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Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 16
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्

परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञान-(विवक-) के द्वारा उस अज्ञानका नाश कर दिया है, उनका वह ज्ञान सूर्यकी तरह परमतत्त्व परमात्माको प्रकाशित कर देता है। — VaniSagar

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TamilIND

ஆனால் யாருடைய அறியாமை தன்னைப் பற்றிய அறிவால் அழிக்கப்படுகிறதோ, அவர்களுக்கு, சூரியனைப் போல, ஞானம் பரம பிரம்மத்தை வெளிப்படுத்துகிறது.

KannadaIND

ಆದರೆ ಯಾರ ಅಜ್ಞಾನವು ಆತ್ಮಜ್ಞಾನದಿಂದ ನಾಶವಾಗುತ್ತದೆಯೋ ಅವರಿಗೆ ಸೂರ್ಯನಂತೆ ಜ್ಞಾನವು ಪರಮ ಬ್ರಹ್ಮವನ್ನು ತಿಳಿಸುತ್ತದೆ.

MalayalamIND

എന്നാൽ ആത്മജ്ഞാനത്താൽ അജ്ഞത നശിപ്പിച്ചവർക്ക്, സൂര്യനെപ്പോലെ, അറിവ് പരമബ്രഹ്മത്തെ വെളിപ്പെടുത്തുന്നു.

MarathiIND

परंतु सूर्याप्रमाणे ज्यांचे अज्ञान आत्मज्ञानाने नष्ट होते, त्यांना ज्ञान परब्रह्म प्रकट करते.

SindhiIND

پر جن جي جهالت نفس جي علم سان ناس ٿئي ٿي، سج وانگر، علم برهمڻ کي ظاهر ڪري ٿو.

BengaliIND

কিন্তু সূর্যের ন্যায় আত্মজ্ঞানের দ্বারা যাদের অজ্ঞতা বিনষ্ট হয়, তাদের কাছে জ্ঞান পরমব্রহ্মকে প্রকাশ করে।

TeluguIND

అయితే ఆత్మజ్ఞానం వల్ల ఎవరి అజ్ఞానం నశించిపోతుందో వారికి, సూర్యునివలె, జ్ఞానము పరమ బ్రహ్మను వెల్లడిస్తుంది.

NepaliIND

तर जसको अज्ञान आत्माको ज्ञानले नष्ट हुन्छ, सूर्य जस्तै ज्ञानले परम ब्रह्मलाई प्रकट गर्दछ।

PunjabiIND

ਪਰ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅਗਿਆਨਤਾ ਆਤਮ ਦੇ ਗਿਆਨ ਦੁਆਰਾ ਨਾਸ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਸੂਰਜ ਵਾਂਗ, ਗਿਆਨ ਪਰਮ ਬ੍ਰਹਮ ਨੂੰ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਦਾ ਹੈ।

GujaratiIND

પરંતુ જેમનું અજ્ઞાન આત્માના જ્ઞાનથી નાશ પામે છે, તેઓને સૂર્યની જેમ જ્ઞાન પરમ બ્રહ્મને પ્રગટ કરે છે.

AssameseIND

কিন্তু যিসকলৰ অজ্ঞানতা সূৰ্য্যৰ দৰে আত্মজ্ঞানৰ দ্বাৰা ধ্বংস হয়, তেওঁলোকৰ বাবে জ্ঞানে পৰম ব্ৰহ্ম প্ৰকাশ কৰে।

