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Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 8
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यन् श्रृणवन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन् श्वसन्

तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मल-मूत्र का त्याग करता, सोता, श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं' -- ऐसा समझकर 'मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ' -- ऐसा माने। — VaniSagar

Global Translations

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KannadaIND

ನಾನು ಏನನ್ನೂ ಮಾಡುವುದಿಲ್ಲ," ಹೀಗೆ ಸತ್ಯದ ಸಮನ್ವಯ ಬಲ್ಲವರು ಯೋಚಿಸುತ್ತಾರೆ, ನೋಡುತ್ತಾರೆ, ಕೇಳುತ್ತಾರೆ, ಸ್ಪರ್ಶಿಸುತ್ತಾರೆ, ವಾಸನೆ ಮಾಡುತ್ತಾರೆ, ತಿನ್ನುತ್ತಾರೆ, ಹೋಗುತ್ತಾರೆ, ಮಲಗುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಉಸಿರಾಡುತ್ತಾರೆ.

TamilIND

நான் ஒன்றும் செய்யவே இல்லை," இவ்வாறு ஒருமித்த உண்மையை அறிந்தவர் சிந்திப்பார், பார்ப்பார், கேட்பார், தொடுகிறார், வாசனைப்பார்க்கிறார், சாப்பிடுவார், செல்வார், உறங்குகிறார், சுவாசிப்பார்.

PunjabiIND

ਮੈਂ ਬਿਲਕੁਲ ਵੀ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ," ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਸੱਚ ਦੇ ਸੁਮੇਲ ਵਾਲੇ ਜਾਣਕਾਰ ਨੂੰ ਵੇਖਣਾ, ਸੁਣਨਾ, ਛੂਹਣਾ, ਸੁੰਘਣਾ, ਖਾਣਾ, ਜਾਣਾ, ਸੌਣਾ ਅਤੇ ਸਾਹ ਲੈਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।

TeluguIND

నేనేమీ చేయను," ఈ విధంగా సత్యం యొక్క సామరస్య జ్ఞాని ఆలోచిస్తాడు, చూడటం, వినడం, తాకడం, వాసన చూడటం, తినడం, వెళ్ళడం, నిద్రపోవడం మరియు శ్వాసించడం.

MalayalamIND

ഞാൻ ഒന്നും ചെയ്യുന്നില്ല," അങ്ങനെ സത്യത്തിൻ്റെ സമന്വയം അറിയുന്നവൻ ചിന്തിക്കുകയും കാണുകയും കേൾക്കുകയും സ്പർശിക്കുകയും മണക്കുകയും ഭക്ഷണം കഴിക്കുകയും പോകുകയും ഉറങ്ങുകയും ശ്വസിക്കുകയും ചെയ്യും.

DogriIND

मैं बिल्कुल किश नेईं करदा," इस चाल्ली सच्चाई दा समन्वयात्मक ज्ञाता सोचदा, दिक्खदा, सुनदा, छूह्ना, सूंघदा, खांदा, जाना, सोना, ते सांस लैंदा।

ManipuriIND

ꯑꯩꯅꯥ ꯀꯔꯤꯒꯨꯝꯕꯥ ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯇꯧꯗꯦ," ꯑꯁꯨꯝꯅꯥ ꯑꯆꯨꯝꯕꯥ ꯈꯉꯂꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯈꯅꯒꯅꯤ, ꯎꯕꯥ, ꯇꯥꯕꯥ, ꯊꯦꯡꯅꯕꯥ, ꯁꯣꯀꯄꯥ, ꯆꯥꯕꯥ, ꯆꯠꯄꯥ, ꯇꯨꯝꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯁ꯭ꯕꯔ ꯍꯣꯅꯕꯥ ꯉꯃꯒꯅꯤ꯫

SindhiIND

مان ڪجھ به نه ٿو ڪريان،“ اهڙيءَ طرح سچ جو همعصر ڄاڻندڙ سوچيندو، ڏسڻ، ٻڌڻ، ڇهڻ، سونگھڻ، کائڻ، وڃڻ، سمهڻ ۽ ساهه کڻڻ.

MaithiliIND

हम किछुओ नहि करैत छी," एहि तरहें सत्यक सामंजस्यपूर्ण ज्ञाता सोचत, देखैत, सुनैत, स्पर्श करैत, गंध करैत, खाइत, जाइत, सुतैत, आ साँस लैत।

BhojpuriIND

हम बिल्कुल कुछ ना करेनी," एह तरह से सत्य के सामंजस्यपूर्ण ज्ञाता सोचत, देखत, सुनत, छूवत, सूंघत, खात, जाके, सुतत, आ साँस लेत होई।

