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Sudarshana Chakra
Adhyay 8, Shlok 12
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्

(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। — VaniSagar

Global Translations

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BhojpuriIND

सब फाटक बंद क के, मन के दिल में बंद क के, आ जीवन-श्वास के माथा में स्थिर क के एकाग्रता के अभ्यास में लाग जाइब।

AssameseIND

সকলো দুৱাৰ বন্ধ কৰি মনক হৃদয়ত আৱদ্ধ কৰি মূৰত প্ৰাণ-শ্বাস স্থিৰ কৰি একাগ্ৰতাৰ অভ্যাসত লিপ্ত হওক।

ManipuriIND

ꯒꯦꯠ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛ ꯂꯣꯠꯁꯤꯟꯗꯨꯅꯥ, ꯋꯥꯈꯂꯕꯨ ꯊꯝꯃꯣꯌꯗꯥ ꯊꯃꯖꯤꯜꯂꯒꯥ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯀꯣꯛꯇꯥ ꯄꯨꯟꯁꯤꯒꯤ ꯊꯋꯥꯏ ꯌꯥꯑꯣꯕꯥ ꯑꯗꯨ ꯊꯃꯗꯨꯅꯥ, ꯄꯨꯛꯅꯤꯡ ꯆꯪꯕꯒꯤ ꯊꯧꯑꯣꯡꯗꯥ ꯌꯥꯑꯣꯕꯤꯌꯨ꯫

MalayalamIND

എല്ലാ വാതിലുകളും അടച്ച്, മനസ്സിനെ ഹൃദയത്തിൽ ഒതുക്കി, ജീവശ്വാസം തലയിൽ ഉറപ്പിച്ച്, ഏകാഗ്രതയുടെ പരിശീലനത്തിൽ ഏർപ്പെടുന്നു.

MarathiIND

सर्व दरवाजे बंद करून, मनाला हृदयात बंदिस्त करून, डोक्यात जीवन श्वास स्थिर करून, एकाग्रतेच्या अभ्यासात मग्न व्हा.

BengaliIND

সমস্ত দ্বার বন্ধ করে, চিত্তকে অন্তরে আবদ্ধ করে, মস্তকে জীবন-নিশ্বাস স্থির করে একাগ্রতার অনুশীলনে মগ্ন হও।

MizoIND

Kawngkhar zawng zawng khar vek a, rilru chu thinlunga khar a, lu-a nunna thaw siam that hnuah, ngaihtuahna seng (concentration) tihnaah inhmang rawh.

KannadaIND

ಎಲ್ಲಾ ದ್ವಾರಗಳನ್ನು ಮುಚ್ಚಿ, ಮನಸ್ಸನ್ನು ಹೃದಯದಲ್ಲಿ ಬಂಧಿಸಿ, ಮತ್ತು ಪ್ರಾಣವನ್ನು ತಲೆಯಲ್ಲಿ ಸ್ಥಿರಗೊಳಿಸಿ, ಏಕಾಗ್ರತೆಯ ಅಭ್ಯಾಸದಲ್ಲಿ ತೊಡಗುತ್ತಾರೆ.

GujaratiIND

બધા દરવાજા બંધ કરીને, મનને હૃદયમાં બંધ કરીને, અને જીવન-શ્વાસને મસ્તકમાં સ્થિર કરીને, એકાગ્રતાના અભ્યાસમાં વ્યસ્ત રહો.

TamilIND

எல்லா வாசல்களையும் அடைத்து, மனதை இதயத்தில் அடைத்து, உயிர் மூச்சை தலையில் நிலைநிறுத்தி, ஒருமுகப் பயிற்சியில் ஈடுபடுங்கள்.

TeluguIND

అన్ని ద్వారాలను మూసివేసి, మనస్సును హృదయంలో బంధించి, తలలో ప్రాణాధారాన్ని స్థిరపరచుకొని, ఏకాగ్రత సాధనలో నిమగ్నమై ఉండండి.

