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Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 17
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः। गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः

जिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है, जिनका मन तदाकार हो रहा है, जिनकी स्थिति परमात्मतत्वमें है, ऐसे परमात्मपरायण साधक ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति (परमगति) को प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

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TeluguIND

వారి మేధస్సు దానిలో శోషించబడుతుంది, వారి స్వయం అది, దానిలో స్థిరపడింది, అదే వారి పరమ లక్ష్యంతో, వారు తిరిగి రాని చోటికి వెళతారు, జ్ఞానం ద్వారా వారి పాపాలు తొలగిపోతాయి.

TamilIND

அவர்களின் புத்தி அதில் உள்வாங்கப்பட்டது, அவர்கள் சுயமாக இருப்பது, அதில் நிலைநிறுத்தப்பட்டது, அதையே அவர்களின் உயர்ந்த குறிக்கோளாகக் கொண்டு, அவர்கள் திரும்பி வராத இடத்திற்குச் செல்கிறார்கள், அவர்களின் பாவங்கள் அறிவால் அகற்றப்படுகின்றன.

MalayalamIND

അവരുടെ ബുദ്ധി അതിൽ ലയിച്ചു, അവർ സ്വയം അതാണ്, അതിൽ സ്ഥാപിതമാണ്, അത് അവരുടെ പരമോന്നത ലക്ഷ്യമായി, അവർ തിരിച്ച് വരാത്തിടത്ത് നിന്ന് പോകുന്നു, അറിവ് കൊണ്ട് അവരുടെ പാപങ്ങൾ ഇല്ലാതാക്കുന്നു.

KannadaIND

ಅವರ ಬುದ್ಧಿಯು ಅದರಲ್ಲಿ ಲೀನವಾಗಿದೆ, ಅವರ ಸ್ವಯಂ ಅದು, ಅದರಲ್ಲಿ ಸ್ಥಾಪಿತವಾಗಿದೆ, ಅದನ್ನು ಅವರ ಪರಮೋಚ್ಚ ಗುರಿಯಾಗಿಟ್ಟುಕೊಂಡು, ಅವರು ಹಿಂತಿರುಗಿ ಬರದಿರುವಲ್ಲಿಗೆ ಹೋಗುತ್ತಾರೆ, ಅವರ ಪಾಪಗಳು ಜ್ಞಾನದಿಂದ ಹೊರಹಾಕಲ್ಪಡುತ್ತವೆ.

BengaliIND

তাদের বুদ্ধিমত্তা তাতেই নিমগ্ন, তাদের স্বয়ং সেটাই, তাতেই প্রতিষ্ঠিত, সেটাই তাদের সর্বোচ্চ লক্ষ্য হিসেবে, তারা চলে যায় যেখান থেকে ফিরে আসে না, জ্ঞান দ্বারা তাদের পাপ দূর হয়।

MarathiIND

त्यांची बुद्धी त्यामध्ये लीन झाली आहे, त्यांचे स्वत्व आहे, त्यामध्ये स्थापित आहे, ते त्यांचे सर्वोच्च ध्येय आहे, ते जिथून परत येत नाही, ज्ञानाने त्यांची पापे दूर होतात.

SindhiIND

انهن جي عقل ان ۾ سمايل آهي، انهن جو نفس آهي، ان ۾ قائم آهي، انهي سان گڏ انهن جو عظيم مقصد آهي، اهي اهي ويندا آهن جتان ڪو به واپس نه آهي، انهن جا گناهه علم جي ذريعي ختم ٿي ويا آهن.

GujaratiIND

તેમની બુદ્ધિ તેમાં સમાઈ જાય છે, તેઓનું સ્વત્વ તે જ છે, તે જ તેમના સર્વોચ્ચ ધ્યેય તરીકે સ્થાપિત થાય છે, તેઓ જ્યાંથી પાછા ફરતા નથી ત્યાં જાય છે, જ્ઞાન દ્વારા તેમના પાપો દૂર થાય છે.

