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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 35
श्री भगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते

श्रीभगवान् बोले -- हे महाबाहो ! यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है -- यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। परन्तु हे कुन्तीनन्दन ! अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है। — VaniSagar

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BengaliIND

"নিঃসন্দেহে, হে পরাক্রমশালী অর্জুন, মন নিয়ন্ত্রণ করা কঠিন এবং চঞ্চল; কিন্তু অনুশীলন এবং বৈরাগ্য দ্বারা, এটি সংযত করা যায়।

MarathiIND

, "हे पराक्रमी अर्जुना, निःसंशयपणे, मन नियंत्रित करणे कठीण आणि चंचल आहे; परंतु अभ्यास आणि वैराग्य यांनी ते आवरले जाऊ शकते.

OdiaIND

, "ନି ly ସନ୍ଦେହ, ହେ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ସଶସ୍ତ୍ର ଅର୍ଜୁନ, ମନ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରିବା ଏବଂ ଅଶାନ୍ତ ହେବା କଷ୍ଟକର; କିନ୍ତୁ ଅଭ୍ୟାସ ଏବଂ ବିଘ୍ନ ସହିତ ଏହାକୁ ରୋକାଯାଇପାରିବ |

GujaratiIND

"નિઃશંકપણે, હે પરાક્રમી અર્જુન, મનને નિયંત્રિત કરવું મુશ્કેલ અને અશાંત છે; પરંતુ વ્યવહાર અને વૈરાગ્યથી તેને સંયમિત કરી શકાય છે.

NepaliIND

"निस्सन्देह, हे पराक्रमी अर्जुन, मनलाई नियन्त्रण गर्न कठिन र चंचल छ, तर अभ्यास र वैराग्यले यसलाई नियन्त्रण गर्न सकिन्छ।

SindhiIND

”بلاشڪ، اي طاقتور ارجن، ذهن کي قابو ڪرڻ مشڪل ۽ بيقرار آهي؛ پر مشق ۽ بيزاريءَ سان، ان کي قابو ڪري سگهجي ٿو.

TamilIND

, "நிச்சயமின்றி, ஓ வலிமையான ஆயுதம் கொண்ட அர்ஜுனா, மனதைக் கட்டுப்படுத்துவது கடினம் மற்றும் அமைதியற்றது; ஆனால் பயிற்சி மற்றும் அக்கறையின் மூலம், அதைக் கட்டுப்படுத்த முடியும்.

TeluguIND

, "నిస్సందేహంగా, ఓ శక్తివంతమైన సాయుధ అర్జునా, మనస్సును నియంత్రించడం కష్టం మరియు చంచలమైనది; కానీ అభ్యాసం మరియు వైరాగ్యంతో, దానిని నిగ్రహించవచ్చు.

PunjabiIND

"ਬੇਸ਼ੱਕ, ਹੇ ਬਲਵਾਨ ਅਰਜੁਨ, ਮਨ ਨੂੰ ਕਾਬੂ ਕਰਨਾ ਔਖਾ ਅਤੇ ਬੇਚੈਨ ਹੈ; ਪਰ ਅਭਿਆਸ ਅਤੇ ਵਿਕਾਰ ਨਾਲ, ਇਸ ਨੂੰ ਰੋਕਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ।

BhojpuriIND

, "निस्संदेह, हे पराक्रमी अर्जुन, मन के नियंत्रित कइल कठिन आ बेचैन होला; बाकिर अभ्यास आ निष्काम से ओकरा के रोकल जा सकेला."

KannadaIND

, "ನಿಸ್ಸಂದೇಹವಾಗಿ, ಓ ಬಲಶಾಲಿಯಾದ ಅರ್ಜುನ, ಮನಸ್ಸು ನಿಯಂತ್ರಿಸಲು ಕಷ್ಟ ಮತ್ತು ಚಂಚಲವಾಗಿದೆ; ಆದರೆ ಅಭ್ಯಾಸ ಮತ್ತು ನಿರಾಸಕ್ತಿಯಿಂದ, ಅದನ್ನು ನಿಗ್ರಹಿಸಬಹುದು.

