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Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 26
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्। अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्

काम-क्रोधसे सर्वथा रहित, जीते हुए मनवाले और स्वरूपका साक्षात्कार किये हुए सांख्ययोगियोंके लिये दोनों ओरसे--शरीरके रहते हुए अथवा शरीर छूटनेके बाद) निर्वाण ब्रह्म परिपूर्ण है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

ஆசை மற்றும் கோபத்திலிருந்து விடுபட்ட, தங்கள் எண்ணங்களைக் கட்டுப்படுத்தி, சுயத்தை உணர்ந்த சுயகட்டுப்பாட்டு துறவிகளுக்கு முழு சுதந்திரம் எல்லா பக்கங்களிலும் உள்ளது.

KannadaIND

ಬಯಕೆ ಮತ್ತು ಕೋಪದಿಂದ ಮುಕ್ತರಾದ, ತಮ್ಮ ಆಲೋಚನೆಗಳನ್ನು ನಿಯಂತ್ರಿಸಿದ ಮತ್ತು ಆತ್ಮವನ್ನು ಅರಿತುಕೊಂಡ ಸ್ವಯಂ-ನಿಯಂತ್ರಿತ ತಪಸ್ವಿಗಳಿಗೆ ಸಂಪೂರ್ಣ ಸ್ವಾತಂತ್ರ್ಯವು ಎಲ್ಲಾ ಕಡೆಗಳಲ್ಲಿ ಅಸ್ತಿತ್ವದಲ್ಲಿದೆ.

MalayalamIND

ആഗ്രഹങ്ങളിൽ നിന്നും ക്രോധത്തിൽ നിന്നും മുക്തരായ, ചിന്തകളെ നിയന്ത്രിക്കുന്ന, ആത്മസാക്ഷാത്ക്കാരം നേടിയ ആത്മനിയന്ത്രണമുള്ള സന്യാസികൾക്ക് സമ്പൂർണ്ണ സ്വാതന്ത്ര്യം എല്ലാ വശങ്ങളിലും നിലനിൽക്കുന്നു.

GujaratiIND

જેઓ ઈચ્છા અને ક્રોધથી મુક્ત છે, જેમણે પોતાના વિચારોને કાબૂમાં રાખ્યા છે અને જેમણે આત્માનો સાક્ષાત્કાર કર્યો છે તેવા સ્વ-નિયંત્રિત તપસ્વીઓ માટે ચારે બાજુ સંપૂર્ણ સ્વતંત્રતા છે.

PunjabiIND

ਉਨ੍ਹਾਂ ਸਵੈ-ਨਿਯੰਤਰਿਤ ਸੰਨਿਆਸੀ ਜੋ ਇੱਛਾ ਅਤੇ ਕ੍ਰੋਧ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਵਿਚਾਰਾਂ ਨੂੰ ਕਾਬੂ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਅਨੁਭਵ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਲਈ ਪੂਰਨ ਆਜ਼ਾਦੀ ਹਰ ਪਾਸੇ ਮੌਜੂਦ ਹੈ।

MarathiIND

इच्छा आणि क्रोधापासून मुक्त असलेल्या, आपल्या विचारांवर नियंत्रण ठेवलेल्या आणि आत्मस्वरूपाचा साक्षात्कार झालेल्या आत्मनियंत्रित तपस्वींसाठी सर्व बाजूंनी पूर्ण स्वातंत्र्य आहे.

BengaliIND

যে সমস্ত স্ব-নিয়ন্ত্রিত তপস্বী কামনা ও ক্রোধ থেকে মুক্ত, যারা তাদের চিন্তাকে নিয়ন্ত্রিত করেছে এবং যারা আত্মাকে উপলব্ধি করেছে তাদের জন্য সর্বদিক থেকে পরম স্বাধীনতা বিদ্যমান।

SindhiIND

مڪمل آزادي سڀني طرفن تي موجود آهي انهن نفس تي ضابطو رکندڙ سنتن لاءِ جيڪي خواهش ۽ ڪاوڙ کان آزاد آهن، جن پنهنجن خيالن تي ضابطو ڪيو آهي، ۽ جن پاڻ کي محسوس ڪيو آهي.

NepaliIND

इच्छा र क्रोधबाट मुक्त भएका, आफ्नो विचारलाई नियन्त्रणमा राख्ने र आत्म-साक्षात्कार गर्ने आत्म-नियन्त्रित तपस्वीहरूका लागि चारैतिर पूर्ण स्वतन्त्रता अवस्थित छ।

TeluguIND

కోరికలు మరియు కోపం నుండి విముక్తి పొందిన, తమ ఆలోచనలను నియంత్రించుకున్న మరియు ఆత్మను గ్రహించిన స్వీయ-నియంత్రణ సన్యాసులకు అన్ని వైపులా సంపూర్ణ స్వేచ్ఛ ఉంది.

