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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 18
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते। निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा

वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है और स्वयं सम्पूर्ण पदार्थोंसे निःस्पृह हो जाता है, उस कालमें वह योगी है - ऐसा कहा जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

సంపూర్ణ నియంత్రిత మనస్సు స్వయం లోనే ఉండి, కోరికలు కలిగించే వస్తువులు దేనికీ ఆపేక్ష లేకుండా ఉన్నప్పుడు, 'అతను ఐక్యంగా ఉన్నాడు' అని చెప్పబడుతుంది.

SindhiIND

جڏهن مڪمل طور تي ڪنٽرول ٿيل ذهن صرف نفس ۾ آرام ڪري ٿو، ڪنهن به خواهش جي شين جي خواهش کان آزاد آهي، تڏهن اهو چيو ويندو آهي، 'هو متحد آهي'.

MalayalamIND

പൂർണ്ണമായി നിയന്ത്രിതമായ മനസ്സ് ഇച്ഛാശക്തിയുള്ള ഏതെങ്കിലും വസ്തുക്കളെ മോഹിക്കാതെ ആത്മാവിൽ മാത്രം വിശ്രമിക്കുമ്പോൾ, 'അവൻ ഏകീകൃതനാണ്' എന്ന് പറയപ്പെടുന്നു.

NepaliIND

जब पूर्णतया नियन्त्रित मन कुनै पनि इच्छाका वस्तुहरूको लालसाबाट मुक्त भएर एक्लै स्वयंमा रहन्छ, तब भनिन्छ, 'उहाँ एकरूप हुनुहुन्छ'।

BengaliIND

যখন নিখুঁতভাবে নিয়ন্ত্রিত চিত্ত একা আত্মার মধ্যে বিশ্রাম নেয়, কোনো কামনার বস্তুর আকাঙ্ক্ষা থেকে মুক্ত থাকে, তখন বলা হয়, 'তিনি একত্রিত'।

MarathiIND

जेव्हा पूर्णतः नियंत्रित मन हे कोणत्याही इच्छेच्या वस्तूंच्या आकांक्षेपासून मुक्त होऊन केवळ स्वतःमध्येच विसावते, तेव्हा 'तो एकरूप आहे' असे म्हणतात.

GujaratiIND

જ્યારે સંપૂર્ણ રીતે નિયંત્રિત મન એકલા સ્વમાં જ વિશ્રામ કરે છે, ઇચ્છાના કોઈપણ પદાર્થોની ઝંખનાથી મુક્ત હોય છે, ત્યારે કહેવાય છે કે 'તે એકરૂપ છે'.

TamilIND

முழுமையாகக் கட்டுப்படுத்தப்பட்ட மனம், ஆசைப் பொருள்கள் எவற்றின் மீதும் ஏங்காமல் தன்னில் மட்டுமே தங்கியிருக்கும் போது, ​​'அவர் ஒன்றுபட்டவர்' என்று கூறப்படுகிறது.

PunjabiIND

ਜਦੋਂ ਪੂਰਨ ਤੌਰ 'ਤੇ ਨਿਯੰਤਰਿਤ ਮਨ ਇਕੱਲੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿਚ ਟਿਕ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਇੱਛਾ ਦੀਆਂ ਕਿਸੇ ਵਸਤੂਆਂ ਦੀ ਲਾਲਸਾ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਇਹ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, 'ਉਹ ਇਕਮੁੱਠ ਹੈ'।

KannadaIND

ಪರಿಪೂರ್ಣವಾಗಿ ನಿಯಂತ್ರಿತವಾದ ಮನಸ್ಸು ಕೇವಲ ಆತ್ಮದಲ್ಲಿ ನೆಲೆಗೊಂಡಾಗ, ಯಾವುದೇ ಬಯಕೆಯ ವಸ್ತುಗಳಿಗೆ ಹಂಬಲಿಸದೆ, 'ಅವನು ಐಕ್ಯನಾಗಿದ್ದಾನೆ' ಎಂದು ಹೇಳಲಾಗುತ್ತದೆ.

AssameseIND

যেতিয়া নিখুঁতভাৱে নিয়ন্ত্ৰিত মনটোৱে কামনাৰ কোনো বস্তুৰ প্ৰতি আকাংক্ষাৰ পৰা মুক্ত, কেৱল আত্মাত জিৰণি লয়, তেতিয়া কোৱা হয়, ‘তেওঁ একত্ৰিত’।

