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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 20
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। यत्र चैवात्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति

योगका सेवन करनेसे जिस अवस्थामें निरुद्ध चित्त उपराम हो जाता है तथा जिस अवस्थामें स्वयं अपने-आप से अपने-आपको देखता हुआ अपने-आपमें ही सन्तुष्ट हो जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

యోగ సాధనచే నిగ్రహించబడిన మనస్సు ప్రశాంతతను పొంది, ఆత్మను స్వయంగా చూసినప్పుడు, వారు తమ స్వయంలోనే తృప్తి చెందుతారు.

BengaliIND

যোগ সাধনার দ্বারা সংযত মন যখন নিস্তব্ধতা লাভ করে এবং যখন আত্মাকে স্বচক্ষে দেখে, তখন তারা নিজের আত্মায় তৃপ্ত হয়।

NepaliIND

योग साधनाद्वारा संयमित मनले शान्तता प्राप्त गर्छ र जब व्यक्ति स्वयंलाई देख्छ, तब स्वयं स्वयंमा सन्तुष्ट हुन्छ।

TamilIND

யோகப் பயிற்சியால் அடக்கப்பட்ட மனம், அமைதி அடையும் போது, ​​ஒருவன் தன்னைத்தானே பார்க்கும்போது, ​​தன் சுயத்தில் திருப்தி அடைகிறது.

MalayalamIND

യോഗാഭ്യാസത്താൽ നിയന്ത്രിതമായ മനസ്സ് നിശ്ശബ്ദത പ്രാപിക്കുമ്പോൾ, ഒരുവൻ സ്വയം കാണുമ്പോൾ, അവർ സ്വന്തം ആത്മാവിൽ സംതൃപ്തരാകുന്നു.

GujaratiIND

જ્યારે મન, યોગના અભ્યાસથી સંયમિત, શાંત થાય છે, અને જ્યારે વ્યક્તિ સ્વયંને સ્વાર્થે જુએ છે, ત્યારે તે પોતાના આત્મામાં સંતુષ્ટ થાય છે.

SindhiIND

جڏهن ذهن، يوگا جي مشق سان روڪيل، خاموشي حاصل ڪري ٿو، ۽ جڏهن ڪو ماڻهو پنهنجي نفس کي ڏسي ٿو، اهي پنهنجي نفس ۾ مطمئن آهن.

MarathiIND

योगसाधनेने संयमित झालेले मन जेव्हा शांततेची प्राप्ती करते आणि जेव्हा कोणी आत्मस्वरूपाचे दर्शन घेते तेव्हा ते स्वतःच्या आत्म्यात तृप्त होतात.

PunjabiIND

ਜਦੋਂ ਮਨ, ਯੋਗ ਦੇ ਅਭਿਆਸ ਦੁਆਰਾ ਰੋਕਿਆ ਹੋਇਆ, ਅਡੋਲਤਾ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਜਦੋਂ ਕੋਈ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਆਪ ਦੁਆਰਾ ਵੇਖਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿੱਚ ਸੰਤੁਸ਼ਟ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

KannadaIND

ಯೋಗಾಭ್ಯಾಸದಿಂದ ನಿಗ್ರಹಗೊಂಡ ಮನಸ್ಸು ನಿಶ್ಯಬ್ದವನ್ನು ಪಡೆದಾಗ ಮತ್ತು ಆತ್ಮವನ್ನು ಆತ್ಮದಿಂದ ನೋಡಿದಾಗ ಅವರು ತಮ್ಮ ಆತ್ಮದಲ್ಲಿಯೇ ತೃಪ್ತರಾಗುತ್ತಾರೆ.

KonkaniIND

योगाभ्यासान संयमी मन जेन्ना शांतताय मेळयता आनी आत्म्यान आत्म्यान पळयतना ते स्वताच्या आत्म्यांत समाधानी जातात.