OdiaIND

ଇଚ୍ଛା ଏବଂ କ୍ରୋଧରୁ ମୁକ୍ତ, ଯେଉଁମାନେ ସେମାନଙ୍କର ଚିନ୍ତାଧାରାକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରିଛନ୍ତି ଏବଂ ଯେଉଁମାନେ ଆତ୍ମକୁ ହୃଦୟଙ୍ଗମ କରିଛନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସଂପୂର୍ଣ୍ଣ ସ୍ୱାଧୀନତା ସବୁ ଦିଗରେ ବିଦ୍ୟମାନ |

ManipuriIND

ꯑꯄꯥꯝꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯁꯥꯑꯣꯕꯗꯒꯤ ꯅꯥꯟꯊꯣꯛꯂꯕꯥ, ꯃꯈꯣꯌꯒꯤ ꯋꯥꯈꯂꯕꯨ ꯀꯟꯠꯔꯣꯜ ꯇꯧꯔꯕꯥ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯁꯥꯒꯤ ꯑꯣꯏꯖꯕꯥ ꯊꯤꯕꯥ ꯉꯝꯕꯥ ꯃꯁꯥꯅꯥ ꯃꯁꯥꯕꯨ ꯊꯥꯖꯖꯕꯥ ꯇꯄꯁꯕꯁꯤꯡꯒꯤꯗꯃꯛ ꯃꯥꯌꯀꯩ ꯈꯨꯗꯤꯡꯗꯥ ꯃꯄꯨꯡ ꯐꯥꯕꯥ ꯅꯤꯡꯇꯝꯕꯥ ꯂꯩ꯫

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.26।। व्याख्या--'कामक्रोधवियुक्तानां यतीनाम्'--भगवान् उपर्युक्त पदोंसे यह स्पष्ट कह रहे हैं कि सिद्ध महापुरुषमें काम-क्रोधादि दोषोंकी गन्ध भी नहीं रहती। काम-क्रोधादि दोष उत्पत्ति-विनाशशील असत् पदार्थों (शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि) के सम्बन्धसे उत्पन्न होते हैं। सिद्ध महापुरुषको उत्पत्ति-विनाशशील सत्त-त्त्वमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जाता है, अतः उत्पत्ति-विनाशरहित असत् पदार्थोंसे उसका सम्बन्ध सर्वथा नहीं रहता। उसके अनुभवमें अपने कहलानेवाले शरीर अन्तःकरणसहित सम्पूर्ण संसारके साथ अपने सम्बन्धका सर्वथा अभाव हो जाता है, अतः उसमें काम-क्रोध आदि विकार कैसे उत्पन्न हो सकते हैं? यदि काम-क्रोध सूक्ष्मरूपसे भी हों, तो अपनेको जीवन्मुक्त मान लेना भ्रम ही है।उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंकी इच्छाको 'काम' कहते हैं। काम अर्थात् कामना अभावमें पैदा होती है। अभाव सदैव असत्में रहता है। सत्-स्वरूपमें अभाव है ही नहीं। परन्तु जब स्वरूप असत्से तादात्म्य कर लेता है, तब असत्-अंशके अभावको वह अपनेमें मान लेता है। अपनेमें अभाव माननेसे ही कामना पैदा होती है और कामना-पूर्तिमें बाधा लगनेपर क्रोध आ जाता है। इस प्रकार स्वरूपमें कामना न होनेपर भी तादात्म्यके कारण अपनेमें कामनाकी प्रतीति होती है। परन्तु जिनका तादात्म्य नष्ट हो गया है और स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो गया है, उन्हें स्वयंमें असत्के अभावका अनुभव हो ही कैसे सकता है ?साधन करनेसे कामक्रोध कम होते हैं ऐसा साधकोंका अनुभव है। जो चीज कम होनेवाली होती है वह मिटनेवाली होती है अतः जिस साधनसे ये काम-क्रोध कम होते हैं उसी साधनसे ये मिट भी जाते हैं।साधन करनेवालोंको यह अनुभव होता है कि (1) कामक्रोध आदि दोष पहले जितनी जल्दी आते थे, उतनी जल्दी अब नहीं आते। (2) पहले जितने वेगसे आते थे उतने वेगसे अब नहीं आते और (3) पहले जितनी देरतक ठहरते थे उतनी देरतक अब नहीं ठहरते। कभी-कभी साधकको ऐसा भी प्रतीत होता है कि काम-क्रोधका वेग पहलेसे भी अधिक आ गया। इसका कारण यह है कि (1) साधन करनेसे भोगासक्ति तो मिटती चली गयी और पूर्णावस्था प्राप्त हुई नहीं। (2) अन्तःकरण शुद्ध होनेसे थोड़े काम-क्रोध भी साधकको अधिक प्रतीत होते हैं। (3) कोई मनके विरुद्ध कार्य करता है तो वह साधकको बुरा लगता है, पर साधकउसकी परवाह नहीं करता। बुरा लगनेके भावका भीतर संग्रह होता रहता है। फिर अन्तमें थोड़ी-सी बातपर भी जोरसे क्रोध आ जाता है; क्योंकि भीतर जो संग्रह हुआ था, वह एक साथ बाहर निकलता है। इससे दूसरे व्यक्तिको भी आश्चर्य होता है कि इतनी थोड़ी-सी बातपर इसे इतना क्रोध आ गया! कभी-कभी वृत्तियाँ ठीक होनेसे साधकको ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी पूर्णावस्था हो गयी। परन्तु वास्तवमें जबतक पूर्णावस्थाका अनुभव करनेवाला है, तबतक (व्यक्तित्व बना रहनेसे) पूर्णावस्था हुई नहीं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा जो काम और क्रोध इन दोनों दोषोंसे रहित हो चुके हैं जिन्होंने अन्तःकरणको अपने वशमें कर लिया है जिन्होंने आत्माको जान लिया है ऐसे आत्मज्ञानी सम्यग्दर्शी यती संन्यासियोंको दोनों ओरसे अर्थात् जीवित रहते हुए भी और मरनेके पश्चात् भी दोनों अवस्थाओंमें ब्रह्मनिर्वाण यानी मोक्ष प्राप्त रहता है। यथार्थ ज्ञानमें निष्ठावाले संन्यासियोंके लिये सद्यः ( तुरंत ही होनेवाली ) मुक्ति बतलायी गयी है तथा सब प्रकार ईश्वरार्पितभावसे पूर्ण ब्रह्म परमात्मामें सब कर्मोंका त्याग करके किया हुआ कर्मयोग भी अन्तःकरणकी शुद्धि ज्ञानप्राप्ति और सर्वकर्मसंन्यासके क्रमसे मोक्षदायक है यह बात भगवान्ने पदपदपर कही है और (आगे भी ) कहेंगे।

