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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 11
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्

शुद्ध भूमिपर, जिसपर क्रमशः कुश, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न अत्यन्त ऊँचा है और न अत्यन्त नीचा, ऐसे अपने आसनको स्थिरस्थापन करके। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

ఒక పరిశుభ్రమైన ప్రదేశంలో, ఒకదానిపై ఒకటి పొరలుగా ఉన్న వస్త్రం, చర్మం మరియు కుశ గడ్డితో తయారు చేయబడిన, చాలా ఎత్తుగా లేదా చాలా తక్కువగా ఉండకుండా, తన సొంతంగా ఒక దృఢమైన సీటును ఏర్పాటు చేసుకున్నాడు.

BengaliIND

একটি পরিষ্কার জায়গায়, নিজের একটি শক্ত আসন স্থাপন করে, খুব উঁচু বা খুব নিচু নয়, কাপড়, চামড়া এবং কুশ ঘাসের উপর একটি স্তরে স্তরে তৈরি।

MarathiIND

स्वच्छ जागेवर, कापड, कातडे आणि कुशा गवताने बनवलेले, खूप उंच किंवा खूप कमी नसलेले, स्वतःचे एक मजबूत आसन स्थापित केले आहे.

TamilIND

ஒரு சுத்தமான இடத்தில், தனக்கென ஒரு உறுதியான இருக்கையை அமைத்துக் கொண்டு, மிக உயரமானதாகவோ அல்லது தாழ்வாகவோ இல்லாமல், துணி, தோல் மற்றும் குஷா புல் ஆகியவற்றால் ஆனது.

MalayalamIND

വൃത്തിയുള്ള ഒരു സ്ഥലത്ത്, തുണി, തൊലി, കുശ പുല്ല് എന്നിവ കൊണ്ട് നിർമ്മിച്ച, വളരെ ഉയരമോ താഴ്ന്നതോ അല്ല, സ്വന്തമായി ഒരു ഉറച്ച ഇരിപ്പിടം സ്ഥാപിച്ചു.

SindhiIND

صاف سٿري جاءِ تي، نه ته تمام اوچي ۽ نه تمام گهٽ، ڪپڙي، چمڙي ۽ ڪشما گھاس جي هڪ ٻئي جي مٿان رکيل، پنهنجي هڪ مضبوط سيٽ قائم ڪري.

PunjabiIND

ਸਾਫ਼-ਸੁਥਰੀ ਥਾਂ 'ਤੇ, ਕੱਪੜੇ, ਚਮੜੇ ਅਤੇ ਕੁਸ਼ ਘਾਹ ਦੇ ਬਣੇ ਹੋਏ, ਨਾ ਬਹੁਤ ਉੱਚੇ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਬਹੁਤ ਨੀਵੇਂ, ਆਪਣੀ ਇੱਕ ਪੱਕੀ ਸੀਟ ਸਥਾਪਿਤ ਕੀਤੀ ਸੀ।

KannadaIND

ಸ್ವಚ್ಛವಾದ ಸ್ಥಳದಲ್ಲಿ, ಬಟ್ಟೆ, ಚರ್ಮ ಮತ್ತು ಕುಶಾ ಹುಲ್ಲಿನಿಂದ ಮಾಡಿದ, ತುಂಬಾ ಎತ್ತರವಾಗಲೀ ಅಥವಾ ತುಂಬಾ ಕೆಳಗಾಗಲೀ ತನ್ನದೇ ಆದ ಒಂದು ದೃಢವಾದ ಆಸನವನ್ನು ಸ್ಥಾಪಿಸಲಾಗಿದೆ.

NepaliIND

सफा ठाउँमा कपडा, छाला र कुशा घाँसले एकअर्कालाई तह लगाउने, न त धेरै अग्लो न धेरै तल, आफ्नै ठाँउको आसन बनाएर ।

GujaratiIND

સ્વચ્છ જગ્યાએ, કપડા, ચામડી અને કુશા ઘાસથી બનેલી, એક બીજા પર એક સ્તરવાળી, ન તો ખૂબ ઊંચી કે ખૂબ નીચી, પોતાની એક મક્કમ બેઠક સ્થાપિત કરી.

