Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 27
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्। उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्

जिसके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिसका रजोगुण तथा मन सर्वथा शान्त(निर्मल) हो गया है, ऐसे इस ब्रह्मस्वरूप योगीको निश्चित ही उत्तम (सात्त्विक) सुख प्राप्त होता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TeluguIND

ఎవరి మనస్సు ప్రశాంతంగా ఉంటుందో, ఎవరి మోహం చల్లారుతుందో, ఎవరు బ్రహ్మంగా మారారో, పాపం లేని ఈ యోగికి నిజంగా పరమానందం కలుగుతుంది.

BengaliIND

প্রকৃতপক্ষে পরম সুখ এই যোগীর কাছে আসে যাঁর মন শান্ত হয়, যাঁর আবেগ প্রশমিত হয়, যিনি ব্রহ্ম হয়েছেন এবং যিনি পাপমুক্ত।

MarathiIND

ज्याचे चित्त शांत झाले आहे, ज्याची वासना शमली आहे, जो ब्रह्म झाला आहे आणि जो पापमुक्त झाला आहे, अशा योगीला खरोखरच परम आनंद प्राप्त होतो.

SindhiIND

پرڀوءَ جي نعمت حقيقت ۾ اچي ٿي هن يوگي کي جنهن جي ذهن کي سڪون مليل آهي، جنهن جو جذبو ختم ٿي ويو آهي، جيڪو برهمڻ بڻجي ويو آهي ۽ جيڪو گناهن کان پاڪ آهي.

BhojpuriIND

परम आनंद वाकई एह योगी के आवेला जेकर मन शान्त हो गइल बा, जेकर राग दमन हो गइल बा, जे ब्रह्म बन गइल बा आ जे पाप से मुक्त बा.

MaithiliIND

परम आनंद वास्तव में एहि योगी के अबैत छनि जिनकर मन शान्त भ गेल छनि, जिनकर राग दम गेल छनि, जे ब्रह्म बनि गेल छथि, आ जे पाप सं मुक्त छथि |

DogriIND

परम आनंद वाकई इस योगी गी औंदा ऐ जिसदा मन शांतिपूर्ण होंदा ऐ, जिसदा राग दमन होंदा ऐ, जेह्ड़ा ब्रह्म बनी गेदा ऐ, ते जेह्ड़ा पाप थमां मुक्त ऐ।

KannadaIND

ಯಾವ ಯೋಗಿಗೆ ಮನಸ್ಸು ಶಾಂತವಾಗಿದೆಯೋ, ಯಾರ ಮೋಹವು ಶಮನವಾಗಿದೆಯೋ, ಯಾರು ಬ್ರಹ್ಮನಾಗಿದ್ದಾನೆ ಮತ್ತು ಪಾಪದಿಂದ ಮುಕ್ತನಾಗಿರುತ್ತಾನೋ ಅಂತಹ ಯೋಗಿಗೆ ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಪರಮಾನಂದವು ಬರುತ್ತದೆ.

GujaratiIND

જેનું મન શાંત થયું છે, જેનું ઝનૂન શમી ગયું છે, જે બ્રહ્મ બન્યો છે અને જે પાપમુક્ત છે એવા આ યોગીને ખરેખર પરમ આનંદ આવે છે.

PunjabiIND

ਸੱਚਮੁੱਚ ਪਰਮ ਅਨੰਦ ਇਸ ਯੋਗੀ ਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਹੈ ਜਿਸ ਦਾ ਮਨ ਸ਼ਾਂਤ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ, ਜਿਸ ਦੀ ਲਗਨ ਬੰਦ ਹੋ ਗਈ ਹੈ, ਜੋ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ ਅਤੇ ਜੋ ਪਾਪ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹੈ।

KonkaniIND

मन शांत जाल्लो, राग शांत जाल्लो, ब्रह्म जाल्लो आनी पापमुक्त आशिल्ल्या ह्या योगीक खरेंच परम आनंद मेळटा.

MizoIND

He Yogi rilru thlamuang, a duhzawng tihreh, Brahman lo ni tawh, sual laka fihlim tawh hi Lâwmna sang ber a lo thleng tak zet a ni.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'प्रशान्तमनसं ह्येनं ৷৷. ब्रह्मभूतमकल्मषम्'--जिसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गये हैं अर्थात् तमोगुण और तमोगुणकी अप्रकाश अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह (गीता 14। 13)--ये वृत्तियाँ नष्ट हो गयी हैं, ऐसे योगीको यहाँ 'अकल्मषम्' कहा गया है। जिसका रजोगुण और रजोगुणकी लोभ, प्रवृत्ति, नये-नये कर्मोंमें लगना, अशान्ति और स्पृहा (गीता 14। 12)--ये वृत्तियाँ शान्त हो गयी हैं, ऐसे योगीको यहाँ 'शान्तरजसम्' बताया गया है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

क्योंकि जिसका मन भलीभाँति शान्त है जिसका रजोगुण शान्त हो गया है अर्थात् जिसका मोहादि क्लेशरूप रजोगुण अच्छी प्रकार क्षीण हो चुका है जो ब्रह्मरूप जीवन्मुक्त अर्थात् यह सब कुछ ब्रह्म ही है ऐसे निश्चयवाला है एवं जो अधर्मादि दोषोंसे रहित है उस योगीको निरतिशय उत्तम सुख प्राप्तहोता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