OdiaIND

ସମସ୍ତ ଫାଟକ ବନ୍ଦ କରି, ମନକୁ ହୃଦୟରେ ସୀମିତ ରଖି, ଏବଂ ଜୀବନ-ନିଶ୍ୱାସକୁ ମୁଣ୍ଡରେ ସ୍ଥିର କରି, ଏକାଗ୍ରତା ଅଭ୍ୟାସରେ ନିୟୋଜିତ |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'सर्वद्वाराणि संयम्य'--(अन्तसमयमें) सम्पूर्ण इन्द्रियोंके द्वारोंका संयम कर ले अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-- इन पाँचों विषयोंसे श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और नासिका-- इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको तथा बोलना, ग्रहण करना, गमन करना, मूत्र-त्याग और मल-त्याग-- इन पाँचों क्रियाओंसे वाणी, हाथ, चरण, उपस्थ और गुदा--इन पाँचों कर्मेन्द्रियोंको सर्वथा हटा ले। इससे इन्द्रियाँ अपने स्थानमें रहेंगी।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

यहाँ भी कविं पुराणमनुशासितारम् यदक्षरं वेदविदो वदन्ति इस प्रकार प्रतिपादन किये हुए परब्रह्मकी प्राप्तिका पूर्वोक्तरूपसे उपायभूत जो ओंकार है उसकी कालान्तरमें मुक्ितरूप फल देनेवाली वही उपासना योगधारणासहित कहनी है तथा उसके प्रसङ्ग और अनुप्रसङ्गमें आनेवाली बातें भी कहनी हैं। इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है --, समस्त द्वारोंका अर्थात् विषयोंकी उपलब्धिके द्वाररूप जो समस्त इन्द्रियगोलक हैं उन सबका संयम करके एवं मनको हृदयकमलमें निरुद्ध करके अर्थात् संकल्पविकल्पसे रहित करके फिर वशमें किये हुए मनके सहारेसे हृदयसे ऊपर जानेवाली नाडीद्वारा ऊपर चढ़कर अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापन करके योगधारणाको धारण करनेके लिये प्रवृत्त हुआ साधक ( परमगतिको प्राप्त होता है इस प्रकार अगले श्लोकसे सम्बन्ध है )।

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Sri Anandgiri

वक्ष्यमाणेनोपायेनेत्युक्तं व्यक्तीकुर्वन्नोंकारद्वारा ब्रह्मोपासनं श्रुत्युक्तमनुक्रामति -- स यो हेति। सत्यकामेनाभिध्यानफलं जिज्ञासुना भगवन्निति पिप्पलादः संबोध्याभिमुखीक्रियते। निपातौ तु प्रसिद्धमर्थमेव द्योतयन्तावभिध्यानस्य फलत्वेन कर्तव्यत्वमावेदयतः। मनुष्येषु मध्ये स योऽधिकृतो मनुष्यस्तत्प्रसिद्धमभिध्यानं यथा सिध्यति तथा सर्ववेदसारभूतमोङ्कारमाभिमुख्येन ध्यायीत। तच्चाभिध्यानमाप्रयाणादिति न्यायेन मरणान्तमनुष्ठेयम्। स चैवमनुतिष्ठन्प्रकृतेनाभिध्यायेन लोकानां जेतव्यानां बहुत्वात्कतमं लोकं जयतीति प्रश्नं पृष्टवते सत्यकामाय पिप्पलादनामा किलाचार्यः प्रतिवचनं प्रोवाच। तत्र प्रथममभिध्येयमोंकारं परापरब्रह्मत्वेन महीकरोति -- एतद्वा इति। त्रिमात्रेणाकारोकारमकारात्मकेनेति यावत्। योऽभिध्यायीत तमेव यथाभिध्यातं पुरुषमधिगच्छतीत्यादिवचनेनोपासनमोंकारस्योक्तमित्यर्थः। प्रश्नश्रुतिवत्कठवल्ली च तत्रैवार्थे प्रवृत्तेत्याह -- अन्यत्रेति। अव्यवधानेनोपनिषदां व्यवधानेन च कर्मश्रुतीनां परस्मिन्नात्मनि पर्यवसानं दर्शयति -- सर्व इति। तपसामपि सर्वेषां चित्तशुद्धिद्वारा तत्रैव पर्यवसानमित्याह -- तपांसीति। तस्यैव च ज्ञानार्थमष्टाङ्गं ब्रह्मचर्यं तत्र तत्र विहितमित्याह -- यदिच्छन्त इति। तस्य पदनीयस्य ब्रह्मणः संक्षेपेण कथनमोंकारद्वारकमिति कथयति -- ओमित्येतदिति। उदाहृतवचनानां तात्पर्यं दर्शयति -- परस्येति। तस्य वाचकरूपेण वा तस्यैव प्रतीकरूपेण वा विवक्षितस्योपासनं यथोक्तैर्वचनैरुक्तमिति संबन्धः। ननु परस्मिन्ब्रह्मणि तत्त्वमस्यादिवाक्यादेवं प्रतिपत्तिरधिकारिणो भविष्यति किमित्युपासनमोङ्कारस्योपन्यस्यते तत्राह -- परेति। यद्यपि विशिष्टस्याधिकारिणो विनैवोपासनमुपनिषद्भ्यो ब्रह्मणि प्रतिपत्तिरुत्पद्यते तथापि मन्दानां मध्यमानां च तद्धीहेतुत्वेनोङ्कारो विवक्षितस्तच्चोपासनं ब्रह्मदृष्ट्या श्रुतिभिरुपदिष्टमित्यर्थः। तस्य क्रममुक्तिफलत्वादनुष्ठेयत्वं सूचयति -- कालान्तरेति। भवत्येवं श्रुतीनां प्रवृत्तिस्तावता प्रकृते किमायातमित्याशङ्क्याह -- उक्तं यदिति। तदेवेहापि वक्तव्यमित्युत्तरेण संबन्धः। उपासनमेवोपास्योपन्यासद्वारा स्फोरयति -- कविमित्यादिना। पूर्वोक्तरूपेणेत्यभिधानत्वेन प्रतीकत्वेन चेत्यर्थः। श्रौतस्योपासनस्यानूद्यमानस्य सोपस्करत्वं संगिरते -- योगेति। तर्हि कथम् -- अनन्यचेताः सततम् इत्यादि वक्ष्यते तत्राह -- प्रसक्तेति। ओंकारोपासनं प्रसक्तं तदनन्तरं तत्फलमनुप्रसक्तं तद्द्वारा चापुनरावृत्त्यादि वक्तव्यकोटिनिविष्टमित्यर्थः। उक्तेऽर्थे समनन्तरग्रन्थमुत्थापयति -- इत्येवमर्थ इति। श्रोत्रादीनां कुत्र द्वारत्वं तत्राह -- उपलब्धाविति। तेषां संयमनं विषयेषु प्रवृत्तानां दोषदर्शनद्वारा तेभ्यो वैमुख्यापादनम्। कोऽयं मनसो हृदये निरोधस्तत्राह -- निष्प्रचारमिति। मनसो विषयाकारवृत्तिं निरुध्य हृदि वशीकृतस्य कार्यं दर्शयति -- तत्रेति। ऊर्ध्वमित्यत्रापि हृदयादिति संबध्यते। सर्वाण्युपलब्धिद्वाराणि श्रोत्रादीनि संनिरुध्य वायुमपि सर्वतो निगृह्य हृदयमानीय ततो निर्गतया सुषुम्नया कण्ठभ्रूमध्यललाटक्रमेण प्राणं मूर्धन्याधाय योगधारणामारूढो ब्रह्म व्याहरन्मां च तदर्थमनुस्मरन्परमां गतिं यातीति संबन्धः।

