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Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 4
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्

बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग फलवाले कहते हैं, न कि पण्डितजन; क्योंकि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके फलरूप परमात्माको प्राप्त कर लेता है। — VaniSagar

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TamilIND

குழந்தைகள், புத்திசாலிகள் அல்ல, அறிவு மற்றும் செயலின் யோகம் அல்லது செயலின் செயல்திறனைப் பற்றி பேசுகிறார்கள், அவை வேறுபட்டவை மற்றும் வேறுபட்டவை; ஒன்றில் உண்மையாக நிலைநிறுத்தப்பட்டவன் இரண்டின் பலனையும் பெறுகிறான்.

KannadaIND

ಮಕ್ಕಳು, ಬುದ್ಧಿವಂತರಲ್ಲ, ಜ್ಞಾನ ಮತ್ತು ಕ್ರಿಯೆಯ ಯೋಗ ಅಥವಾ ಕ್ರಿಯೆಯ ಕಾರ್ಯಕ್ಷಮತೆಯ ಬಗ್ಗೆ ಮಾತನಾಡುತ್ತಾರೆ, ಅವುಗಳು ವಿಭಿನ್ನ ಮತ್ತು ವಿಭಿನ್ನವಾಗಿವೆ; ಒಂದರಲ್ಲಿ ನಿಜವಾಗಿ ನೆಲೆಗೊಂಡವನು ಎರಡರ ಫಲವನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ.

MalayalamIND

കുട്ടികൾ, ജ്ഞാനികളല്ല, വിജ്ഞാനത്തെക്കുറിച്ചും കർമ്മയോഗത്തെക്കുറിച്ചോ അല്ലെങ്കിൽ പ്രവർത്തനത്തിൻ്റെ പ്രകടനത്തെക്കുറിച്ചോ സംസാരിക്കുന്നു, അവ വ്യത്യസ്തവും വ്യത്യസ്തവുമാണെന്ന് തോന്നുന്നു. യഥാർത്ഥത്തിൽ ഒന്നിൽ സ്ഥിരത കൈവരിക്കുന്നവൻ രണ്ടിൻ്റെയും ഫലം നേടുന്നു.

MarathiIND

मुले, ज्ञानी नसून, ज्ञान आणि कृतीचा योग किंवा कृतीच्या कामगिरीबद्दल बोलतात, जसे की ते वेगळे आणि वेगळे आहेत; जो खरोखर एकामध्ये स्थिर असतो, त्याला दोन्हीचे फळ मिळते.

MaithiliIND

बच्चा सब, ज्ञानी नै, ज्ञान आ कर्म के योग के बात करै छै, या कर्म के निष्पादन के बारे में, जेना ओ सब अलग आ अलग हो; जे सही मायने मे एक मे स्थापित अछि, ओ दुनूक फल प्राप्त करैत अछि |

BhojpuriIND

ज्ञानी ना, लइका ज्ञान आ कर्म के योग, भा कर्म के निष्पादन के बात करेलें जइसे कि ऊ लोग अलग आ अलग होखे; जे सही मायने में एक में स्थापित होखे, ओकरा दुनो के फल मिलेला।

DogriIND

बच्चे, ज्ञानी नेईं, ज्ञान ते कर्म दे योग दी गल्ल करदे न, जां कर्म दे निष्पादन दी गल्ल करदे न, जि'यां ओह् अलग-अलग ते बक्ख-बक्ख न; जो सचमुच इक विच स्थापित होवे, ओह दोनों दा फल पांदा है।

TeluguIND

పిల్లలు, జ్ఞానులు కాదు, జ్ఞానం మరియు చర్య యొక్క యోగం లేదా చర్య యొక్క పనితీరు గురించి మాట్లాడతారు, వారు విభిన్నంగా మరియు భిన్నంగా ఉంటారు; ఒకదానిలో నిజంగా స్థిరపడినవాడు, రెండింటి ఫలాలను పొందుతాడు.

BengaliIND

শিশুরা, জ্ঞানী নয়, জ্ঞান এবং কর্মের যোগের কথা বলে, বা কর্ম সম্পাদনের কথা বলে, যেন তারা স্বতন্ত্র এবং ভিন্ন; যে প্রকৃতপক্ষে একটিতে প্রতিষ্ঠিত, সে উভয়েরই ফল লাভ করে।

GujaratiIND

બાળકો, જ્ઞાનીઓ નહીં, જ્ઞાન અને ક્રિયાના યોગ, અથવા ક્રિયાના પ્રદર્શનની વાત કરે છે, જાણે કે તેઓ અલગ અને અલગ હોય; જે ખરેખર એકમાં સ્થાપિત છે તે બંનેનું ફળ મેળવે છે.