DogriIND

जदूं पूरी चाल्ली नियंत्रित मन इकले आत्म च गै टिकदा ऐ, जेह्ड़ा इच्छा दे किसे बी वस्तु दी तड़प थमां मुक्त होंदा ऐ, तां आखेआ जंदा ऐ जे 'ओह् इकजुट ऐ'।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--[इस अध्यायके दसवेंसे तेरहवें श्लोकतक सभी ध्यानयोगी साधकोंके लिये बिछाने और बैठनेवाले आसनोंकी विधि बतायी। चौदहवें और पंद्रहवें श्लोकमें सगुणसाकारके ध्यानका फलसहितवर्णन किया। फिर सोलहवेंसत्रहवें श्लोकोंमें सभी साधकोंके लिये उपयोगी नियम बताये। अब इस (अठारहवें) श्लोकसे लेकर तेईसवें श्लोकतक स्वरूपके ध्यानका फलसहित वर्णन करते हैं।] 'यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते'--अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ चित्त अर्थात् संसारके चिन्तनसे रहित चित्त जब अपने स्वतःसिद्ध स्वरूपमें स्थित हो जाता है। तात्पर्य है कि जब यह सब कुछ नहीं था, तब भी जो था और सब कुछ नहीं रहेगा, तब भी जो रहेगा तथा सबके उत्पन्न होनेके पहले भी जो था, सबका लय होनेके बाद भी जो रहेगा और अभी भी जो ज्यों-का-त्यों है, उस अपने स्वरूपमें चित्त स्थित हो जाता है। अपने स्वरूपमें जो रस है, आनन्द है, वह इस मनको कहीं भी और कभी भी नहीं मिला है। अतः वह रस, आनन्द मिलते ही मन उसमें तल्लीन हो जाता है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

अब यह बतलाते हैं कि ( साधक पुरुष ) कब युक्त ( समाधिस्थ ) हो जाता है वशमें किया हुआ चित्त यानी विशेषरूपसे एकाग्रताको प्राप्त हुआ चित्त जब बाह्य चिन्तनको छोड़कर केवल आत्मामें ही स्थित होता है अपने स्वरूपमें स्थिति लाभ करता है। तब उस समय सब भोगोंकी लालसासे रहित हुआ योगी अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट समस्त भोगोंसे जिसकी तृष्णा नष्ट हो गयी है ऐसा योगी युक्त है समाधिस्थ ( परमात्मामें स्थितिवाला ) है ऐसे कहा जाता है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

सफलस्य साङ्गस्य योगस्योक्त्यनन्तरं यदा हीत्यादावुक्तकालानुवादेन युक्तं लक्षयितुमनन्तरश्लोकप्रवृत्तिं दर्शयति अथाधुनेति। विशेषेण संयतत्वमेव संक्षिपति एकाग्रतामिति। आत्मन्येवेत्येवकारार्थं कथयति हित्वेति। केवलत्वमद्वितीयत्वम्। तस्यात्मस्थितिं विवृणोति स्वात्मनीति। चित्तस्य हि कल्पितस्यात्मैव तत्त्वं तत्पुनरन्यतः सर्वतो निवारितमधिष्ठाने निमग्नं तिष्ठतीति भावः। तस्यामवस्थायां सर्वेभ्यो विषयेभ्यो व्यावृत्ततृष्णो युक्तो व्यवह्रियत इत्याह निःस्पृह इति।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

एतादृशयोगयुक्तः कदा भवतीति तत्राह। यस्मिन्काले विशेषेण नियतं चित्तं संयतमेकाग्रतामापन्नं निरुद्धं चित्तं बाह्यविषयचिन्तां विहायात्मन्येव प्रत्यगभिन्ने केवलेऽवतिष्ठते। स्थितं लभत इत्यर्थः। सर्वकामेभ्यो दृष्टादृष्टविषयेभ्यः निर्गता निवृत्ता स्पृहा तृष्णा यस्य स तदा तस्मिन्काले युक्त इत्युच्यते।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yadāwhen
viniyatamfully controlled
chittamthe mind
ātmaniof the self
evacertainly
avatiṣhṭhatestays
nispṛihaḥfree from cravings: sarva
kāmebhyaḥfor yearning of the senses
yuktaḥsituated in perfect Yog
itithus
uchyateis said
tadāthen
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.17
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा

दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.19
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः

जैसे स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है, योगका अभ्यास करते हुए वश में किए हुए चित्तवाले योगीके चित्तकी वैसी ही उपमा कही गयी है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 18
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 18
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते। निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा

वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है और स्वयं सम्पूर्ण पदार्थोंसे निःस्पृह हो जाता है, उस कालमें वह योगी है - ऐसा कहा जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ: "वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है और स्वयं सम्पूर्ण पदार्थोंसे निःस्पृह हो जाता है, उस कालमें वह योगी है - ऐसा कहा जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 18?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 18 translates to: "When the perfectly controlled mind rests in the Self alone, free from longing for any of the objects of desire, then it is said, 'He is united'. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते। निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तद" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 18 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है और स्वयं सम्पूर्ण पदार्थोंसे निःस्पृह हो जाता है, उस कालमें वह योगी है - ऐसा कहा जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yadā viniyataṁ chittam ātmanyevāvatiṣhṭhate" mean in English?

"yadā viniyataṁ chittam ātmanyevāvatiṣhṭhate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 18. When the perfectly controlled mind rests in the Self alone, free from longing for any of the objects of desire, then it is said, 'He is united'. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.