BhojpuriIND

योग के साधना से संयमित मन जब शान्तता प्राप्त करेला आ आत्म से आत्म के देखला पर ऊ अपना आत्म में संतुष्ट हो जाला।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'यत्रोपरमते चित्तं ৷৷. पश्यन्नात्मनि तुष्यति'--ध्यानयोगमें पहले 'मनको केवल स्वरूपमें ही लगाना है' यह धारणा होती है। ऐसी धारणा होनेके बाद स्वरूपके सिवाय दूसरी कोई वृत्ति पैदा हो भी जाय, तो उसकी उपेक्षा करके उसे हटा देने और चित्तको केवल स्वरूपमें ही लगानेसे जब मनका प्रवाह केवल स्वरूपमें ही लग जाता है, तब उसको ध्यान कहते हैं। ध्यानके समय ध्याता, ध्यान और ध्येय--यह त्रिपुटी रहती है अर्थात् साधक ध्यानके समय अपनेको ध्याता (ध्यान करनेवाला) मानता है, स्वरूपमें तद्रूप होनेवाली वृत्तिको ध्यान मानता है और साध्यरूप स्वरूपको ध्येय मानता है। तात्पर्य है कि जबतक इन तीनोंका अलग-अलग ज्ञान रहता है, तबतक वह 'ध्यान' कहलाता है। ध्यानमें ध्येयकी मुख्यता होनेके कारण साधक पहले अपनेमें ध्यातापना भूल जाता है। फिर ध्यानकी वृत्ति भी भूल जाता है। अन्तमें केवल ध्येय ही जाग्रत् रहता है। इसको 'समाधि' कहते हैं। यह 'संप्रज्ञातसमाधि' है जो चित्तकी एकाग्र अवस्थामें होती है। इस समाधिके दीर्घकालके अभ्याससे फिर 'असंप्रज्ञात-समाधि' होती है। इन दोनों समाधियोंमें भेद यह है कि जबतक ध्येय, ध्येयका नाम और नाम-नामीका सम्बन्ध--ये तीनों चीजें रहती हैं, तबतक वह 'संप्रज्ञात-समाधि' होती है। इसीको चित्तकी 'एकाग्र' अवस्था कहते हैं। परन्तु जब नामकी स्मृति न रहकर केवल नामी (ध्येय) रह जाता है, तब वह 'असंप्रज्ञात-समाधि' होती है। इसीको चित्तकी 'निरुद्ध' अवस्था कहते हैं।निरुद्ध अवस्थाकी समाधि दो तरहकी होती है--सबीज और निर्बीज। जिसमें संसारकी सूक्ष्म वासना रहती है, वह 'सबीज समाधि' कहलाती है। सूक्ष्म वासनाके कारण सबीज समाधिमें सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं। ये सिद्धियाँ सांसारिक दृष्टिसे तो ऐश्वर्य हैं, पर पारमार्थिक दृष्टिसे (चेतन-तत्त्वकी प्राप्तिमें) विघ्न हैं। ध्यानयोगी जब इन सिद्धियोंको निस्तत्त्व समझकर इनसे उपराम हो जाता है, तब उसकी 'निर्बीज समाधि' होती है, जिसका यहाँ (इस श्लोकमें)

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस प्रकार योगाभ्यासके बलसे वायुरहित स्थानमें रखे हुए दीपककी भाँति एकाग्र किया हुआ योगसाधनसे निरुद्ध किया हुआ सब ओरसे चञ्चलतारहित किया हुआ चित्त जिस समय उपरत होता है उपरतिको प्राप्त होता है। तथा जिस कालमें समाधिद्वारा अति निर्मल ( स्वच्छ ) हुए अन्तःकरणसे परम चैतन्य ज्योतिःस्वरूप आत्माका साक्षात् करता हुआ वह अपने आपमें ही संतुष्ट हो जाता है तृप्ति लाभ कर लेता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

