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Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 5
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति

सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। अतः जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोगको (फलरूपमें) एक देखता है, वही ठीक देखता है। — VaniSagar

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TamilIND

சாங்கியர்கள் அல்லது ஞானிகள் அடையும் அந்த இடத்தை யோகிகள் (கர்ம யோகிகள்) அடைகிறார்கள். அறிவையும் செயலின் செயல்திறனையும் (கர்ம யோகம்) ஒன்றாகக் காண்பவர் உண்மையாகவே பார்க்கிறார்.

MalayalamIND

സാംഖ്യന്മാരോ ജ്ഞാനികളോ എത്തിച്ചേരുന്ന സ്ഥലത്ത് യോഗികളും (കർമ്മയോഗികൾ) എത്തിച്ചേരുന്നു. അറിവും കർമ്മ പ്രകടനവും (കർമയോഗം) ഒന്നായി കാണുന്നവൻ യഥാർത്ഥമായി കാണുന്നു.

KannadaIND

ಸಾಂಖ್ಯರು ಅಥವಾ ಜ್ಞಾನಿಗಳು ತಲುಪುವ ಸ್ಥಳವನ್ನು ಯೋಗಿಗಳು (ಕರ್ಮಯೋಗಿಗಳು) ಸಹ ತಲುಪುತ್ತಾರೆ. ಜ್ಞಾನವನ್ನು ಮತ್ತು ಕ್ರಿಯೆಯ ಕಾರ್ಯಕ್ಷಮತೆಯನ್ನು (ಕರ್ಮಯೋಗ) ಒಂದಾಗಿ ನೋಡುವವನು ನಿಜವಾಗಿಯೂ ನೋಡುತ್ತಾನೆ.

MarathiIND

सांख्य किंवा ज्ञानी ज्या ठिकाणी पोहोचतात ते योगी (कर्मयोगी) देखील पोहोचतात. जो ज्ञान आणि कर्मयोग (कर्मयोग) एकच पाहतो, तो खरोखर पाहतो.

ManipuriIND

ꯁꯪꯈ꯭ꯌꯁꯤꯡ ꯅꯠꯔꯒꯥ ꯖ꯭ꯅꯥꯅꯤꯁꯤꯡꯅꯥ ꯌꯧꯔꯀꯄꯥ ꯃꯐꯝ ꯑꯗꯨ ꯌꯣꯒꯁꯤꯡ (ꯀꯔꯝ ꯌꯣꯒꯤꯁꯤꯡ)ꯅꯁꯨ ꯌꯧꯏ꯫ ꯖ꯭ꯅꯥꯟ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯊꯕꯛ ꯄꯥꯡꯊꯣꯀꯄꯥ (ꯀꯔꯝ ꯌꯣꯒ)ꯕꯨ ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯎꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯇꯁꯦꯡꯅꯥ ꯎꯏ꯫

MaithiliIND

जे स्थान पर सांख्य या ज्ञानी पहुँचैत छथि, तकरा योगी (कर्म योगी) सेहो पहुँचैत छथि | जे ज्ञान आ कर्म योग (कर्म योग) के निष्पादन के एक बुझैत अछि, ओ सत्य देखैत अछि |

DogriIND

जिस थाह् र गी सांख्य जां ज्ञानी पुज्जदे न, उसी योगी (कर्म योगी) बी पुज्जदे न। जो ज्ञान ते कर्म (कर्म योग) दे निष्पादन गी इक रूप च दिक्खदा ऐ, ओह् सच्ची गै दिक्खदा ऐ।

NepaliIND

जुन स्थानमा सांख्य वा ज्ञानीहरू पुग्छन्, त्यो ठाउँ पनि योगीहरू (कर्मयोगीहरू) पुग्छन्। जसले ज्ञान र कर्मयोगलाई एउटै रूपमा देख्छ, उसले वास्तवमा देख्छ।

GujaratiIND

જે સ્થાન પર સાંખ્ય અથવા જ્ઞાનીઓ પહોંચે છે તે સ્થાન યોગીઓ (કર્મયોગીઓ) દ્વારા પણ પહોંચે છે. જે જ્ઞાન અને કર્મયોગ (કર્મયોગ)ને એક તરીકે જુએ છે, તે સાચે જ જુએ છે.

