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Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 7
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते

जिसकी इन्द्रियाँ अपने वशमें हैं, जिसका अन्तःकरण निर्मल है, जिसका शरीर अपने वशमें है और सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा ही जिसकी आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता। — VaniSagar

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KannadaIND

ಕರ್ಮಮಾರ್ಗಕ್ಕೆ ಮುಡಿಪಿಟ್ಟವನು, ಮನಸ್ಸು ನಿರ್ಮಲವಾಗಿರುವವನು, ಆತ್ಮವನ್ನು ಜಯಿಸಿದವನು, ತನ್ನ ಇಂದ್ರಿಯಗಳನ್ನು ನಿಗ್ರಹಿಸಿದವನು ಮತ್ತು ಎಲ್ಲ ಜೀವಿಗಳಲ್ಲಿ ತನ್ನನ್ನು ತಾನೇ ಎಂದು ಅರಿತುಕೊಳ್ಳುವವನು, ನಟನೆಯಾದರೂ, ಅವನು ಕಳಂಕಿತನಾಗಿರುವುದಿಲ್ಲ.

MalayalamIND

കർമ്മമാർഗ്ഗത്തിൽ അർപ്പിതമായവനും, മനസ്സ് ശുദ്ധമായവനും, ആത്മാവിനെ ജയിച്ചവനും, തൻ്റെ ഇന്ദ്രിയങ്ങളെ കീഴ്പെടുത്തിയവനും, പ്രവർത്തിക്കുന്നവനാണെങ്കിലും, എല്ലാ ജീവികളിലും തൻ്റെ ആത്മാവായി സ്വയം സാക്ഷാത്കരിച്ചവനും കളങ്കമില്ല.

TamilIND

செயல்வழியில் ஈடுபாடு கொண்டவனும், மனம் தூய்மையானவனும், சுயத்தை வென்றவனும், தன் புலன்களை அடக்கியவனும், எல்லா உயிர்களிடத்தும் தன் சுயத்தை உணர்ந்தவனும், செயல் செய்தாலும், அவன் கறைபடுவதில்லை.

TeluguIND

క్రియా మార్గంలో నిబద్ధత కలిగి, మనస్సు నిర్మలంగా ఉండి, ఆత్మను జయించినవాడు, ఇంద్రియాలను నిగ్రహించుకున్నవాడు, మరియు అన్ని జీవులలో తన నేనే అని గ్రహించేవాడు, నటన అయినప్పటికీ, కలుషితుడు కాదు.

GujaratiIND

જે કર્મમાર્ગમાં સમર્પિત છે, જેનું મન શુદ્ધ છે, જેણે આત્મ પર વિજય મેળવ્યો છે, જેણે પોતાની ઈન્દ્રિયોને વશ કરી લીધી છે અને જે પોતાના આત્માને સર્વ જીવોમાં સાક્ષાત્કાર કરે છે, તે કૃત્ય કરવા છતાં કલંકિત નથી.

PunjabiIND

ਜੋ ਕਰਮ ਮਾਰਗ ਵਿੱਚ ਸਮਰਪਤ ਹੈ, ਜਿਸ ਦਾ ਮਨ ਪਵਿੱਤਰ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਿੱਤ ਲਿਆ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੇ ਆਪਣੀਆਂ ਇੰਦਰੀਆਂ ਨੂੰ ਵੱਸ ਵਿੱਚ ਕਰ ਲਿਆ ਹੈ, ਅਤੇ ਜੋ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਸਾਰੇ ਜੀਵਾਂ ਵਿੱਚ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਅਨੁਭਵ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਭਾਵੇਂ ਕਰਮ ਕਰਦਾ ਹੋਵੇ, ਉਹ ਦਾਗੀ ਨਹੀਂ ਹੈ।

MarathiIND

जो कर्ममार्गाला समर्पित आहे, ज्याचे मन शुद्ध आहे, ज्याने स्वतःवर विजय मिळवला आहे, ज्याने आपल्या इंद्रियांना वश केले आहे आणि जो सर्व प्राणिमात्रांमध्ये स्वतःलाच स्वतःला जाणतो आहे, तो कृती करत असला तरी कलंक नाही.

