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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 9
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु। साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते

सुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और सम्बन्धियोंमें तथा साधु-आचरण करनेवालोंमें और पाप-आचरण करनेवालोंमें भी समबुद्धिवाला मनुष्य श्रेष्ठ है। — VaniSagar

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TeluguIND

మంచి మనసు కలవారు, మిత్రులు, శత్రువులు, ఉదాసీనత, తటస్థులు, ద్వేషపూరితులు, బంధువులు, సత్పురుషులు మరియు అధర్మపరుల పట్ల ఒకే ఆలోచన ఉన్నవాడు శ్రేష్ఠుడు.

MarathiIND

जो सद्बुद्धी, मित्र, शत्रू, उदासीन, तटस्थ, द्वेषी, नातेवाईक, नीतिमान आणि अनीतिमान यांच्याबद्दल समान मनाचा असतो तो श्रेष्ठ असतो.

SindhiIND

جيڪو نيڪ دل، دوست، دشمن، لاتعلق، غير جانبدار، نفرت ڪندڙ، رشتيدار، نيڪ ۽ بدڪردار لاءِ هڪجهڙائي وارو آهي، اهو عظيم آهي.

MalayalamIND

നല്ല മനസ്സുള്ളവർ, മിത്രങ്ങൾ, ശത്രുക്കൾ, നിസ്സംഗർ, നിഷ്പക്ഷർ, വിദ്വേഷം, ബന്ധുക്കൾ, നീതിമാൻമാർ, അനീതികൾ എന്നിവരോട് ഒരേ മനസ്സുള്ളവൻ ശ്രേഷ്ഠനാണ്.

TamilIND

நல்ல உள்ளம் கொண்டவர்கள், நண்பர்கள், எதிரிகள், அலட்சியம், நடுநிலை, வெறுப்பு, உறவினர், நேர்மையாளர், அநீதி இழைத்தவர்களிடம் ஒரே எண்ணம் கொண்டவர் சிறந்து விளங்குகிறார்.

KannadaIND

ಒಳ್ಳೆಯ ಮನಸ್ಸಿನವರು, ಮಿತ್ರರು, ಶತ್ರುಗಳು, ಉದಾಸೀನರು, ತಟಸ್ಥರು, ದ್ವೇಷಿಗಳು, ಸಂಬಂಧಿಕರು, ನೀತಿವಂತರು ಮತ್ತು ಅನೀತಿವಂತರ ಕಡೆಗೆ ಒಂದೇ ಮನಸ್ಸಿನವನಾಗಿರುತ್ತಾನೆ.

PunjabiIND

ਜੋ ਨੇਕਦਿਲ, ਮਿੱਤਰ, ਵੈਰੀ, ਉਦਾਸੀਨ, ਨਿਰਪੱਖ, ਨਫ਼ਰਤ ਕਰਨ ਵਾਲੇ, ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰਾਂ, ਧਰਮੀ ਅਤੇ ਅਧਰਮੀ ਪ੍ਰਤੀ ਇੱਕੋ ਮਨ ਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਉੱਤਮ ਹੈ।

BengaliIND

সদালাপী, বন্ধু, শত্রু, উদাসীন, নিরপেক্ষ, বিদ্বেষপরায়ণ, আত্মীয়, ধার্মিক ও অধার্মিকদের প্রতি যে একই মনের অধিকারী সে শ্রেষ্ঠ।

OdiaIND

ଯିଏ ଉତ୍ତମ ହୃଦୟ, ବନ୍ଧୁ, ଶତ୍ରୁ, ଉଦାସୀନ, ନିରପେକ୍ଷ, ଘୃଣାକାରୀ, ସମ୍ପର୍କୀୟ, ଧାର୍ମିକ ଏବଂ ଅଧାର୍ମିକମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ସମାନ ମନରେ ଥାଏ, ସେ ଉତ୍କୃଷ୍ଟ |

AssameseIND

সৎ হৃদয়, বন্ধু, শত্ৰু, উদাসীন, নিৰপেক্ষ, ঘৃণনীয়, আত্মীয়, ধাৰ্মিক আৰু অধাৰ্মিকৰ প্ৰতি যি একে মনৰ থাকে, তেওঁ উত্তম।

ManipuriIND

ꯑꯐꯕꯥ ꯊꯝꯃꯣꯌꯁꯤꯡ, ꯃꯔꯨꯄꯁꯤꯡ, ꯌꯦꯛꯅꯕꯥ, ꯃꯤꯅꯨꯡꯁꯤ ꯂꯩꯠꯔꯕꯥ, ꯅ꯭ꯌꯨꯠꯔꯤꯁꯟ, ꯌꯦꯛꯅꯕꯥ, ꯃꯔꯤ-ꯃꯇꯥꯁꯤꯡ, ꯆꯨꯝꯃꯤ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯔꯥꯅꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏꯁꯤꯡꯒꯤ ꯃꯥꯌꯀꯩꯗꯥ ꯋꯥꯈꯜ ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯂꯩꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯍꯦꯟꯅꯥ ꯐꯩ꯫

