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Sudarshana Chakra
Adhyay 8, Shlok 13
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्

(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो साधक 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

এক-অক্ষরযুক্ত ওম, ব্রহ্ম উচ্চারণ করে এবং আমাকে স্মরণ করে, যে দেহ ত্যাগ করে, সে পরম লক্ষ্য অর্জন করে।

SindhiIND

”اُم، برهمڻ“ جو هڪ اکر ڳائڻ ۽ مون کي ياد ڪرڻ سان، جيڪو جسم ڇڏي، وڃي ٿو، سو اعليٰ مقصد کي حاصل ڪري ٿو.

KannadaIND

ಬ್ರಹ್ಮನೆಂಬ ಏಕಾಕ್ಷರವನ್ನು ಉಚ್ಚರಿಸುತ್ತಾ, ನನ್ನನ್ನು ಸ್ಮರಿಸುತ್ತಾ, ದೇಹವನ್ನು ತ್ಯಜಿಸುವವನು ಪರಮೋದ್ದೇಶವನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ.

MalayalamIND

ഏകാക്ഷരമായ ഓം, ബ്രഹ്മം, എന്നെ സ്മരിച്ചുകൊണ്ട്, ശരീരം വിട്ട് പോകുന്നവൻ പരമമായ ലക്ഷ്യത്തെ പ്രാപിക്കുന്നു.

GujaratiIND

એકાક્ષરી ઓમ, બ્રહ્મનું ઉચ્ચારણ કરીને અને મારું સ્મરણ કરવાથી, જે શરીર છોડીને પ્રયાણ કરે છે, તે પરમ ધ્યેયને પ્રાપ્ત કરે છે.

MaithiliIND

एकाक्षर ॐ ब्रह्म के उच्चारण करके और मम स्मरण करके जो शरीर छोड़कर प्रस्थान करते हैं, वह परम लक्ष्य प्राप्त होता है |

NepaliIND

एक अक्षर ओम ब्रह्म उच्चारण गर्दा र मलाई याद गर्नाले देह त्यागेर परम लक्ष्य प्राप्त हुन्छ।

AssameseIND

একবৰ্ণৰ ওম ব্ৰহ্ম উচ্চাৰণ কৰি মোক স্মৰণ কৰি যিজনে দেহ এৰি গুচি যায়, তেওঁ পৰম লক্ষ্যত উপনীত হয়।

PunjabiIND

ਇੱਕ ਅੱਖਰ ਵਾਲੇ ਓਮ, ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਦਾ ਉਚਾਰਨ ਕਰਨ ਨਾਲ, ਅਤੇ ਮੈਨੂੰ ਯਾਦ ਕਰਨ ਨਾਲ, ਜੋ ਸਰੀਰ ਨੂੰ ਤਿਆਗਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਪਰਮ ਟੀਚੇ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ।

MarathiIND

ब्रह्म या एकच अक्षराचा उच्चार केल्याने आणि माझे स्मरण केल्याने, जो शरीर सोडून निघून जातो, तो परम ध्येयाची प्राप्ती करतो.

TamilIND

ஓம் என்ற ஒரே எழுத்தான பிரம்மத்தை உச்சரித்து, என்னை நினைவு செய்து, உடலை விட்டுப் பிரிந்தவர், பரம லட்சியத்தை அடைகிறார்.

TeluguIND

ఓం అనే ఏక అక్షరాన్ని ఉచ్చరించి, నన్ను స్మరిస్తూ, దేహాన్ని విడిచిపెట్టి, సర్వోత్కృష్టమైన లక్ష్యాన్ని చేరుకుంటాడు.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'सर्वद्वाराणि संयम्य'--(अन्तसमयमें) सम्पूर्ण इन्द्रियोंके द्वारोंका संयम कर ले अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-- इन पाँचों विषयोंसे श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और नासिका-- इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको तथा बोलना, ग्रहण करना, गमन करना, मूत्र-त्याग और मल-त्याग -- इन पाँचों क्रियाओंसे वाणी, हाथ, चरण, उपस्थ और गुदा--इन पाँचों कर्मेन्द्रियोंको सर्वथा हटा ले। इससे इन्द्रियाँ अपने स्थानमें रहेंगी।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

उसी जगह ( प्राणोंको ) स्थिर रखते हुए --, ओम् इस एक अक्षररूप ब्रह्मका अर्थात् ब्रह्मके स्वरूपका लक्ष्य करानेवाले ओंकारका उच्चारश करता हुआ और उसके अर्थरूप मुझ ईश्वररूपका चिन्तन करता हुआ जो पुरुष शरीरको छोड़कर जाता है अर्थात् मरता है वह इस प्रकार शरीरको छोड़कर जानेवाला परम गतिको पाता है। यहाँ त्यजन्देहम् यह विशेषण मरण का लक्ष्य करानेके लिये है। अभिप्राय यह कि देहके त्यागसे ही आत्माका मरण है स्वरूपके नाशसे नहीं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