BengaliIND

যিনি কর্মপথে নিবেদিত, যাঁর মন শুদ্ধ, যিনি আত্মকে জয় করেছেন, যিনি নিজের ইন্দ্রিয়গুলিকে বশীভূত করেছেন এবং যিনি কর্ম করলেও সমস্ত প্রাণীর মধ্যে নিজেকেই আত্মরূপে উপলব্ধি করেন, তিনি কলঙ্কিত হন না।

SindhiIND

جيڪو عمل جي راهه تي وقف آهي، جنهن جو ذهن خالص آهي، جنهن نفس کي فتح ڪيو آهي، جنهن پنهنجي حواس کي پنهنجي تابع ڪري ورتو آهي، ۽ جيڪو پنهنجي ذات کي سڀني مخلوقات ۾ پنهنجو پاڻ سمجهي ٿو، جيتوڻيڪ عمل ڪري، داغدار ناهي.

NepaliIND

जो कर्ममार्गमा समर्पित छ, जसको मन शुद्ध छ, जसले आत्मलाई जितेको छ, जसले आफ्नो इन्द्रियलाई वशमा राखेको छ र जसले कर्म गर्दा पनि सबै प्राणीमा स्वयंलाई आत्मसात गर्छ, त्यो कलंक हुँदैन ।

MizoIND

Thiltih kawngah inpe, a rilru thianghlim, mahni hneh tawh, a hriatna thunun tawh, thil nung zawng zawnga Mahni anga a Mahni chu thil ti mah se, a hre chiangtu chu a bawlhhlawh lo.

ManipuriIND

ꯊꯕꯛꯀꯤ ꯂꯝꯕꯤꯗꯥ ꯀꯠꯊꯣꯛꯂꯕꯥ, ꯋꯥꯈꯜ ꯁꯦꯡꯂꯕꯥ, ꯃꯁꯥꯕꯨ ꯃꯥꯏꯊꯤꯕꯥ ꯄꯤꯔꯕꯥ, ꯃꯍꯥꯛꯀꯤ ꯏꯟꯗ꯭ꯔꯤꯁꯤꯡꯕꯨ ꯁꯣꯀꯍꯜꯂꯕꯥ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯊꯕꯛ ꯇꯧꯔꯕꯁꯨ ꯖꯤꯕ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯇꯥ ꯃꯁꯥꯒꯤ ꯑꯣꯏꯖꯕꯥ ꯊꯤꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯗꯨꯗꯤ ꯁꯣꯀꯍꯜꯂꯣꯏ |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.7।। व्याख्या--'जितेन्द्रियः' इन्द्रियाँ वशमें होनेका तात्पर्य है--इन्द्रियोंका राग-द्वेषसे रहित होना। राग-द्वेषसे रहित होनेपर इन्द्रियोंमें मनको विचलित करनेकी शक्ति नहीं रहती । साधक उनको अपने मनके अनुकूल चाहे जहाँ लगा सकता है।कर्मयोगके साधकके लिये इन्द्रियोंका वशमें होना आवश्यक है। इसीलिये भगवान् कर्मयोगके प्रकरणमें इन्द्रियोंको वशमें करनेकी बात विशेषरूपसे कहते हैं; जैसे--'यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्य' (3। 7) ;'तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य' (3। 41)। कर्मयोगीका कर्मोंके साथ अधिक सम्बन्ध रहता है; इसलिये इन्द्रियाँ वशमें न होनेसे उसके विचलित होनेकी सम्भावना रहती है। कर्मयोगके साधनमें दूसरोंके हितके लिये सेवारूपसे कर्तव्य-कर्म करना आवश्यक है, जिसके लिये इन्द्रियोंका वशमें होना बहुत जरूरी है। इन्द्रियाँ वशमें हुए बिना कर्मयोगका साधन होना कठिन है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

