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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 36
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः। वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः

जिसका मन पूरा वशमें नहीं है, उसके द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है। परन्तु उपायपूर्वक यत्न करनेवाले वश्यात्माको योग प्राप्त हो सकता है, ऐसा मेरा मत है। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

అనియంత్రిత స్వయం ఉన్న వ్యక్తి యోగాను సాధించడం కష్టమని నేను భావిస్తున్నాను, కానీ స్వీయ-నియంత్రణ మరియు కృషి చేసే వ్యక్తి తగిన మార్గాల ద్వారా దానిని సాధించగలడు.

KannadaIND

ಅನಿಯಂತ್ರಿತ ಸ್ವಯಂ ಹೊಂದಿರುವ ವ್ಯಕ್ತಿಯಿಂದ ಯೋಗವನ್ನು ಸಾಧಿಸುವುದು ಕಷ್ಟ ಎಂದು ನಾನು ಭಾವಿಸುತ್ತೇನೆ, ಆದರೆ ಸ್ವಯಂ-ನಿಯಂತ್ರಿತ ಮತ್ತು ಶ್ರಮಿಸುವವನು ಅದನ್ನು ಸೂಕ್ತ ವಿಧಾನಗಳಿಂದ ಸಾಧಿಸಬಹುದು.

TamilIND

கட்டுப்பாடற்ற சுயம் கொண்ட ஒருவரால் யோகாவை அடைவது கடினம் என்று நான் நினைக்கிறேன், ஆனால் சுயக்கட்டுப்பாடும் முயற்சியும் உள்ள ஒருவர் அதை சரியான வழிமுறைகளால் அடைய முடியும்.

PunjabiIND

ਮੈਨੂੰ ਲੱਗਦਾ ਹੈ ਕਿ ਯੋਗ ਨੂੰ ਇੱਕ ਬੇਕਾਬੂ ਆਤਮ ਨਾਲ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨਾ ਔਖਾ ਹੈ, ਪਰ ਸਵੈ-ਨਿਯੰਤ੍ਰਿਤ ਅਤੇ ਯਤਨਸ਼ੀਲ ਵਿਅਕਤੀ ਇਸ ਨੂੰ ਉਚਿਤ ਸਾਧਨਾਂ ਦੁਆਰਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ।

BengaliIND

আমি মনে করি অনিয়ন্ত্রিত ব্যক্তি দ্বারা যোগ অর্জন করা কঠিন, কিন্তু আত্মনিয়ন্ত্রিত এবং প্রচেষ্টাকারী ব্যক্তি উপযুক্ত উপায়ে এটি অর্জন করতে পারে।

GujaratiIND

મને લાગે છે કે અનિયંત્રિત વ્યક્તિ દ્વારા યોગ પ્રાપ્ત કરવો મુશ્કેલ છે, પરંતુ સ્વ-નિયંત્રિત અને પ્રયત્નશીલ વ્યક્તિ તેને યોગ્ય માધ્યમથી પ્રાપ્ત કરી શકે છે.

MalayalamIND

അനിയന്ത്രിതമായ ഒരു വ്യക്തിക്ക് യോഗ നേടുന്നത് ബുദ്ധിമുട്ടാണെന്ന് ഞാൻ കരുതുന്നു, എന്നാൽ ആത്മനിയന്ത്രണവും പരിശ്രമവുമുള്ള ഒരാൾക്ക് ഉചിതമായ മാർഗങ്ങളിലൂടെ അത് നേടാനാകും.

MarathiIND

मला वाटते की अनियंत्रित व्यक्तीला योग साधणे कठीण आहे, परंतु आत्म-नियंत्रित आणि प्रयत्नशील व्यक्ती योग्य मार्गाने तो मिळवू शकतो.

NepaliIND

मेरो विचारमा अनियन्त्रित व्यक्तिले योग प्राप्त गर्न गाह्रो छ, तर आत्म-नियन्त्रित र प्रयास गर्ने व्यक्तिले यसलाई उपयुक्त माध्यमबाट प्राप्त गर्न सक्छ।

SindhiIND

مان سمجهان ٿو ته يوگا حاصل ڪرڻ ڏکيو آهي هڪ بي قابو نفس سان، پر پاڻ تي ضابطو رکندڙ ۽ ڪوشش ڪندڙ ماڻهو ان کي مناسب طريقن سان حاصل ڪري سگهي ٿو.