NepaliIND

तिनीहरूको बुद्धि त्यसैमा समाहित हुन्छ, तिनीहरूको आत्म-त्यसैमा स्थापित हुन्छ, त्यसैलाई आफ्नो सर्वोच्च लक्ष्यको रूपमा लिएर तिनीहरू त्यहाँ जान्छन्, जहाँबाट फर्किंदैन, तिनीहरूका पापहरू ज्ञानद्वारा नष्ट हुन्छन्।

PunjabiIND

ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਬੁੱਧੀ ਉਸ ਵਿੱਚ ਲੀਨ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਸਵੈ, ਉਸ ਵਿੱਚ ਸਥਾਪਿਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਸਰਵਉੱਚ ਟੀਚੇ ਵਜੋਂ, ਉਹ ਉੱਥੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ਜਿੱਥੋਂ ਵਾਪਸੀ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ, ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਪਾਪ ਗਿਆਨ ਦੁਆਰਾ ਦੂਰ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ।

DogriIND

उंदी बुद्धि उस च लीन, उंदा आत्म ओह, उस च स्थापित, उसी अपना परम लक्ष्य बनाइयै, ओह् जित्थें थमां वापसी नेईं होंदी, उंदे पाप ज्ञान कन्नै दूर होई जंदे न।

BhojpuriIND

ओहमें लीन उनकर बुद्धि, ओहमें स्थापित उनकर आत्म ऊ, ओहमें स्थापित, ओही के आपन परम लक्ष्य बना के, ऊ लोग ओहिजा जाला जहाँ से वापसी ना होखे, ज्ञान से उनकर पाप दूर हो जाला.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.17।। व्याख्या--[परमात्मतत्त्वका अनुभव करनेके लिये दो प्रकारके साधन हैं एक तो विवेकके द्वारा असत्का त्याग करनेपर सत्में स्वरूप-स्थिति स्वतः हो जाती है और दूसरा, सत्का चिन्तन करते-करते सत्की प्राप्ति हो जाती है। चिन्तनसे सत्की ही प्राप्ति होती है। असत्की प्राप्ति कर्मोंसे होती है, चिन्तनसे नहीं। उत्पत्ति-विनाशशील वस्तु कर्मसे मिलती है और नित्य परिपूर्ण तत्त्व चिन्तनसे मिलता है। चिन्तनसे परमात्मा कैसे प्राप्त होते हैं--इसकी विधि इस श्लोकमें बताते हैं।]'तद्बुद्धयः' निश्चय करनेवाली वृत्तिका नाम 'बुद्धि' है। साधक पहले बुद्धिसे यह निश्चय करे कि सर्वत्र एक परमात्मतत्त्व ही परिपूर्ण है। संसारके उत्पन्न होनेसे पहले भी परमात्मा थे और संसारके नष्ट होनेके बाद भी परमात्मा रहेंगे। बीचमें भी संसारका जो प्रवाह चल रहा है, उसमें भी परमात्मा वैसे-के-वैसे ही हैं। इस प्रकार परमात्माकी सत्ता-(होनेपन-) में अटल निश्चय होना ही 'तद्बुद्धयः' पदका तात्पर्य है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जो प्रकाशित हुआ परमज्ञान है उस परमार्थतत्त्वमें जिनकी बुद्धि जा पहुँची है वे तद्बुद्धि हैं वह परब्रह्म ही जिनका आत्मा है वे तदात्मा हैं उस ब्रह्ममें ही जिनकी निष्ठादृढ़ आत्मभावनातत्परता है अर्थात् जो सब कर्मोंका संन्यास करके ब्रह्ममें ही स्थित हो गये हैं वे तन्निष्ठ हैं। वह परब्रह्म ही जिनका परम अयनआश्रय परमगति है अर्थात् जो केवल आत्मामें ही रत हैं वे तत्परायण हैं ( इस प्रकार ) जिनके अन्तःकरणका अज्ञान ज्ञानद्वारा नष्ट हो गया है एवं उपर्युक्त ज्ञानद्वारा संसारके कारणरूप पापादि दोष जिनके नष्ट हो चुके हैं ऐसे ज्ञाननिर्धूतकल्मष संन्यासी अपुनरावृत्तिको अर्थात् जिस अवस्थाको प्राप्त कर लेनेपर फिर देहसे सम्बन्ध होना छूट जाता है ऐसी अवस्थाको प्राप्त होते हैं।