BhojpuriIND

बाकिर जिनकर अज्ञान आत्म ज्ञान से नाश हो जाला, सूर्य निहन, ज्ञान परम ब्रह्म के प्रकट करेला।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.16।। व्याख्या--'ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः'--पीछेके श्लोकमें कही बातसे विलक्षण बात बतानेके लिये यहाँ 'तु'पदका प्रयोग किया गया है।पीछेके श्लोकमें जिसको 'अज्ञानेन' पदसे कहा था, उसको ही यहाँ 'तत् अज्ञानम्' पदसे कहा गया है।अपनी सत्ताको और शरीरको अलग-अलग मानना 'ज्ञान' है और एक मानना 'अज्ञान' है।उत्पत्ति-विनाशशील संसारके किसी अंशमें तो हमने अपनेको रख लिया अर्थात् मैं-पन (अहंता) कर लिया और किसी अंशको अपनेमें रख लिया अर्थात् मेरापन (ममता) कर लिया। अपनी सत्ताका तो निरन्तर अनुभव होता है और मैं-मेरापन बदलता हुआ प्रत्यक्ष दीखता है; जैसे--पहले मैं बालक था और खिलौने आदि मेरे थे, अब मैं युवा या वृद्ध हूँ और स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदि मेरे हैं। इस प्रकार मैं-मेरेपनके परिवर्तनका ज्ञान हमें है, पर अपनी सत्ताके परिवर्तनका ज्ञान हमें नहीं है--यह ज्ञान अर्थात् विवेक है।मैं-मेरेपनको जडके साथ न मिलाकर साधक अपने-विवेकको महत्त्व दे कि मैं-मेरापन जिससे मिलाता हूँ, वह सब बदलता है; परन्तु मैं-मेरा कहलानेवाला मैं (मेरी सत्ता) वही रहता हूँ। जडका बदलना और अभाव तो समझमें आता है, पर स्वयंका बदलना और अभाव किसीकी समझमें नहीं आता; क्योंकि स्वयंमें किञ्चित् भी परिवर्तन और अभाव कभी होता ही नहीं--इस विवेकके द्वारा मैं-मेरेपनका त्याग कर दे कि शरीर 'मैं' नहीं और बदलनेवाली वस्तु 'मेरी' नहीं। यही विवेकके द्वारा अज्ञानका नाश करना है। परिवर्तनशीलके साथ अपरिवर्तनशीलका सम्बन्ध अज्ञानसे अर्थात् विवेकको महत्त्व न देनेसे है। जिसने विवेकको जाग्रत् करके परिवर्तनशील मैं-मेरेपनके सम्बन्धका विच्छेद कर दिया है, उसका वह विवेक सच्चिदानन्दघन परमात्माको प्रकाशित कर देता है अर्थात् अनुभव करा देता है।'तेषामादित्यव़ज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्' विवेकके सर्वथा जाग्रत् होनेपर परिवर्तनशीलकी निवृत्ति हो जाती है। परिवर्तनशीलकी निवृत्ति होनेपर अपने स्वरूपका स्वच्छ बोध हो जाता है जिसके होते ही सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मतत्त्व प्रकाशित हो जाता है अर्थात् उसके साथ अभिन्नताका अनुभव हो जाता है।यहाँ 'परम' पद परमात्मतत्त्वके लिये प्रयुक्त हुआ है। दूसरे अध्यायके उनसठवें श्लोकमें तथा तेरहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भी परमात्मतत्त्वके लिये 'परम' पद आया है।'प्रकाशयति' पदका तात्पर्य है कि सूर्यका उदय होनेपर नयी वस्तुका निर्माण नहीं होता, प्रत्युत अन्धकारसे ढके जानेके कारण जो वस्तु दिखायी नहीं दे रही थी, वह दीखने लग जाती है। इसी प्रकार परमात्मतत्त्व स्वतःसिद्ध है, पर अज्ञानके कारण उसका अनुभव नहीं हो रहा था। विवेकके द्वारा अज्ञान मिटते ही उस स्वतःसिद्ध परमात्मतत्त्वका अनुभव होने लग जाता है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

जिन जीवोंके अन्तःकरणका वह अज्ञान जिस अज्ञानसे आच्छादित हुए जीव मोहित होते हैं आत्मविषयक विवेकज्ञानद्वारा नष्ट हो जाता है उनका वह ज्ञान सूर्यकी भाँति उस परम परमार्थतत्त्वको प्रकाशित कर देता है। अर्थात् जैसे सूर्य समस्त रूपमात्रको प्रकाशित कर देता है वैसे ही उनका ज्ञान समस्त ज्ञेय वस्तुको प्रकाशित कर देता है।

