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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 19
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः

जैसे स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है, योगका अभ्यास करते हुए वश में किए हुए चित्तवाले योगीके चित्तकी वैसी ही उपमा कही गयी है। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

గాలిలేని ప్రదేశంలో ఉంచిన దీపం ఎలా ఆరదుదో, అలాగే నియంత్రిత మనస్సు గల యోగి, ఆత్మలో యోగ సాధన చేసే యోగి పోల్చబడతాడు.

MarathiIND

वारा नसलेल्या जागी ठेवलेला दिवा जसा लखलखत नाही, त्याचप्रमाणे नियंत मनाचा योगी, जो आत्म्यात योग साधतो, त्याची तुलना केली जाते.

TamilIND

காற்று இல்லாத இடத்தில் வைக்கப்படும் விளக்கு ஒளிராமல் இருப்பது போல, சுயமாக யோகா பயிற்சி செய்யும் கட்டுப்பாடான மனதைக் கொண்ட யோகி ஒப்பிடப்படுகிறார்.

PunjabiIND

ਜਿਵੇਂ ਹਵਾ ਰਹਿਤ ਥਾਂ 'ਤੇ ਰੱਖਿਆ ਹੋਇਆ ਦੀਵਾ ਨਹੀਂ ਟਿਮਟਦਾ, ਉਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇੱਕ ਨਿਯੰਤਰਿਤ ਮਨ ਦਾ ਯੋਗੀ, ਜੋ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿੱਚ ਯੋਗ ਦਾ ਅਭਿਆਸ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਦੀ ਤੁਲਨਾ ਵਿੱਚ ਹੈ।

BengaliIND

বায়ুবিহীন স্থানে স্থাপিত প্রদীপ যেমন জ্বলে না, তেমনি নিয়ন্ত্রিত মনের যোগী, যিনি আত্মার মধ্যে যোগ অনুশীলন করেন, তুলনা করেন।

NepaliIND

जसरी हावाविहीन स्थानमा राखिएको दियो झिलिमिली हुँदैन, त्यसरी नै आत्ममा योग अभ्यास गर्ने नियन्त्रित मनको योगीको तुलना हुन्छ।

SindhiIND

جيئن واءُ واري جاءِ تي رکيل چراغ ٽمٽار نه ٿو ٿئي، تيئن هڪ ڪنٽرول ٿيل دماغ جو يوگي آهي، جيڪو پاڻ ۾ يوگا جي مشق ڪري ٿو، مقابلي ۾.

GujaratiIND

જેમ પવનવિહીન જગ્યાએ મૂકેલો દીવો ઝળહળતો નથી, તેવી જ રીતે નિયંત્રિત મનનો યોગી, જે આત્મામાં યોગનો અભ્યાસ કરે છે, તેની સરખામણીમાં.

DogriIND

जिवें हवाहीन थां ते रखे दी दीप झिलमिलांदा नहीं, उवें ही नियंत्रत मन दे योगी, जो आत्म विच योग करदा है, दी तुलना कीती जांदी है।

MalayalamIND

കാറ്റില്ലാത്ത സ്ഥലത്ത് വെച്ച വിളക്ക് മിന്നിമറയാത്തതുപോലെ, സ്വയം യോഗ ചെയ്യുന്ന നിയന്ത്രിത മനസ്സിൻ്റെ യോഗിയെ താരതമ്യം ചെയ്യുന്നു.

KonkaniIND

वाऱ्या नाशिल्ल्या सुवातेर दवरिल्लो दिवो जसो झिलमिलना तसोच आत्म्यांत योग करपी नियंत्रीत मनाच्या योगीची तुळा करतात.

