Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 10
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः

भोगबुद्धिसे संग्रह न करनेवाला, इच्छारहित और अन्तःकरण तथा शरीरको वशमें रखनेवाला योगी अकेला एकान्तमें स्थित होकर मनको निरन्तर परमात्मामें लगाये। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TeluguIND

యోగి నిరంతరం మనస్సును నిలకడగా ఉంచడానికి, ఏకాంతంలో, ఒంటరిగా, శరీరం మరియు మనస్సును నియంత్రించి, ఆశ మరియు దురాశ నుండి విముక్తిగా ఉంచడానికి నిరంతరం కృషి చేయనివ్వండి.

PunjabiIND

ਯੋਗੀ ਨੂੰ ਮਨ ਨੂੰ ਸਥਿਰ ਰੱਖਣ, ਇਕਾਂਤ ਵਿਚ, ਇਕੱਲੇ, ਸਰੀਰ ਅਤੇ ਮਨ ਨੂੰ ਕਾਬੂ ਵਿਚ ਰੱਖਣ ਅਤੇ ਉਮੀਦ ਅਤੇ ਲਾਲਚ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਰੱਖਣ ਲਈ ਨਿਰੰਤਰ ਯਤਨ ਕਰਨ ਦਿਓ।

GujaratiIND

યોગીને મનને સ્થિર રાખવા, એકાંતમાં, એકાંતમાં, શરીર અને મનને નિયંત્રિત રાખવા અને આશા અને લોભથી મુક્ત રહેવા સતત પ્રયત્ન કરવા દો.

BengaliIND

যোগী মনকে স্থির রাখতে, নির্জনে, একা, শরীর ও মনকে নিয়ন্ত্রিত করে এবং আশা ও লোভ থেকে মুক্ত রাখার জন্য ক্রমাগত চেষ্টা করুক।

MalayalamIND

ഏകാന്തതയിൽ, ഏകാന്തതയിൽ, ശരീരത്തെയും മനസ്സിനെയും നിയന്ത്രിച്ച്, പ്രത്യാശയിൽ നിന്നും അത്യാഗ്രഹത്തിൽ നിന്നും മുക്തമായി മനസ്സിനെ സ്ഥിരമായി നിലനിർത്താൻ യോഗി നിരന്തരം പരിശ്രമിക്കട്ടെ.

NepaliIND

योगीले मनलाई स्थिर राख्ने, एकान्तमा, एकान्तमा, शरीर र मनलाई नियन्त्रणमा राखेर, आशा र लोभबाट मुक्त राख्न निरन्तर प्रयास गरून्।

MarathiIND

योगी मन स्थिर ठेवण्यासाठी, एकांतात, एकांतात, शरीर आणि मन नियंत्रित ठेवण्यासाठी आणि आशा आणि लोभापासून मुक्त राहण्यासाठी सतत प्रयत्न करू द्या.

SindhiIND

اچو ته يوگي کي مسلسل ذهن کي مستحڪم رکڻ جي ڪوشش ڪرڻ گهرجي، اڪيلائي ۾ رهي، اڪيلو، جسم ۽ ذهن تي ڪنٽرول سان، ۽ اميد ۽ لالچ کان آزاد.

TamilIND

யோகி மனதை நிலையாக வைத்து, தனிமையில், தனிமையில், உடலையும் மனதையும் கட்டுப்படுத்தி, நம்பிக்கை மற்றும் பேராசையிலிருந்து விடுபட தொடர்ந்து முயற்சி செய்யட்டும்.

KannadaIND

ಯೋಗಿಯು ಮನಸ್ಸನ್ನು ಸ್ಥಿರವಾಗಿರಿಸಲು, ಏಕಾಂತದಲ್ಲಿ, ಏಕಾಂಗಿಯಾಗಿ, ದೇಹ ಮತ್ತು ಮನಸ್ಸನ್ನು ನಿಯಂತ್ರಿಸಲು ಮತ್ತು ಭರವಸೆ ಮತ್ತು ದುರಾಶೆಯಿಂದ ಮುಕ್ತವಾಗಿಡಲು ನಿರಂತರವಾಗಿ ಶ್ರಮಿಸಲಿ.