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Sri Anandgiri

तर्हि सर्वेषामनाद्यज्ञानावृतज्ञानत्वाद्व्यामोहाभावाच्च कुतः संसारनिवृत्तिरिति तत्राह ज्ञानेनेति। सर्वमिति पूर्णत्वमुच्यते ज्ञेयस्यैव वस्तुनस्तत्परमिति विशेषणम्। तद्व्याचष्टे परमार्थतत्त्वमिति।

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Sri Dhanpati

तर्हि सर्वेषामनादिभावरुपाज्ञानावृतज्ञानत्वाद्य्वामोहस्य निवृत्त्यभावात्संसारनिवृत्तिः कथं स्यादिति तत्राह ज्ञानेनेति। ज्ञानेन तु गुरुपदिष्टेन शास्त्रीयेण विवेकज्ञानेन स्वपरमार्थस्वरुपविषयेण तदज्ञानं कर्तृत्वादिविनिर्मुक्तं ब्रह्माहमस्मीति परमात्माभेदास्तित्वज्ञानावरकं येषां मुमुक्षूणां नाशितं तेषामादित्यवत् यथादित्योऽस्तित्वेन भान्तमपि घटादिवस्तु तद्गतसमस्तरुपा भानापादकं तमो निवर्त्य प्रकाशयति तथा गुरुपदिष्टं ज्ञानं भावनाप्रकर्षेण भानावरणमज्ञानमपि निवर्त्य तत् श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणादौ प्रसिद्धं परं परमार्थतत्त्वं प्रकाशयति सच्चिदानन्दानन्तात्मकं ब्रह्माहमस्मीति साक्षाद्य्वक्तीकरोतीत्यर्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
jñānenaby divine knowledge
tubut
tatthat
ajñānamignorance
yeṣhāmwhose
nāśhitamhas been destroyed
ātmanaḥof the self
teṣhāmtheir
ādityavat
jñānamknowledge
prakāśhayatiillumines
tatthat
paramSupreme Entity
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 5.15
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः

सर्वव्यापी परमात्मा न किसीके पापकर्मको और न शुभकर्मको ही ग्रहण करता है; किन्तु अज्ञानसे ज्ञान ढका हुआ है, उसीसे सब जीव मोहित हो रहे हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.17
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः। गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः

जिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है, जिनका मन तदाकार हो रहा है, जिनकी स्थिति परमात्मतत्वमें है, ऐसे परमात्मपरायण साधक ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति (परमगति) को प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 16
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 16
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्

परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञान-(विवक-) के द्वारा उस अज्ञानका नाश कर दिया है, उनका वह ज्ञान सूर्यकी तरह परमतत्त्व परमात्माको प्रकाशित कर देता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ: "परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञान-(विवक-) के द्वारा उस अज्ञानका नाश कर दिया है, उनका वह ज्ञान सूर्यकी तरह परमतत्त्व परमात्माको प्रकाशित कर देता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 16?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 16 translates to: "But to those whose ignorance is destroyed by knowledge of the Self, like the sun, knowledge reveals the Supreme Brahman. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 16 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञान-(विवक-) के द्वारा उस अज्ञानका नाश कर दिया है, उनका वह ज्ञान सूर्यकी तरह परमतत्त्व परमात्माको प्रकाशित कर देता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "jñānena tu tad ajñānaṁ yeṣhāṁ nāśhitam ātmanaḥ" mean in English?

"jñānena tu tad ajñānaṁ yeṣhāṁ nāśhitam ātmanaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 16. But to those whose ignorance is destroyed by knowledge of the Self, like the sun, knowledge reveals the Supreme Brahman. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.