DogriIND

साफ-सुथरे थाह् र उप्पर, अपनी इक पक्की सीट स्थापित करियै, न ते मता उच्चा ते न गै मता निचले, कपड़े, खाल ते कुशा घाह् कन्नै बने दा जेह्ड़ा इक-दुए उप्पर परतदार हा।

ManipuriIND

ꯁꯦꯡꯂꯕꯥ ꯃꯐꯝ ꯑꯃꯗꯥ, ꯃꯁꯥꯒꯤ ꯑꯆꯦꯠꯄꯥ ꯐꯃꯐꯝ ꯑꯃꯥ ꯂꯤꯡꯈꯠꯂꯒꯥ, ꯌꯥꯝꯅꯥ ꯋꯥꯡꯕꯥ ꯅꯠꯔꯒꯥ ꯌꯥꯝꯅꯥ ꯅꯦꯝꯕꯥ, ꯐꯤ, ꯈꯣꯡꯎꯞ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯀꯨꯁꯥ ꯃꯍꯩ ꯃꯔꯣꯡꯁꯤꯡꯅꯥ ꯑꯃꯒꯥ ꯑꯃꯒꯥ ꯂꯦꯌꯔ ꯇꯧꯗꯨꯅꯥ ꯁꯦꯝꯕꯥ꯫

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'शुचौ देशे'--भूमिकी शुद्धि दो तरहकी होती है--(1) स्वाभाविक शुद्ध स्थान; जैसे--गङ्गा आदिका किनारा; जंगल; तुलसी, आँवला, पीपल आदि पवित्र वृक्षोंके पासका स्थान आदि और (2) शुद्ध किया हुआ स्थान; जैसे--भूमिको गायके गोबरसे लीपकर अथवा जल छिड़ककर शुद्ध किया जाय; जहाँ मिट्टी हो, वहाँ ऊपरकी चार-पाँच अंगुली मिट्टी दूर करके भूमिको शुद्ध किया जाय। ऐसी स्वाभाविक अथवा शुद्ध की हुई समतल भूमिमें काठ या पत्थरकी चौकी आदिको लगा दे। 'चैलाजिनकुशोत्तरम्'--यद्यपि पाठके अनुसार क्रमशः वस्त्र, मृगछाला और कुश बिछानी चाहिये , तथापि बिछानेमें पहले कुश बिछा दे, उसके ऊपर बिना मारे हुए मृगका अर्थात् अपने-आप मरे हुए मृगका चर्म बिछा दे; क्योंकि मारे हुए मृगका चर्म अशुद्ध होता है। अगर ऐसी मृगछाला न मिले, तो कुशपर टाटका बोरा अथवा ऊनका कम्बल बिछा दे। फिर उसके ऊपर कोमल सूती कपड़ा बिछा दे।वाराहभगवान्के रोमसे उत्पन्न होनके कारण कुश बहुत पवित्र माना गया है; अतः उससे बना आसन काममें लाते हैं। ग्रहण आदिके समय सूतकसे बचनेके लिये अर्थात् शुद्धिके लिये कुशको पदार्थोंमें, कपड़ोंमें रखते हैं। पवित्री, प्रोक्षण आदिमें भी इसको काममें लेते हैं। अतः भगवान्ने कुश बिछानेके लिये कहा है।कुश शरीरमें गड़े नहीं और हमारे शरीरमें जो विद्युत्शक्ति है वह आसानमेंसे होकर जमीनमें न चली जाय, इसलिये (विद्युत्शक्तिको रोकनेके लिये) मृगछाला बिछानेका विधान आया है।मृगछालाके रोम (रोएँ) शरीरमें न लगें और आसन कोमल रहे, इसलिये मृगछालाके ऊपर सूती शुद्ध कपड़ा बिछानेके लिये कहा गया है। अगर मृगछालाकी जगह कम्बल या टाट हो, तो वह गरम न हो जाय, इसलिये उसपर सूती कपड़ा बिछाना चाहिये।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

योगाभ्यास करनेवालेके लिये योगके साधनरूप आसन आहार और विहार आदिका नियम बतलाना उचित है एवं योगको प्राप्त हुए पुरुषका लक्षण और उसका फल आदि भी कहना चाहिये। इसलिये अब ( यह प्रकरण ) आरम्भ किया जाता है। उसमें पहले आसनका ही वर्णन करते हैं शुद्ध स्थानमें अर्थात् जो स्वभावसे अथवा झाड़नेबुहारने आदि संस्कारोंसे साफ किया हुआ पवित्र और एकान्त स्थान हो उसमें अपने आसनको जो न अति ऊँचा हो और न अति नीचा हो और जिसपर क्रमसे वस्त्र मृगचर्म और कुशा बिछाये गये हों अविचलभावसे स्थापन करके। यहाँ पाठक्रमसे उन वस्त्रादिका क्रम उलटा समझना चाहिये अर्थात् पहले कुशा उसपर मृगचर्म और फिर उसपर वस्त्र बिछावे।