BengaliIND

যে স্থানে সাংখ্য বা জ্ঞানীরা পৌঁছেছেন সেই স্থানে যোগীরাও পৌঁছেছেন (কর্মযোগীরা)। যিনি জ্ঞান এবং কর্মের কার্যক্ষমতা (কর্ম যোগ) এক হিসাবে দেখেন, তিনি সত্যই দেখেন।

PunjabiIND

ਉਹ ਸਥਾਨ ਜਿੱਥੇ ਸਾਂਖਿਆਂ ਜਾਂ ਗਿਆਨੀਆਂ ਦੁਆਰਾ ਪਹੁੰਚਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਉਹ ਯੋਗੀਆਂ (ਕਰਮ ਯੋਗੀਆਂ) ਦੁਆਰਾ ਵੀ ਪਹੁੰਚਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਜੋ ਗਿਆਨ ਅਤੇ ਕਰਮ (ਕਰਮ ਯੋਗ) ਦੇ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਨੂੰ ਇੱਕ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਵੇਖਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਸੱਚਮੁੱਚ ਵੇਖਦਾ ਹੈ।

TeluguIND

సాంఖ్యులు లేదా జ్ఞానులు చేరుకునే ప్రదేశాన్ని యోగులు (కర్మయోగులు) కూడా చేరుకుంటారు. జ్ఞానాన్ని మరియు క్రియ యొక్క పనితీరును (కర్మ యోగం) ఒకటిగా చూసేవాడు నిజంగా చూస్తాడు.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.5।। व्याख्या--'यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते'--पूर्वश्लोकके उत्तरार्धमें भगवान्ने कहा था कि एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित होकर मनुष्य दोनों साधनोंके फलरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर लेता है। उसी बातकी पुष्टि भगवान् उपर्युक्त पदोंमें दूसरे ढंगसे कर रहे हैं कि जो तत्त्व सांख्ययोगी प्राप्तकरते हैं, वही तत्त्व कर्मयोगी भी प्राप्त करते हैं।संसारमें जो यह मान्यता है कि कर्मयोगसे कल्याण नहीं होता, कल्याण तो ज्ञानयोगसे ही होता है--इस मान्यताको दूर करनेके लिये यहाँ 'अपि' अव्ययका प्रयोग किया गया है। सांख्ययोगी और कर्मयोगी--दोनोंका ही अन्तमें कर्मोंसे अर्थात् क्रियाशील प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है। प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर दोनों ही योग एक हो जाते हैं। साधन-कालमें भी सांख्ययोगका विवेक (जड़-चेतनका सम्बन्ध-विच्छेद) कर्मयोगीको अपनाना पड़ता है और कर्मयोगकी प्रणाली (अपने लिये कर्म न करनेकी पद्धति) सांख्ययोगीको अपनानी पड़ती है। सांख्ययोगका विवेक प्रकृति-पुरुषका सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये होता है और कर्मयोगका कर्म संसारकी सेवाके लिये होता है। सिद्ध होनेपर सांख्ययोगी और कर्मयोगी--दोनोंकी एक स्थिति होती है क्योंकि दोनों ही साधकोंकी अपनी निष्ठाएँ हैं (गीता 3। 3)।संसार विषम है। घनिष्ठ-से-घनिष्ठ सांसारिक सम्बन्धमें भी विषमता रहती है। परन्तु परमात्मा सम हैं। अतः समरूप परमात्माकी प्राप्ति संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ही होती है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये दो योगमार्ग हैं--ज्ञानयोग और कर्मयोग। मेरे सत्-स्वरूपमें कभी अभाव नहीं होता, जबकि कामना-आसक्ति अभावमें ही पैदा होती है--ऐसा समझकर असङ्ग हो जाय--यह ज्ञानयोग है। जिन वस्तुओंमें साधकका राग है, उन वस्तुओंको दूसरोंकी सेवामें खर्च कर दे और जिन व्यक्तियोंमें राग है, उनकी निःस्वार्थभावसे सेवा कर दे--यह कर्मयोग है। इस प्रकार ज्ञानयोगमें विवेक-विचारके द्वारा और कर्मयोगमें सेवाके द्वारा संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।'एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति'--पूर्वश्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने व्यतिरेक रीतिसे कहा था कि सांख्ययोग और कर्मयोगको बेसमझ लोग ही अलग-अलग फल देनेवाले कहते हैं। उसी बातको अब अन्वय रीतिसे कहते हैं कि जो मनुष्य इन दोनों साधनोंको फल-दृष्टिसे एक देखता है, वही यथार्थरूपमें देखता है।इस प्रकार चौथे और पाँचवें श्लोकका सार यह है कि भगवान् सांख्ययोग और कर्मयोग--दोनोंको स्वतन्त्र साधन मानते हैं और दोनोंका फल एक ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति मानते हैं। इस वास्तविकताको न जाननेवाले मनुष्यको भगवान् बेसमझ कहते हैं और इस जाननेवालेको भगवान् यथार्थ जाननेवाला (बुद्धिमान्) कहते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