BhojpuriIND

योगी मन के स्थिर राखे के सतत प्रयास करे, एकांत में, अकेले, तन-मन के नियंत्रित क के, आ आशा आ लोभ से मुक्त रहस।

ManipuriIND

ꯌꯣꯒꯤꯅꯥ ꯋꯥꯈꯜ ꯅꯤꯡꯊꯤꯖꯅꯥ ꯊꯝꯅꯕꯥ, ꯇꯪꯗꯨ ꯂꯩꯇꯥꯅꯥ ꯂꯩꯗꯨꯅꯥ, ꯃꯁꯥ ꯃꯊꯟꯇꯥ, ꯍꯀꯆꯥꯡ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯋꯥꯈꯜ ꯀꯟꯠꯔꯣꯜ ꯇꯧꯗꯨꯅꯥ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯥꯁꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯂꯣꯚꯗꯒꯤ ꯅꯥꯟꯊꯣꯛꯅꯕꯥ ꯍꯣꯠꯅꯒꯗꯕꯅꯤ꯫

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--[पाँचवें अध्यायके सत्ताईसवें-अट्ठाईसवें श्लोकोंमें जिस ध्यानयोगका संक्षेपसे वर्णन किया था, अब यहाँ उसीका विस्तारसे वर्णन कर रहे हैं। 'युज् समाधौ' धातुसे जो 'योग' शब्द बनता है, जिसका अर्थ चित्तवृत्तियोंका निरोध करना है , उस योगका वर्णन यहाँ दसवें श्लोकसे आरम्भ करते हैं।]

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

अतः ऐसे उत्तम फलकी प्राप्तिके लिये ध्यान करनेवाला योगी अकेला किसीको साथ न लेकर पहाड़की गुफा आदि एकान्त स्थानमें स्थित हुआ निरन्तर अपने अन्तःकरणको ध्यानमें स्थिर किया करे। एकान्त स्थानमें स्थित हुआ और अकेला इन विशेषणोंसे यह भाव पाया जाता है कि संन्यास ग्रहण करके योगका साधन करे। जिसका चित्त अन्तःकरण और आत्मा शरीर ( दोनों ) जीते हुए हैं ऐसा यतचित्तात्मा निराशी तृष्णाहीन और संग्रहरहित होकर अर्थात् संन्यासी होनेपर भी सब संग्रहका त्याग करके योगका अभ्यास करे।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

यथोक्तविशेषणवतो योगारूढेषूत्तमत्वे योगानुष्ठाने प्रयतितव्यमित्यङ्गाभिधानानन्तरं प्रधानमभिदधाति अत एवमिति। आदरनैरन्तर्यदीर्घकालत्वं विशेषणत्रयं योगस्य सूचयति सततमिति। तस्यैव पञ्चाङ्गान्युपन्यस्यति रहसीत्यादिना। सर्वदेत्यादरदीर्घकालयोरुपलक्षणम्। प्रत्यगात्मानं व्यावर्तयति अन्तःकरणमिति। गिरिगुहादावित्यादिशब्देन योगप्रतिबन्धकदुर्जनादिविधुरो देशो गृह्यते। विशेषणद्वयस्य तात्पर्यमाह रहसीति। योगं युञ्जानस्य संन्यासिनो विशेषणान्तराणि दर्शशति यतेति। सति संन्यासित्वे किमित्यपरिग्रहग्रहणमर्थपुनरुक्तेरित्याशङ्क्य कौपीनाच्छादनादिष्वपि शक्तिनिवृत्त्यर्थमित्याह संन्यासित्वेऽपीति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

