Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 28
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः। विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः

बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

புலன்கள், மனம் மற்றும் புத்தி எப்பொழுதும் கட்டுப்படுத்தப்பட்டு, முக்தியை அவற்றின் உச்சக் குறிக்கோளாகக் கொண்டு, ஆசை, பயம் மற்றும் கோபம் ஆகியவற்றிலிருந்து விடுபட்ட முனிவர் உண்மையாகவே நிரந்தரமாக விடுதலை பெறுகிறார்.

MalayalamIND

ഇന്ദ്രിയങ്ങളും മനസ്സും ബുദ്ധിയും എപ്പോഴും നിയന്ത്രിച്ച്, ആഗ്രഹം, ഭയം, ക്രോധം എന്നിവയിൽ നിന്ന് മുക്തിയെ പരമമായ ലക്ഷ്യമാക്കി, മുനി യഥാർത്ഥത്തിൽ എന്നെന്നേക്കുമായി മുക്തി നേടുന്നു.

KannadaIND

ಇಂದ್ರಿಯಗಳು, ಮನಸ್ಸು ಮತ್ತು ಬುದ್ಧಿಯನ್ನು ಯಾವಾಗಲೂ ನಿಯಂತ್ರಿಸಿ, ಮುಕ್ತಿಯನ್ನು ತಮ್ಮ ಪರಮೋಚ್ಚ ಗುರಿಯಾಗಿ ಹೊಂದಿದ್ದು, ಆಸೆ, ಭಯ ಮತ್ತು ಕೋಪದಿಂದ ಮುಕ್ತವಾಗಿ, ಋಷಿಯು ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಶಾಶ್ವತವಾಗಿ ಮುಕ್ತನಾಗುತ್ತಾನೆ.

TeluguIND

ఇంద్రియాలు, మనస్సు మరియు బుద్ధి ఎప్పుడూ నియంత్రించబడి, కోరిక, భయం మరియు కోపం నుండి విముక్తిని తమ పరమ లక్ష్యంగా కలిగి, ఋషి నిజంగా శాశ్వతంగా ముక్తిని పొందుతాడు.

BengaliIND

ইন্দ্রিয়, মন এবং বুদ্ধি সর্বদা নিয়ন্ত্রিত, মুক্তিকে তাদের সর্বোচ্চ লক্ষ্য হিসাবে রেখে, কামনা, ভয় এবং ক্রোধ থেকে মুক্ত, ঋষি সত্যই চিরকালের জন্য মুক্তি পান।

GujaratiIND

ઇંદ્રિયો, મન અને બુદ્ધિને હંમેશા નિયંત્રિત કરીને, મુક્તિને તેમનું સર્વોચ્ચ ધ્યેય માનીને, ઈચ્છા, ભય અને ક્રોધથી મુક્ત, ઋષિ સાચા અર્થમાં કાયમ માટે મુક્ત થાય છે.

MarathiIND

इंद्रिये, मन आणि बुद्धी सदैव नियंत्रित राहून, मुक्ती हेच त्यांचे सर्वोच्च ध्येय, इच्छा, भय आणि क्रोध यांच्यापासून मुक्त, ऋषी खऱ्या अर्थाने कायमचे मुक्त होतात.

SindhiIND

حواس، دماغ ۽ عقل کي هميشه قابو ۾ رکڻ سان، آزاديءَ کي پنهنجو اعليٰ مقصد قرار ڏئي، خواهش، خوف ۽ ڪاوڙ کان آزاد ٿي، بابا سچ پچ هميشه لاءِ آزاد ٿي ويندو آهي.