यथोक्तयोगधारणार्थं प्रवृत्तो मूर्धनि प्राणमाधाय धारयन्किं कुर्यादित्याशङ्क्यानन्तरश्लोकमवतारयति -- तत्रैवेति। एकं च तदक्षरं चेत्येकाक्षरमोमित्येवंरूपं तत्कथं ब्रह्मेति विशिष्यते तत्राह -- ब्रह्मण इति। यः प्रयातीति मरणमुक्त्वा त्यजन्देहमिति ब्रुवता पुनरुक्तिराश्रिता स्यादित्याशङ्क्य विशेषणार्थं विवृणोति -- देहेति। एवमोंकारमुच्चारयन्नर्थं चाभिध्यायन्ध्याननिष्ठः स पुमानित्यर्थः। परमामिति गतिविशेषणं क्रममुक्तिविवक्षया द्रष्टव्यम्।

VaniSagar Research Vault
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Sri Dhanpati

ओमिति। एकं च तदक्षरं ब्रह्म ब्रह्मणोऽभिधानभूतम्। अभिधायकमितियावत्। ऊँकारं व्याहरन्नुच्चारयन् तदभिधेयं परमात्मानं मामनुस्मरन्ननुचिन्तयन्। यत्तु ओमितिव्याहरन् एकाक्षरं एकमक्षरं एकमद्वितीयमक्षरमविनाशि सर्वव्यापकं ब्रह्म मां ओमित्यस्यार्थं स्मरन्नितिकेचित्। यत्तु ओमितिव्याहरन् एकाक्षरं एकमक्षरं एकमद्वितीयमक्षरमावैनासि सर्वव्यापकं ब्रह्म मां ओमित्यस्यार्थं स्मरन्नितिकेचित्। तन्न।एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारः इत्युपक्रम्ययः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाचरेण परं पुरुषभिध्यायीत इतिश्रुत्यननुसरणेन तद्विस्मरणस्य स्पष्टवात्। श्रुतिस्थत्रिमात्रशब्दस्यैकशब्देन व्याख्यानं भगवता क्रियते। श्रुतौ त्रिमात्रेणेत्यस्य प्रथममकारेणाभिध्यायीत तत उकारेण ततो मकारेणेति भ्रमो मामूदित्येतद्तम्। ओमिति त्रिमात्रमेकमेवाक्षरं व्याहरन् नतु मात्राभेदेनाक्षरत्रयं पृथक्पृथग्व्याहारन्नित्यर्थः। किंच रुढिर्योगमपहन्तीति न्यायात् अक्षरशब्द ओंकारेणैव संबध्यते तस्य वर्णे रुढत्वात्। योगाश्रयणं तु रुढ्यसंभवे। तस्मात् श्रुत्यनुसारि व्यवहितान्वयरहितं रुढिपरित्यागदोषाग्रस्तं सर्वज्ञानां भाष्यकृतां व्याख्यानमेव प्रयाणकाल आत्मनो देहत्यागमात्रं प्रयाणं नतु स्वरुपनाशेनेत्यर्थः। देहं त्यजन्यः प्रयाति स परमां उत्कृष्टामबाध्यां गतिं स्थानं मोक्षाख्यं ब्रह्मलोकप्राप्तिक्रमेण याति अधिगच्छति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
omsacred syllable representing the formless aspect of God
itithus
ekaakṣharam
brahmathe Absolute Truth
vyāharanchanting
māmme (Shree Krishna)
anusmaranremembering
yaḥwho
prayātideparts
tyajanquitting
dehamthe body
saḥhe
yātiattains
paramāmthe supreme
gatimgoal
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Bhagavad Gita · 8.12
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्

(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 8.14
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः

हे पृथानन्दन ! अनन्यचित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य-निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उसको सुलभतासे प्राप्त हो जाता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 8Shlok 13
Bhagavad Gita · Adhyay 8, Shlok 13
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्

(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो साधक 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 13 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 13 का हिंदी अर्थ: "(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो साधक 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 13?

Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 13 translates to: "Uttering the one-syllabled Om, the Brahman, and remembering Me, he who departs, leaving the body, attains the Supreme Goal. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 8, श्लोक 13 है जो Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga में संकलित है। (इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो साधक 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "oṁ ityekākṣharaṁ brahma vyāharan mām anusmaran" mean in English?

"oṁ ityekākṣharaṁ brahma vyāharan mām anusmaran" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 13. Uttering the one-syllabled Om, the Brahman, and remembering Me, he who departs, leaving the body, attains the Supreme Goal. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.