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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 38
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति। अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि

हे महाबाहो ! संसारके आश्रयसे रहित और परमात्मप्राप्तिके मार्गमें मोहित अर्थात् विचलित -- इस तरह दोनों ओरसे भ्रष्ट हुआ साधक क्या छिन्न-भिन्न बादलकी तरह नष्ट तो नहीं हो जाता ? — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

రెండింటిలోనుండి పడిపోయినవాడు, బరువైన మేఘంలా, ఆసరా లేనివాడా, ఓ పరాక్రమవంతుడా, బ్రహ్మమార్గంలో భ్రమపడి నశించలేదా?

MarathiIND

दोन्हींपासून गळून पडलेला, ब्रह्ममार्गात भ्रमित झालेला, हे पराक्रमी, निराधार, भाड्याच्या ढगासारखा तो नाश पावत नाही का?

GujaratiIND

બ્રહ્મના માર્ગે ભ્રમિત, હે પરાક્રમી, આધારહીન, બંનેમાંથી પડી ગયેલા, શું તે ભાડાના વાદળની જેમ નાશ પામતો નથી?

MalayalamIND

രണ്ടിൽ നിന്നും വീണവൻ, ഒരു മേഘം പോലെ നശിക്കുന്നില്ലേ, പിന്തുണയില്ലാത്തവനേ, ഹേ ബലവാനായ, ബ്രഹ്മത്തിൻ്റെ പാതയിൽ വഞ്ചിതനായി?

KannadaIND

ಎರಡರಿಂದಲೂ ಬಿದ್ದ, ಅವನು ಬಾಡುವ ಮೋಡದಂತೆ ನಾಶವಾಗುವುದಿಲ್ಲವೇ, ಬೆಂಬಲವಿಲ್ಲದ, ಓ ಬಲಶಾಲಿ, ಬ್ರಹ್ಮನ ಮಾರ್ಗದಲ್ಲಿ ಭ್ರಮೆಗೊಂಡ?

NepaliIND

दुबैबाट पतित, ब्रह्म मार्गमा मोहित, हे पराक्रमी, निराधार, निराधार बादल जस्तै नाश हुँदैन?

SindhiIND

ٻنھي کان ڦاٽي، ڇا ھو ڪڪر جي ڪڪر وانگر ناس نه ٿيو، اي بي وس، اي طاقتور، برهمڻ جي واٽ تي ڀلجي ويو؟

TamilIND

இரண்டிலிருந்தும் வீழ்ந்தவன், வாடை மேகம் போல், ஆதரவற்றவனே, வலிமைமிக்க கரங்களை உடையவனே, பிரம்மனின் பாதையில் ஏமாற்றப்பட்டவனே, அவன் அழிவதில்லையா?

PunjabiIND

ਦੋਨਾਂ ਤੋਂ ਡਿੱਗਿਆ ਹੋਇਆ, ਕੀ ਉਹ ਕਿਰਾਇਆ ਦੇ ਬੱਦਲ ਵਾਂਗ ਨਾਸ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ, ਆਸਰਾ ਰਹਿਤ, ਹੇ ਬਲਵੰਤ, ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਦੇ ਮਾਰਗ ਵਿੱਚ ਕੁਰਾਹੇ ਪਏ ਹੋਏ?

BengaliIND

উভয় হইতে পতিত, সে কি খাজনা মেঘের মত বিনষ্ট হয় না, অসহায়, হে পরাক্রমশালী, ব্রাহ্মণের পথে প্রতারিত?

OdiaIND

ଉଭୟଙ୍କଠାରୁ ପତିତ, ସେ ଭଡ଼ା ମେଘ ପରି ବିନଷ୍ଟ ହୁଏ ନାହିଁ, ଅସହାୟ, ହେ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ସଶସ୍ତ୍ର, ବ୍ରାହ୍ମଣ ରାସ୍ତାରେ ଭ୍ରାନ୍ତ?

KonkaniIND

दोगांयनी पडून तो भाड्याच्या मेघा भशेन नाश ना, आदारहीन, हे पराक्रमी, ब्रह्ममार्गाचेर मोहित?