एकका भी भली प्रकार अनुष्ठान कर लेनेसे दोनोंका फल कैसे पा लेता है इसपर कहा जाता है सांख्योगियोंद्वारा अर्थात् ज्ञाननिष्ठायुक्त संन्यासियोंद्वारा जो मोक्ष नामक स्थान प्राप्त किया जाता है वही कर्मयोगियोंद्वारा भी ( प्राप्त किया जाता है )। जो पुरुष अपने लिये ( कर्मोंका ) फल न चाहकर सब कर्म ईश्वरमें अर्पण करके और उसे ज्ञानप्राप्तिका उपाय मानकर उनका अनुष्ठान करते हैं वे योगी हैं उनको भी परमार्थज्ञानरूप संन्यासप्राप्तिके द्वारा ( वही मोक्षरूप फल ) मिलता है। यह अभिप्राय है। इसलिये फलमें एकता होनेके कारण जो सांख्य और योगको एक देखता है वही यथार्थ देखता है। पू0 यदि ऐसा है तब तो कर्मयोगसे कर्मसंन्यास ही श्रेष्ठ है फिर यह कैसे कहा कि उन दोनोंमें कर्मसंन्यासकी अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है उ0 उसमें जो कारण है सो सुनो तुमने केवल कर्मसंन्यास और केवल कर्मयोगके अभिप्रायसे पूछा था कि उन दोनोंमें कौनसा एक कल्याणकारक है उसीके अनुरूप मैंने यह उत्तर दिया कि ज्ञानरहित कर्मसंन्यासकी अपेक्षा तो कर्मयोग ही श्रेष्ठ है। क्योंकि ज्ञानसहित संन्यासको तो मैं सांख्य मानता हूँ और वही परमार्थयोग भी है।

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Sri Anandgiri

प्रश्नपूर्वकं श्लोकान्तरमवतारयति एकस्यापीति। केचिदेव तयोरेकफलत्वं पश्यन्तीत्याशङ्क्य तेषामेव सम्यग्दर्शित्वं नेतरेषामित्याह एकमिति। तिष्ठत्यस्मिन्न च्यवते पुनरिति व्युत्पत्तिमाश्रित्याह मोक्षाख्यमिति। योगशब्दार्थमाह ज्ञानप्राप्तीति। ये हि जिज्ञासवः सर्वाणि कर्माणि भगवत्प्रीत्यर्थत्वेन तेषां फलाभिलाषमकृत्वा ज्ञानप्राप्तौ बुद्धिशुद्धिद्वारेणोपायत्वेनानुतिष्ठन्ति तेऽत्र योगा विवक्ष्यन्ते। अच्प्रत्ययस्य मत्वर्थत्वं गृहीत्वोक्तं योगिन इति। सर्वोऽपि द्वैतप्रपञ्चो न वस्तुभूतो मायाविलासत्वादात्मा त्वविक्रियोऽद्वितीयो वस्तुसन्निति प्रयोजकज्ञानं परमार्थज्ञानं तत्पूर्वकसंन्यासद्वारेण कर्मिभिरपि तदेव स्थानं प्राप्यमित्येकफलत्वं संन्यासकर्मयोगयोरविरुद्धमित्याह तैरपीति। फलैकत्वे फलितमाह अत इति।