NepaliIND

इन्द्रिय, मन र बुद्धि सदैव नियन्त्रित भएर, मुक्तिलाई आफ्नो परम लक्ष्य बनाएर, इच्छा, भय र क्रोधबाट मुक्त भएमा, ऋषि वास्तवमा सदाको लागि मुक्त हुन्छन्।

PunjabiIND

ਇੰਦਰੀਆਂ, ਮਨ ਅਤੇ ਬੁੱਧੀ ਨੂੰ ਸਦਾ ਨਿਯੰਤਰਿਤ ਕਰਨ ਨਾਲ, ਮੁਕਤੀ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਪਰਮ ਟੀਚਾ, ਇੱਛਾ, ਡਰ ਅਤੇ ਕ੍ਰੋਧ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਕਰਕੇ, ਰਿਸ਼ੀ ਸੱਚਮੁੱਚ ਸਦਾ ਲਈ ਮੁਕਤ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

AssameseIND

ইন্দ্ৰিয়, মন আৰু বুদ্ধি সদায় নিয়ন্ত্ৰিত হৈ, মুক্তিক নিজৰ পৰম লক্ষ্য হিচাপে লৈ, কামনা, ভয় আৰু ক্ৰোধৰ পৰা মুক্ত হৈ ঋষি সঁচাকৈয়ে চিৰদিনৰ বাবে মুক্ত হয়।

ManipuriIND

ꯏꯟꯗ꯭ꯔꯤ, ꯋꯥꯈꯜ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯋꯥꯈꯜ ꯑꯁꯤ ꯃꯇꯝ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯇꯥ ꯀꯟꯠꯔꯣꯜ ꯇꯧꯗꯨꯅꯥ, ꯂꯤꯕꯔꯦꯁꯟ ꯑꯁꯤ ꯃꯈꯣꯌꯒꯤ ꯈ꯭ꯕꯥꯏꯗꯒꯤ ꯋꯥꯡꯕꯥ ꯄꯥꯟꯗꯝ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯂꯧꯗꯨꯅꯥ, ꯑꯄꯥꯝꯕꯥ, ꯑꯀꯤꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯁꯥꯑꯣꯕꯗꯒꯤ ꯅꯥꯟꯊꯣꯛꯇꯨꯅꯥ, ꯔ꯭ꯏꯁꯤ ꯑꯁꯤ ꯇꯁꯦꯡꯅꯥ ꯃꯇꯝ ꯆꯨꯞꯄꯒꯤ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯅꯤꯡꯇꯝꯕꯥ ꯐꯪꯏ |

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.28।। व्याख्या--'स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्'--परमात्माके सिवाय सब पदार्थ बाह्य हैं। बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़ देनेका तात्पर्य है कि मनसे बाह्य विषयोंका चिन्तन न करे।बाह्य पदार्थोंके सम्बन्धका त्याग कर्मयोगमें सेवाके द्वारा और ज्ञानयोगमें विवेकके द्वारा किया जाता है। यहाँ भगवान् ध्यानयोगके द्वारा बाह्य पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेदकी बात कह रहे हैं। ध्यानयोगमें एकमात्र परमात्माका ही चिन्तन होनेसे बाह्य पदार्थोंसे विमुखता हो जाती है।वास्तवमें बाह्य पदार्थ बाधक नहीं हैं। बाधक है--इनसे रागपूर्वक माना हुआ अपना सम्बन्ध। इस माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेमें ही उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य है। 'चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः' यहाँ 'भ्रुवोः अन्तरे'--पदोंसे दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीचमें रखना अथवा दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर रखना (गीता 6। 13)--ये दोनों ही अर्थ लिये जा सकते हैं।ध्यानकालमें नेत्रोंको सर्वथा बंद रखनेसे लयदोष अर्थात् निद्रा आनेकी सम्भावना रहती है, और नेत्रोंको सर्वथा खुला रखनेसे (सामने दृश्य रहनेसे) विक्षेपदोष आनेकी सम्भावना रहती है। इन दोनों प्रकारके दोषोंको दूर करनेके लिये आधे मुँदे हुए नेत्रोंकी दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीच स्थापित करनेके लिये कहा गया है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

