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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 25
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्

धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा संसारसे धीरे-धीरे उपराम हो जाय और परमात्मस्वरूपमें मन-(बुद्धि-) को सम्यक् प्रकारसे स्थापन करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

కొద్దికొద్దిగా, అతను తెలివిని గట్టిగా పట్టుకోవడం ద్వారా స్థిరత్వాన్ని పొందనివ్వండి; మనస్సును నేనే స్థాపన చేసిన తరువాత, అతడు వేరే దేని గురించి ఆలోచించకూడదు.

NepaliIND

बिस्तारै बिस्तारै, उसले बुद्धिलाई दृढतापूर्वक समातेर स्थिरता प्राप्त गरोस्। मनलाई आत्ममा स्थापित गराएपछि, उसले अरू केही सोच्नु हुँदैन।

BhojpuriIND

धीरे-धीरे ओकरा के मजबूती से पकड़ के बुद्धि के स्थिरता प्राप्त करे; मन के आत्म में स्थापित कर के ऊ अउरी कुछ ना सोचे।

KonkaniIND

ल्हवू ल्हवू ताका बुध्दीची स्थिरताय घट्ट धरून मेळोवंक दिवची; मन आत्म्यांत स्थापन करून ताणें आनीक कांयच विचार करचो न्हय.

ManipuriIND

ꯇꯞꯅꯥ ꯇꯞꯅꯥ ꯃꯍꯥꯛꯅꯥ ꯋꯥꯈꯂꯒꯤ ꯇꯪꯗꯨ ꯂꯩꯇꯥꯕꯥ ꯑꯗꯨ ꯆꯦꯠꯅꯥ ꯊꯃꯗꯨꯅꯥ ꯐꯪꯂꯁꯤ; ꯋꯥꯈꯜ ꯑꯗꯨ ꯃꯁꯥꯃꯀꯄꯨ ꯃꯁꯥꯅꯥ ꯃꯁꯥꯕꯨ ꯊꯥꯖꯖꯗꯨꯅꯥ, ꯃꯍꯥꯛꯅꯥ ꯑꯇꯣꯞꯄꯥ ꯀꯔꯤꯒꯨꯝꯕꯥ ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯈꯟꯊꯔꯣꯏꯗꯕꯅꯤ꯫

AssameseIND

লাহে লাহে তেওঁ বুদ্ধিৰ স্থিৰতা দৃঢ়তাৰে ধৰি ৰাখক; মনক আত্মাত প্ৰতিষ্ঠা কৰি তেওঁ আন একো নাভাবিব।

TamilIND

கொஞ்சம் கொஞ்சமாக, புத்தியை உறுதியாகப் பிடித்துக் கொண்டு அவன் நிலைத்தன்மையை அடையட்டும்; மனதை தன்னில் நிலைநிறுத்திக் கொண்ட பிறகு, அவன் வேறு எதையும் நினைக்க வேண்டாம்.

SindhiIND

ٿوريءَ دير سان، عقل کي مضبوطيءَ سان پڪڙي ان جي ثابت قدمي حاصل ڪري. ذهن کي پاڻ ۾ قائم ڪرڻ کان پوء، هن کي ٻيو ڪجهه سوچڻ نه ڏيو.

PunjabiIND

ਹੌਲੀ-ਹੌਲੀ, ਉਸ ਨੂੰ ਅਕਲ ਨੂੰ ਮਜ਼ਬੂਤੀ ਨਾਲ ਫੜ ਕੇ ਸਥਿਰਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਦਿਓ; ਮਨ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿਚ ਸਥਾਪਿਤ ਕਰ ਕੇ, ਉਸ ਨੂੰ ਹੋਰ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਸੋਚਣਾ ਚਾਹੀਦਾ।

MarathiIND

हळूहळू बुद्धीला घट्ट धरून त्याला स्थिरता प्राप्त होऊ द्या; मनाला स्वतःमध्ये स्थापित केल्यावर, त्याने इतर कशाचाही विचार करू नये.

BengaliIND

একটু একটু করে, তাকে শক্ত করে ধরে বুদ্ধির স্থিরতা লাভ করুক; মনকে আত্মায় প্রতিষ্ঠিত করে, সে যেন আর কিছু না ভাবতে পারে।

