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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 44
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः। जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते

वह (श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट मनुष्य) भोगोंके परवश होता हुआ भी पूर्वजन्ममें किये हुए अभ्यास-(साधन-) के कारण ही परमात्माकी तरफ खिंच जाता है; क्योंकि योग-(समता-) का जिज्ञासु भी वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंका अतिक्रमण कर जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

అదే పూర్వ అభ్యాసం ద్వారా, అతను తనకు తానుగా ఉన్నప్పటికీ భరించబడ్డాడు. కేవలం యోగాన్ని తెలుసుకోవాలనుకునేవాడు కూడా బ్రాహ్మణ పదానికి అతీతంగా ఉంటాడు.

TamilIND

அதே முந்தைய நடைமுறையால், அவர் தன்னை மீறி தாங்குகிறார். யோகத்தை அறிய விரும்புபவன் கூட பிராமண சொல்லுக்கு அப்பாற்பட்டவன்.

KannadaIND

ಅದೇ ಹಿಂದಿನ ಅಭ್ಯಾಸದಿಂದ, ಅವನು ತನ್ನ ಹೊರತಾಗಿಯೂ ಸಹಿಸಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಾನೆ. ಕೇವಲ ಯೋಗವನ್ನು ತಿಳಿದುಕೊಳ್ಳಲು ಬಯಸುವವನು ಕೂಡ ಬ್ರಾಹ್ಮಣ ಪದವನ್ನು ಮೀರುತ್ತಾನೆ.

GujaratiIND

તે જ ભૂતપૂર્વ પ્રથા દ્વારા, તે પોતે હોવા છતાં પણ જન્મે છે. યોગને જાણવાની ઈચ્છા રાખનાર પણ બ્રાહ્મણ શબ્દથી આગળ વધે છે.

OdiaIND

ସେହି ପୂର୍ବ ଅଭ୍ୟାସ ଦ୍ୱାରା, ସେ ନିଜ ସତ୍ତ୍ୱେ ବହନ କରନ୍ତି | ଏପରିକି ଯିଏ କେବଳ ଯୋଗ ଜାଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଶବ୍ଦଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ |

MalayalamIND

അതേ മുൻ അഭ്യാസത്താൽ, അവൻ തന്നെ ഉണ്ടായിരുന്നിട്ടും അവൻ വഹിക്കുന്നു. യോഗയെ അറിയാൻ ആഗ്രഹിക്കുന്നവൻ പോലും ബ്രാഹ്മണ പദത്തിനപ്പുറം പോകുന്നു.

NepaliIND

त्यही पुरानो अभ्यासद्वारा, ऊ आफैंमा पनि जन्मन्छ। जो केवल योग जान्न चाहन्छ उसले पनि ब्राह्मण शब्द भन्दा पर जान्छ।

MarathiIND

त्याच पूर्वीच्या सरावाने, तो स्वत: असूनही जन्माला येतो. ज्याला केवळ योग जाणून घ्यायचा आहे तोही ब्राह्मण शब्दाच्या पलीकडे जातो.

MaithiliIND

ओही पूर्वक अभ्यास सँ ओ अपना रहितो सहन क' लैत छथि । जे मात्र योग जानबाक इच्छा रखैत अछि ओ सेहो ब्राह्मण शब्द सँ आगू बढ़ि जाइत अछि |

MizoIND

Chu thil tih dan hlui tho chuan amah ngei pawh ni se, a phur reng a ni. Yoga hriat duh mai mai pawh hian Brahmanic thumal a pel a ni.

AssameseIND

সেই একেটা পূৰ্বৰ অভ্যাসেয়েই তেওঁক নিজৰ সত্ত্বেও বহন কৰা হয়। আনকি যিজনে কেৱল যোগক জানিব বিচাৰে তেওঁও ব্ৰাহ্মণ্য শব্দৰ বাহিৰলৈ যায়।

