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Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 27
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ

बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है। — VaniSagar

Global Translations

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KannadaIND

ಎಲ್ಲಾ ಬಾಹ್ಯ ಸಂಪರ್ಕಗಳನ್ನು ಮುಚ್ಚುವುದು ಮತ್ತು ಹುಬ್ಬುಗಳ ನಡುವಿನ ನೋಟವನ್ನು ಸರಿಪಡಿಸುವುದು, ಮೂಗಿನ ಹೊಳ್ಳೆಗಳಲ್ಲಿ ಚಲಿಸುವ ಹೊರಹೋಗುವ ಮತ್ತು ಒಳಬರುವ ಉಸಿರಾಟವನ್ನು ಅರಿತುಕೊಳ್ಳುವುದು.

TamilIND

அனைத்து வெளிப்புற தொடர்புகளையும் அணைத்து, புருவங்களுக்கு இடையில் பார்வையை சரிசெய்து, மூக்கின் உள்ளே நகரும் வெளிச்செல்லும் மற்றும் உள்வரும் சுவாசத்தை உணர்தல்.

MalayalamIND

എല്ലാ ബാഹ്യ സമ്പർക്കങ്ങളും അടച്ചുപൂട്ടുകയും പുരികങ്ങൾക്കിടയിൽ നോട്ടം ഉറപ്പിക്കുകയും ചെയ്യുക, നാസാരന്ധ്രങ്ങൾക്കുള്ളിൽ ചലിക്കുന്ന ഔട്ട്‌ഗോയിംഗ് ഇൻകമിംഗ് ശ്വാസങ്ങൾ മനസ്സിലാക്കുക.

OdiaIND

ସମସ୍ତ ବାହ୍ୟ ସମ୍ପର୍କକୁ ବନ୍ଦ କରିବା ଏବଂ ଆଖି ମଧ୍ୟରେ ଥିବା ନଜରକୁ ଠିକ୍ କରିବା, ନାକ ଭିତରେ ଗତି କରୁଥିବା ଏବଂ ଆସୁଥିବା ନିଶ୍ୱାସକୁ ଅନୁଭବ କରିବା |

MarathiIND

सर्व बाह्य संपर्क बंद करणे आणि भुवयांमधील टक लावून पाहणे, नाकपुडीमध्ये फिरणारे बाहेर जाणारे आणि येणारे श्वास लक्षात घेणे.

GujaratiIND

બધા બાહ્ય સંપર્કોને બંધ કરીને અને ભમર વચ્ચેની ત્રાટકશક્તિને ઠીક કરીને, નસકોરાની અંદર જતા અને આવતા શ્વાસોને સમજો.

PunjabiIND

ਸਾਰੇ ਬਾਹਰੀ ਸੰਪਰਕਾਂ ਨੂੰ ਬੰਦ ਕਰਨਾ ਅਤੇ ਭਰਵੱਟਿਆਂ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਨਿਗਾਹ ਨੂੰ ਠੀਕ ਕਰਨਾ, ਬਾਹਰ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ਅਤੇ ਆਉਣ ਵਾਲੇ ਸਾਹਾਂ ਨੂੰ ਨੱਕ ਦੇ ਅੰਦਰ ਜਾਣ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਕਰਨਾ।

BengaliIND

সমস্ত বাহ্যিক পরিচিতি বন্ধ করা এবং ভ্রুগুলির মধ্যে দৃষ্টি স্থির করা, নাসারন্ধ্রের মধ্যে বহির্গামী এবং আগত শ্বাসগুলিকে উপলব্ধি করা।

SindhiIND

سڀني خارجي رابطن کي بند ڪرڻ ۽ ابرو جي وچ ۾ نظر کي درست ڪرڻ، نڪرندڙ ۽ ايندڙ سانس کي محسوس ڪرڻ، نڪ جي اندر منتقل ٿيڻ.

NepaliIND

सबै बाह्य सम्पर्कहरू बन्द गर्दै र भौंहरू बीचको नजरलाई ठीक गर्दै, बाहिर जाने र आउने सासहरू नाक भित्र चलिरहेको महसुस गर्दै।

MizoIND

Pawn lam inzawmna zawng zawng khar vek a, mitmeng inkara mitmeng siam that a, thawk chhuak leh lo lut chu hnar chhunga thawk chhuak tih hriatchhuah a ni.