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--[अर्जुनने पूर्वोक्त श्लोकमें कां गतिं कृष्ण गच्छति कहकर जो बात पूछी थी, उसीका इस श्लोकमें खुलासा पूछते हैं।]

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

हे महाबाहो वह आश्रयरहित और ब्रह्मप्राप्तिके मार्गमें मोहित हुआ पुरुष कर्ममार्ग और ज्ञानमार्ग दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर क्या छिन्नभिन्न हुए बादलकी भाँति नष्ट हो जाता है अथवा नष्ट नहीं होता।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

प्रश्नमेव विवृणोति कच्चिदिति। प्रशस्तप्रश्नार्थत्वं कच्चिदित्यस्याङ्गीकृत्य व्याचष्टे किमिति। उभयविभ्रष्टत्वं स्पष्टयति कर्मेत्यादिना। वायुना छिन्नं विशकलितमभ्रं यथा नश्यति तद्वदित्याह छिन्नेति। नाशाशङ्कानिमित्तमाह निराश्रय इति। कर्ममार्गरूपावष्टम्भाभावेऽपि ज्ञानमार्गावष्टम्भस्तस्य भविष्यतीत्याशङ्क्याह विमूढः सन्निति। नहि कर्मिणं प्रतीयमाशङ्का युक्ताभिलाषं त्यक्त्वेश्वरे समर्प्या समर्प्य वा कर्मानुतिष्ठतो निरुपचारेण तद्भ्रंशवचनासंभवात्सर्वकर्मसंन्यासिनस्तु विहितानां त्यागाज्ज्ञानोपायाच्चविच्युतेरनर्थप्राप्तिशङ्का युक्तेति भावः।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

स्वाशयं स्फटयति कच्चिदिति प्रश्ने। उभयविभ्रष्टः सर्वकर्मणां त्यागात् कर्ममार्गात् सभ्यग्दर्शनालाभाद्योगाच्च विभ्रष्टः स किं नश्यत्युत न नश्यति।थ उभयविभ्रष्टत्वमेव दर्शयति द्वाभ्यां विशेषणाभ्याम्। अप्रतिष्ठो निराश्रयः कर्ममार्गरुपाश्रयरहितः। ब्रह्मणः पथि ब्रह्मप्राप्तिमार्गे विमूढः ज्ञानमार्गावष्टम्भशून्यः। उभयविभ्रष्टस्य नाशे दृष्टान्तमाह। छिन्नभ्रमिव यथा पूर्वस्मादभ्राद्विच्छिनोऽभ्रैकदेशः परमप्तिमार्गे विमूढः ज्ञानमार्गावष्टम्भशून्यः। उभयविभ्रष्टस्य नाशे दृष्टान्माह। छिन्नाभ्रमिव यथा पूर्वस्मादभ्राद्विच्छिनोऽभ्रैकदेशः परमभ्रमप्राप्य मध्य एवनश्यति तद्वत्। महाबाहो इतिसंबोधयन् भक्तोद्धारणसमर्थैरति प्रबलैर्बाहुभिर्युक्ते त्वयि सति तस्य नाशो न युक्त इति द्योतयति। यत्तु प्रश्नमेव विवृणोति। कश्चिदितिकिमित्यस्मिन्नर्थे। नश्यति नरकं प्राप्नोति। किंवा तस्य गत्यन्तरमस्तीति किमापेक्षितं पक्षान्तरं पूरणीयम्। ननु नरकपातान्तस्तस्य को वापराध इत्याशङ्क्याह ब्रह्मणः पथि विमूढ इति। ननु कृतानां काम्यकर्मणां तथा चित्तशुद्य्धर्थमनुष्ठितानामावश्यककर्मणां फलं प्राप्स्यति कुतोऽस्य नरकप्राप्तिरित्याशङ्क्याहउयविभ्रष्ट इति। कृतौरावश्यककर्मबिश्चित्तशुद्धौ जातायामपि तदुपेयमोचकज्ञानपरिभिश्चित्तशुद्धौ जातायामपि तदुपेयमोचकज्ञानपरिभ्रष्टः किमन्यतेषामावश्यकर्कणां फलं प्राप्नुयात् तथा स्वात्मानं कर्तृत्वादिरहितं कर्मण्यनधिकारिणं निश्चित्य ब्रह्मार्पणं ब्रह्मविरित्याद्युक्तमार्गेण शुद्य्धार्थ कर्माचरणात् कथं वा कर्मण्यधिकारी स्यादित्युभयविभ्रष्टपदस्यार्थः। ननु किमित्येवं ब्रह्मणः पथि तस्य विमूढतेत्यत उक्तमप्रतिष्ठ इति। प्रतिष्ठा क्षुद्र पुरुषार्थपरित्यागेन परमार्थशक्तिलक्षणा तद्रहित इत्यर्थ इतीतरैःस कल्पितं तदसत्। काम्यकर्मणां फलस्यावश्यंभावेनोभयभ्रष्टत्वाभावात् तथा स्वात्मानमित्यादेः किं मम मोक्षेण काम्यादीनेव तत्तल्लोकप्राप्तये करिष्यामीति स्वपूर्वग्रन्थविरुद्धत्वात्। नहि काम्यकर्ममार्गे प्रवृत्तस्ततो भ्रष्ट इति शङ्कितुं शक्यते अतः संन्यातीति भाष्यटीकायामुक्त्त्वाच्च। एतेनाप्रतिष्ठशब्दार्थो.़पि प्रत्युक्तः। विमूढो ब्रह्मणः पथीत्यनेनैव परमपुरुषार्थाशक्तेरुक्तत्वात्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
kachchitwhether
nanot
ubhayaboth
vibhraṣhṭaḥdeviated from
chhinnabroken
abhramcloud
ivalike
naśhyatiperishes
apratiṣhṭhaḥwithout any support
mahābāho
vimūḍhaḥbewildered
brahmaṇaḥof God
pathione on the path
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Bhagavad Gita · 6.37
अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति

