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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 37
अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति

हे कृष्ण ! जिसकी साधनमें श्रद्धा है, पर जिसका प्रयत्न शिथिल है, वह अन्तसमयमें अगर योगसे विचलितमना हो जाय, तो वह योगसिद्धिको प्राप्त न करके किस गतिको चला जाता है? — VaniSagar

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TeluguIND

విశ్వాసం ఉన్నప్పటికీ, తనను తాను నియంత్రించుకోలేనివాడు, మరియు ఎవరి మనస్సు యోగా నుండి దూరంగా తిరుగుతుందో, అతను యోగాలో పరిపూర్ణతను పొందడంలో విఫలమై, ఏ ముగింపును ఎదుర్కొంటాడు, ఓ కృష్ణా?

TamilIND

நம்பிக்கை இருந்தும், தன்னைக் கட்டுப்படுத்திக் கொள்ள முடியாதவன், யோகத்தை விட்டு விலகிச் செல்லும் மனம், யோகத்தில் முழுமையை அடையத் தவறியவன், என்ன முடிவைச் சந்திக்கிறான், ஓ கிருஷ்ணா?

SindhiIND

جيڪو ايمان رکڻ جي باوجود به پاڻ تي ضابطو رکي نٿو سگهي ۽ جنهن جو ذهن يوگا کان پري ڀڄندو آهي، تنهن کي آخر ڪهڙو ملندو، جيڪو يوگا ۾ ڪمال حاصل ڪرڻ ۾ ناڪام رهيو، اي ڪرشن؟

GujaratiIND

જે શ્રદ્ધા હોવા છતાં પણ પોતાની જાતને કાબૂમાં રાખી શકતો નથી, અને જેનું મન યોગથી ભટકી જાય છે, તે હે કૃષ્ણ, યોગમાં પૂર્ણતા પ્રાપ્ત કરવામાં અસફળ થઈને શું અંત આવે છે?

KannadaIND

ಯಾರಿಗೆ ನಂಬಿಕೆ ಇದ್ದರೂ ತನ್ನನ್ನು ತಾನು ಹತೋಟಿಯಲ್ಲಿಟ್ಟುಕೊಳ್ಳಲು ಸಾಧ್ಯವಾಗದೆ, ಯಾರ ಮನಸ್ಸು ಯೋಗದಿಂದ ದೂರ ಸರಿಯುತ್ತದೋ, ಅವನು ಯೋಗದಲ್ಲಿ ಪರಿಪೂರ್ಣತೆಯನ್ನು ಸಾಧಿಸಲು ವಿಫಲನಾಗಿ ಯಾವ ಅಂತ್ಯವನ್ನು ಎದುರಿಸುತ್ತಾನೆ, ಓ ಕೃಷ್ಣ?

MalayalamIND

വിശ്വാസമുണ്ടായിട്ടും സ്വയം നിയന്ത്രിക്കാൻ കഴിയാത്തവൻ, യോഗയിൽ നിന്ന് മനസ്സ് അലയുന്നവൻ, ഹേ കൃഷ്ണാ, യോഗയിൽ പൂർണത കൈവരിക്കാൻ കഴിയാതെ, അവൻ എന്ത് പര്യവസാനം നേരിടുന്നു?

PunjabiIND

ਜੋ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਹੋਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਵੀ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਕਾਬੂ ਵਿਚ ਰੱਖਣ ਤੋਂ ਅਸਮਰਥ ਹੈ, ਅਤੇ ਜਿਸ ਦਾ ਮਨ ਯੋਗ ਤੋਂ ਭਟਕਦਾ ਹੈ, ਹੇ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ, ਯੋਗ ਵਿਚ ਪੂਰਨਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਵਿਚ ਅਸਫਲ ਹੋ ਕੇ ਉਹ ਕਿਸ ਅੰਤ ਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਹੈ?

