुपक्रम्य तमेव प्रधानीकृत्य देवयानं पन्थानमवतारयति -- तं कालमिति।

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Sri Dhanpati

यद्यपीहैवात्मसाक्षात्कारवतांन तस्य प्राणा उत्क्रामन्त्यत्रैव समवलीयन्ते इति श्रुत्या गत्युत्क्रान्तिनिषेधाद्वक्ष्यमाणमार्गोपदेशस्तदर्थ नोपयज्यते तथापि प्रणवावेशितबुद्धीना प्रकृतानां योगिनां सगुणोपासकानां क्रममुक्तिभाजां केन क्रमेण ब्रह्मप्राप्तिरित्याकाङ्क्षायामुत्तरमार्गे निरुपिव्ये उत्तरमार्गेण गता न निवर्तन्ते गतास्तु पुररावृत्तिभाज इत वक्तव्यस्तुत्यर्थे पितृयाणमार्गोपदेशः। यत्रेति। यत्र काले प्रयाता मृता योगिनो ध्यानयोगिन उपासका अनावृत्तिमपुनरावृत्तिं यान्ति कर्मयोगिनश्चावृत्तिं पुनरावृत्तिं यान्ति तं कालं वक्ष्यामि कर्मिणः योगित्वमनुष्ठानयोगात्कर्मयोगेन योगिनामित्युक्तत्वात् योगिन इत्यनेन प्रक्रान्ता ओमित्येकाक्षरमित्यादिक्तो ग्राह्यास्तेन पञ्चाग्निविद्योपासकानां देवयानमार्गेण ब्रह्मलोकं गतानामपि ततो निवृत्तौ न क्षतिः। कर्मयोगिनोऽप्यपासनासमुच्चितकर्मयोगिनो ग्राह्याः। भरतर्षभेति संबोधयन् भरता अपि निष्कामकर्मयोगसमुच्चितेनेपास नेनात्रैव साक्षात्कारं लब्ध्वा साक्षान्मुक्तिं देवयानमार्गेण गत्वा क्रमेण वा प्राप्तास्त्वं तु तेभ्यः श्रेष्ठस्तथैव भवितुं योग्योऽसीति सूचयति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yatrawhere
kāletime
tucertainly
anāvṛittimno return
āvṛittimreturn
chaand
evacertainly
yoginaḥa yogi
prayātāḥhaving departed
yāntiattain
tamthat
kālamtime
vakṣhyāmiI shall describe
bharataṛiṣhabha
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Bhagavad Gita · 8.22
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया। यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्

हे पृथानन्दन अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो अनन्यभक्तिसे प्राप्त होनेयोग्य है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 8.24
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः

जिस मार्गमें प्रकाशस्वरूप अग्निका अधिपति देवता, दिनका अधिपति देवता, शुक्लपक्षका अधिपति देवता, और छः महीनोंवाले उत्तरायणका अधिपति देवता है, शरीर छोड़कर उस मार्गसे गये हुए ब्रह्मवेत्ता पुरुष (पहले ब्रह्मलोकको प्राप्त होकर पीछे ब्रह्माजीके साथ) ब्रह्मको प्राप्त हो जाते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 8Shlok 23
Bhagavad Gita · Adhyay 8, Shlok 23
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! जिस काल अर्थात् मार्गमें शरीर छोड़कर गये हुए योगी अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर नहीं आते और (जिस मार्गमें गये हुए) आवृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर आते हैं, उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको मैं कहूँगा। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 23 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 23 का हिंदी अर्थ: "हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! जिस काल अर्थात् मार्गमें शरीर छोड़कर गये हुए योगी अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर नहीं आते और (जिस मार्गमें गये हुए) आवृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर आते हैं, उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको मैं कहूँगा। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 23?

Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 23 translates to: "Now I will tell you, O chief of the Bharatas, the times of departure at which the Yogis will return or not return. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 8, श्लोक 23 है जो Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga में संकलित है। हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! जिस काल अर्थात् मार्गमें शरीर छोड़कर गये हुए योगी अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर नहीं आते और (जिस मार्गमें गये हुए) आवृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर आते हैं, उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको मैं कहूँगा। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yatra kāle tvanāvṛittim āvṛittiṁ chaiva yoginaḥ" mean in English?

"yatra kāle tvanāvṛittim āvṛittiṁ chaiva yoginaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 23. Now I will tell you, O chief of the Bharatas, the times of departure at which the Yogis will return or not return. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.