एवं योगारुढस्य लक्षणं फलं च प्रदर्शितम्। अत उत्तमफलप्राप्तये योगारुढतां संपादयेदित्याह योगीति। योगी ध्यानी रहसि एकान्ते गिरिगुहादौ स्थितः सन् एकाकी सहायवर्जितः। रहसि स्थित एकाकीति विशेषणात्संन्यासं कृत्वेत्यर्थः। एकाकीत्यस्य शिष्यादिसहायरहित इत्यपि बोध्यम्। यतौ वशीकृतौ चित्तात्मानौ चित्तदेहौ यस्य स चित्तस्य चिन्तनात्मनोऽन्तःकरणपरिणामस्य यतत्वमनुभूतार्थचिन्ताव्यावृत्तत्वं देहस्य च यतत्वं मक्षिकादंशपिपीलिकादिबाधयाप्यकम्पितत्वे सति चिरकालासनप्रयुक्तदुःखशून्यत्वम्। निराशीः फलतृष्णाशून्यः। अनेन वैराग्यादिसाधनसंपन्नो मुमुक्षुः कथितः। अपरिग्रहः संन्यासित्वेऽपि चोरभयजनकपुस्तकादिसर्वपरिग्रहशून्यः एतादृशः सन् सततं सर्वदा आत्मानमन्तःकरणं युञ्जीत समादध्यात् वृत्तिनिरोधेन निरुन्ध्यात्। वृत्तयश्च पञ्चविधाः प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतय इति। तत्र प्रत्यक्षानुमानागमाख्यानि त्रीणि प्रमाणानीति सांख्यादयः। उपमानमप्यङ्गीकृत्य चत्वारीति गौतमाः। अर्थापत्तिमनुपलब्धिं चाश्रित्य षडिति वेदान्तिनो याज्ञिकाश्च। संभवमैतिह्यं चाश्रित्याष्टाविति पौराणिकाः। विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतस्मिंस्तद्वुद्धिः शुक्तिर्वा रजतः वेत्येवमादिरुपः। प्रमा भ्रमविलक्षणो विकल्पः। निद्रास्मृती लोकप्रसिद्धे। अन्यासामपि वृत्तीनामेतास्वन्तर्भावो द्रष्टव्यः। तथाचैतदृत्तिनिरोधेनान्तःकरणं चित्तं समादध्यादिति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yogīa yogi
yuñjītashould remain engaged in meditation
satatamconstantly
ātmānamself
rahasiin seclusion
sthitaḥremaining
ekākīalone
yatachitta
nirāśhīḥfree from desires
aparigrahaḥfree from desires for possessions for enjoyment
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.9
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु। साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते

सुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और सम्बन्धियोंमें तथा साधु-आचरण करनेवालोंमें और पाप-आचरण करनेवालोंमें भी समबुद्धिवाला मनुष्य श्रेष्ठ है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.11
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्

शुद्ध भूमिपर, जिसपर क्रमशः कुश, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न अत्यन्त ऊँचा है और न अत्यन्त नीचा, ऐसे अपने आसनको स्थिरस्थापन करके। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 10
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 10
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः

भोगबुद्धिसे संग्रह न करनेवाला, इच्छारहित और अन्तःकरण तथा शरीरको वशमें रखनेवाला योगी अकेला एकान्तमें स्थित होकर मनको निरन्तर परमात्मामें लगाये। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ: "भोगबुद्धिसे संग्रह न करनेवाला, इच्छारहित और अन्तःकरण तथा शरीरको वशमें रखनेवाला योगी अकेला एकान्तमें स्थित होकर मनको निरन्तर परमात्मामें लगाये। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 10?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 10 translates to: "Let the yogi constantly strive to keep the mind steady, remaining in solitude, alone, with the body and mind controlled, and free from hope and greed. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 10 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। भोगबुद्धिसे संग्रह न करनेवाला, इच्छारहित और अन्तःकरण तथा शरीरको वशमें रखनेवाला योगी अकेला एकान्तमें स्थित होकर मनको निरन्तर परमात्मामें लगाये। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yogī yuñjīta satatam ātmānaṁ rahasi sthitaḥ" mean in English?

"yogī yuñjīta satatam ātmānaṁ rahasi sthitaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 10. Let the yogi constantly strive to keep the mind steady, remaining in solitude, alone, with the body and mind controlled, and free from hope and greed. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.