जब यह पुरुष सम्यक् ज्ञानप्राप्तिके उपायरूप योगसे युक्त विशुद्ध अन्तःकरणवाला विजितात्मा शरीरविजयी जितेन्द्रिय और सब भूतोंमें अपने आत्माको देखनेवाला अर्थात् जिसका अन्तरात्मा ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंका आत्मरूप हो गया हो ऐसा यथार्थ ज्ञानी हो जाता है। तब इस प्रकार स्थित हुआ वह पुरुष लोकसंग्रह के लिये कर्म करता हुआ भी उनसे लिप्त नहीं होता अर्थात् कर्मोंसे नहीं बँधता। वास्तवमें वह कुछ करता भी नहीं है इसलिये आत्माके यथार्थ स्वरूपका नाम तत्त्व है उसको जाननेवाला तत्त्वज्ञानी परमार्थदर्शी समाहित होकर ऐसे माने कि मैं कुछ भी नहीं करता।

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Sri Anandgiri

ननु पारिव्राज्यं परिगृह्य श्रवणादिसाधनमसकृदनुतिष्ठतो लब्धसम्यग्बोधस्यापि यथापूर्वं कर्माण्युपलभ्यन्ते तानि च बन्धहेतवो भविष्यन्तीत्याशङ्क्य श्लोकान्तरमवतारयति यदा पुनरिति। सम्यग्दर्शनप्राप्त्युपायत्वेन यदा पुनरयं पुरुषो योगयुक्तत्वादिविशेषणः सम्यग्दर्शी संपद्यते तदा प्रातिभासिकीं प्रवृत्तिमनुसृत्य कुर्वन्नपि न लिप्यत इति योजना। योगेन नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानेनेति यावत्। आदौनित्याद्यनुष्ठानवतो रजस्तमोमलाभ्यामकलुषितं सत्त्वं सिध्यतीत्याह विशुद्धेति। बुद्धिशुद्धौ कार्यकरणसंघातस्यापि स्वाधीनत्वं भवतीत्याह विजितेति। तस्य यथोक्तविशेषणवतो जायते सम्यग्दर्शित्वमित्याह सर्वभूतेति। सम्यग्दर्शिनस्तर्हि कर्मानुष्ठानं कुतस्त्यं तदनुष्ठाने वा कुतो बन्धविश्लेषसिद्धिरित्याशङ्क्याह स तत्रेति। सम्यग्दर्शनं सप्तम्यर्थः।