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Sri Dhanpati

सर्वाणि च शब्दादिविषयोपलब्धौ द्वाराणि श्रोत्रादीनीन्द्रियाणि संयम्य तत्तद्विषयेभ्यः संयमनं प्रत्याहरणं कत्वा हृदि हृत्कमले मनो निरुध्य तत्तद्विषयस्मरणान्निरोधनं च कृत्वा। निष्प्रचारमापाद्येतियावत्। तत्र वशीकृतेन मनसा हृद्यादूर्ध्यगामिन्या नाड्योर्ध्वं भूमिकाजयक्रमेणारुह्यात्मनः स्वस्य प्राणं मूर्धन्याधाय संस्थाप्य योगधारणां धारयितुमास्थितः प्रवृत्तः सन् आत्मनो योगधारणामिति वान्वयः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sarvadvārāṇi
sanyamyarestraining
manaḥthe mind
hṛidiin the heart region
nirudhyaconfining
chaand
mūrdhniin the head
ādhāyaestablish
ātmanaḥof the self
prāṇamthe life breath
āsthitaḥsituated (in)
yogadhāraṇām
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 8.11
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये

वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं और साधक जिसकी प्राप्तिकी इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, वह पद मैं तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगा। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 8.13
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्

(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो साधक 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 8Shlok 12
Bhagavad Gita · Adhyay 8, Shlok 12
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्

(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ: "(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 12?

Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 12 translates to: "Having closed all the gates, confined the mind in the heart, and fixed the life-breath in the head, engage in the practice of concentration. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधार" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 8, श्लोक 12 है जो Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga में संकलित है। (इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sarva-dvārāṇi sanyamya mano hṛidi nirudhya cha" mean in English?

"sarva-dvārāṇi sanyamya mano hṛidi nirudhya cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 12. Having closed all the gates, confined the mind in the heart, and fixed the life-breath in the head, engage in the practice of concentration. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.