BhojpuriIND

उहे पहिले के प्रथा से ऊ अपना बावजूद सहन हो जाला. जे खाली योग के जाने के चाहत बा उहो ब्राह्मण शब्द से परे हो जाला।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः--योगियोंके कुलमें जन्म लेनेवाले योगभ्रष्टको जैसी साधनकी सुविधा मिलती है, जैसा वायुमण्डल मिलता है, जैसा सङ्ग मिलता है, जैसी शिक्षा मिलती है, वैसी साधनकी सुविधा, वायुमण्डल, सङ्ग, शिक्षा आदि श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवालोंकोनहीं मिलती। परन्तु स्वर्गादि लोकोंमें जानेसे पहले मनुष्यजन्ममें जितना योगका साधन किया है, सांसारिक भोगोंका त्याग किया है, उसके अन्तःकरणमें जितने अच्छे संस्कार पड़े हैं, उस मनुष्य-जन्ममें किये हुए अभ्यासके कारण ही भोगोंमें आसक्त होता हुआ भी वह परमात्माकी तरफ जबर्दस्ती खिंच जाता है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

पहले शरीरकी बुद्धिसे उसका संयोग कैसे होता है सो कहते हैं क्योंकि वह योगभ्रष्ट पुरुष परवश हुआ भी पूर्वाभ्यासके द्वारा अर्थात् जो पहले जन्ममें किया हुआ अभ्यास है उस अति बलवान् पूर्वाभ्यासके द्वारा योगकी ओर खींच लिया जाता है। यदि योगाभ्यासके संस्कारोंकी अपेक्षा अधिक बलवान् अधर्मादि कर्म न किये हों तो वह योगाभ्यासजनित संस्कारोंसे खिंच जाता है और यदि अधिक बलवान् अधर्म किया हुआ होता है तो उससे योगजन्य संस्कार भी दब ही जाते हैं। परंतु उस पापकर्मका क्षय होनेपर योगजन्य संस्कार स्वयं ही अपना कार्य आरम्भ कर देता है। बहुत बालतक दबे रहनेपर भी उसका नाश नहीं होता। जो योगका जिज्ञासु भी है अर्थात् जो योगके स्वरूपको जाननेकी इच्छा करके योगमार्गमें लगा हुआ योगभ्रष्ट संन्यासी है वह भी शब्दब्रह्मको अर्थात् वेदमें कहे हुए कर्मफलको अतिक्रम कर जाता है फिर जो योगको जानकर उसमें स्थित हुआ अभ्यास करता है उसका तो कहना ही क्या है। यहाँ प्रसंगकी शक्तिसे जिज्ञासुका अर्थ संन्यासी किया गया है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

यदि पूर्वसंस्कारोऽस्येच्छामुपनयन्न प्रवर्तयति तथाच प्रवृत्तिरनिच्छया स्यादित्याशङ्क्याह पूर्वेति। स हि योगभ्रष्टः समनन्तरजन्मकृतसंस्कारवशादुत्तरस्मिञ्जन्मनि अनिच्छन्नपि योगं प्रत्येवाकृष्टो भवतीत्यर्थः। तत्र कैमुतिकन्यायं सूचयति जिज्ञासुरिति। पूर्वार्धं विभजते यः पूर्वेति। तस्मान्नेच्छया तस्य प्रवृत्तिरिति शेषः। योगभ्रष्टस्याधर्मादिप्रतिबन्धेऽपि तर्हि पूर्वाभ्यासवशाद्बुद्धिसंबन्धः स्यादित्याशङ्क्याह नेत्यादिना। यदि योगभ्रष्टेन योगाभ्यासजनितसंस्कारप्राबल्यात्प्रबलमरधर्मप्रभेदरूपं कर्म न कृतं स्यात्तदा तेन संस्कारेण वशीकृतः सन्निच्छादिरहितोऽपि बुद्धिसंबन्धभाग्भवतीत्यर्थः। विपक्षे योगसंस्कारस्याभिभूतत्वान्न कार्यारम्भकत्वमित्याह अधर्मश्चेदिति। योगजसंस्कारस्याधर्माभिभूतस्य कार्यमकृत्वैवाभिभावकप्राबल्ये प्रणाशः स्यादित्याशङ्क्याह तत्क्षये त्विति। कालव्यवधानान्निवृत्तिं शङ्कित्वोक्तं नेति। तृणजलायुकादृष्टान्तश्रुत्या संस्कारस्य दीर्घतायाः समधिगतत्वादिति भावः। कैमुतिकन्यायोक्तिपरमुत्तरार्धं विभजते जिज्ञासुरपीत्यादिना। अत्रापि संन्यासीति विशेषणं पूर्ववदवधेयमित्याह सामर्थ्यादिति। नहि कर्मी कर्ममार्गे प्रवृत्तस्ततो भ्रष्टः शङ्कितुं शक्यते अतः संन्यासी पूर्वोक्तैर्विशेषणैर्विशिष्टो योगभ्रष्टोऽभीष्टः सोऽपि वैदिकं कर्म तत्फलं चातिवर्तते किमुत योगं बुद्ध्वा तन्निष्ठः सदाभ्यासं कुर्वन्कर्म तत्फलं चातिवर्तत इति वक्तव्यमिति योजना। योगनिष्ठस्य कर्मतत्फलातिवर्तनं ततोऽधिकफलावाप्तिर्विवक्ष्यते।