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Sri Anandgiri

विदुषां विविदिषूणां चान्तरङ्गाणि विद्यापरिपाकसाधनानीत्युपदिदिक्षुरुत्तरश्लोकस्यापेक्षितं पूरयति यत्परमिति। तस्मिन्परमार्थतत्त्वे परस्मिन्ब्रह्मणि बाह्यं विषयमपोह्य गता प्रवृत्ता श्रवणमनननिदिध्यासनैरसकृदनुष्ठितैर्बुद्धिः साक्षात्कारलक्षणा येषां ते तथेति प्रथमविशेषणं विभजते तस्मिन्निति। तर्हि बोद्धा जीवो बोद्धव्यं ब्रह्मेति जीवब्रह्मभेदाभ्युपगमो नेत्याह तदात्मान इति। कल्पितं बोद्धृबोद्धव्यत्वं वस्तुतस्तु न भेदोऽस्तीत्यङ्गीकृत्य व्याचष्टे तदेवेति। ननु देहादावात्माभिमानमपनीय ब्रह्मण्येवाहमस्मीत्यवस्थानं तत्तदनुष्ठीयमानकर्मप्रतिबन्धान्न सिध्यतीत्याशङ्क्य विशेषणान्तरमादत्ते तन्निष्ठा इति। तत्र निष्ठाशब्दार्थं दर्शयन्विवक्षितमर्थमाह निष्ठेत्यादिना। तथापि पुरुषार्थान्तरापेक्षाप्रतिबन्धात्कथंयथोक्ते ब्रह्मण्येवावस्थानं सेद्धुं पारयति तत्राह तत्परायणाश्चेति। यथोक्तानामधिकारिणां परमपुरुषार्थस्योक्तब्रह्मानतिरेकान्नान्यत्रासक्तिरिति तात्पर्यार्थमाह केवलेति। ननु यथोक्तविशेषणवतां वर्तमानदेहपातेऽपि देहान्तरपरिग्रहव्यग्रतया कुतो यथोक्ते ब्रह्मण्यवस्थानमास्थातुं शक्यते तत्राह ते गच्छन्तीति। सति संसारकारणे दुरितादौ संसारप्रसरस्य दुर्वारत्वान्नापुनरावृत्तिसिद्धिरित्याशङ्क्याह ज्ञानेति। उक्तविशेषसंपत्त्या दर्शितफलशालित्वमाश्रमान्तरेष्वसंभावितमिति मन्वानो विशिनष्टि यतय इति।

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Sri Dhanpati

तत्परमार्थतत्त्वं ज्ञानप्रकाशितं तस्मिन्गता बुद्धिर्येषां ते। ननु ते किं तस्माद्य्वतिरिक्ता नेत्याह। तदेव परंब्रह्मात्मा स्वरुपं येषां ते। तत्र हेतुमाह। यतस्तस्मिन्ब्रह्मणि निष्ठा निदिध्यासनात्मकोऽभिनिवेशो येषां ते। तत्रापि हेतुमाह। यतस्तदेव परमयनं परा गतिर्येषां ते तदेव परां गतिं बुद्ध्वा इहामुत्रार्थभोगे विरज्य तत्छ्रवणतन्मननैकपरत्वेन तत्पराणा इत्यर्थः। एवंभूता अपुनरावृत्तिं मोक्षं गच्छन्ति। यतो ज्ञानेन ब्रह्मात्मसाक्षात्कारेण नितरां मूलोच्छेदेन धूतो नाशितः कल्मषः पुनरावृत्तिकारणीभूतो येषां ते।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
tatbuddhayaḥ
tatātmānaḥ
tatniṣhṭhāḥ
tatparāyaṇāḥ
gachchhantigo
apunaḥāvṛittim
jñānaby knowledge
nirdhūtadispelled
kalmaṣhāḥsins
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 5.16
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्

परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञान-(विवक-) के द्वारा उस अज्ञानका नाश कर दिया है, उनका वह ज्ञान सूर्यकी तरह परमतत्त्व परमात्माको प्रकाशित कर देता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.18
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः

ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 17
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 17
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः। गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः

जिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है, जिनका मन तदाकार हो रहा है, जिनकी स्थिति परमात्मतत्वमें है, ऐसे परमात्मपरायण साधक ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति (परमगति) को प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ: "जिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है, जिनका मन तदाकार हो रहा है, जिनकी स्थिति परमात्मतत्वमें है, ऐसे परमात्मपरायण साधक ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति (परमगति) को प्राप्त होते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 17?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 17 translates to: "Their intellect absorbed in That, their self being That, established in That, with That as their supreme goal, they go whence there is no return, their sins dispelled by knowledge. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः। गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 17 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। जिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है, जिनका मन तदाकार हो रहा है, जिनकी स्थिति परमात्मतत्वमें है, ऐसे परमात्मपरायण साधक ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति (परमगति) को प्राप्त होते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "tad-buddhayas tad-ātmānas tan-niṣhṭhās tat-parāyaṇāḥ" mean in English?

"tad-buddhayas tad-ātmānas tan-niṣhṭhās tat-parāyaṇāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 17. Their intellect absorbed in That, their self being That, established in That, with That as their supreme goal, they go whence there is no return, their sins dispelled by knowledge. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.