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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 39
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः। त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते

हे कृष्ण! मेरे इस सन्देहका सर्वथा छेदन करनेके लिये आप ही योग्य हैं; क्योंकि इस संशयका छेदन करनेवाला आपके सिवाय दूसरा कोई हो नहीं सकता। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

ఓ కృష్ణా, దయచేసి నా ఈ సందేహాన్ని పూర్తిగా నివృత్తి చేయండి, అలా చేయడం నీకు తప్ప ఎవరికీ సాధ్యం కాదు.

TamilIND

ஓ கிருஷ்ணா, தயவு செய்து என்னுடைய இந்த சந்தேகத்தை முற்றிலும் நீக்கிவிடு, ஏனென்றால் அது உன்னைத் தவிர வேறு யாருக்கும் சாத்தியமில்லை.

GujaratiIND

હે કૃષ્ણ, કૃપા કરીને મારી આ શંકાને સંપૂર્ણપણે દૂર કરો, કારણ કે તમારા સિવાય કોઈના માટે તે શક્ય નથી.

OdiaIND

ହେ କୃଷ୍ଣ, ଦୟାକରି ମୋର ଏହି ସନ୍ଦେହକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ରୂପେ ଦୂର କର, କାରଣ ତୁମ ବ୍ୟତୀତ ଅନ୍ୟ କାହା ପାଇଁ ଏହା ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ |

MaithiliIND

हे कृष्ण, हमर एहि संदेह केँ पूर्णतः दूर करू, कारण अहाँक अतिरिक्त ककरो लेल ई संभव नहि अछि ।

AssameseIND

হে কৃষ্ণ, মোৰ এই সন্দেহ সম্পূৰ্ণৰূপে দূৰ কৰা, কাৰণ আপোনাৰ বাহিৰে আন কাৰোবাৰ বাবে সেয়া সম্ভৱ নহয়।

MarathiIND

हे कृष्णा, कृपा करून माझी ही शंका पूर्णपणे दूर करा, कारण असे करणे तुझ्याशिवाय कोणालाच शक्य नाही.

MalayalamIND

ഹേ കൃഷ്ണാ, എൻ്റെ ഈ സംശയം പൂർണ്ണമായി ദൂരീകരിക്കണമേ, അങ്ങല്ലാതെ മറ്റാർക്കും അത് സാധ്യമല്ല.

KannadaIND

ಓ ಕೃಷ್ಣಾ, ದಯವಿಟ್ಟು ನನ್ನ ಈ ಸಂದೇಹವನ್ನು ಸಂಪೂರ್ಣವಾಗಿ ಹೋಗಲಾಡಿಸು, ಏಕೆಂದರೆ ಅದು ನಿನ್ನನ್ನು ಹೊರತುಪಡಿಸಿ ಬೇರೆ ಯಾರಿಗೂ ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲ.

BengaliIND

হে কৃষ্ণ, দয়া করে আমার এই সংশয় সম্পূর্ণরূপে দূর করুন, কারণ আপনি ছাড়া অন্য কারো পক্ষে তা করা সম্ভব নয়।

DogriIND

हे कृष्ण, मेरे इस शक गी पूरी चाल्ली दूर करो, कीजे तुंदे सिवाय होर कुसै दा बी एह् संभव नेईं ऐ।

NepaliIND

हे कृष्ण, मेरो यो शङ्कालाई पूर्णरूपले हटाइदिनुहोस्, किनकि यो तपाईं बाहेक अरू कसैको लागि सम्भव छैन।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य होनेसे साधक पापकर्मोंसे तो सर्वथा रहित हो गया, इसलिये वह नरकोंमें तो जा ही नहीं सकता और स्वर्गका ध्येय न रहनेसे स्वर्गमें भी जा नहीं सकता। मनुष्ययोनिमें आनेका उसका उद्देश्य नहीं है, इसलिये वह उसमें भी नहीं आ सकता और परमात्मप्राप्तिके साधनसे भी विचलित हो गया। ऐसा साधक क्या छिन्न-भिन्न बादलकी तरह नष्ट तो नहीं हो जाता? यह मेरा संशय है। 'त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते' इस संशयका सर्वथा छेदन करनेवाला अन्य कोई हो नहीं सकता। इसका तात्पर्य है कि शास्त्रकी कोई गुत्थी हो, शास्त्रका कोई गहन विषय हो, कोई ऐसा कठिन पंक्ति हो, जिसका अर्थ न लगता हो, तो उसको शास्त्रोंका ज्ञाता कोई विद्वान् भी समझा सकता है। परन्तु योगभ्रष्टकी क्या गति होती है? इसका उत्तर वह नहीं दे सकता। हाँ, योगी कुछ हदतक इसको जान सकता है, पर वह सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति-आगतिको अर्थात् जाने और आनेको नहीं जान सकता क्योंकि वह 'युञ्जान योगी' है अर्थात् अभ्यास करके योगी बना है। अतः वह वहींतक जान सकता है, जहाँतक उसकी जाननेकी हद है। परन्तु आप तो 'युक्त योगी' हैं अर्थात् आप बिना अभ्यास, परिश्रमके सर्वत्र सब कुछ जाननेवाले हैं। आपके समान जानकार कोई हो सकता ही नहीं। आप साक्षात् भगवान् हैं और सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति-आगतिको जाननेवाले हैं । अतः इस योगभ्रष्टके गतिविषयक प्रश्नका उत्तर आप ही दे सकते हैं। आप ही मेरे इस संशयको दूर कर सकते हैं। सम्बन्ध--अड़तीसवें श्लोकमें अर्जुनने शङ्का की थी कि संसारसे और साधनसे च्युत हुए साधकका कहीं पतन तो नहीं हो जाता? उसका समाधान करनेके लिये भगवान् आगेका श्लोक कहते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