NepaliIND

बच्चाहरू, ज्ञानीहरू होइन, ज्ञान र कर्मको योग, वा कर्मको प्रदर्शनको कुरा गर्छन्, मानौं तिनीहरू फरक र फरक छन्; जो वास्तवमा एकमा स्थापित हुन्छ, उसले दुवैको फल पाउँछ।

SindhiIND

ٻار، عقلمند نه، علم ۽ عمل جي يوگا، يا عمل جي ڪارڪردگيءَ جي ڳالهه ڪن ٿا، ڄڻ ته اهي الڳ ۽ الڳ آهن؛ جيڪو سچ پچ هڪ ۾ قائم آهي، اهو ٻنهي جو ميوو حاصل ڪري ٿو.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः'--इसी अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके तत्त्वदर्शी महापुरुषके पास जाकर ज्ञान प्राप्त करनेके साधनको 'कर्मसंन्यास' नामसे कहा है। भगवान्ने भी दूसरे श्लोकमें अपने सिद्धान्तकी मुख्यता रखते हुए उसे 'संन्यास' और 'कर्मसंन्यास' नामसे कहा है। अब उस साधनको भगवान् यहाँ 'सांख्य' नामसे कहते हैं। भगवान् शरीर-शरीरीके भेदविचार करके स्वरूपमें स्थित होनेको 'सांख्य' कहते हैं। भगवान्के मतमें 'संन्यास' और 'सांख्य' पर्यायवाची हैं, जिसमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी आवश्यकता नहीं है।अर्जुन जिसे 'कर्मसंन्यास' नामसे कह रहे हैं, वह भी निःसन्देह भगवान्के द्वारा कहे 'सांख्य' का ही एक अवान्तर भेद है। कारण कि गुरुसे सुनकर भी साधक शरीर-शरीरीके भेदका ही विचार करता है।'बालाः' पदसे भगवान् यह कहते हैं कि आयु और बुद्धिमें बड़े होकर भी जो सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग फलवाले मानते हैं, वे बालक अर्थात् बेसमझ ही हैं।जिन महापुरुषोंने सांख्ययोग और कर्मयोगके तत्त्वको ठीक-ठीक समझा है, वे ही पण्डित अर्थात् बुद्धिमान् हैं। वे लोग दोनोंको अलग-अलग फलवाले नहीं कहते; क्योंकि वे दोनों साधनोंकी प्रणालियोंको न देखकर उन दोनोंके वास्तविक परिणामको देखते हैं.साधन-प्रणालीको देखते हुए स्वयं भगवान्ने तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें सांख्ययोग और कर्मयोगको दो प्रकारका साधन स्वीकार किया है। दोनोंकी साधन-प्रणाली तो अलग-अलग है, पर साध्य अलग-अलग नहीं है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

भिन्न पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान करनेयोग्य परस्परविरुद्ध कर्मसंन्यास और कर्मयोगके फलमें भी विरोध होना चाहिये दोनोंका कल्याणरूप एक ही फल कहना ठीक नहीं इस शङ्काके प्राप्त होनेपर यह कहा जाता है बालबुद्धिवाले ही सांख्य और योगइन दोनोंको अलगअलग विरुद्ध फलदायक बतलाते हैं पण्डित नहीं। ज्ञानी पण्डितजन तो दोनोंका अविरुद्ध और एक ही फल मानते हैं। क्योंकि सांख्य और योगइन दोनोंमेंसे एकका भी भलीभाँति अनुष्ठान कर लेनेवाला पुरुष दोनोंका फल पा लेता है। कारण दोनोंका वही ( एक ) कल्याणरूप ( परमपद ) फल है इसलिये फलमें विरोध नहीं है। पू0 संन्यास और कर्मयोग इन शब्दोंसे प्रकरण उठाकर फिर यहाँ प्रकरणविरुद्ध सांख्य और योगके फलकी एकता कैसे कहते हैं उ0 यह दोष नहीं है। यद्यपि अर्जुनने केवल संन्यास और कर्मयोगको पूछनेके अभिप्रायसे ही प्रश्न कियाथा परंतु भगवान्ने उसके अभिप्रायको न छोड़कर ही अपना विशेष अभिप्राय जोड़ते हुए सांख्य और योग ऐसे इन दूसरे शब्दोंसे उनका वर्णन करके उत्तर दिया है। क्योंकि वे संन्यास और कर्मयोग ही ( क्रमानुसार ) ज्ञानसे और उसके उपायरूप समबुद्धि आदि भावोंसे युक्त हो जानेपर सांख्य और योगके नामसे कहे जाते हैं यह भगवान्का मत है अतः यह वर्णन प्रकरणविरुद्ध नहीं है।