जिसके इन्द्रिय मन और बुद्धि वशमें किये हुए हैं जो ईश्वरके स्वरूपका मनन करनेसे मुनि यानी संन्यासी है जो शरीरमें रहता हुआ भी मोक्षपरायण है अर्थात् जो मोक्षको ही परम आश्रय परम गति समझनेवाला मुनि है तथा जो इच्छा भय और क्रोधसे रहित हो चुका है जिसके इच्छा भय और क्रोध चले गये हैं जो इस प्रकार बर्तता है वह संन्यासी सदा मुक्त ही है उसे कोई दूसरी मुक्ति प्राप्त नहीं करनी है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

विषयप्रावण्यं परित्यज्य चक्षुरपि भ्रुवोर्मध्ये विक्षेपपरिहारार्थं कृत्वा प्राणापानौ च नासाभ्यन्तरचरणशीलौ समौ न्यूनाधिकवर्जितौ कुम्भकेन निरुद्धौ कृत्वा करणानि सर्वाण्येवं संयम्य प्राणायामपरो भूत्वा किं कुर्यादित्यपेक्षायामाह यतेन्द्रियेति। इन्द्रियादिसंयमं कृत्वा मोक्षमेवापेक्षमाणो मननशीलः स्यादित्यर्थः। ज्ञानातिशयनिष्ठस्य सर्वदेच्छादिशून्यस्य संन्यासिनो मुक्तेरनायाससिद्धत्वान्न तस्य किंचिदपि कर्तव्यमस्तीत्याह विगतेति। पूर्वार्धाक्षराणि व्याकरोति यतेत्यादिना। द्वितीयार्धाक्षराणि व्याचष्टे विगतेत्यादिना।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

यतानि संयतानि इन्द्रियादीनि येन स मुनिर्मननशीलः मोक्ष एव परमयनं परा गतिर्यस्य स मोक्षपरायणो मुमुक्षुः विगता इच्छादयो यस्मात्स य एवं वर्तते स मुमुक्षुरेव न तस्य मोक्षादन्यत्कर्तव्यमस्ति स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान् मोक्षपरायण इत्यनेन वैराग्यान्मुमुक्षुरधिकारी कथितः। चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोरित्यनेनासनजयेन लयविक्षेपराहित्यमुक्तम्। प्राणेत्यादिना प्राणायामो निरुपितः। स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यानित्यनेनैवअहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः इतिसूत्रोक्ता यमाः।शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः इति सूत्रोक्ता नियमाश्च प्रदर्शिताः। यतेन्द्रिय इति प्रत्याहारः यतमना इति धारणाध्याने यतबुद्धिरिति समाधिकथितः विगतेच्छाभक्रोध इति मोक्षपरायणस्य योगिनः स्वरुपनिरुपणमिति विवेकः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yatacontrolled
indriyasenses
manaḥmind
buddhiḥintelligence
muniḥthe transcendentalist
mokṣaliberation
parāyaṇaḥbeing so destined
vigatadiscarded
icchāwishes
bhayafear
krodhaḥanger
yaḥone who
sadāalways
muktaḥliberated
evacertainly
saḥhe is
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 5.27
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ

बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.29
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति

भक्त मुझे सब यज्ञों और तपोंका भोक्ता, सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् (स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी) जानकर शान्तिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 28
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 28
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः। विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः

बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 28 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 28 का हिंदी अर्थ: "बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 28?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 28 translates to: "With the senses, mind, and intellect ever controlled, having liberation as their supreme goal, free from desire, fear, and anger, the sage is truly liberated forever. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः। विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 28 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yatendriya-mano-buddhir munir mokṣa-parāyaṇaḥ vigatecchā-bha" mean in English?

"yatendriya-mano-buddhir munir mokṣa-parāyaṇaḥ vigatecchā-bha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 28. With the senses, mind, and intellect ever controlled, having liberation as their supreme goal, free from desire, fear, and anger, the sage is truly liberated forever. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.