MalayalamIND

അല്പാൽപ്പമായി, ബുദ്ധിയെ മുറുകെപ്പിടിച്ചുകൊണ്ട് അവൻ സ്ഥിരത കൈവരിക്കട്ടെ; മനസ്സിനെ സ്വയത്തിൽത്തന്നെ നിലനിറുത്തിക്കൊണ്ട് അവൻ മറ്റൊന്നും ചിന്തിക്കരുത്.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'बुद्ध्या धृतिगृहीतया'--साधन करते-करते प्रायः साधकोंको उकताहट होती है, निराशा होती है कि ध्यान लगाते, विचार करते इतने दिन हो गये पर तत्त्वप्राप्ति नहीं हुई, तो अब क्या होगी कैसे होगी? इस बातको लेकर भगवान् ध्यानयोगके साधकको सावधान करते हैं कि उसको ध्यानयोगका अभ्यास करते हुए सिद्धि प्राप्त न हो, तो भी उकताना नहीं चाहिये, प्रत्युत धैर्य रखना चाहिये। जैसे सिद्धि प्राप्त होनेपर, सफलता होनेपर धैर्य रहता है, विफलता होनेपर भी वैसा ही धैर्य रहना चाहिये कि वर्ष-के-वर्ष बीत जायँ, शरीर चला जाय, तो भी परवाह नहीं, पर तत्त्वको तो प्राप्त करना ही है । कारण कि इससे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा काम है नहीं। इसलिये इसको समाप्त करके आगे क्या काम करना है? यदि इससे भी बढ़कर कोई काम है तो इसको छोड़ो और उस कामको अभी करो!--इस प्रकार बुद्धिको वशमें कर ले अर्थात् बुद्धिमें मान, बड़ाई, आराम आदिको लेकर जो संसारका महत्त्व पड़ा है, उस महत्त्वको हटा दे। तात्पर्य है कि पूर्वश्लोकमें जिन विषयोंका त्याग करनेके लिये कहा गया है, धैर्यपूर्वक बुद्धिसे उन विषयोंसे उपराम हो जाय।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

शनैःशनैः अर्थात् सहसा नहीं क्रमक्रमसे उपरतिको प्राप्त करे। किसके द्वारा बुद्धिद्वारा। कैसी बुद्धिद्वारा धैर्यसे धारण की हुई अर्थात् धैर्ययुक्त बुद्धिद्वारा। तथा मनको आत्मामें स्थित करके अर्थात् यह सब कुछ आत्मा ही है उससे अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है इस प्रकार मनको आत्मामें अचल करके अन्य किसी वस्तुका भी चिन्तन न करे। यह योगकी परम श्रेष्ठ विधि है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

कामत्यागद्वारेणेन्द्रियाणि प्रत्याहृत्य किं कुर्यादिति शङ्कितारं प्रत्याह शनैः शनैरिति। सहसाविषयेभ्यः सकाशादुपरमे मनसो न स्वास्थ्यं संभवतीत्यभिप्रेत्याह न सहसेति। तत्र साधनं धैर्ययुक्ता बुद्धिरित्याह कयेत्यादिना। भूम्यादीरव्याकृतपर्यन्ताः प्रकृतीरष्ट पूर्वपूर्वत्र धारणं कृत्वोत्तरोत्तरक्रमेण प्रविलापयेदिति भावः। अव्यक्तमात्मनि प्रविलाप्यात्ममात्रनिष्ठं मनो विधाय चिन्तयितव्याभावादतिस्वस्थो भवेदित्याह आत्मेति। तत्र संस्थितिमेव मनसो विवृणोति आत्मैवेति। योगविधिमुपक्रम्य किमिदमुक्तमित्याशङ्क्याह एष इति। यन्मनसो नैश्चल्यमिति शेषः।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

एवं कृत्वा किं कुर्यादित्यत आह शनैरिति। धृतिगृहीतया धैर्ययुक्तया बुद्य्धोपरमेन्मनस उपरतिं संपादयेत्। शनैः शनैः क्रमेण नतु सहसा। ननूपरतिं प्रापितमपि मनः पुनः पदार्थान्तरचिन्तरनेनोपरतिं हास्यतीत्याशङ्क्याह। आत्मसंस्थमात्मैव सर्वं न ततोऽन्यत् किंचिदस्तीत्येवमात्मसंस्थं मनः कृत्वा आत्मेतरवस्त्वभावान्न किंचिदपि चिन्तयेत्। मनसो मैश्चल्यस्य परमयोगावधित्वात्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhanaiḥgradually
śhanaiḥgradually
uparametattain peace
buddhyāby intellect
dhṛitigṛihītayā
ātmasanstham
manaḥmind
kṛitvāhaving made
nanot
kiñchitanything
apieven
chintayetshould think of
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.24
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः। मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः

संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंका सर्वथा त्याग करके और मनसे ही इन्द्रिय-समूहको सभी ओरसे हटाकर। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.26
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्

यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही लगाये। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 25
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 25
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्

धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा संसारसे धीरे-धीरे उपराम हो जाय और परमात्मस्वरूपमें मन-(बुद्धि-) को सम्यक् प्रकारसे स्थापन करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 25 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 25 का हिंदी अर्थ: "धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा संसारसे धीरे-धीरे उपराम हो जाय और परमात्मस्वरूपमें मन-(बुद्धि-) को सम्यक् प्रकारसे स्थापन करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 25?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 25 translates to: "Little by little, let him attain steadiness of the intellect by holding it firmly; having made the mind establish itself in the Self, let him not think of anything else. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तये" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 25 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा संसारसे धीरे-धीरे उपराम हो जाय और परमात्मस्वरूपमें मन-(बुद्धि-) को सम्यक् प्रकारसे स्थापन करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhanaiḥ śhanair uparamed buddhyā dhṛiti-gṛihītayā" mean in English?

"śhanaiḥ śhanair uparamed buddhyā dhṛiti-gṛihītayā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 25. Little by little, let him attain steadiness of the intellect by holding it firmly; having made the mind establish itself in the Self, let him not think of anything else. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.