MalayalamIND

, "ശക്തനായ അർജ്ജുനാ, നിസ്സംശയമായും, മനസ്സ് നിയന്ത്രിക്കാൻ പ്രയാസമുള്ളതും അസ്വസ്ഥവുമാണ്; എന്നാൽ അഭ്യാസത്തോടും നിസ്സംഗതയോടും കൂടി അതിനെ നിയന്ത്രിക്കാൻ കഴിയും.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्'--यहाँ 'महाबाहो' सम्बोधनका तात्पर्य शूरवीरता बतानेमें है अर्थात् अभ्यास करते हुए कभी उकताना नहीं चाहिये। अपनेमें धैर्यपूर्वक वैसी ही शूरवीरता रखनी चाहिये।अर्जुनने पहले चञ्चलताके कारण मनका निग्रह करना बड़ा कठिन बताया। उसी बातपर भगवान् कहते हैं कि तुम जो कहते हो, वह एकदम ठीक बात है, निःसन्दिग्ध बात है; क्योंकि मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है। 'अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते' अर्जुनकी माता कुन्ती बहुत विवेकवती तथा भोगोंसे विरक्त रहनेवाली थीं। कुन्तीने भगवान् श्रीकृष्णसे विपत्तिका वरदान माँगा था । ऐसा वरदान माँगनेवाला इतिहासमें बहुत कम मिलता है। अतः यहाँ 'कौन्तेय' सम्बोधन देकर भगवान् अर्जुनको कुन्ती माताकी याद दिलाते हैं कि जैसे तुम्हारी माता कुन्ती बड़ी विरक्त है, ऐसे ही तुम भी संसारसे विरक्त होकर परमात्मामें लगो अर्थात् मनको संसारसे हटाकर परमात्मामें लगाओ।मनको बार-बार ध्येयमें लगानेका नाम 'अभ्यास' है। इस अभ्यासकी सिद्धि समय लगानेसे होती है। समय भी निरन्तर लगाया जाय, रोजाना लगाया जाय। कभी अभ्यास किया, कभी नहीं किया--ऐसा नहीं हो। तात्पर्य है कि अभ्यास निरन्तर होना चाहिये और अपने ध्येयमें महत्त्व तथा आदर-बुद्धि होनी चाहिये। इस तरह अभ्यास करनेसे अभ्यास दृढ़ हो जाता है। अभ्यासके दो भेद हैं--(1) अपना जो लक्ष्य, ध्येय है, उसमें मनोवृत्तिको लगाये और दूसरी वृत्ति आ जाय अर्थात् दूसरा कुछ भी चिन्तन आ जाय, उसकी अपेक्षा कर दे, उससे उदासीन हो जाय। (2) जहाँ-जहाँ मन चला जाय, वहाँ-वहाँ ही अपने लक्ष्यको, इष्टको देखे।उपर्युक्त दो साधनोंके सिवाय मन लगानेके कई उपाय हैं; जैसे--

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Sri Harikrishnadas Goenka

श्रीभगवान् बोले कि जैसे तू कहता है यह ठीक ऐसा ही है हे महाबाहो मन चञ्चल और कठिनतासे वशमें होनेवाला है इसमें ( कोई ) संदेह नहीं। किंतु अभ्याससे अर्थात् किसी चित्तभूमिमें एक समान वृत्तिकी बारंबार आवृत्ति करनेसे और दृष्ट तथा अदृष्ट प्रिय भोगोंमें बारंबार दोषदर्शनके अभ्यासद्वारा उत्पन्न हुए अनिच्छारूप वैराग्यसे चित्तके विक्षेपरूप प्रचार ( चञ्चलता ) को रोका जा सकता है। अर्थात् इस प्रकार उस मनका निग्रह निरोध किया जा सकता है।