KannadaIND

ಗಾಳಿಯಿಲ್ಲದ ಸ್ಥಳದಲ್ಲಿ ಇಟ್ಟ ದೀಪವು ಹೇಗೆ ಮಿನುಗುವುದಿಲ್ಲವೋ, ಹಾಗೆಯೇ ಆತ್ಮದಲ್ಲಿ ಯೋಗವನ್ನು ಅಭ್ಯಾಸ ಮಾಡುವ ನಿಯಂತ್ರಿತ ಮನಸ್ಸಿನ ಯೋಗಿಯನ್ನು ಹೋಲಿಸಲಾಗುತ್ತದೆ.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'यथा दीपो निवातस्थो ৷৷. युञ्जतो योगमात्मनः'--जैसे सर्वथा स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें रखे हुए दीपककी लौ थोड़ी भी हिलती-डुलती नहीं है ,ऐसे ही जो योगका अभ्यास करता है, जिसका मन स्वरूपके चिन्तनमें लगता है और जिसने चित्तको अपने वशमें कर रखा है, उस ध्यानयोगीकेचित्तके लिये भी दीपककी लौकी उपमा दी गयी है। तात्पर्य है कि उस योगीका चित्त स्वरूपमें ऐसा लगा हुआ है कि उसमें एक स्वरूपके सिवाय दूसरा कुछ भी चिन्तन नहीं होता।पूर्वश्लोकमें जिस योगीके चित्तको विनियत कहा गया है, उस वशीभूत किये हुए चित्तवाले योगीके लिये यहाँ 'यतचित्तस्य' पद आया है।कोई भी स्थान वायुसे सर्वथा रहित नहीं होता। वायु सर्वत्र रहती है। कहींपर वायु स्पन्दनरूपसे रहती है और कहींपर निःस्पन्दनरूपसे रहती है। इसलिये यहाँ

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

उस योगीका जो समाधिस्थ चित्त है उसकी उपमा कही जाती है जैसे वायुरहित स्थानमें रखा हुआ दीपक विचलित नहीं होता वही उपमा आत्मध्यानका अभ्यास करनेवाले समाधिमें स्थित हुए योगीके जीते हुए अन्तःकरणकी चित्तगतिको प्रत्यक्ष देखनेवाले योगवेत्ता पुरुषोंने मानी है। जिससे किसीकी समानता की जाय उसका नाम उपमा है।

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Sri Anandgiri

उपमा योगिनश्चित्तस्थैर्यस्योदाहरणमित्यर्थः। उपमाशब्दस्य प्रदीपविषयत्वसिद्ध्यर्थं करणव्युत्पत्तिं दर्शयति उपमीयत इति। योगिनो यथोक्तविशेषणवतश्चित्तस्थैर्यस्यैति शेषः।