OdiaIND

ମୁଁ ଭାବୁଛି ଯୋଗକୁ ଜଣେ ଅନିୟନ୍ତ୍ରିତ ସ୍ with ୟଂ ପ୍ରାପ୍ତ କରିବା କଷ୍ଟକର, କିନ୍ତୁ ଆତ୍ମ-ନିୟନ୍ତ୍ରିତ ଏବଂ ପ୍ରୟାସ ଏହାକୁ ଉପଯୁକ୍ତ ଉପାୟରେ ହାସଲ କରିପାରିବ |

AssameseIND

মই ভাবো অনিয়ন্ত্ৰিত আত্মা থকা এজনে যোগ লাভ কৰাটো কঠিন, কিন্তু আত্মনিয়ন্ত্ৰিত আৰু চেষ্টা কৰাজনে উপযুক্ত উপায়েৰে যোগ লাভ কৰিব পাৰে।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--असंयतात्मना योगो दुष्प्रापः--मेरे मतमें तो जिसका मन वशमें नहीं है उसके द्वारा योग सिद्ध होना कठिन है। कारण कि योगकी सिद्धिमें मनका वशमें न होना जितना बाधक है उतनी मनकी चञ्चलता बाधक नहीं है। जैसे पतिव्रता स्त्री मनको वशमें तो रखती है पर उसे एकाग्र नहीं करती। अतः ध्यानयोगीको अपना मन वशमें करना चाहिये। मन वशमें होनेपर वह मनको जहाँ लगाना चाहे वहाँ लगा सकता है जितनी देर लगाना चाहे उतनी देर लगा सकता है और जहाँसे हटाना चाहे वहीँसे हटा सकता है।प्रायः साधकोंकी यह प्रवृत्ति होती है कि वे साधन तो श्रद्धापूर्वक करते हैं पर उनके प्रयत्नमें शिथिलता रहती है जिससे साधकमें संयम नहीं रहता अर्थात् मन इन्द्रियाँ अन्तःकरणका पूर्णतया संयम नहीं होता। इसलिये योगकी प्राप्तिमें कठिनता होती है अर्थात् परमात्मा सदासर्वत्र विद्यमान रहते हुए भी जल्दी प्राप्त नहीं होते।भगवान्की तरफ चलनेवाले वैष्णव संस्कारवाले साधकोंकी मांस आदिमें जैसी अरुचि होती है वैसी अरुचि साधककी विषयभोगोंमें नहीं होती अर्थात् विषयभोग उतने निषिद्ध और पतन करनेवाले नहीं दीखते। कारण कि विषयभोगोंका ज्यादा अभ्यास होनेसे उनमें मांस आदिकी तरह ग्लानि नहीं होती। मांस आदि सर्वथा निषिद्ध वस्तु खानेसे पतन तो होता ही है पर उससे भी ज्यादा पतन होता है रागपूर्वक विषयभोगोंको भोगनेसे। कारण कि मांस आदिमें तो यह निषिद्ध वस्तु है ऐसी भावना रहती है पर भोगोंको भोगनेसे यह निषिद्ध है ऐसी भावना नहीं रहती। इसलिये भोगोंके जो संस्कार भीतर बैठ जाते हैं वे बड़े भयंकर होते हैं। तात्पर्य है कि मांस आदि खानेसे जो पाप लगता है वह दण्ड भोगकर नष्ट हो जायगा। वह पाप आगे नये पापोंमें नहीं लगायेगा। परन्तु रागपूर्वक विषयभोगोंका सेवन करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं वे जन्मजन्मान्तरतक विषयभोगोंमें और उनकी रुचिके परिणामस्वरूप पापोंमें लगाते रहेंगे।तात्पर्य है कि साधकके अन्तःकरणमें विषयभोगोंकी रुचि रहनेके कारण ही वह संयतात्मा नहीं हो पातामनइन्द्रियोंको अपने वशमें नहीं कर पाता। इसलिये उसको योगकी प्राप्तिमें अर्थात् ध्यानयोगकी सिद्धिमें कठिनता होती है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

