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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 26
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्

यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही लगाये। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TeluguIND

చంచలమైన మరియు అస్థిరమైన మనస్సు ఏ కారణం నుండి దూరంగా తిరుగుతుందో, అతను దాని నుండి దానిని నిరోధించి, దానిని స్వీయ నియంత్రణలోకి తీసుకురానివ్వండి.

KannadaIND

ಯಾವುದೇ ಕಾರಣದಿಂದ ಚಂಚಲ ಮತ್ತು ಅಸ್ಥಿರವಾದ ಮನಸ್ಸು ದೂರ ಸರಿಯುತ್ತದೆ, ಅವನು ಅದನ್ನು ತಡೆಯಲಿ ಮತ್ತು ಅದನ್ನು ಸ್ವಯಂ ನಿಯಂತ್ರಣಕ್ಕೆ ತರಲಿ.

MarathiIND

चंचल आणि चंचल मन कोणत्याही कारणास्तव दूर भटकत असेल तर त्याला त्यापासून रोखून एकट्या आत्म्याच्या नियंत्रणात आणावे.

AssameseIND

যি কাৰণৰ পৰা অস্থিৰ আৰু অস্থিৰ মন বিচৰণ কৰে, তাৰ পৰাই তাক সংযত কৰি অকল আত্মাৰ নিয়ন্ত্ৰণলৈ আনিব লাগে।

PunjabiIND

ਜਿਸ ਕਾਰਣ ਤੋਂ ਬੇਚੈਨ ਤੇ ਚੰਚਲ ਮਨ ਭਟਕਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਉਸ ਤੋਂ ਰੋਕ ਕੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਅਧੀਨ ਕਰ ਲਉ।

NepaliIND

चंचल र अस्थिर मन जुनसुकै कारणबाट टाढा जान्छ, उसलाई त्यसबाट रोकेर एक्लै स्वयंको नियन्त्रणमा ल्याउनुहोस्।

BengaliIND

অস্থির ও অস্থির মন যে কারণেই দূরে সরে যায়, সে যেন তা থেকে বিরত থাকে এবং তাকে একা নিজের নিয়ন্ত্রণে নিয়ে আসে।

GujaratiIND

ચંચળ અને અસ્થિર મન જે પણ કારણથી ભટકે છે, તેને તેમાંથી સંયમિત કરીને એકલા આત્માના નિયંત્રણમાં લાવવા દો.

TamilIND

அமைதியற்ற மற்றும் நிலையற்ற மனம் எந்த காரணத்திலிருந்து விலகிச் செல்கிறதோ, அதிலிருந்து அவர் அதைக் கட்டுப்படுத்தி, சுயத்தின் கட்டுப்பாட்டின் கீழ் கொண்டு வரட்டும்.

MalayalamIND

അസ്വസ്ഥവും അസ്ഥിരവുമായ മനസ്സ് ഏത് കാരണത്തിൽ നിന്ന് അകന്നുപോകുന്നുവോ, അതിൽ നിന്ന് അവൻ അതിനെ തടഞ്ഞുനിർത്തി അതിനെ സ്വയം നിയന്ത്രിക്കട്ടെ.

SindhiIND

جنهن به سبب کان بيقرار ۽ بي ثبات ذهن ڀڄي وڃي، ان کي ان کان روڪيو ۽ ان کي اڪيلو نفس جي قبضي ۾ آڻي.

OdiaIND

ଯେକ whatever ଣସି କାରଣରୁ ଅସ୍ଥିର ଏବଂ ଅସ୍ଥିର ମନ ଏଣେତେଣେ ଭ୍ରମଣ କରେ, ସେ ଏହାକୁ ଏଥିରୁ ନିବୃତ୍ତ କର ଏବଂ ଏହାକୁ କେବଳ ଆତ୍ମର ନିୟନ୍ତ୍ରଣରେ ଆଣ |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'यतो यतो निश्चरति ৷৷. आत्मन्येव वशं नयेत्'--साधकने जो ध्येय बनाया है, उसमें यह मन टिकता नहीं, ठहरता नहीं। अतः इसको अस्थिर कहा गया है। यह मन तरह-तरहके सांसारिक भोगोंका, पदार्थोंका चिन्तन करता है। अतः इसको 'चञ्चल' कहा गया है। तात्पर्य है कि यह मन न तो परमात्मामें स्थिर होता है और न संसारको ही छोड़ता है। इसलिये साधकको चाहिये कि यह मन जहाँ-जहाँ जाय, जिस-जिस कारणसे जाय, जैसे-जैसे जाय और जब-जब जाय, इसको वहाँ-वहाँसे, उस-उस कारणसे वैसे-वैसे और तब-तब हटाकर परमात्मामें लगाये। इस अस्थिर और चञ्चल मनका नियमन करनेमें सावधानी रखे, ढिलाई न करे।मनको परमात्मामें लगानेका तात्पर्य है कि जब यह पता लगे कि मन पदार्थोंका चिन्तन कर रहा है, तभी ऐसा विचार करे कि चिन्तनकी वृत्ति और उसके विषयका आधार और प्रकाशक परमात्मा ही हैं। यही परमात्मामें मन लगाना है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस प्रकार मनको आत्मामें स्थित करनेमें लगा हुआ योगी स्वाभाविक दोषके कारण जो अत्यन्त चञ्चल है तथा इसीलिये जो अस्थिर है ऐसा मन जिसजिस शब्दादि विषयके निमित्तसे विचलित होता है बाहर जाता है उसउस शब्दादि विषयरूप निमित्तसे ( इस मनको ) रोककर एवं उसउस विषयरूप निमित्तको यथार्थ तत्त्वनिरूपणद्वारा आभासमात्र दिखाकर वैराग्यकी भावनासे इस मनका ( बारंबार ) आत्मामें ही निरोध करे अर्थात् इसे आत्माके ही वशीभूत किया करे। इस प्रकार योगाभ्यासके बलसे योगीका मन आत्मामें ही शान्त हो जाता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