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Sri Anandgiri

प्रश्नमङ्गीकृत्य प्रतिवचनमुत्थापयति श्रीभगवानिति। कुत्र संशयराहित्यं तत्राह मन इति। कथं तर्हि मनोनिरोधो भवति तत्राह किं त्विति। अभ्यासस्वरूपं सामान्येन निदर्शयति अभ्यासो नामेति। कस्यांचिच्चित्तभूमावित्यविशेषितो ध्येयो विषयो निर्दिश्यते समानप्रत्ययावृत्तिर्विजातीयप्रत्ययान्तरितेति शेषः। चित्तस्येति षष्ठी प्रत्ययस्य तद्विकारत्वद्योतनार्था। वैराग्यस्वरूपं निरूपयति वैराग्यमिति। तेषु वैतृष्ण्यं वैराग्यं नामेति संबन्धः। तत्र हेतुं सूचयति दोषेति। विषयेषु तृष्णाविषयेषु दोषदर्शनमभ्यस्यते तेन वैतृष्ण्यं जायते। निगृह्यमाणं निर्दिशति विक्षेपेति। तस्मिन्गृहीते निरुद्धे मनोनिरोधेऽस्य किं स्यादित्यपेक्षायामाह एवमिति। अभ्यासहेतुकवैराग्यद्वारा चित्तप्रचारनिरोधे निरुद्धवृत्तिकं मनो विषयविमुखमन्तर्निष्ठं भवतीत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

प्रश्नमभिनन्दन् श्रीभगवानुवाच। असंशयं मनश्चलं दुर्निग्रहं चेत्यस्मिन्नर्थे संशयो नास्ति। यद्यपि दुर्निग्रहं तथापि तु अभ्यासेन चित्तभूमौ कस्यांचिद्विजातीयप्रत्ययानन्तरितसमानप्रत्ययावृत्तिलक्षणेन वैराग्यं नाम दष्टादृष्टेषु भोगेषु दोषदर्शनाभ्यासा द्वैतृष्ण्यं तेन च गृह्यते। विक्षिप्तत्वादिकं त्यक्त्वा निरुध्यत इत्यर्थः। पूर्वोर्धे महाबाहो इति संबोधयन्महाबाहुनातिबलेन जितनिवातकवचादिना त्वयापि यद्येवमुच्यते तर्हि मनसो दुर्निग्रहत्वे संशयो नास्तीति सूचयति। बाह्वदिबलसाध्यो मनसो निग्रहो न भवति किंत्वभ्यासवैराग्यसाध्यः। यथातिप्रबलै राजभिः स्वग्रहे वासयितुं दुर्घटो दुर्वासा अपि तव मात्राऽबलया कुन्त्या विषयेषुवैराग्येण तत्सेवनपरत्वं परित्यज्य तच्छुश्रुषाभ्यासेन च स्वग्रहे निवासितः प्रसादितश्च तथा त्वं तत्पुत्रो मदुक्तेनोपायेन दुर्निग्रहमपि मनो निग्रहीतुं योग्योऽसीति सूचयन्नाह हे कौन्तेयेति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhrībhagavān uvācha
asanśhayamundoubtedly
mahābāho
manaḥthe mind
durnigrahamdifficult to restrain
chalamrestless
abhyāsenaby practice
tubut
kaunteyaArjun, the son of Kunti
vairāgyeṇaby detachment
chaand
gṛihyatecan be controlled
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Bhagavad Gita · 6.34
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्

क्योंकि हे कृष्ण ! मन बड़ा ही चञ्चल, प्रमथनशील, दृढ़ (जिद्दी) और बलवान् है। उसका निग्रह करना मैं वायुकी तरह अत्यन्त कठिन मानता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.36
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः। वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः

जिसका मन पूरा वशमें नहीं है, उसके द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है। परन्तु उपायपूर्वक यत्न करनेवाले वश्यात्माको योग प्राप्त हो सकता है, ऐसा मेरा मत है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 35
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 35
श्री भगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते

श्रीभगवान् बोले -- हे महाबाहो ! यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है -- यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। परन्तु हे कुन्तीनन्दन ! अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 35 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 35 का हिंदी अर्थ: "श्रीभगवान् बोले -- हे महाबाहो ! यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है -- यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। परन्तु हे कुन्तीनन्दन ! अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 35?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 35 translates to: ", "Undoubtedly, O mighty-armed Arjuna, the mind is difficult to control and restless; but with practice and dispassion, it can be restrained. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"श्री भगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 35 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। श्रीभगवान् बोले -- हे महाबाहो ! यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है -- यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। परन्तु हे कुन्तीनन्दन ! अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhrī bhagavān uvācha" mean in English?

"śhrī bhagavān uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 35. , "Undoubtedly, O mighty-armed Arjuna, the mind is difficult to control and restless; but with practice and dispassion, it can be restrained. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.