मनस्तद्वृत्त्योरभावे स्वरूपभूतसुखाविर्भावस्य स्वापादौ प्रसिद्धिं द्योतयितुं हिशब्दः। मोहादिक्लेशप्रतिबन्धाद्योगिनि यथोक्तसुखाप्राप्तिमाशङ्क्य मनोविलयमुपेत्य परिहरति शान्तेति। तस्यास्मदादिविलक्षणत्वमाह ब्रह्मभूतमिति। अस्मदादेरपि स्वतो ब्रह्मभूतत्वेन तुल्यं जीवन्मुक्तत्वमित्याशङ्क्याह ब्रह्मैवेति। धर्माधर्मप्रतिबन्धादयुक्ता यथोक्तसुखप्राप्तिरित्याशङ्क्योक्तम् अकल्मषमिति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

योगिनमुत्तमं सुखमुपैतीत्युक्तं तदेव स्फुटयति यञ्जन्निति। एवं यथोक्तेन क्रमेणात्मानमन्तःकरणं सदा दीर्घकालमादरनैरन्तर्याम्यां च युञ्जन् आत्मनि स्थिरं कुर्वन्। योगान्तरायवर्जित इति भाष्यम्। योगान्तरायाश्च योगसूत्रप्रदर्शिताःव्याधिस्त्यनसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वावस्थितत्वानि चित्तविषेपास्तेऽन्तरायाः दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः इति। एत रजस्तमोवशात्प्रवर्तमानाश्चित्तस्य विक्षेपा भवन्ति। तैरेकाग्रताविरोधिभिश्चित्तं विक्षिप्यत इत्यर्थः। तत्र व्याधिर्धातुवैषम्यनिमित्तो ज्वरादिः। स्त्यानमकर्मण्यता। संशयश्चित्तस्योभयकोठ्यालम्बनम्। विज्ञानं योगः साध्यो नवेति। प्रमादोऽनुत्थानशीलता। समाधिसाधने औदासीन्यं आलस्यम्। कायचित्तयोर्गुरुत्वं योगविषये प्रीत्यभावहेतुः। अविरतिश्चित्तस्य विषयसंप्रयोगात्मागर्धः। भ्रान्तिदर्शनं शुक्तिकायां रजतवद्धिपर्ययज्ञानम्। लब्धभूमि कत्वं कुतश्चिन्निमित्तात्समाधिभूमेरलाभः। अनवस्थितत्वं लब्धावस्थायामपि समाधिभूमौ चित्तस्य तत्राप्रतिष्ठा। एते समाधेरेकाग्रताया यथायोगं प्रतिपक्षत्वादन्तराया इत्युच्यन्ते। चित्तविक्षेपकारकानन्यानप्यन्तरायान्प्रतिपादयितुमाह। कुतश्चिन्निमित्तादुत्पन्नेषु विक्षेपेषु एते दुःखादयः प्रवर्तन्ते तत्र दुःखंचित्तस्य रागजः परिणामो बाधनालक्षणः। यद्वाधात्प्राणिनस्ततपघाताय प्रवर्तन्ते। तौर्मनस्यं बाह्याभ्यन्तरैः करणैर्मनसो तौस्थ्यम्। अङ्गमेजयत्वं सर्वाङगीणो वेपथुः आसनस्थैर्यस्य बाधकः। प्राणो यद्वाह्यवायुमाचामति स श्वासः यत्कौष्ठ्यं वायुं निःश्वसिति स प्रश्वासः िति योगसूत्रार्थः। विगतकल्मषः पापादिरहितः सुखेनानायासेनात्यन्तं निरतिशयं सुखं ब्रह्मसंस्पर्शं ब्रह्मणा परमात्मना सभ्यक् स्पर्शो यस्य तत्। ब्रह्माभिन्नं सुखमश्रुते व्याप्नोति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
praśhāntapeaceful
manasammind
hicertainly
enamthis
yoginamyogi
sukham uttamamthe highest bliss
upaitiattains
śhāntarajasam
brahmabhūtam
akalmaṣhamwithout sin
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.26
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्

यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही लगाये। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.28
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः। सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते

इस प्रकार अपने-आपको सदा परमात्मामें लगाता हुआ पापरहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्मप्राप्तिरूप अत्यन्त सुखको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 27
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 27
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्। उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्

जिसके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिसका रजोगुण तथा मन सर्वथा शान्त(निर्मल) हो गया है, ऐसे इस ब्रह्मस्वरूप योगीको निश्चित ही उत्तम (सात्त्विक) सुख प्राप्त होता है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ: "जिसके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिसका रजोगुण तथा मन सर्वथा शान्त(निर्मल) हो गया है, ऐसे इस ब्रह्मस्वरूप योगीको निश्चित ही उत्तम (सात्त्विक) सुख प्राप्त होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 27?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 27 translates to: "Supreme Bliss indeed comes to this Yogi whose mind is made peaceful, whose passion is quelled, who has become Brahman, and who is free from sin. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्। उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 27 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। जिसके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिसका रजोगुण तथा मन सर्वथा शान्त(निर्मल) हो गया है, ऐसे इस ब्रह्मस्वरूप योगीको निश्चित ही उत्तम (सात्त्विक) सुख प्राप्त होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "praśhānta-manasaṁ hyenaṁ yoginaṁ sukham uttamam" mean in English?

"praśhānta-manasaṁ hyenaṁ yoginaṁ sukham uttamam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 27. Supreme Bliss indeed comes to this Yogi whose mind is made peaceful, whose passion is quelled, who has become Brahman, and who is free from sin. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.