द्विविधः समाधिः संप्रज्ञातोऽसंप्रज्ञातश्च ध्येयैकाकारसत्त्ववृत्तिर्भेदेन कथंचिज्ज्ञायमाना संप्रज्ञातः समाधिः कथमपि पृथगज्ञायमाना सैव सत्त्ववृत्तिरसंप्रज्ञातः समाधिः तत्र सामान्येन समाधिलक्षणमभिधायासंप्रज्ञातस्य समाधेरधुना लक्षणं विवक्षन्नाह एवमिति। काले समाध्युपलक्षिते। एवकारस्तुष्यतीत्यनेन संबध्यते। चकारस्य संबन्धमाह यस्मिंश्चेति। कालस्तु पूर्ववत्। कर्मकारकत्वेन निर्दिष्टमात्मानं तत्पदार्थत्वेन व्याचष्टे परमिति। आत्मनीत्यस्य त्वंपदार्थविषयत्वमाह स्व एवेति। परमात्मानं प्रतीच्येव तद्भावेनापरोक्षीकुर्वन्नतुष्टिहेत्वभावात्तुष्यत्येवेत्यर्थः। तस्मिन्काले योगसिद्धिर्भवतीति शेषः।

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Sri Dhanpati

द्विविधः समाधिः संप्रज्ञातोऽसंप्रज्ञातश्चेति। तत्र ध्येयैकाकारसत्त्ववृत्तिर्भेदेन कथंचिज्ज्ञायमाना आद्यः। कथमपि पृथगज्ञायमाना सैव सत्त्ववृत्तिर्द्वितीयः। तत्राद्यं प्रदर्श्य इदानीं द्वितीयस्य लक्षणं विवक्षन्नाह यत्रेति। निरुद्धं सर्वतो निवारितप्रचारं यत्र चैव यस्मिंश्च काले आत्मना समाधिपरिशुद्धेनान्तःकरणेनात्मानं परं तत्पदार्थ ज्योतिःस्वरुपं पश्यन्नुपलभमाः त्वंपदार्थ आत्मन्येव तुष्यति परमात्मानं प्रत्यक्चैतन्यएव तद्भावेनापरोक्षीकुर्वन् अतुष्टिनिदानाभावात्तुष्टिं लभत एवेत्यर्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yatrawhen
uparamaterejoice inner joy
chittamthe mind
niruddhamrestrained
yogasevayā
yatrawhen
chaand
evacertainly
ātmanāthrough the purified mind
ātmānamthe soul
paśhyanbehold
ātmaniin the self
tuṣhyatiis satisfied
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.19
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः

जैसे स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है, योगका अभ्यास करते हुए वश में किए हुए चित्तवाले योगीके चित्तकी वैसी ही उपमा कही गयी है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.21
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः

जो सुख आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुद्धिग्राह्य है, उस सुखका जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस सुखमें स्थित हुआ यह ध्यानयोगी फिर कभी तत्त्वसे विचलित नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 20
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 20
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। यत्र चैवात्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति

योगका सेवन करनेसे जिस अवस्थामें निरुद्ध चित्त उपराम हो जाता है तथा जिस अवस्थामें स्वयं अपने-आप से अपने-आपको देखता हुआ अपने-आपमें ही सन्तुष्ट हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ: "योगका सेवन करनेसे जिस अवस्थामें निरुद्ध चित्त उपराम हो जाता है तथा जिस अवस्थामें स्वयं अपने-आप से अपने-आपको देखता हुआ अपने-आपमें ही सन्तुष्ट हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 20?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 20 translates to: "When the mind, restrained by the practice of yoga, attains quietude, and when one sees the Self by the Self, they are satisfied in their own Self. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। यत्र चैवात्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 20 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। योगका सेवन करनेसे जिस अवस्थामें निरुद्ध चित्त उपराम हो जाता है तथा जिस अवस्थामें स्वयं अपने-आप से अपने-आपको देखता हुआ अपने-आपमें ही सन्तुष्ट हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yatroparamate chittaṁ niruddhaṁ yoga-sevayā" mean in English?

"yatroparamate chittaṁ niruddhaṁ yoga-sevayā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 20. When the mind, restrained by the practice of yoga, attains quietude, and when one sees the Self by the Self, they are satisfied in their own Self. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.