NepaliIND

जो आस्था भए पनि आफूलाई नियन्त्रण गर्न असमर्थ छ र जसको मन योगबाट टाढा भइसकेको छ, उसले योगमा पूर्णता प्राप्त गर्न नसकेर के अन्त्य गर्छ, हे कृष्ण ?

BengaliIND

বিশ্বাস থাকা সত্ত্বেও যে নিজেকে নিয়ন্ত্রণ করতে অক্ষম, এবং যাঁর মন যোগ থেকে দূরে সরে যায়, হে কৃষ্ণ, যোগে সিদ্ধি লাভে ব্যর্থ হয়ে তার কী পরিণতি হয়?

MarathiIND

हे कृष्णा, ज्याला श्रध्दा असूनही स्वत:वर ताबा ठेवता येत नाही, आणि ज्याचे मन योगापासून दूर जाते, त्याला योगात पूर्णता न मिळाल्याने त्याला कोणते अंत भेटायचे?

OdiaIND

ଯିଏ ନିଜକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରିବାରେ ଅସମର୍ଥ, ଯଦିଓ ତାଙ୍କର ବିଶ୍ୱାସ ଅଛି, ଏବଂ ଯାହାର ମନ ଯୋଗଠାରୁ ଦୂରେଇ ଯାଏ, ଯୋଗରେ ସିଦ୍ଧତା ହାସଲ କରିବାରେ ବିଫଳ ହୋଇ ସେ କ’ଣ ଶେଷ ହୁଏ?

ManipuriIND

ꯊꯥꯖꯕꯥ ꯂꯩꯔꯕꯁꯨ ꯃꯁꯥꯕꯨ ꯀꯟꯠꯔꯣꯜ ꯇꯧꯕꯥ ꯉꯃꯗꯕꯥ, ꯋꯥꯈꯜ ꯌꯣꯒꯗꯒꯤ ꯂꯥꯄꯊꯣꯛꯅꯥ ꯂꯩꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯌꯣꯒꯗꯥ ꯃꯄꯨꯡ ꯐꯥꯕꯥ ꯐꯪꯕꯗꯥ ꯃꯥꯌ ꯄꯥꯀꯄꯥ ꯉꯃꯗꯅꯥ ꯀꯔꯤ ꯑꯔꯣꯏꯕꯥ ꯊꯦꯡꯅꯔꯤꯕꯅꯣ, ꯍꯦ ꯀ꯭ꯔ꯭ꯏꯁ꯭ꯟ?

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः'--जिसकी साधनमें अर्थात् जप, ध्यान, सत्सङ्ग, स्वाध्याय आदिमें रुचि है, श्रद्धा है और उनको करता भी है, पर अन्तःकरण और बहिःकरण वशमें न होनेसे साधनमें शिथिलता है, तत्परता नहीं है। ऐसा साधक अन्तसमयमें संसारेमें राग रहनेसे, विषयोंका चिन्तन होनेसे अपने साधनसे विचलित हो जाय, अपने ध्येयपर स्थिर न रहे तो फिर उसकी क्या गति होती है?

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

योगाभ्यासको स्वीकार करके जिसने इस लोक और परलोककी प्राप्तिके साधनरूप कर्मोंका तो त्याग कर दिया और योगसिद्धिका फल मोक्षप्राप्तिका साधन पूर्ण ज्ञान जिसको मिला नहीं ऐसे जिस योगीका चित्त अन्तकालमें योगमार्गसे विचलित हो गया हो उस योगीके नाशकी आशङ्का करके अर्जुन पूछने लगा हे कृष्ण जो साधक योगमार्गमें यत्न करनेवाला नहीं है परंतु श्रद्धासे अर्थात् आस्तिकबुद्धिसे युक्त है और अन्तकालमें जिसका मन योगसे चलायमान हो गया है वह चञ्चलचित्त भ्रष्ट स्मृतिवाला योगी योगकी सिद्धिको अर्थात् योगफलरूप पूर्ण ज्ञानको न पाकर किस गतिको प्राप्त होता है ।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