BengaliIND

আমি কিছুই করি না, "এইভাবে সত্যের সমন্বিত জ্ঞানী চিন্তা করবে, দেখবে, শ্রবণ করবে, স্পর্শ করবে, ঘ্রাণ পাবে, খাওয়াবে, যাবে, ঘুম পাবে এবং শ্বাস করবে।

MarathiIND

मी अजिबात काही करत नाही," अशा प्रकारे सत्याचा समरस झालेला जाणकार पाहणे, ऐकणे, स्पर्श करणे, वास घेणे, खाणे, जाणे, झोपणे आणि श्वास घेणे याबद्दल विचार करेल.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.8।। व्याख्या--'तत्त्ववित् युक्तः'--यहाँ ये पद सांख्ययोगके विवेकशील साधकके वाचक हैं, जो तत्त्ववित् महापुरुषकी तरह निर्भ्रान्त अनुभव करनेके लिये तत्पर रहता है। उसमें ऐसा विवेक जाग्रत् हो गया है कि सब क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं, उन क्रियाओंका मेरे साथ कोई सम्बन्ध है ही नहीं।जो अपनेमें अर्थात् स्वरूपमें कभी किञ्चिन्मात्र भी किसी क्रियाके कर्तापनको नहीं देखता, वह 'तत्त्ववित्' है। उसमें नित्य-निरन्तर स्वाभाविक ही यह सावधानी रहती है कि स्वरूपमें कर्तापन है ही नहीं। प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन बुद्धि, प्राण आदिके साथ वह कभी भी अपनी एकता स्वीकार नहीं करता, इसलिये इनके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको वह अपनी क्रियाएँ मान ही कैसे सकता है?वास्तवमें उपर्युक्त स्थिति स्वरूपसे सभी मनुष्योंकी है; परन्तु वे भूलसे स्वरूपको क्रियाओंका कर्ता मान लेते हैं (गीता 3। 27)। परमात्माकी जिस शक्तिसे समष्टि संसारकी क्रियाएँ हो रही हैं, उसी शक्तिसे व्यष्टि शरीरकी क्रियाएँ भी हो रही हैं। परन्तु समष्टिके ही क्षुद्र अंश व्यष्टिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेनेके कारण मनुष्य व्यष्टिकी कुछ क्रियाओँको अपनी क्रियाएँ मानने लग जाता है। इस मान्यताको हटानेके ही लिये भगवान् कहते हैं कि साधक अपनेको कभी कर्ता न माने। जबतक किसी भी अंशमें कर्तापनकी मान्यता है, तबतक वह साधक कहा जाता है। जब अपनेमें कर्तापनकी मान्यताका सर्वथा अभाव होकर अपने स्वरूपका अनुभव हो जाता है, तब वह तत्त्ववित् महापुरुष कहा जाता है। जैसे स्वप्नसे जगनेपर मनुष्यका स्वप्नसे बिलकुल सम्बन्ध नहीं रहता, ऐसे ही तत्त्ववित् महापुरुषका शरीरादिसे होनेवाली क्रियाओंसे बिलकुल सम्बन्ध (कर्तापन) नहीं रहता।यहाँ 'तत्त्ववित्'वही है, जो प्रकृति और पुरुषके विभागको अर्थात् गुण और क्रिया सब प्रकृतिमें है, प्रकृतिसे अतीत तत्त्वमें गुण और क्रिया नहीं है--इसको ठीक-ठीक जानता है। प्रकृतिसे अतीत निर्विकार तत्त्व तो सबका प्रकाशक और आधार है। सबका प्रकाशक होता हुआ भी वह प्रकाश्यके अन्तर्गत ओतप्रोत है। प्रकाश्य (शरीर आदि) में घुला-मिला रहनेपर भी प्रकाशक प्रकाशक ही है और प्रकाश्य प्रकाश्य ही है। ऐसे ही वह सबका आधार होता हुआ भी सबके (आधेयके) कण-कणमें व्याप्त है; पर वह कभी आधेय नहीं होता। कारण कि जो प्रकाशक और आधार है, उसमें करना और होना नहीं है। करना और होनारूप परिवर्तन तो प्रकाश्य अथवा आधेयमें ही है। इस तरह प्रकाशक और प्रकाश्य आधार और आधेयके भेद-(विभाग-) को जो ठीक तरहसे जानता है, वही 'तत्त्ववित्' है। इसी प्रकृति (क्षेत्र) और पुरुष-(क्षेत्रज्ञ-) के विभागको जाननेकी बात भगवान्ने पहले दूसरे अध्यायके सोलहवें श्लोकमें और आगे सातवें अध्यायके चौथे-पाँचवें तथा तेरहवें अध्यायके दूसरे, उन्नीसवें, तेईसवें और चौंतीसवें श्लोकमें कही है। 