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Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 6
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति

परन्तु हे महाबाहो ! कर्मयोगके बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है। मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

ஆனால், ஓ வலிமையான ஆயுதம் கொண்ட அர்ஜுனா, துறவு யோகம் இல்லாமல் அடைவது கடினம்; யோகத்தில் இணக்கமான முனிவர் விரைவாக பிரம்மனிடம் செல்கிறார்.

KannadaIND

ಆದರೆ, ಓ ಬಲಶಾಲಿಯಾದ ಅರ್ಜುನ, ಯೋಗವಿಲ್ಲದೆ ತ್ಯಜಿಸುವುದು ಕಷ್ಟ; ಯೋಗದ ಸಮನ್ವಯದಲ್ಲಿರುವ ಋಷಿಯು ಬೇಗನೆ ಬ್ರಹ್ಮನ ಬಳಿಗೆ ಹೋಗುತ್ತಾನೆ.

MalayalamIND

പക്ഷേ, ബലവാനായ അർജ്ജുനാ, യോഗ കൂടാതെ ത്യാഗം നേടുക പ്രയാസമാണ്; യോഗാനുഷ്ഠാനമുള്ള മുനി വേഗത്തിൽ ബ്രഹ്മത്തിലേക്ക് പോകുന്നു.

BengaliIND

কিন্তু, হে পরাক্রমশালী অর্জুন, যোগ ছাড়া ত্যাগ লাভ করা কঠিন; যোগের সাথে সঙ্গতিপূর্ণ ঋষি দ্রুত ব্রাহ্মণের কাছে যান।

SindhiIND

پر، اي طاقتور هٿياربند ارجن، يوگا کان سواءِ ارتداد حاصل ڪرڻ مشڪل آهي. بابا جيڪو يوگا سان مطابقت رکي ٿو، جلدي برهمڻ ڏانهن وڃي ٿو.

NepaliIND

तर, हे पराक्रमी अर्जुन, योगविना त्याग प्राप्त गर्न कठिन छ; जो ऋषि योगसँग मेल खान्छ, चाँडै ब्राह्मणमा जान्छ।

TeluguIND

కానీ, ఓ శక్తివంతమైన సాయుధ అర్జునా, యోగం లేకుండా త్యజించడం కష్టం; యోగానికి అనుగుణంగా ఉన్న ఋషి త్వరగా బ్రహ్మం వద్దకు వెళ్తాడు.

PunjabiIND

ਪਰ, ਹੇ ਬਲਵਾਨ ਅਰਜੁਨ, ਯੋਗ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਤਿਆਗ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨਾ ਔਖਾ ਹੈ; ਜੋ ਰਿਸ਼ੀ ਯੋਗ ਨਾਲ ਮੇਲ ਖਾਂਦਾ ਹੈ ਉਹ ਜਲਦੀ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਕੋਲ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

GujaratiIND

પણ, હે પરાક્રમી અર્જુન, યોગ વિના ત્યાગ પ્રાપ્ત કરવો મુશ્કેલ છે; જે ઋષિ યોગ સાથે સુસંગત છે તે ઝડપથી બ્રાહ્મણ પાસે જાય છે.

MarathiIND

परंतु, हे पराक्रमी अर्जुना, योगाशिवाय त्याग प्राप्त होणे कठीण आहे; जो ऋषी योगाशी सुसंगत असतो तो पटकन ब्राह्मणाकडे जातो.

AssameseIND

কিন্তু হে মহাবাহু অৰ্জুন, যোগ অবিহনে ত্যাগ কঠিন; যোগৰ লগত মিল থকা ঋষি সোনকালে ব্ৰহ্মৰ ওচৰলৈ যায়।

MaithiliIND

परन्तु हे महाबाहु अर्जुन, योग के बिना त्याग प्राप्त करब कठिन अछि; योग के साथ तालमेल में रहने वाला ऋषि शीघ्र ब्रह्म के पास जाते हैं |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.6।। व्याख्या--'संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः'--सांख्ययोगकी सफलताके लिये कर्मयोगका साधन करना आवश्यक है; क्योंकि उसके बिना सांख्य-योगकी सिद्धि कठिनतासे होती है। परन्तु कर्मयोगकी सिद्धिके लिये सांख्ययोगका साधन करनेकी आवश्यकता नहीं है। यही भाव यहाँ 'तु' पदसे प्रकट किया गया है।सांख्ययोगीका लक्ष्य परमात्मतत्त्वका अनुभव करना होता है। परन्तु राग रहते हुए इस साधनके द्वारा परमात्मतत्त्वके अनुभवकी तो बात ही क्या है, इस साधनका समझमें आना भी कठिन हैराग मिटानेका सुगम उपाय है--कर्मयोगका अनुष्ठान करना। कर्मयोगमें प्रत्येक क्रिया दूसरोंके हितके लिये ही की जाती है। दूसरोंके हितका भाव होनेसे अपना राग स्वतः मिटता है। इसलिये कर्मयोगके आचरणद्वारा राग मिटाकर सांख्ययोगका साधन करना सुगम पड़ता है। कर्मयोगका साधन किये बिना सांख्ययोगका सिद्ध होना कठिन है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