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Sri Dhanpati

कथंभूतं बुद्धिसंयोगं लभत इत्यपेक्षायां तेनैव पूर्वाभ्यासेनावशस्यापि योगभ्रष्टस्य बुद्धिंप्रत्येवाहरणरुपमित्याह पूर्वेति। यः पूर्व जन्मानि कृतोऽभ्यासः तेनैव बलवता हि यसमादवशः पित्राद्यधीनोऽपि सः योगभ्रष्टो ह्नियते स्ववशीक्रियते योगाभ्याससंस्कारात् बलवत्तरस्याधर्मस्य प्रतिबन्धकस्याभावात् प्रतिबन्धे सत्यपि पूर्वाभ्यासस्तत्क्षयः प्रतीक्षते। ननु तस्य नाशोऽस्ति। एतदेव कैमुत्येन द्रढयति। योगस्य जिज्ञासुर्नतु यतमानो योगी सोऽपि शब्दब्रह्म वेदोक्तकर्मानुष्ठानफलमतिवर्तते मुञ्चति किमुत यो योगं ज्ञात्वा तन्निष्ठोभ्यासं कुर्यात्। एतेन ननु योगिनां दरिद्राणां कुले जातस्य बुद्धिसंयोगोऽस्तु नाम शुचीनां श्रीमतां कुले उत्पन्नस्य द्रव्यजनितभोगादिप्रतिबन्धवशाद्धुद्धिसंयोगो न भविष्यतीत्याङ्कापि परास्ता।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
pūrvapast
abhyāsenadiscipline
tenaby that
evacertainly
hriyateis attracted
hisurely
avaśhaḥhelplessly
apialthough
saḥthat person
jijñāsuḥinquisitive
apieven
yogasyaabout yog
śhabdabrahma
ativartatetranscends
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.43
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्। यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन

हे कुरुनन्दन ! वहाँपर उसको पूर्वजन्मकृत साधन-सम्पत्ति अनायास ही प्राप्त हो जाती है। फिर उससे वह साधनकी सिद्धिके विषयमें पुनः विशेषतासे यत्न करता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.45
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्

परन्तु जो योगी प्रयत्नपूर्वक यत्न करता है और जिसके पाप नष्ट हो गये हैं तथा जो अनेक जन्मोंसे सिद्ध हुआ है, वह योगी फिर परमगतिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 44
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 44
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः। जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते

वह (श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट मनुष्य) भोगोंके परवश होता हुआ भी पूर्वजन्ममें किये हुए अभ्यास-(साधन-) के कारण ही परमात्माकी तरफ खिंच जाता है; क्योंकि योग-(समता-) का जिज्ञासु भी वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंका अतिक्रमण कर जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 44 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 44 का हिंदी अर्थ: "वह (श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट मनुष्य) भोगोंके परवश होता हुआ भी पूर्वजन्ममें किये हुए अभ्यास-(साधन-) के कारण ही परमात्माकी तरफ खिंच जाता है; क्योंकि योग-(समता-) का जिज्ञासु भी वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंका अतिक्रमण कर जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 44?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 44 translates to: "By that same former practice, he is borne on in spite of himself. Even he who merely wishes to know Yoga goes beyond the Brahmanic word. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः। जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 44 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। वह (श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट मनुष्य) भोगोंके परवश होता हुआ भी पूर्वजन्ममें किये हुए अभ्यास-(साधन-) के कारण ही परमात्माकी तरफ खिंच जाता है; क्योंकि योग-(समता-) का जिज्ञासु भी वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंका अतिक्रमण कर जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśho ’pi saḥ" mean in English?

"pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśho ’pi saḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 44. By that same former practice, he is borne on in spite of himself. Even he who merely wishes to know Yoga goes beyond the Brahmanic word. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.