प्रश्नान्तरमुत्थापयति तत्रेत्यादिना। मनोनिरोधस्य दुःखसाध्यत्वमाशङ्क्य परिहृते सति प्रष्टा पुनरवकाशं प्रतिलभ्योवाचेति संबन्धः। लोकद्वयप्रापककर्मसंभवे कुतो योगिनो नाशाशङ्केत्याशङ्क्याह योगाभ्यासेति। तथापि योगानुष्ठानपरिपाकपरिप्रापितसम्यग्दर्शनसामर्थ्यान्मोक्षोपपत्तौ कुतस्तस्य नाशाशङ्केति चेन्मैवमनेकान्तरायवत्त्वाद्योगस्येह जन्मनि प्रायेण संसिद्धेरसिद्धिरित्यभिसंधायाह योगसिद्धीति। अभ्युदयनिःश्रेयसबहिर्भावो नाशो योगमार्गे तत्फलस्य सम्यग्दर्शनस्यादर्शनादिति शेषः। तर्हि ततो बहिर्मुखत्वमेवात्यन्तिकं संवृत्तमित्याशङ्क्याह श्रद्धयेति। तर्हि योगमार्गमाश्रयते नेत्याह योगादिति। मरणकाले व्याकुलेन्द्रियस्य ज्ञानसाधनानुष्ठानावकाशाभावाद् युक्तं ततश्चलितमानसत्वमित्याशङ्क्याह भ्रष्टेति। गम्यत इति गतिः पुरुषार्थः सामान्यप्रश्नमन्तर्भाव्य विशेषप्रश्नो द्रष्टव्यः।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

योगभ्रष्टस्य स्वर्गमोक्षयोरभावमाशङ्कार्जुन उवाच। अयतियत्नशीलो योगमार्गे श्रद्धया आस्तिक्य बुद्य्धा चोपेतः युक्तोऽन्तकाले योगाच्चलितं मानसं मनो यस्य सोऽभ्रष्टस्मृतिः योगसंसिद्धिं योगफलं सम्यग्दर्शनमप्राप्य कां गतिं गच्छति। अयमाशयः योगाभ्यासाङ्गीकरणेन समस्तकर्मणां संन्यासात्कर्मफलस्य गन्तव्यस्य स्वर्गादेरभावः योगाच्चलितचित्तत्वात् योगफलस्य सभ्यग्ज्ञानस्यालाभात्पृच्छति कां गतिं गच्छतीति। यत्त्वत्रार्जुनोऽगृहीतसंन्यासानामापाततः शास्त्रोत्थात्मानात्मविवेकानां उभयविधवैराग्यवतां ईश्वरार्पणबुद्य्धैवावश्यकं कर्म कुर्वतां मोक्षमार्गप्रवृत्तानां यदि मध्ये मरणादिनाऽप्राप्य संन्यासं मोचकज्ञाने विघ्नवतां गतिं पृच्छति अयतिरिति। अयतिः संन्यासमोचकज्ञानपंपन्नः हे कृष्ण कां गतिं गच्छतीति संबन्धः। ननु किमत्र प्रष्टव्यं तत्तत्कर्मानुगुणां गतिं गमिष्यतीत्याशङ्क्याह श्रद्धयोपेत इति। श्रद्धा मोक्षे ईश्वरे चास्तिक्यबुद्धिः तयोपेतः। मोक्षार्थ सत्त्वशुद्धये ईश्वरार्पणबुद्य्धा आवश्यकं कर्म कुर्वन्निति भावः तर्हि मोक्षमेव प्राप्स्यतीत्याशङ्कयाह अप्राप्येति। योगो ज्ञानयोगः सएव संसिद्धिः संसिद्धशब्दवाच्यमोक्षसाधनत्वादुपचारात् तामप्राप्य। अनुत्पन्ने मोचकज्ञान इत्यर्थः। ज्ञानाभावेकुतो मोक्षप्राप्तिरिति भावः। कुतो वोक्तश्रद्धोपेतस्य योगसंसिद्य्धप्राप्तिस्तत्राह योगा़च्चलितमानस इति। अत्र केचिद्यागाच्चिलितमानस इत्यस्य मृत इति व्याचक्षते। केचित्तु विषयेष्वासक्त इति वदन्ति। अन्येतु किं मम मोक्षेण काम्यान्यागादीनेव तत्तल्लोकप्राप्तये करिध्यामीति चेष्टितमानस इति व्याख्यां वर्णयन्तीति भाष्यविरुद्धमितरैः कल्पितं तच्चिन्तयम्। एवमुक्तप्रकारेणादौ मोक्षार्थं सत्त्वशुद्धये ईश्वरार्पणबुद्य्धावश्यकं कर्म कुर्वतः किं मम मोक्षेण काम्यान्यागादीनेव करिष्यामीति योगाच्चलितमानसस्य काम्याग्निष्टोमाद्यनुष्ठानसंभवेन गतेरुक्तत्वात् प्रश्नविवरणरुपस्योत्तरश्लोकस्योत्तरस्य चासंगत्यापत्तेः। एतेनायतिरित्यादिपरास्तम्। त्यक्तसर्वकर्मणः अप्राप्तसम्यग्दर्शनस्यैवोभयभ्रष्टत्वात्। यदपि योगो ज्ञानयोग इत्यादि तदपि न। मुख्यार्थसंभवे उपचारायोगात्। यदपि व्याख्यानान्तरप्रदर्शनं तदपि न। प्रथमव्याख्यानस्यापदार्थत्वात् द्वितीयस्य तृतीयन्तर्भावादिति दिक्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
arjunaḥ uvāchaArjun said
ayatiḥlax
śhraddhayāwith faith
upetaḥpossessed
yogātfrom Yog
chalitamānasaḥ
aprāpyafailing to attain
yogasansiddhim
kāmwhich
gatimdestination
kṛiṣhṇaShree Krishna
gachchhatigoes
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Bhagavad Gita · 6.36
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः। वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः

जिसका मन पूरा वशमें नहीं है, उसके द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है। परन्तु उपायपूर्वक यत्न करनेवाले वश्यात्माको योग प्राप्त हो सकता है, ऐसा मेरा मत है। — VaniSagar

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कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति। अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि

हे महाबाहो ! संसारके आश्रयसे रहित और परमात्मप्राप्तिके मार्गमें मोहित अर्थात् विचलित -- इस तरह दोनों ओरसे भ्रष्ट हुआ साधक क्या छिन्न-भिन्न बादलकी तरह नष्ट तो नहीं हो जाता ? — VaniSagar

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अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति

हे कृष्ण ! जिसकी साधनमें श्रद्धा है, पर जिसका प्रयत्न शिथिल है, वह अन्तसमयमें अगर योगसे विचलितमना हो जाय, तो वह योगसिद्धिको प्राप्त न करके किस गतिको चला जाता है? — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 37 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 37 का हिंदी अर्थ: "हे कृष्ण ! जिसकी साधनमें श्रद्धा है, पर जिसका प्रयत्न शिथिल है, वह अन्तसमयमें अगर योगसे विचलितमना हो जाय, तो वह योगसिद्धिको प्राप्त न करके किस गतिको चला जाता है? — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 37?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 37 translates to: "He who is unable to control himself, even though he has faith, and whose mind wanders away from Yoga, what end does he meet, having failed to attain perfection in Yoga, O Krishna? — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं क" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 37 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। हे कृष्ण ! जिसकी साधनमें श्रद्धा है, पर जिसका प्रयत्न शिथिल है, वह अन्तसमयमें अगर योगसे विचलितमना हो जाय, तो वह योगसिद्धिको प्राप्त न करके किस गतिको चला जाता है? — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "arjuna uvācha" mean in English?

"arjuna uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 37. He who is unable to control himself, even though he has faith, and whose mind wanders away from Yoga, what end does he meet, having failed to attain perfection in Yoga, O Krishna? — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.