जो वैदिक ( निष्काम ) कर्मयोग है वह तो उसी ज्ञानयोगका साधन होनेके कारण गौणरूपसे योग और संन्यास कहा जाने लगा है। वह उसीका साधन कैसे है सो कहते हैं बिना कर्मयोगके पारमार्थिक संन्यास प्राप्त होना कठिन है दुष्कर है। तथा फल न चाहकर ईश्वरसमर्पणके भावसे किये हुए वैदिक कर्मयोगसे युक्त हुआ ईश्वरके स्वरूपका मनन करनेवाला मुनि ब्रह्मको अर्थात् परमात्मज्ञाननिष्ठारूप पारमार्थिक संन्यासको शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है इसलिये मैंने कहा कि कर्मयोग श्रेष्ठ है। परमात्मज्ञानका सूचक होनेसे प्रकरणमें वर्णित संन्यास ही ब्रह्म नामसे कहा गया है तथा संन्यास ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही पर है इस श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

यदि यथोक्तज्ञानपूर्वकसंन्यासद्वारा कर्मिणामपि श्रेयोवाप्तिरिष्टा तर्हि संन्यासस्यैव श्रेयस्त्वं प्राप्तमिति चोदयति एवं तर्हीति। संन्यासस्य श्रेष्ठत्वे कर्मयोगस्य प्रशस्यत्ववचनमनुचितमित्याह कथं तर्हीति। पूर्वोक्तमेवाभिप्रायं स्मारयन्परिहरति शृण्विति। कर्मयोगस्य विशिष्टत्ववचनं तत्रेति परामृष्टम्। तदेव कारणं कथयति त्वयेत्यादिना। केवलं विज्ञानरहितमिति यावत्। तयोरन्यतरः कः श्रेयानितीतिशब्दोऽध्याहर्तव्यः। त्वदीयं प्रश्नमनुसृत्य तदनुगुणं प्रतिवचनं ज्ञानमनपेक्ष्य तद्रहितात्केवलादेव संन्यासाद्योगस्य विशिष्टत्वमिति यथोक्तमित्याह तदनुरूपमिति। ज्ञानापेक्षः संन्यासस्तर्हि कीदृगित्याशङ्क्याह ज्ञानेति। तर्हि कर्मयोगे कथं योगशब्दः संन्यासशब्दो वा प्रयुज्यते तत्राह यस्त्विति। तादर्थ्यात्परमार्थज्ञानशेषत्वादिति यावत्। तदेव तादर्थ्यं प्रश्नपूर्वकं प्रसाधयति कथमित्यादिना। कर्मानुष्ठानाभावे बुद्धिशुद्ध्यभावात्परमार्थसंन्यासस्य सम्यग्ज्ञानात्मनो न प्राप्तिरिति व्यतिरेकमुपन्यस्यान्वयमुपन्यस्यति योगेति। पारमार्थिकः सम्यग्ज्ञानात्मकः। सामग्र्यभावे कार्यप्राप्तिरयुक्तेति मत्वाह दुःखमिति। योगयुक्तत्वं व्याचष्टे वैदिकेनेति। ईश्वरस्वरूपस्य सविशेषस्येति शेषः। ब्रह्मेति व्याख्येयं पदमुपादाय व्याचष्टे प्रकृत इति। तत्र ब्रह्मशब्दप्रयोगे हेतुमाह परमात्मेति। लक्षणशब्दो गमकविषयः। संन्यासे ब्रह्मशब्दप्रयोगे तैत्तिरीयकश्रुतिं प्रमाणयति न्यास इति। कथं संन्यासे हिरण्यगर्भवाची ब्रह्मशब्दः प्रयुज्यते द्वयोरपि परत्वाविशेषादित्याह ब्रह्म हीति। ब्रह्मशब्दस्य संन्यासविषयत्वे फलितं वाक्यार्थमाह ब्रह्मेत्यादिना। नद्याः स्रोतांसीव निम्नप्रवणानि कर्मभिरतितरां परिपक्वकषायस्य करणानि सर्वतो व्यापृतानि निरस्ताशेषकूटस्थप्रत्यगात्मान्वेषणप्रवणानि भवन्तीति। कर्मयोगस्य परमार्थसंन्यासप्राप्त्युपायत्वे फलितमाह अत इति।