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Sri Anandgiri

यदुक्तं संन्यासकर्मयोगयोर्निःश्रेयसकरत्वं तदाक्षिपति संन्यासेति। तत्रोत्तरत्वेनोत्तरश्लोकमवतारयति इति प्राप्त इति। विवेकिनस्तर्हि कथं वदन्तीत्याकाङ्क्षायामाह एकमिति। संख्यामात्मसमीक्षामर्हतीतिसांख्यं संन्यासो योगस्तु कर्मयोगस्तावुभावपि पृथगित्यस्यार्थमाह विरुद्धेति। शास्त्रार्थविवेकशून्यत्वं बालत्वम्। उत्तरार्धमवतारयितुं भूमिकां करोति पण्डितास्त्विति। ज्ञानिनो योगिनश्चेति शेषः। द्वयोरविरुद्धफलत्वमेव प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति कथमित्यादिना। एकं साधनमनुष्ठितवतो द्वयोरपि फलं भवतीति विरुद्धमित्याशङ्क्याह उभयोरिति। सांख्ययोगयोः संन्यासकर्मानुष्ठानयोस्तत्त्वज्ञानद्वारा निःश्रेयसफलत्वान्न विरुद्धफलत्वशङ्केत्यर्थः। सांख्ययोगयोरेकफलत्ववचनं प्रकरणाननुगुणमिति शङ्कते नन्विति। अप्रकृतत्वमसिद्धमिति परिहरति नैष दोष इति। संन्यासं कर्मणामित्यादिना संन्यासं कर्मयोगं चाङ्गीकृत्य प्रश्ने संन्यासः कर्मयोगश्चेत्यादिना तथैव प्रतिवचने च कथं सांख्ययोगयोरेकफलत्वमप्रकृतं न भवतीत्युच्यते तत्राह यद्यपीति। प्रतिवचनमपि तदनुरूपमेव भगवता निरूपितमिति विशेषानुपपत्तिरित्याशङ्क्याह भगवांस्त्विति। तदपरित्यागेनेत्यत्र तत्पदेन प्रष्ट्रा प्रतिनिर्दिष्टौ कर्मसंन्यासकर्मयोगावुच्येते। सांख्ययोगाविति शब्दान्तरवाच्यतया तयोरेव संन्यासकर्मयोगयोरत्यागेन स्वाभिप्रेतं च विशेषं संयोज्य भगवान्प्रतिवचनं ददाविति योजना। यदुक्तं स्वाभिप्रेतं च विशेषं संयोज्येति तदेतद्व्यक्तीकरोति तावेवेति। समबुद्धित्वादीत्यादिशब्देन ज्ञानोपायभूतं शमादिरादीयते प्रकृतयोरेव संन्यासकर्मयोगयोरुपादाने फलितमाह अत इति। सांख्ययोगावित्यादिश्लोकव्याख्यानसमाप्तिरितिशब्दार्थः।