परंतु जिसका अन्तःकरण वशमें किया हुआ नहीं है उस मनको वशमें न करनेवाले पुरुषद्वारा अर्थात् जिसका अन्तःकरण अभ्यास और वैराग्यद्वारा संयत किया हुआ नहीं है ऐसे पुरुषद्वारा योग प्राप्त किया जाना कठिन है अर्थात् उसको योग कठिनतासे प्राप्त हो सकता है यह मेरा निश्चय है। परंतु जो स्वाधीन मनवाला है जिसका मन अभ्यासवैराग्यद्वारा वशमें किया हुआ है और जो फिर भी बारंबार यत्न करता ही जाता है ऐसे पुरुषद्वारा पूर्वोक्त उपायोंसे यह योग प्राप्त किया जा सकता है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

संयतात्मनो योगप्राप्तिः सुलभेत्युक्त्वा व्यतिरेकं दर्शयति यः पुनरिति। व्यतिरेकोपन्यासपरं पूर्वार्धमनूद्य व्याकरोति असंयतेति। पूर्वोक्तान्वयव्याख्यानपरमुत्तरार्धं व्याचष्टे यस्त्वित्यादिना। अन्तःकरणस्य स्ववशत्वे सिद्धेऽपि वैराग्यादावास्थावता भवितव्यमित्याह यततेति। उपायो वैराग्यादिपूर्वको मनोनिरोधः।

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Sri Dhanpati

असंयतं अभ्यासवैराग्याभ्यामनायत्तं चित्तं यस्य तेन आत्मौपम्येनेत्यनेनोक्तो योगो दुष्प्रापः प्राप्तुमशक्यः। वशीकृतचित्तेन तूपायतः अभ्यासवैराग्यरुपोपायात् भूयोऽपि यतता प्रयत्नं कुर्वता योगोऽवापुतुं प्राप्तुं शक्यः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
asanyataātmanā
yogaḥYog
duṣhprāpaḥdifficult to attain
itithus
memy
matiḥopinion
vaśhyaātmanā
tubut
yatatāone who strives
śhakyaḥpossible
avāptumto achieve
upāyataḥby right means
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Bhagavad Gita · 6.35
श्री भगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते

श्रीभगवान् बोले -- हे महाबाहो ! यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है -- यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। परन्तु हे कुन्तीनन्दन ! अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.37
अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति

हे कृष्ण ! जिसकी साधनमें श्रद्धा है, पर जिसका प्रयत्न शिथिल है, वह अन्तसमयमें अगर योगसे विचलितमना हो जाय, तो वह योगसिद्धिको प्राप्त न करके किस गतिको चला जाता है? — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 36
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 36
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः। वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः

जिसका मन पूरा वशमें नहीं है, उसके द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है। परन्तु उपायपूर्वक यत्न करनेवाले वश्यात्माको योग प्राप्त हो सकता है, ऐसा मेरा मत है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 36 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 36 का हिंदी अर्थ: "जिसका मन पूरा वशमें नहीं है, उसके द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है। परन्तु उपायपूर्वक यत्न करनेवाले वश्यात्माको योग प्राप्त हो सकता है, ऐसा मेरा मत है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 36?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 36 translates to: "I think Yoga is hard to be attained by one with an uncontrolled self, but the self-controlled and striving one can attain it by the appropriate means. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः। वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 36 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। जिसका मन पूरा वशमें नहीं है, उसके द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है। परन्तु उपायपूर्वक यत्न करनेवाले वश्यात्माको योग प्राप्त हो सकता है, ऐसा मेरा मत है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "asaṅyatātmanā yogo duṣhprāpa iti me matiḥ" mean in English?

"asaṅyatātmanā yogo duṣhprāpa iti me matiḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 36. I think Yoga is hard to be attained by one with an uncontrolled self, but the self-controlled and striving one can attain it by the appropriate means. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.