'पश्यञ्शृण्वन्स्पृशन् ৷৷. उन्मिषन्निमिषन्नपि'--यहाँ देखना, सुनना, स्पर्श करना, सूँघना और खाना--ये पाँचों क्रियाएँ (क्रमशः नेत्र, श्रोत्र, त्वचा, घ्राण और रसना --इन पाँच) ज्ञानेन्द्रियोंकी हैं। चलना, ग्रहण करना, बोलना और मल-मूत्रका त्याग करना--ये चारों क्रियाएँ (क्रमशः पाद, हस्त, वाक्, उपस्थ और गुदा--इन पाँच) कर्मेन्द्रियोंकी हैं । सोना--यह एक क्रिया अन्तःकरणकी है। श्वास लेना--यह एक क्रिया प्राणकी और आँखें खोलना तथा मूँदना--ये दो क्रियाएँ 'कूर्म 'नामक उपप्राणकी हैं।उपर्युक्त तेरह क्रियाएँ देकर भगवान्ने ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, अन्तःकरण, प्राण और उपप्राणसे होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाओँका उल्लेख कर दिया है। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिके द्वारा ही होती हैं, स्वयंके द्वारा नहीं। दूसरा एक भाव यह भी प्रतीत होता है कि सांख्ययोगीके द्वारा वर्ण, आश्रम, स्वभाव, परिस्थिति आदिके अनुसार शास्त्रविहित शरीर-निर्वाहकी क्रियाएँ, खान-पान, व्यापार करना, उपदेश देना, लिखना ,पढ़ना, सुनना, सोचना आदि क्रियाएँ न होती हों--ऐसी बात नहीं है। उसके द्वारा ये सब क्रियाएँ हो सकती हैं।मनुष्य अपनेको उन्हीं क्रियाओँका कर्ता मानता है, जिनको वह जानकर अर्थात् मन-बुद्धिपूर्वक करता है; जैसे पढ़ना, लिखना, सोचना, देखना, भोजन करना आदि। परन्तु अनेक क्रियाएँ ऐसी होती हैं, जिन्हें मनुष्य जानकर नहीं करता; जैसे--श्वासका आना-जाना, आँखोंका खुलना और बंद होना आदि। फिर इन क्रियाओंका कर्ता अपनेको न माननेकी बात इस श्लोकमें कैसे कही गयी? इसका उत्तर यह है कि सामान्यरूपसे श्वासोंका आना-जाना आदि क्रियाएँ स्वाभाविक होनेवाली हैं; किन्तु प्राणायाम आदिमें मनुष्य श्वास लेना आदि क्रियाएँ जानकर करता है। ऐसे ही आँखोको खोलना और बंद करना भी जानकर किया जा सकता है। इसलिये इन क्रियाओंका कर्ता भी अपनेको न माननेके लिये कहा गया है। दूसरी बात, जैसे मनुष्य 'श्वसन् उन्मिषन् निमिषन्' (श्वास लेना, आँखोंको खोलना और मूँदना)--इन क्रियाओंको स्वाभाविक मानकर इनमें अपना कर्तापन नहीं मानता, ऐसे ही अन्य क्रियाओंको भी स्वाभाविक मानकर उनमें अपना कर्तापन नहीं मानना चाहिये।यहाँ 'पश्यन्' आदि जो तेरह क्रियाएँ बतायी हैं, इनका बिना किसी आधारके होना सम्भव नहीं है। ये क्रियाएँ जिसके आश्रित होती हैं अर्थात् इन क्रियाओंका जो आधार है, उसमें कभी कोई क्रिया नहीं होती। ऐसे ही प्रकाशित होनेवाली ये सम्पूर्ण क्रियाएँ बिना किसी प्रकाशके सिद्ध नहीं हो सकतीं। जिस प्रकाशसे ये क्रियाएँ प्रकाशित होती है, जिस प्रकाशके अन्तर्गत होती हैं, उस प्रकाशमें कभी कोई क्रिया हुई नहीं, होती नहीं, होगी नहीं, हो सकती नहीं और होनी सम्भव भी नहीं। ऐसा वह तत्त्व सबका आधार, प्रकाशक और स्वयं प्रकाशस्वरूप है। वह सबमें रहता हुआ भी कुछ नहीं करता। उस तत्त्वकी तरफ लक्ष्य करानेमें ही उपर्युक्त इन तेरह क्रियाओँका तात्पर्य है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तत्त्वको समझकर कब और किस प्रकार ऐसे माने सो कहते हैं ( देखता सुनता छूता सूँघता खाता चलता सोता श्वास लेता बोलता त्याग करता ग्रहण करता तथा आँखोंको खोलता और मूँदता हुआ भी इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयमें बर्त रही हैं ऐसे समझकर ) ऐसे माने कि मैं कुछ भी नहीं करता। इस प्रकार इसका पहलेके आधे श्लोकसे सम्बन्ध है। जो इस प्रकार तत्त्वज्ञानी है अर्थात् सब इन्द्रियाँ और अन्तःकरणोंकी चेष्टारूप कर्मोंमें अकर्म देखनेवाला है वह अपनेमें कर्मोंका अभाव देखता है इसलिये उस यथार्थ ज्ञानीका सर्वकर्मसंन्यासमें ही अधिकार है। क्योंकि मृगतृष्णिकामें जल समझकर उसको पीनेके लिये प्रवृत्त हुआ मनुष्य उसमें जलके अभावका ज्ञान हो जानेपर फिर भी वही जल पीनेके लिये प्रवृत्त नहीं होता।