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Sri Anandgiri

योगं योगाङ्गानि चोपदिश्योत्तरसंदर्भस्य तात्पर्यमाह अथेति। योगस्वरूपकतिपयतदङ्गप्रदर्शनानन्तर्यमथशब्दार्थः। विहारादीनामित्यादिशब्देन यथोक्तासनादिगतावान्तरभेदग्रहणम्। तत्फलादि चेत्यादिशब्देन योगफलसम्यग्ज्ञानं च तत्फलं कैवल्यं ततो भ्रष्टस्यात्यन्तिकविनष्टत्वमित्यादि गृह्यते। एवं समुदायतात्पर्ये दर्शिते किमासीनः शयानस्तिष्ठन्गच्छन्कुर्वन्वा युञ्जीतेत्यपेक्षायामनन्तरश्लोकतात्पर्यमाह तत्रेति। निर्धारणे सप्तमी। प्रथमं योगानुष्ठानस्य प्रधानम्असीनः संभवात् इति न्यायादिति यावत्। विविक्तत्वं द्वेधा विभजते स्वभावत इति। आसनस्यास्थैर्ये तत्रोपविश्य योगमनुतिष्ठतः समाधानायोगाद्योगासिद्धिरित्यभिसंधाय विशिनष्टि अचलनमिति। आस्यतेऽस्मिन्निति व्युत्पत्तिमनुसृत्याह आसनमिति। आत्मन इति परकीयासनव्युदासार्थं पतनभयपरिहारार्थं नात्युच्चमित्युक्तं नाप्यतिनीचमिति भूतलपाषाणादिसंश्लेषे वातक्षोभाग्निमान्द्यादिसंभावितदोषनिरासार्थं चैलं वस्त्रमजिनं चर्म पशूनां तच्च मृगस्य कुशा दर्भास्ते चोत्तरे यस्मिन्नुपरिष्टादारभ्य तत्तथोक्तम्। प्रथमं चैलं ततोऽजिनं ततश्च कुशा इति प्रतिपन्नपाठक्रममापातिकं क्रममतिक्रम्यादौ कुशास्ततोऽजिनं ततश्चैलमिति क्रमं विवक्षित्वाह विपरीतोऽवेति।

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Sri Dhanpati

एवं पूर्वोक्तलक्षणसंपन्नस्य योगारुढस्य यत्फलं भवति तत्प्राप्तये योगारुढतां संपादयेदित्युक्तम्। अथेदानीं योगं युञ्जानस्य तद्ङगान्यासनाहारविहारादीनि नियतानि फलं च सर्वतः श्रैष्ठ्यं मुक्तिलक्षणं वक्तुमारभते शुचावित्यादिना। शुचौ शुद्धे स्वभावतः संस्कारतो वा देशे स्थाने विविक्ते आत्मनः स्वस्यासनं स्थिरमचलं नात्युच्छ्रितं नाप्यतिनीचं तच्च चैलादीन्युत्तरे यस्मिंस्तत्। आदौ कुशानां स्थापनं तदुपर्यजिनं मृगचर्म तदुपरि चैलं भृदुवस्त्रमित्येतादृशमासनं प्रतिष्ठाप्य चतुष्कोणादिसंनिवेशविचारेण कृत्वा। आत्मन इत्यनेन स्वस्यैवोपशमयोग्यमित्युक्तम्। तेनान्यस्थिति प्रयुक्तविक्षेपप्रसक्तिर्वारिता।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhuchauin a clean
deśheplace
pratiṣhṭhāpyahaving established
sthiramsteadfast
āsanamseat
ātmanaḥhis own
nanot
atitoo
uchchhritamhigh
nanot
atitoo
nīchamlow
chailacloth
ajinaa deerskin
kuśhakuśh grass
uttaramone over the other
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.10
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः

भोगबुद्धिसे संग्रह न करनेवाला, इच्छारहित और अन्तःकरण तथा शरीरको वशमें रखनेवाला योगी अकेला एकान्तमें स्थित होकर मनको निरन्तर परमात्मामें लगाये। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.12
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः। उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये

उस आसनपर बैठकर चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें रखते हुए मनको एकाग्र करके अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 11
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 11
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्

शुद्ध भूमिपर, जिसपर क्रमशः कुश, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न अत्यन्त ऊँचा है और न अत्यन्त नीचा, ऐसे अपने आसनको स्थिरस्थापन करके। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ: "शुद्ध भूमिपर, जिसपर क्रमशः कुश, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न अत्यन्त ऊँचा है और न अत्यन्त नीचा, ऐसे अपने आसनको स्थिरस्थापन करके। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 11?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 11 translates to: "In a clean spot, having established a firm seat of his own, neither too high nor too low, made of cloth, skin, and kusha grass layered one over the other. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तर" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 11 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। शुद्ध भूमिपर, जिसपर क्रमशः कुश, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न अत्यन्त ऊँचा है और न अत्यन्त नीचा, ऐसे अपने आसनको स्थिरस्थापन करके। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhuchau deśhe pratiṣhṭhāpya sthiram āsanam ātmanaḥ" mean in English?

"śhuchau deśhe pratiṣhṭhāpya sthiram āsanam ātmanaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 11. In a clean spot, having established a firm seat of his own, neither too high nor too low, made of cloth, skin, and kusha grass layered one over the other. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.