ननु मनसः शब्दादिनिमित्तानुरोधेन रागद्वेषवशादत्यन्तचञ्चलस्यास्थिरस्य तत्र तत्र स्वभावेन प्रवृत्तस्य कुतो नैश्चल्यं नैश्चिन्त्यं चेति तत्राह तत्रेति। योगप्रारम्भः सप्तम्यर्थः। एवंशब्देन मनसैवेत्यादिरुक्तप्रकारो गृह्यते। स्वाभाविको दोषो मिथ्याज्ञानाधीनो रागादिः। शब्दादेर्मनसो नियमनं कथमित्याशङ्क्याह तत्तन्निमित्तमिति। याथात्म्यनिरूपणं क्षयिष्णुत्वदुःखसंमिश्रत्वाद्यालोचनं तेन तत्र तत्र वैराग्यभावनया तत्तदाभासीकृत्य ततस्ततो नियम्यैतन्मन इति संबन्धः। मनोवशीकरणेनोपशमे किं स्यादित्याशङ्क्याह एवमिति। योगाभ्यासो विषयविवेकद्वारा मनोनिग्रहाद्यावृत्तिः। प्रशान्तमात्मन्येव प्रलीनमिति यावत्।

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Sri Dhanpati

ननु मनसः शब्दादिनिमित्तानुरोधेन रागद्वेषवशादतिच्चलस्यास्थिरस्य स्वभावादेव तत्रतत्र विषये प्रवृत्त्स्य नैश्चल्यं नैश्चिन्त्यं वा कुत इत्याशङ्क्याह यत इति। एवमात्मसंस्थं मनः कर्तुं प्रवृत्तो योगी यतो यतो यस्माद्यस्मान्निमित्ताच्छब्दादेर्निःसरति निर्गच्छति स्वभावदोषान्मनश्चञ्चलमतएवास्थिरं लयाभिमुखं। ततस्ततस्तस्मात्त्स्माच्छब्दादेर्निमित्तान्नियम्य तत्तच्छब्दादिनिमित्तं क्षयिष्णुत्वदुःखसंमिश्रत्वाद्यालोचनेन तत्रतत्र वैराग्यभावनयाऽभावीकृत्यात्मन्येवैतन्मनो वशं नयेदात्मवशतामापादयेत्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yataḥ yataḥwhenever and wherever
niśhcharatiwanders
manaḥthe mind
chañchalamrestless
asthiramunsteady
tataḥ tataḥfrom there
niyamyahaving restrained
etatthis
ātmanion God
evacertainly
vaśhamcontrol
nayetshould bring
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.25
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्

धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा संसारसे धीरे-धीरे उपराम हो जाय और परमात्मस्वरूपमें मन-(बुद्धि-) को सम्यक् प्रकारसे स्थापन करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.27
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्। उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्

जिसके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिसका रजोगुण तथा मन सर्वथा शान्त(निर्मल) हो गया है, ऐसे इस ब्रह्मस्वरूप योगीको निश्चित ही उत्तम (सात्त्विक) सुख प्राप्त होता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 26
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 26
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्

यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही लगाये। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ: "यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही लगाये। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 26?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 26 translates to: "From whatever cause the restless and unsteady mind wanders away, let him restrain it from that and bring it under the control of the Self alone. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 26 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही लगाये। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yato yato niśhcharati manaśh chañchalam asthiram" mean in English?

"yato yato niśhcharati manaśh chañchalam asthiram" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 26. From whatever cause the restless and unsteady mind wanders away, let him restrain it from that and bring it under the control of the Self alone. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.