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Sri Dhanpati

योगिनः समाहितचित्तस्योपमानमाह यथेति। यथा प्रदीपो निवाते वायुवर्जिते देशे स्थितो नेङ्गते न चलति।उपमीयतेऽनयेत्युपमा सा योगज्ञैः चित्तप्रचारज्ञैः स्मृता चिन्तिता। योगिनो यतचित्तस्य संयतान्तःकरणस्यात्मनो योगं समाधिमनुतिष्ठतः। अत्रोत्थानिकायां समाहितं च तच्चित्तमिति कर्मधारयः। योगिनः समाहितचित्तस्येति व्यधिकरणे षष्ठ्यौ। एवं मूले तद्भाष्ये च ज्ञेयम्। एवं योगाभ्यासबलादेकाग्रीभूतं निवातप्रदीपकल्पं सदित्युत्तरश्लोकस्थभाष्यात्। योगिनो यथोक्तविशेषणवतश्चित्तस्थैर्यस्येति शेष इति तु भाष्यटीकाकाराः। एतेनात्मनो योगं नियुञ्जत इति व्याख्याने दार्ष्टान्तिकालाभः सर्वावस्थस्यापि चित्तस्य सर्वदात्माकारतयात्मपदवैयर्थ्यं च। नहि योगेनात्माकारता चित्तस्य संपाद्यते किंतु स्वतएवात्माकारस्य सतो नात्माकारता निवर्त्यत इति तस्माद्दार्ष्टान्तिकलाभप्रतिपादनार्थमात्मपदमिति प्रत्युक्तम्। विवेकादियुक्तेन मनसाऽविद्यानिवृत्त्यात्मा स्वयमेव प्रकाशते इत्यर्थे मनसैवानुद्रष्टव्यमितिवत् योगेनानात्माकारतां चित्तस्य प्रत्युक्तम्। विवेकादियुक्तेन मनसाऽविद्यानिवृत्त्यात्मा स्वयमेव प्रकाशते इत्यर्थे मनसैवानुद्रष्टव्यमितिवत् योगेनानात्माकारतां चित्तस्य निवर्त्य स्वतःसिद्धामात्माकारतां स्फुरणरुपां समाधिमनुतिष्ठत इत्यर्थके आत्मनो योगं युञ्जत इति वाक्ये आत्मपदस्य सार्थक्यात्। अन्यथा आत्मसंस्थं मनःकृत्वेति वक्ष्यमाणात्मपदवैयर्थ्यप्रसङ्गात्। युञ्जतन्नेवं सदात्मानमितिवत् आत्मनोऽन्तःकरणस्य समाधिं निरोधमनुतिष्ठतोऽसंप्रज्ञातसमाध्यभिमुखस्येति भाष्यार्थसंभवेनात्मपदसार्थक्याच्च। अतएव योगिनो यतचित्तस्य निरुद्धसर्ववृत्तेरसंप्रज्ञातसमाधिरुपं योगं निरोधभूमौ युञ्जतोऽनुतिष्ठितः य आत्मान्तःकरणं तस्य निश्चलतया सत्त्वोद्रेकेण प्रकाशकतया च निश्चलो दीपो दृष्टान्त इत्यप्यपास्तम्। निश्चलताप्रतिपादकयतपदसमभिव्याहारात्। समीपत्वाच्चान्वययोग्यं चित्तपदं विहायात्मपदस्य दार्ष्टान्तिकपरत्वानौचित्यात् असंप्रज्ञातसमाधौ चित्तस्य कथमपि पृथग्ज्ञायमानत्वात् असंप्रज्ञातसमाध्यभिमुखस्य योगिनस्तत्सिद्धिपूर्वकाले यदेकाग्रीभूतं चित्तं तस्यायं दृष्टान्तो नतु निरुद्धसर्ववृत्तेरसंप्रज्ञातसमाधिस्थस्य योगिनोऽन्तःकरणस्येति विद्वद्भिराकलनीयम्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yathāas
dīpaḥa lamp
nivātasthaḥ
nadoes not
iṅgateflickers
this
upamāanalogy
smṛitāis considered
yoginaḥof a yogi
yatachittasya
yuñjataḥsteadily practicing
yogamin meditation
ātmanaḥon the Supreme
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.18
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते। निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा

वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है और स्वयं सम्पूर्ण पदार्थोंसे निःस्पृह हो जाता है, उस कालमें वह योगी है - ऐसा कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.20
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। यत्र चैवात्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति

योगका सेवन करनेसे जिस अवस्थामें निरुद्ध चित्त उपराम हो जाता है तथा जिस अवस्थामें स्वयं अपने-आप से अपने-आपको देखता हुआ अपने-आपमें ही सन्तुष्ट हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 19
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 19
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः

जैसे स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है, योगका अभ्यास करते हुए वश में किए हुए चित्तवाले योगीके चित्तकी वैसी ही उपमा कही गयी है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ: "जैसे स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है, योगका अभ्यास करते हुए वश में किए हुए चित्तवाले योगीके चित्तकी वैसी ही उपमा कही गयी है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 19?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 19 translates to: "As a lamp placed in a windless spot does not flicker, so is the Yogi of a controlled mind, who practices Yoga in the Self, compared. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 19 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। जैसे स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है, योगका अभ्यास करते हुए वश में किए हुए चित्तवाले योगीके चित्तकी वैसी ही उपमा कही गयी है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yathā dīpo nivāta-stho neṅgate sopamā smṛitā" mean in English?

"yathā dīpo nivāta-stho neṅgate sopamā smṛitā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 19. As a lamp placed in a windless spot does not flicker, so is the Yogi of a controlled mind, who practices Yoga in the Self, compared. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.