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Sri Dhanpati

एकस्यापि सभ्यगनुष्ठानात्कथमुभयोः फलं लभन्त इत्यत आह यदिति। सांख्यैः ज्ञाननिष्ठैः संन्यासिभिः विशुद्धान्तःकरणैर्यन्मोक्षाख्यं स्थानं च्युतिवर्जितं प्राप्यते तत्त्वसाक्षात्कारमात्रेण लभ्यत इति विस्मृतग्रैवेयकलाभवल्लब्धस्यैव लाभः। तद्यौगैर्ज्ञानप्राप्त्युपायभूतानि ईश्वराराधनार्थानि फलाभिसंधिरहितानि शास्त्रीयाणि कर्माणि योगशब्दवाच्यानि तद्वद्भिः। अर्शआदित्वान्मत्वर्थीयोऽच्प्रत्ययः। तदेव स्थानं परमार्थज्ञानं संन्यासप्राप्तिद्वारेण गम्यते प्राप्यत इत्यर्थः। आयुर्घृतमितिवत्साध्यसाधनयोरभेदाभिप्रायेण परमार्थज्ञानस्य मोक्षाभिन्नत्वात् मोक्षस्य तदभिन्नत्वाच्चैवमुक्तमित्यविरोधः। एतेन ननूभयोरेकं मोक्षाख्यं फलमस्तु नाम तत्साधनयोस्तु परस्परसापेक्षत्वं न युक्तं प्राप्यग्रामस्यैकत्वेऽपि मार्गाणामिवेत्याशङ्क्याह यत्सांख्यैरिति। अत्रेदं विकल्पनीयम्। किं व्यक्तिभेदमात्रेण सन्यासकर्मयोगयोरन्योन्यनिरपेक्षतां ब्रूषे किंवा अपेक्षणीयान्तरा भावात्। नाद्य इत्याह। बहुवचनेन यत्सांख्यैरिति संन्यासैस्तत्तत्कर्मत्यागरुपैरपि यथाऽन्योन्यसापेक्षैरेव फलं साध्यते तथा भिन्नाभ्यामेव संन्यासकर्मयोगाभ्यामन्योन्यसापेक्षाभ्यां भविष्यतीति भावः। नान्त्य इत्याह। यत्स्थानं प्राप्यत इति स्थानशब्देनात्र सोचकज्ञानमुच्यत इति प्रत्युक्तम्। पूर्वश्लोके परस्परसापेक्षत्वाप्रतिपादनात् कर्मयोगादिसाध्यात् ज्ञानान्निरपेक्षात्केवलान्मोक्ष इतिवत् शमदमादिविशिष्टस्य सन्यासस्य कर्मसाध्यत्वेऽपि तेन ज्ञाने जननीये कर्मापेक्षाया अभावादन्योन्यसापेक्षत्वासिद्धेः एकमित्यादेः स्थाने सांख्यं योगं च परस्परसापेक्षमिति वक्तव्यत्वापत्तेश्च। अतः साक्षात्परम्परया वा एकफलजनकत्वात् एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स सभ्यक्पश्यतीत्यर्थ एव रम्यः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yatwhat
sānkhyaiḥby means of karm sanyās
prāpyateis attained
sthānamplace
tatthat
yogaiḥby working in devotion
apialso
gamyateis attained
ekamone
sānkhyamrenunciation of actions
chaand
yogamkarm yog
chaand
yaḥwho
paśhyatisees
saḥthat person
paśhyatiactually sees
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 5.4
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्

बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग फलवाले कहते हैं, न कि पण्डितजन; क्योंकि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके फलरूप परमात्माको प्राप्त कर लेता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.6
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति

परन्तु हे महाबाहो ! कर्मयोगके बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है। मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 5
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 5
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति

सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। अतः जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोगको (फलरूपमें) एक देखता है, वही ठीक देखता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ: "सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। अतः जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोगको (फलरूपमें) एक देखता है, वही ठीक देखता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 5?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 5 translates to: "That place which is reached by the Sankhyas or the Jnanis is also reached by the Yogis (Karma Yogis). He who sees knowledge and the performance of action (Karma Yoga) as one, sees truly. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 5 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। अतः जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोगको (फलरूपमें) एक देखता है, वही ठीक देखता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yat sānkhyaiḥ prāpyate sthānaṁ tad yogair api gamyate" mean in English?

"yat sānkhyaiḥ prāpyate sthānaṁ tad yogair api gamyate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 5. That place which is reached by the Sankhyas or the Jnanis is also reached by the Yogis (Karma Yogis). He who sees knowledge and the performance of action (Karma Yoga) as one, sees truly. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.