हे कृष्ण मेरे इस संशयको निःशेषतासे काटनेके लिये अर्थात् नष्ट करनेके लिये आप हीसमर्थ हैं क्योंकि आपको छोड़कर दूसरा कोई ऋषि या देवता इस संशयका नाश करनेवाला सम्भव नहीं है। अतः आपको ही इसका नाश करना चाहिये यह अभिप्राय है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

यथोपदर्शितसंशयापाकरणार्थमर्जुनो भगवन्तं प्रेरयन्नाह एतदिति। मत्तोऽन्यः कश्चिदृषिर्वा देवो वा त्वदीयं संशयं छेत्स्यतीत्याशङ्क्याह त्वदन्य इति। अन्यस्य संशयच्छेत्तुरभावे फलितमाह अत इति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

संशयमुक्त्वा तच्छेदनं प्रार्थयते एतदिति। एतं मे मम संशयं हे कृष्ण छेत्तुमपनेतुमर्हस्यशेषतः। उक्तएव कृष्णपदाभिप्रायोऽत्रापि द्रष्टव्यः। नन्वन्यः कश्चिद्देवो वा ऋषिर्वा छेत्स्यति किमेवंप्रार्थनयेत्यत आह। त्वत्तः कृष्णादधिकारिणमाकृष्य तत्तस्थानप्रापकात्तत्तत्कर्मफलप्रदातुः सर्वेश्वरात्सर्वज्ञादन्योऽनीश्वरोऽसर्वज्ञ कश्चिदृषिर्वा देवो वास्य संशयस्य छेत्ताऽपनेता हि यस्मान्न संभवत्यतः त्वमेव छेत्तुमर्हसीत्यर्थः। यत्तु एतन्मे पृष्टं हे कृष्ण असंशयं यथा भवति तथाऽशेषतः सर्वात्मना छेत्तुं निराकर्तुमर्हसीति तन्न। संशयस्यास्येत्यननुरोधप्रसङ्गात्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
etatthis
memy
sanśhayamdoubt
kṛiṣhṇaKrishna
chhettumto dispel
arhasiyou can
aśheṣhataḥcompletely
tvatthan you
anyaḥother
sanśhayasyaof doubt
asyathis
chhettāa dispeller
nanever
hicertainly
upapadyateis fit
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Bhagavad Gita · 6.38
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति। अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि

हे महाबाहो ! संसारके आश्रयसे रहित और परमात्मप्राप्तिके मार्गमें मोहित अर्थात् विचलित -- इस तरह दोनों ओरसे भ्रष्ट हुआ साधक क्या छिन्न-भिन्न बादलकी तरह नष्ट तो नहीं हो जाता ? — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.40
श्री भगवानुवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। नहि कल्याणकृत्कश्िचद्दुर्गतिं तात गच्छति

श्रीभगवान् बोले -- हे पृथानन्दन ! उसका न तो इस लोकमें और न परलोकमें ही विनाश होता है; क्योंकि हे प्यारे ! कल्याणकारी काम करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं जाता। — VaniSagar

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Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 39
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः। त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते

हे कृष्ण! मेरे इस सन्देहका सर्वथा छेदन करनेके लिये आप ही योग्य हैं; क्योंकि इस संशयका छेदन करनेवाला आपके सिवाय दूसरा कोई हो नहीं सकता। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 39 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 39 का हिंदी अर्थ: "हे कृष्ण! मेरे इस सन्देहका सर्वथा छेदन करनेके लिये आप ही योग्य हैं; क्योंकि इस संशयका छेदन करनेवाला आपके सिवाय दूसरा कोई हो नहीं सकता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 39?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 39 translates to: "O Krishna, please completely dispel this doubt of mine, for it is not possible for anyone but You to do so. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः। त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 39 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। हे कृष्ण! मेरे इस सन्देहका सर्वथा छेदन करनेके लिये आप ही योग्य हैं; क्योंकि इस संशयका छेदन करनेवाला आपके सिवाय दूसरा कोई हो नहीं सकता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "etan me sanśhayaṁ kṛiṣhṇa chhettum arhasyaśheṣhataḥ" mean in English?

"etan me sanśhayaṁ kṛiṣhṇa chhettum arhasyaśheṣhataḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 39. O Krishna, please completely dispel this doubt of mine, for it is not possible for anyone but You to do so. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.