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Sri Dhanpati

कस्यचिच्चित्तशुद्य्धा श्रवणादिना कृतसाक्षात्कारस्य प्रारब्धवशात्कर्मणि स्थितस्य यथापूर्वमुपलभ्यमानानि कर्माणि बन्धकानि न भवन्तीत्यत आह योगयुक्त इति। योगेन पूर्वोक्तेन युक्तः अतएव विशुद्धान्तःकरणः एतए विजतदेहः अतएव विजितानि वागादीनि इन्द्रियाणि येन सः। एवंभूतोऽधिकारी लक्षणसंपन्नः सर्वेषां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानां भूतानामात्मभूत आत्मा प्रत्यक्चेतनो यस्य सः। अखण्डात्मसाक्षात्कारवानित्यर्थः। यत्तु कैश्चिद्भाष्योक्तं विग्रहं सर्वभूतात्मेत्येतावतैवार्थलाभादात्मभूतेत्यधिकं स्यादित्यापत्त्या दूषयित्वा सर्वभूतो जडभूत आत्मभूतोऽजडभूतश्च आत्मा यस्येति च विग्रहः प्रदर्शितस्तत्प्रामादिकम्। कृत्स्त्रवाचिनः सर्वपदादेव जडाजडग्रहे सर्वभूतात्मेत्येतावतैवेष्टमाभे आधिक्यस्य तुल्यत्वात्। सर्वमचेतनमात्मानश्चेतनास्तद्भूत आत्मा यस्येति विगृह्य सर्वात्मभूतात्मेत्येतावतैवेष्टार्थे सिद्धे प्रथमभूतपदवैयर्थ्य प्रसङ्गाच्च। किंच भाष्यमते ब्रह्मादीनां प्रत्यगात्मभूत आत्मा यस्येति श्रुत्यैवात्मपरमात्मनोरैक्यमुच्यते। तव मते तु उपादानत्वलिङ्गेन जडसाधारण्येनात्मनः परमात्माभेदो गम्यत इत्यत आचार्योक्तमेव रमणीयम्। स लोकंसग्रहार्थं कुर्वन्नपि न लिप्यते। योगयुक्तो न कर्मभिर्बध्यत इत्यर्थः। युत्तु ननु योगयुक्तस्य सत्त्वशुद्धौ जातायामपि सर्वकर्मसंन्यासे कृते नित्याकरणजनितप्रत्यवायलक्षणो लेप आपद्येतेत्याशङ्क्याह योगयुक्त इति। अकुर्वन्नापि न लिप्यते। नित्याकरणोत्थेन दोषेणन स्पृश्यत इत्यर्थः। तत्र हेतुमाह। सर्वेषां ब्रह्मादिस्थावरान्तानां भूतानां योऽनुस्यूत आत्माऽसंङ्गोदासीनचिद्रूपस्तं भूतः प्राप्तस्तदैक्यज्ञानवानात्भान्तःकरणै यस्येति तदुपेक्ष्यम्।कतमसतः सज्जायत इति श्रुतिमनुरुध्याकरणादभावरुपाद्भावरुपस्य प्रत्यवायस्यानुत्पत्तेराचार्यैरसकृदुक्तत्वात्सर्वेत्यादेरार्जवेन भाष्योक्तमार्गेणोक्तार्थलाभे संभवति क्लिष्टकल्पनाया अन्याय्यत्वात्। योगेन निर्विकल्पसमाधिना युक्त इत्याद्युपेक्ष्यं प्रकरणविरोधस्योक्तत्वात्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yogayuktaḥ
viśhuddhaātmā
vijitaātmā
jitaindriyaḥ
sarvabhūta
kurvanperforming
apialthough
nanever
lipyateentangled
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Bhagavad Gita · 5.6
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति

परन्तु हे महाबाहो ! कर्मयोगके बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है। मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.8
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यन् श्रृणवन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन् श्वसन्

तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मल-मूत्र का त्याग करता, सोता, श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं' -- ऐसा समझकर 'मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ' -- ऐसा माने। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 7
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 7
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते

जिसकी इन्द्रियाँ अपने वशमें हैं, जिसका अन्तःकरण निर्मल है, जिसका शरीर अपने वशमें है और सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा ही जिसकी आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ: "जिसकी इन्द्रियाँ अपने वशमें हैं, जिसका अन्तःकरण निर्मल है, जिसका शरीर अपने वशमें है और सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा ही जिसकी आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 7?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 7 translates to: "He who is devoted to the path of action, whose mind is pure, who has conquered the self, who has subdued his senses, and who realizes his Self as the Self in all beings, though acting, is not tainted. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 7 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। जिसकी इन्द्रियाँ अपने वशमें हैं, जिसका अन्तःकरण निर्मल है, जिसका शरीर अपने वशमें है और सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा ही जिसकी आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yoga-yukto viśhuddhātmā vijitātmā jitendriyaḥ" mean in English?

"yoga-yukto viśhuddhātmā vijitātmā jitendriyaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 7. He who is devoted to the path of action, whose mind is pure, who has conquered the self, who has subdued his senses, and who realizes his Self as the Self in all beings, though acting, is not tainted. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.