हे कृष्ण ! जिसकी साधनमें श्रद्धा है, पर जिसका प्रयत्न शिथिल है, वह अन्तसमयमें अगर योगसे विचलितमना हो जाय, तो वह योगसिद्धिको प्राप्त न करके किस गतिको चला जाता है? — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.39
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः। त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते

हे कृष्ण! मेरे इस सन्देहका सर्वथा छेदन करनेके लिये आप ही योग्य हैं; क्योंकि इस संशयका छेदन करनेवाला आपके सिवाय दूसरा कोई हो नहीं सकता। — VaniSagar

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कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति। अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि

हे महाबाहो ! संसारके आश्रयसे रहित और परमात्मप्राप्तिके मार्गमें मोहित अर्थात् विचलित -- इस तरह दोनों ओरसे भ्रष्ट हुआ साधक क्या छिन्न-भिन्न बादलकी तरह नष्ट तो नहीं हो जाता ? — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 38 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 38 का हिंदी अर्थ: "हे महाबाहो ! संसारके आश्रयसे रहित और परमात्मप्राप्तिके मार्गमें मोहित अर्थात् विचलित -- इस तरह दोनों ओरसे भ्रष्ट हुआ साधक क्या छिन्न-भिन्न बादलकी तरह नष्ट तो नहीं हो जाता ? — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 38?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 38 translates to: "Fallen from both, does he not perish like a rent cloud, supportless, O mighty-armed one, deluded on the path of Brahman? — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति। अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 38 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। हे महाबाहो ! संसारके आश्रयसे रहित और परमात्मप्राप्तिके मार्गमें मोहित अर्थात् विचलित -- इस तरह दोनों ओरसे भ्रष्ट हुआ साधक क्या छिन्न-भिन्न बादलकी तरह नष्ट तो नहीं हो जाता ? — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "kachchin nobhaya-vibhraṣhṭaśh chhinnābhram iva naśhyati" mean in English?

"kachchin nobhaya-vibhraṣhṭaśh chhinnābhram iva naśhyati" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 38. Fallen from both, does he not perish like a rent cloud, supportless, O mighty-armed one, deluded on the path of Brahman? — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.