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Sri Anandgiri

कर्माण्यङ्गीकृत्य तैरस्य विदुषो बन्धो नास्तीत्युक्तमिदानीं वस्तुतस्तस्य कर्माण्येव न सन्तीत्याह नचेति। लोकदृष्ट्या विदुषोऽपि कर्माणि सन्तीत्याशङ्क्य स्वदृष्ट्या तदभावमभिप्रेत्याह नैवेति।

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Sri Dhanpati

कुर्वन्नपि कुतो न लिप्यत इत्याशङ्क्य यतोऽसौ परमार्थतो न करोतीत्याह द्वाभ्याम् नैवेति। युक्तः समाहितः सन्नादौ कर्मयोगयुक्त इति वाऽयं पक्षोऽध्याहारसापेक्षत्वादाचार्यैरुपेक्षितिः। तत्त्ववित्परमार्थदर्शी नैव किंचित्करोमीति मन्येत मन्यते। कदेत्यपेक्षायामाह पश्यन्नित्यादि। अपेः सर्वत्र संबन्धः। पश्यन्नित्यादिज्ञानेन्द्रियाणां व्यापारान् गच्छन्निति पादयोर्व्यापारं स्वपन्निति बुद्धेः श्वसन्निति प्राणस्य प्रलपन्निति वाचः विसृजन्निति पायूपस्थयोः गृह्णन्निति हस्तयोः उन्मिषन्निमिषन्निति कूर्माख्यप्राणस्य कुर्वन्नपीन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते नाहमसङ्ग आत्मेति धारयन् बुद्य्धा निश्चयं कुर्वन् किंचित्सरोमीति तत्त्वविन्मन्यतेऽतो न लिप्यत इत्यर्थः। यद्वानन्वेवं कर्तृत्वाभिमानशून्य इन्द्रियैः प्रतिषिद्धमपि कुर्यादित्यत आह इन्द्रियाणीति। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेष्विष्टेषु विषयेषु वर्तन्त इति हेतोरन्याय्यमपि कुर्युरित्य इन्द्रियाणि धारयन्त्त्स्वायत्तानि यथेष्टसंचारपराङ्भुखानि कुर्वन्निति। अस्मिन्पक्षे प्रकरणविरोधोऽनुषक्लेशश्च परिहर्तव्यः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nanot
evacertainly
kiñchitanything
karomiI do
itithus
yuktaḥsteadfast in karm yog
manyetathinks
tattvavit
paśhyanseeing
śhṛiṇvanhearing
spṛiśhantouching
jighransmelling
aśhnaneating
gachchhanmoving
svapansleeping
śhvasanbreathing
pralapantalking
visṛijangiving up
gṛihṇanaccepting
unmiṣhanopening (the eyes)
nimiṣhanclosing (the eyes)
apialthough
indriyāṇithe senses
indriyaartheṣhu
vartantemoving
itithus
dhārayanconvinced
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 5.7
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते

जिसकी इन्द्रियाँ अपने वशमें हैं, जिसका अन्तःकरण निर्मल है, जिसका शरीर अपने वशमें है और सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा ही जिसकी आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.9
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्

तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मल-मूत्र का त्याग करता, सोता हुआ, श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता हुआ भी 'सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं' -- ऐसा समझकर 'मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ' -- ऐसा माने। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 8
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 8
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यन् श्रृणवन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन् श्वसन्

तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मल-मूत्र का त्याग करता, सोता, श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं' -- ऐसा समझकर 'मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ' -- ऐसा माने। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ: "तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मल-मूत्र का त्याग करता, सोता, श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं' -- ऐसा समझकर 'मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ' -- ऐसा माने। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 8?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 8 translates to: "I do nothing at all," thus would the harmonized knower of Truth think, seeing, hearing, touching, smelling, eating, going, sleeping, and breathing. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यन् श्रृणवन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 8 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मल-मूत्र का त्याग करता, सोता, श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं' -- ऐसा समझकर 'मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ' -- ऐसा माने। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "naiva kiñchit karomīti yukto manyeta tattva-vit" mean in English?

"naiva kiñchit karomīti yukto manyeta tattva-vit" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 8. I do nothing at all," thus would the harmonized knower of Truth think, seeing, hearing, touching, smelling, eating, going, sleeping, and breathing. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.