KonkaniIND

सगळे भायले संपर्क बंद करप आनी भोंवतणीं पळोवपाची नदर स्थिर करप, नाकाच्या पोकळ्यां भितर हालपी भायर सरपी आनी येवपी श्वासांची जाणविकाय करप.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.27।। व्याख्या--'स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्'--परमात्माके सिवाय सब पदार्थ बाह्य हैं। बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़ देनेका तात्पर्य है कि मनसे बाह्य विषयोंका चिन्तन न करे।बाह्य पदार्थोंके सम्बन्धका त्याग कर्मयोगमें सेवाके द्वारा और ज्ञानयोगमें विवेकके द्वारा किया जाता है। यहाँ भगवान् ध्यानयोगके द्वारा बाह्य पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेदकी बात कह रहे हैं। ध्यानयोगमें एकमात्र परमात्माका ही चिन्तन होनेसे बाह्य पदार्थोंसे विमुखता हो जाती है।वास्तवमें बाह्य पदार्थ बाधक नहीं हैं। बाधक है--इनसे रागपूर्वक माना हुआ अपना सम्बन्ध। इस माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेमें ही उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य है। 'चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः'--यहाँ 'भ्रुवोः अन्तरे'पदोंसे दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीचमें रखना अथवा दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर रखना (गीता 6। 13)--ये दोनों ही अर्थ लिये जा सकते हैं।ध्यानकालमें नेत्रोंको सर्वथा बंद रखनेसे लयदोष अर्थात् निद्रा आनेकी सम्भावना रहती है, और नेत्रोंको सर्वथा खुला रखनेसे (सामने दृश्य रहनेसे) विक्षेपदोष आनेकी सम्भावना रहती है। इन दोनों प्रकारके दोषोंको दूर करनेके लिये आधे मुँदे हुए नेत्रोंकी दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीच स्थापित करनेके लिये कहा गया है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

अब सम्यक् ज्ञानके अन्तरङ्ग साधनरूप ध्यानयोगको विस्तारपूर्वक कहूँगा यह विचारकर उस ध्यानयोगके सूत्रस्थानीय श्लोकोंका उपदेश करते हैं शब्दादि बाह्य विषयोंको बाहर करके यानी जो शब्दादि विषय श्रोत्रादि इन्द्रियोंद्वारा अन्तःकरणके भीतर प्रविष्ट कर लिये गये हैं उनका चिन्तन न करना ही बाह्य विषयोंको निकाल बाहर करना है इस प्रकार उनको बाहर करके एवं दोनों नेत्रों ( की दृष्टि ) को भृकुटिके मध्यस्थानमें स्थित करके तथा नासिका ( और कण्ठादि आभ्यन्तर भागों ) के भीतर विचरनेवाले प्राण और अपानको समान करके।

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Sri Anandgiri

वृत्तमनूद्योत्तरश्लोकत्रयस्य तात्पर्यार्थमाह सम्यग्दर्शनेति। ईश्वरार्पितसर्वभावेनेति। भगवति परस्मिन्नीश्वरे समर्पितः सर्वेषां देहेन्द्रियमनसां भावश्चेष्टाविशेषो न क्वचिदपि बहिस्तेषां व्यापारस्तेनेत्यर्थः। कर्मयोगस्य तत्फलस्य चाभिधानानन्तरमित्यथशब्दार्थः। स्वतो बाह्यानां विषयाणां कुतो बहिष्करणमित्याशङ्क्याह श्रोत्रादीति। तेषां बहिःकरणं कीदृगित्याशङ्क्याह तानिति।

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Sri Dhanpati

एवं तत्त्वज्ञाननिष्ठानां यतीनां सद्योमुक्तिरुक्त्वा कर्मयोगिनं च सत्त्वशुद्य्धादिक्रमेण। अथेदानीं ध्यानयोगस्य सम्यग्दर्शनान्तरङ्गासाधनस्य षष्ठाध्या ये विस्तरेण वक्ष्यमाणस्य सूत्रस्थानीयांस्त्रीन्श्लोकानाह। स्पर्शान् शब्दादीन्बाह्यानेव श्रोत्रादिद्वारेण अन्तर्बुद्धौ प्रविष्टन्विषयान् अचिन्तनेन बहिःकृत्वा चक्षुश्चैव भ्रुवोरन्तरे कृत्वा तथा प्राणपानौ नासाभ्यन्तरचारिणौ समौ कृत्वा।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sparśhāncontacts (through senses)
kṛitvākeeping
bahiḥoutside
bāhyānexternal
chakṣhuḥeyes
chaand
evacertainly
antarebetween
bhruvoḥof the eyebrows
prāṇaapānau
samauequal
kṛitvākeeping
nāsaabhyantara
chāriṇaumoving
yatacontrolled
indriyasenses
manaḥmind
buddhiḥintellect
muniḥthe sage
mokṣhaliberation
parāyaṇaḥdedicated
vigatafree
ichchhādesires
bhayafear
krodhaḥanger
yaḥwho
sadāalways
muktaḥliberated
evacertainly
saḥthat person
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 5.26
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्। अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्

काम-क्रोधसे सर्वथा रहित, जीते हुए मनवाले और स्वरूपका साक्षात्कार किये हुए सांख्ययोगियोंके लिये दोनों ओरसे--शरीरके रहते हुए अथवा शरीर छूटनेके बाद) निर्वाण ब्रह्म परिपूर्ण है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.28
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः। विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः

बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 27
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 27
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ

बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ: "बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 27?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 27 translates to: "Shutting out all external contacts and fixing the gaze between the eyebrows, realizing the outgoing and incoming breaths moving within the nostrils. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। प्राणापानौ समौ कृत्वा ना" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 27 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sparśhān kṛitvā bahir bāhyānśh chakṣhuśh chaivāntare bhruvoḥ" mean in English?

"sparśhān kṛitvā bahir bāhyānśh chakṣhuśh chaivāntare bhruvoḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 27. Shutting out all external contacts and fixing the gaze between the eyebrows, realizing the outgoing and incoming breaths moving within the nostrils. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.