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Sri Dhanpati

एवं तर्हि कर्मयोगात्संन्यास एव विशिष्यते कथमुक्तं तयोस्तु कर्मसन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते इत्याशङ्क्य ज्ञाननिष्ठारहितादशुद्धचित्तेन कृतात्केवलात्संन्यासात्कर्मत्यागाच्छुद्धिकरस्य सन्यासद्वारा ज्ञानप्राप्त्या मोक्षसंपादकस्य कर्मयोगस्य श्रैष्ठ्यं मया प्रतिपादितं नतु ज्ञाननिष्ठासहितात्सांख्यशब्दोदिताद्विशुद्धान्तःकरणेन कृतात्। तस्मात्तं प्रति साधनत्वात्कर्मयोगस्येत्याशयेनाह संन्यास इति। संन्यासस्तु ज्ञाननिष्ठासहितस्तु परमार्थसंन्यासः। अयोगतः योगेन विनाप्तुं प्राप्तुं दुःखं दुर्घटमित्यर्थः। योगेन वैदिकेन कर्मयोगेनेश्वरसमर्पितरुपेण निष्कामेन युक्तः मुनिः सगुणेश्वरस्वरुपमननशीलः ब्रह्म परमार्थसंन्यास परमात्मज्ञाननिष्ठालक्षणं नचिरेण क्षिप्रमेवाधिगच्छति प्राप्नोति। परमार्थज्ञानलक्षणत्वात्प्रकृतः संन्यासो ब्रह्मोच्यतेन्यास इति ब्रह्म। ब्रह्म हि परः इति श्रुतेः। अशुद्धचित्तेनापि संन्यास एव प्रथमं कुतो न क्रियते ज्ञाननिष्ठाहेतुत्वेन तस्यावश्यकत्वादितिचेत्तत्राह संन्यासस्त्विति। योगमन्तरेण हठादेव यः कृतः संन्यासः स तु दुःखमाप्तुमेव भवति। अशुद्धान्तःकरणत्वेन तत्फलस्य ज्ञाननिष्ठाया असंभवात्। शोधके च कर्मण्यनधिकारात् कर्मब्रह्मोभयभ्रष्टत्वेन परमसंकटापत्तेः। यद्वाऽयोगत इति सप्तम्यर्थे तसिः। अयोगे तु संन्यासो दुःखमाप्तुमिति अयोगे योगाभावे प्रसिद्धसंन्यासाद्विलक्षणःप्रमादिनो बहिश्चित्ताः पिशुनाः कलहोत्सुकाः। संन्याससिनोऽपि दृश्यन्ते दैवसंदूषिताशयाः।। इतिवार्तिककारोक्तः संन्यासः। दुखं नरकात्मकमाप्तुं भवतीति शेषः। नरकफलको नत्वनर्थनिवृत्त्यविनाभूतनिरतिशयानन्दरुपतापादक इति भावः। ननु तर्ह्यवश्याप्रेक्षिताद्योगादेवास्तु फलं नेत्याह। योगयुक्तः सत्त्वशुद्य्धा मुनिर्मननशीलः संन्यासी भूत्वा ब्रह्म सत्यज्ञानादिलक्षणं नचिरेणं शीघ्रमेवाधिगच्छति प्रतिबन्धकाभावात्। साक्षात्करोतीति तु सुगमत्वाद्भाष्यकारैरुपेक्षितम्। माहबाहो इति संबोधयन् महाबाहुसाध्ये युद्धरुपे कर्मण्येव तवाधिकारो न संन्यासे इति सूचयति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sanyāsaḥrenunciation
tubut
mahābāho
duḥkhamdistress
āptumattains
ayogataḥwithout karm yog
yogayuktaḥ
muniḥa sage
brahmaBrahman
na chireṇaquickly
adhigachchhatigoes
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 5.5
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति

सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। अतः जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोगको (फलरूपमें) एक देखता है, वही ठीक देखता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.7
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते

जिसकी इन्द्रियाँ अपने वशमें हैं, जिसका अन्तःकरण निर्मल है, जिसका शरीर अपने वशमें है और सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा ही जिसकी आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 6
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 6
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति

परन्तु हे महाबाहो ! कर्मयोगके बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है। मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ: "परन्तु हे महाबाहो ! कर्मयोगके बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है। मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 6?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 6 translates to: "But, O mighty-armed Arjuna, renunciation is hard to attain without Yoga; the sage who is in harmony with Yoga quickly goes to Brahman. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 6 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। परन्तु हे महाबाहो ! कर्मयोगके बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है। मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sannyāsas tu mahā-bāho duḥkham āptum ayogataḥ" mean in English?

"sannyāsas tu mahā-bāho duḥkham āptum ayogataḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 6. But, O mighty-armed Arjuna, renunciation is hard to attain without Yoga; the sage who is in harmony with Yoga quickly goes to Brahman. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.