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Sri Dhanpati

ननूभयोर्निःश्रेयसकरत्वमेकफलकत्वं न युक्तं भिन्नपुरुषानुष्ठेययोः स्वरुपतोऽपि विरुद्धयोः फलतोऽपि विरोधस्योचितत्वात्। तस्मात्तयोर्यदेकं निःश्रेयसकरं तन्मे ब्रूहीत्यर्जुनाशङ्कामालक्ष्याह सांख्येति। यत्त्वेकत्र पाताशङ्का एकत्र कर्मश्रमस्तदनयोः पथोः कतरः श्रेयानित्याशङ्क्य द्वयोरपि फलतः साभ्यमित्याहेति तच्चिन्त्यम्। उभयोरप्यश्रेष्ठतां मन्यमानस्य कतरः श्रेयानिति प्रश्रस्यानुपपत्तेः। संख्या सभ्यगात्मबुद्धिस्तां वहतीति ज्ञानान्तरङ्गसाधनतया सांख्यः संन्यासः। एवं सांख्यशचब्दावाच्यः शमदमादिभिर्ज्ञानेन च संयुक्तः संन्यासोऽत्र विवक्षितः प्रस्तुतः। तथा प्रस्तुत एव कर्मयोगः ज्ञानोपायसमबुद्धित्वादिसंयुक्तः योगशब्दावाच्यः। तावेव संन्यासकर्मयोगौ ज्ञानतदुपायसमबुद्धित्वादियुक्तौ सांख्ययोगशब्दवाच्याविति भाष्यात्। एतेन सांख्यशब्देन ज्ञाननिष्ठावाचिना तदङ्ग संन्यासं लक्षयतीति लक्षणा परास्ता। बाला अविवेकिनः तौ पृथक् भिन्नफलौ प्रवदन्ति न तु पण्डिताः शास्त्रज्ञा विवेकिनः। तेतु एकमपि कर्मयोगं संन्यासं वा सभ्यक् चित्तशुद्धिसंपादकं शमदमादियुक्तं वाऽऽस्थितोऽनुष्ठितवानुभयोः फलं निःश्रेयसं मोक्षं परम्परया साक्षाद्वा विन्दते लभत इति प्रवदन्तीत्यर्थः। यत्तुसमित्येकीभाव इति यास्कः। एकीभावेनात्मानन्यत्वेन ख्यायते प्रकाश्यते वस्तुस्वरुपमनयेति संख्या स्थूलसूक्ष्मकारणप्रपञ्चस्य निर्विकल्पे प्रत्यगात्मनि प्रविलापनेनोदिता चेतोवृत्तिस्तत्साधनभूतो यः सांख्यः संन्यासः सच दारादिबुद्य्धन्तानां पदार्थानामात्मन्येकीभावेन न्यसनं त्यागः प्रविलापनम् तथा योगोऽप्यग्निहोत्रसंध्योपासनादिनिर्विकल्पसमाध्यन्तमनुष्ठानं तत्र मुख्ययोगस्य लक्षणयोगश्चित्तवृत्तिनिरोधः इति। वृत्तयश्चप्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः। इति पञ्च। तावेतौ फलभूतौ सांख्ययोयौ उत साधनभूतौ संन्यासकर्मयोगाख्यौ। तत्रान्त्ययोः साम्यंज्ञेयः स नित्यसंन्यासी इत्यनेन सूचितमाद्ययोस्त्वैक्यमत्रोच्यते। आस्थितोऽनुतिष्ठन् फलं निर्विकल्पात्मनाऽवस्थितिरुपमित्यन्ये व्याचख्युस्तदर्जुनप्रश्नाननुगुणत्वेनोपेक्ष्यम्। संन्यासकर्मयोग्योः किं श्रेयस्करमिति तेनपृष्टत्वात्। अतएव भाष्यकृद्भिस्तत्रतत्र योगशब्दार्थः कर्मयोग इत्येव प्रदर्शितः। एतेन वृत्तेः पञ्चधात्ववर्णनमप्यप्रासङ्गिकत्वादपास्तम्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sānkhyarenunciation of actions
yogaukarm yog
pṛithakdifferent
bālāḥthe ignorant
pravadantisay
nanever
paṇḍitāḥthe learned
ekamin one
apieven
āsthitaḥbeing situated
samyakcompletely
ubhayoḥof both
vindateachieve
phalamthe result
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 5.3
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते

हे महाबाहो ! जो मनुष्य न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा करता है; वह (कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझनेयोग्य है; क्योंकि द्वन्द्वोंसे रहित मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.5
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति

सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। अतः जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोगको (फलरूपमें) एक देखता है, वही ठीक देखता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 4
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 4
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्

बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग फलवाले कहते हैं, न कि पण्डितजन; क्योंकि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके फलरूप परमात्माको प्राप्त कर लेता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 4 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 4 का हिंदी अर्थ: "बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग फलवाले कहते हैं, न कि पण्डितजन; क्योंकि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके फलरूप परमात्माको प्राप्त कर लेता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 4?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 4 translates to: "Children, not the wise, speak of knowledge and the Yoga of action, or the performance of action, as though they are distinct and different; he who is truly established in one, obtains the fruits of both. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 4 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग फलवाले कहते हैं, न कि पण्डितजन; क्योंकि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके फलरूप परमात्माको प्राप्त कर लेता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sānkhya-yogau pṛithag bālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ" mean in English?

"sānkhya-yogau pṛithag bālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 4. Children, not the wise, speak of knowledge and the Yoga of action, or the performance of action, as though they are distinct and different; he who is truly established in one, obtains the fruits of both. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.