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Sri Anandgiri

पूर्वं कामक्रोधयोर्वेगः सोढव्यो दर्शितः संप्रति तावेव त्याज्यावित्याह किंचेति। ननु दर्शितविशेषणवतां मृतानामेव मोक्षो नतु जीवतामिति चेन्नेत्याह अभित इति। अस्मदादीनामपि तर्हि प्रभूतकामादिप्रभावविधुराणां किमिति मोक्षो न भवतीत्याशङ्क्य सम्यग्दर्शनवैशेष्याभावादित्याह विदितेति। उक्तेऽर्थे श्लोकाक्षराणामन्वयमाचष्टे कामक्रोधेत्यादिना।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

पूर्वं कामक्रोधोद्भवो वेगः सोढव्य इत्युक्तं इदानीं तावेव त्याज्यवित्याह। कामक्रोधाभ्यां वियुक्तानां यतीनां संन्यासिनां संयतचित्तात्मनां विदितात्मतत्त्वानां ब्रह्मनिर्वाणमभितः उभयतो जीवतां मृतानां च वर्तते।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
kāmadesires
krodhaanger
vimuktānāmof those who are liberated
yatīnāmof the saintly persons
yatachetasām
abhitaḥfrom every side
brahmaspiritual
nirvāṇamliberation from material existence
vartateexists
viditaātmanām
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 5.25
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः

जिनका शरीर मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसहित वशमें है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं, जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं, जिनके सम्पूर्ण कल्मष (दोष) नष्ट हो गये हैं, वे विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.27
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ

बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 26
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 26
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्। अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्

काम-क्रोधसे सर्वथा रहित, जीते हुए मनवाले और स्वरूपका साक्षात्कार किये हुए सांख्ययोगियोंके लिये दोनों ओरसे--शरीरके रहते हुए अथवा शरीर छूटनेके बाद) निर्वाण ब्रह्म परिपूर्ण है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ: "काम-क्रोधसे सर्वथा रहित, जीते हुए मनवाले और स्वरूपका साक्षात्कार किये हुए सांख्ययोगियोंके लिये दोनों ओरसे--शरीरके रहते हुए अथवा शरीर छूटनेके बाद) निर्वाण ब्रह्म परिपूर्ण है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 26?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 26 translates to: "Absolute freedom exists on all sides for those self-controlled ascetics who are free from desire and anger, who have controlled their thoughts, and who have realized the Self. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्। अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 26 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। काम-क्रोधसे सर्वथा रहित, जीते हुए मनवाले और स्वरूपका साक्षात्कार किये हुए सांख्ययोगियोंके लिये दोनों ओरसे--शरीरके रहते हुए अथवा शरीर छूटनेके बाद) निर्वाण ब्रह्म परिपूर्ण है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "kāma-krodha-viyuktānāṁ yatīnāṁ yata-chetasām" mean in English?

"kāma-krodha-viyuktānāṁ yatīnāṁ yata-chetasām" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 26. Absolute freedom exists on all sides for those self-controlled ascetics who are free from desire and anger, who have controlled their thoughts, and who have realized the Self. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.