MaithiliIND

जे सद्भावना, मित्र, शत्रु, उदासीन, तटस्थ, घृणित, रिश्तेदार, धर्मात्मा आ अधर्मी के प्रति एक समान विचार के अछि, ओ उत्कृष्ट होइत अछि |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--[आठवें श्लोकमें पदार्थोंमें समता बतायी, अब इस श्लोकमें व्यक्तियोंमें समता बताते हैं। व्यक्तियोंमें समता बतानेका तात्पर्य है कि वस्तु तो अपनी तरफसे कोई क्रिया नहीं करती; अतः उसमें समबुद्धि होना सुगम है, परन्तु व्यक्ति तो अपने लिये और दूसरोंके लिये भी क्रिया करता है; अतः उसमें समबुद्धि होना कठिन है। इसलिये व्यक्तियोंके आचरणोंको देखकर भी जिसकी बुद्धिमें, विचारमें कोई विषमता या पक्षपात नहीं होता, ऐसा समबुद्धिवाला पुरुष श्रेष्ठ है।]

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा सुहृत् शब्दसे लेकर आधा श्लोक एक पद है। सुहृत् प्रत्युपकार न चाहकर उपकार करनेवाला मित्र प्रेमी अरि शत्रु उदासीन पक्षपातरहित मध्यस्थ जो परस्पर विरोध करनेवाले दोनोंका हितैषी हो द्वेष्य अपना अप्रिय और बन्धु अपना कुटुम्बी इन सबमें तथा शास्त्रानुसार चलनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंमें और निषिद्ध कर्म करनेवाले पापियोंमें भी जो समबुद्धिवाला है इन सबमें कौन कैसा क्या कर रहा है ऐसे विचारमें जिसकी बुद्धि नहीं लगती है वह श्रेष्ठ है। अर्थात् ऐसा योगी सब योगारूढ़ पुरुषोंमें उत्तम है। यहाँ विशिष्यते के स्थानमें विमुच्यते ( मुक्त हो जाता है ) ऐसा पाठान्तर भी है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

योगारूढस्य प्रशस्तत्वमभ्युपेत्य योगस्याङ्गान्तरं दर्शयति किञ्चेति। परच्छेदः पदार्थोक्तिरिति व्याख्यानाङ्गं संपादयति सुहृदितीति। अरिर्नाम परोक्षमपकारकः प्रत्यक्षमप्रियो द्वेष्य इति विभागः। समबुद्धिरिति व्याचष्टे कः किमिति। प्रथमो हि प्रश्नो जातिगोत्रादिविषयो द्वितीयो व्यापारविषयः। उक्तप्रकारेणाव्यापृतबुद्धित्वे सर्वोत्कर्षो वा सर्वपायविमोक्षो वा सिध्यतीत्याह विशिष्यत इति। पाठद्वयेऽपि सिद्धमर्थं संगृह्य कथयति योगारूढानामिति।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

न केवलं समलोष्टाश्मकाञ्चन एव अपितु सुहृदादिष्वपि समबुद्धिरित्याह सुहृदिति। सुहृत्प्रत्युपकारमनपेक्ष्योपकर्ता मित्रं स्नेहादिमपेक्ष्य तत्कर्ता अरिः शत्रुः खङ्गहस्तो मारणायोद्यतः उदासीनः पक्षपातशून्यः मध्यस्थो विरोधं कुर्वतोर्द्वयोरपि हितैषी द्वेष्योऽपकर्तृत्वाद्वेषविषयः बन्धुर्भ्रात्रादिः संबन्धीत्येतेषु साधुषु शास्त्रानुवर्तिष्वपिच पापेषु प्रतिषिद्धकारिषु सर्वेष्वेतेषु समबुद्धिः। कः सुहृदादिः किमुपकारादिकर्मकर्तेत्यव्यापृतबुद्धिरित्यर्थः। विशिष्यते सर्वतः श्रेष्ठो भवतीत्यर्थः।विमुच्यते इति वा पाठः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
suhṛit
mitrafriends
arienemies
udāsīnaneutral persons
madhyastha
dveṣhyathe envious
bandhuṣhurelatives
sādhuṣhupious
apias well as
chaand
pāpeṣhuthe sinners
samabuddhiḥ
viśhiṣhyateis distinguished
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.8
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः। युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः

जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त है, जो कूटकी तरह निर्विकार है, जितेन्द्रिय है और मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा स्वर्णमें समबुद्धिवाला है -- ऐसा योगी युक्त (योगारूढ़) कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.10
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः

भोगबुद्धिसे संग्रह न करनेवाला, इच्छारहित और अन्तःकरण तथा शरीरको वशमें रखनेवाला योगी अकेला एकान्तमें स्थित होकर मनको निरन्तर परमात्मामें लगाये। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 9
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 9
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु। साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते

सुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और सम्बन्धियोंमें तथा साधु-आचरण करनेवालोंमें और पाप-आचरण करनेवालोंमें भी समबुद्धिवाला मनुष्य श्रेष्ठ है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 9 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 9 का हिंदी अर्थ: "सुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और सम्बन्धियोंमें तथा साधु-आचरण करनेवालोंमें और पाप-आचरण करनेवालोंमें भी समबुद्धिवाला मनुष्य श्रेष्ठ है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 9?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 9 translates to: "He who is of the same mind towards the good-hearted, friends, enemies, the indifferent, the neutral, the hateful, the relatives, the righteous, and the unrighteous, excels. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु। साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्य" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 9 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। सुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और सम्बन्धियोंमें तथा साधु-आचरण करनेवालोंमें और पाप-आचरण करनेवालोंमें भी समबुद्धिवाला मनुष्य श्रेष्ठ है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "suhṛin-mitrāryudāsīna-madhyastha-dveṣhya-bandhuṣhu" mean in English?

"suhṛin-mitrāryudāsīna-madhyastha-dveṣhya-bandhuṣhu" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 9. He who is of the same mind towards the good-hearted, friends, enemies, the indifferent, the neutral, the hateful, the relatives, the righteous, and the unrighteous, excels. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.